भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 959, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 959

शूराणां हर्षजननी भीरूणां भयवर्धिनी ॥ १५ ॥ तदनन्तर रणभूमिमें रक्तकी भयंकर नदी बह चली, जो शूरवीरोंको हर्ष देनेवाली और भीरु पुरुषोंका भय बढ़ानेवाली थी ॥ १५ ॥ वारणाश्वमनुष्याणां रुधिरौघसमुद्भवा । संवृता गतसत्त्वैश्च मनुष्यगजवाजिभिः ॥ १६ ॥ हाथी, घोड़े और मनुष्योंके रुधिरसमूहसे उस नदीका प्राकट्य हुआ था। वह प्राणशून्य मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे घिरी हुई थी ॥ १६ ॥ सानुकर्षपताकैश्च द्विपाश्वरथभूषणैः । स्यन्दनैरपविद्धैश्च भग्नचक्राक्षकूबरैः ॥ १७ ॥ जातरूपपरिष्कारैर्धनुर्भिः सुमहास्वनैः । सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्नाराचैश्च सहस्रशः ॥ १८ ॥ कर्णपाण्डवनिर्मुक्तैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः । प्रासतोमरसंघातैः खड्गैश्च सपरश्वधैः ॥ १९ ॥ सुवर्णविकृतैश्चापि गदामुसलपट्टिशैः । ध्वजैश्च विविधाकारैः शक्तिभिः परिघैरपि ॥ २० ॥ शतघ्नीभिश्च चित्राभिर्बभौ भारत मेदिनी । भारत! उस समय अनुकर्ष, पताका, हाथी, घोड़े, रथ, आभूषण, टूटकर बिखरे हुए स्यन्दन (रथ), टूक-टूक हुए पहिये, धुरी और कूबर, सुवर्णभूषित एवं महान् टंकार शब्द करनेवाले धनुष, सोनेके पंखवाले बाण, केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान कर्ण और भीमसेनके छोड़े हुए सहस्रों नाराच, प्रास, तोमर, खड्ग, फरसे, सोनेकी गदा, मुसल, पट्टिश, भाँति-भाँतिके ध्वज, शक्ति, परिघ और विचित्र शतघ्नी आदिसे उस रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ १७—२० १/२ ॥ कनकाङ्गदहारैश्च कुण्डलैर्मुकुटैस्तथा ॥ २१ ॥ वलयैरपविद्धैश्च तत्रैवाङ्गुलिवेष्टकैः । चूडामणिभिरुष्णीषैः स्वर्णसूत्रैश्च मारिष ॥ २२ ॥ तनुत्रैः सतलत्रैश्च हारैर्निष्कैश्च भारत । वस्त्रैश्चछत्रैश्च विध्वस्तैश्चामरव्यजनैरपि ॥ २३ ॥ गजाश्वमनुजैर्भिन्नैः शोणिताक्तैश्च पत्रिभिः । तैस्तैश्च विविधैर्भिन्नैस्तत्र तत्र वसुंधरा ॥ २४ ॥ पतितैरपविद्धैश्च विबभौ द्यौरिव ग्रहैः ।

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