महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 747, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिकी अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और सम्मानपूर्वक विदा होकर उनका प्रस्थान तथा साथ आते हुए भीमको युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये लौटा देना
संजय उवाच
धर्मराजस्य तद् वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः ।
स पार्थाद् भयमाशंसन् परित्यागान्महीपतेः ॥ १ ॥
अपवादं ह्यात्मनश्च लोकात् पश्यन् विशेषतः ।
ते मां भीतमिति ब्रूयुरायान्तं फाल्गुनं प्रति ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! धर्मराजका वह कथन सुनकर शिनिप्रवर सात्यकिके मनमें राजाको छोड़कर जानेसे अर्जुनके अप्रसन्न होनेकी आशंका उत्पन्न हुई। विशेषतः उन्हें अपने लिये लोकापवादका भय दिखायी देने लगा। वे सोचने लगे—मुझे अर्जुनकी ओर आते देख सब लोग यही कहेंगे कि यह डरकर भाग आया है ॥ १-२ ॥
निश्चित्य बहुधैवं स सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ।
धर्मराजमिदं वाक्यमब्रवीत् पुरुषर्षभः ॥ ३ ॥
युद्धमें दुर्जय वीर पुरुषरत्न सात्यकिने इस प्रकार भाँति-भाँतिसे विचार करके धर्मराजसे यह बात कही— ॥ ३ ॥
कृतां चेन्मन्यसे रक्षां स्वस्ति तेऽस्तु विशाम्पते ।
अनुयास्यामि बीभत्सुं करिष्ये वचनं तव ॥ ४ ॥
'प्रजानाथ! यदि आप अपनी रक्षाकी व्यवस्था की हुई मानते हैं तो आपका कल्याण हो। मैं अर्जुनके पास जाऊँगा और आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ४ ॥
न हि मे पाण्डवात् कश्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
यो मे प्रियतरो राजन् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
'राजन्! मैं आपसे सच कहता हूँ कि तीनों लोकोंमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो मुझे पाण्डुनन्दन अर्जुनसे अधिक प्रिय हो ॥ ५ ॥
तस्याहं पदवीं यास्ये संदेशात् तव मानद ।