भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 528

आत्मानमर्जुनोऽपश्यद् गगने सहकेशवम् ॥ २३ ॥
तब शुभ लक्षणोंसे युक्त ब्राह्म मुहूर्तमें ध्यानस्थ होनेपर अर्जुनने अपने-आपको भगवान् श्रीकृष्णके साथ आकाशमें जाते देखा ॥ २३ ॥

पुण्यं हिमवतः पादं मणिमन्तं च पर्वतम् ।
ज्योतिर्भिंश्च समाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥ २४ ॥
पवित्र हिमालयके शिखर तथा तेजःपुंजसे व्याप्त एवं सिद्धों और चारणोंसे सेवित मणिमान् पर्वतको भी देखा ॥ २४ ॥

वायुवेगगतिः पार्थः खं भेजे सहकेशवः ।
केशवेन गृहीतः स दक्षिणे विभुना भुजे ॥ २५ ॥
उस समय अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णके साथ वायुवेगके समान तीव्रगतिसे आकाशमें बहुत ऊँचे उठ गये। भगवान् केशवने उनकी दाहिनी बाँह पकड़ रखी थी ॥ २५ ॥

प्रेक्षमाणो बहून् भावान् जगामाद्भुतदर्शनान् ।
उदीच्यां दिशि धर्मात्मा सोऽपश्यच्छ्वेतपर्वतम् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् धर्मात्मा अर्जुनने अद्भुत दिखायी देनेवाले बहुत-से पदार्थोंको देखते हुए क्रमशः उत्तर-दिशामें जाकर श्वेत पर्वतका दर्शन किया ॥ २६ ॥

कुबेरस्य विहारे च नलिनीं पद्मभूषिताम् ।
सरिच्छ्रेष्ठां च तां गङ्गां वीक्षमाणो बहुदकाम् ॥ २७ ॥
इसके बाद उन्होंने कुबेरके उद्यानमें कमलोंसे विभूषित सरोवर तथा अगाध जलराशिसे भरी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाका अवलोकन किया ॥ २७ ॥

सदा पुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतं स्फटिकोपलाम् ।
सिंहव्याघ्रसमाकीर्णां नानामृगसमाकुलाम् ॥ २८ ॥
गंगाके तटपर स्फटिकमणिमय पत्थर सुशोभित होते थे। सदा फूल और फलोंसे भरे हुए वृक्षसमूह वहाँकी शोभा बढ़ा रहे थे। गंगाके उस तटप्रान्तमें बहुत-से सिंह और व्याघ्र विचरण करते थे। नाना प्रकारके मृग वहाँ सब ओर भरे हुए थे ॥ २८ ॥

पुण्याश्रमवतीं रम्यां मनोज्ञाण्डजसेविताम् ।
मन्दरस्य प्रदेशांश्च किन्नरोद्गीतनादितान् ॥ २९ ॥
अनेक पवित्र आश्रमोंसे युक्त और मनोहर पक्षियोंसे सेवित रमणीय गंगानदीका दर्शन करते हुए आगे बढ़नेपर उन्हें मन्दराचलके प्रदेश दिखायी दिये, जो किन्नरोंके उच्चस्वरसे गाये हुए मधुर गीतोंसे मुखरित हो रहे थे ॥ २९ ॥

हेमरूप्यमयैः शृङ्गर्ना नौषधिविदीपितान् ।
तथा मन्दारवृक्षैश्च पुष्पितैरुपशोभितान् ॥ ३० ॥
सोने और चाँदीके शिखर तथा फूलोंसे भरे हुए पारिजातके वृक्ष उन पर्वतीय प्रान्तोंकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा भाँति-भाँतिकी तेजोमयी ओषधियाँ वहाँ अपना प्रकाश फैला रही