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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

शूराणां हर्षजननी भीरूणां भयवर्धिनी ॥ १५ ॥ तदनन्तर रणभूमिमें रक्तकी भयंकर नदी बह चली, जो शूरवीरोंको हर्ष देनेवाली और भीरु पुरुषोंका भय बढ़ानेवाली थी ॥ १५ ॥ वारणाश्वमनुष्याणां रुधिरौघसमुद्भवा । संवृता गतसत्त्वैश्च मनुष्यगजवाजिभिः ॥ १६ ॥ हाथी, घोड़े और मनुष्योंके रुधिरसमूहसे उस नदीका प्राकट्य हुआ था। वह प्राणशून्य मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे घिरी हुई थी ॥ १६ ॥ सानुकर्षपताकैश्च द्विपाश्वरथभूषणैः । स्यन्दनैरपविद्धैश्च भग्नचक्राक्षकूबरैः ॥ १७ ॥ जातरूपपरिष्कारैर्धनुर्भिः सुमहास्वनैः । सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्नाराचैश्च सहस्रशः ॥ १८ ॥ कर्णपाण्डवनिर्मुक्तैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः । प्रासतोमरसंघातैः खड्गैश्च सपरश्वधैः ॥ १९ ॥ सुवर्णविकृतैश्चापि गदामुसलपट्टिशैः । ध्वजैश्च विविधाकारैः शक्तिभिः परिघैरपि ॥ २० ॥ शतघ्नीभिश्च चित्राभिर्बभौ भारत मेदिनी । भारत! उस समय अनुकर्ष, पताका, हाथी, घोड़े, रथ, आभूषण, टूटकर बिखरे हुए स्यन्दन (रथ), टूक-टूक हुए पहिये, धुरी और कूबर, सुवर्णभूषित एवं महान् टंकार शब्द करनेवाले धनुष, सोनेके पंखवाले बाण, केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान कर्ण और भीमसेनके छोड़े हुए सहस्रों नाराच, प्रास, तोमर, खड्ग, फरसे, सोनेकी गदा, मुसल, पट्टिश, भाँति-भाँतिके ध्वज, शक्ति, परिघ और विचित्र शतघ्नी आदिसे उस रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ १७—२० १/२ ॥ कनकाङ्गदहारैश्च कुण्डलैर्मुकुटैस्तथा ॥ २१ ॥ वलयैरपविद्धैश्च तत्रैवाङ्गुलिवेष्टकैः । चूडामणिभिरुष्णीषैः स्वर्णसूत्रैश्च मारिष ॥ २२ ॥ तनुत्रैः सतलत्रैश्च हारैर्निष्कैश्च भारत । वस्त्रैश्चछत्रैश्च विध्वस्तैश्चामरव्यजनैरपि ॥ २३ ॥ गजाश्वमनुजैर्भिन्नैः शोणिताक्तैश्च पत्रिभिः । तैस्तैश्च विविधैर्भिन्नैस्तत्र तत्र वसुंधरा ॥ २४ ॥ पतितैरपविद्धैश्च विबभौ द्यौरिव ग्रहैः ।

माननीय भरतनन्दन! इधर-उधर पड़े हुए सोनेके अंगद, हार, कुण्डल, मुकुट, वलय, अंगूठी, चूड़ामणि, उष्णीष, सुवर्णमय सूत्र, कवच, दस्ताने, हार, निष्क, वस्त्र, छत्र, टूटे हुए चँवर, व्यजन, विदीर्ण हुए हाथी, घोड़े, मनुष्य, खूनसे लथपथ हुए पंखयुक्त बाण आदि नाना प्रकारकी छिन्न-भिन्न, पतित और फेंकी हुई वस्तुओंसे वहाँकी भूमि ग्रहोंसे आकाशकी भाँति सुशोभित हो रही थी॥ २१—२४ १/२॥

अचिन्त्यमद्भुतं चैव तयोः कर्मातिमानुषम् ॥ २५ ॥ दृष्ट्वा चारणसिद्धानां विस्मयः समजायत ।

उन दोनोंके उस अचिन्त्य, अलौकिक और अद्भुत कर्मको देखकर चारणों और सिद्धोंके मनमें भी महान् विस्मय हो गया॥ २५ १/२॥

अग्नेर्वायुसहायस्य गतिः कक्ष इवाहवे ॥ २६ ॥ आसीद् भीमसहायस्य रौद्रमाधिरथेर्गतम् ।

जैसे वायुकी सहायता पाकर सूखे वनमें तथा घास-फूसमें अग्निकी गति बढ़ जाती है, उसी प्रकार उस महायुद्धमें भीमसेनके साथ सूतपुत्र कर्णकी भयंकर गति बढ़ गयी थी॥ २६ १/२॥

निपातितध्वजरथं हतवाजिनरद्विपम् ॥ २७ ॥ गजाभ्यां सम्प्रयुक्ताभ्यामासीन्नलवनं यथा । मेघजालनिभं सैन्यमासीत् तव नराधिप ॥ २८ ॥ विमर्दः कर्णभीमाभ्यामासीच्च परमो रणे ।

नरेश्वर! जैसे दो हाथी किसीसे प्रेरित होकर नरकुलके वनको रौंद डालते हैं, उसी प्रकार मेघोंकी घटाके समान आपकी सेना बड़ी दुरवस्थामें पड़ गयी थी। उसके रथ और ध्वज गिराये जा चुके थे। हाथी, घोड़े और मनुष्य मारे गये थे। कर्ण और भीमसेनने उस युद्धस्थलमें महान् संहार मचा रखा था॥ २७-२८ १/२॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमकर्णयुद्धे अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीम और कर्णका युद्धविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३८॥

१३९-

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एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध, पहले भीमकी और पीछे कर्णकी विजय, उसके बाद अर्जुनके बाणोंसे व्यथित होकर कर्ण और अश्वत्थामाका पलायन

संजय उवाच

ततः कर्णो महाराज भीमं विद्ध्वा त्रिभिः शरैः ।
मुमोच शरवर्षाणि विचित्राणि बहूनि च ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! तदनन्तर कर्णने तीन बाणोंसे भीमसेनको घायल करके उनपर बहुत-से विचित्र बाण बरसाये ॥ १ ॥

वध्यमानो महाबाहुः सूतपुत्रेण पाण्डवः ।
न विव्यथे भीमसेनो भिद्यमान इवाचलः ॥ २ ॥
सूतपुत्रके द्वारा बेधे जानेपर भी महाबाहु पाण्डुपुत्र भीमसेनको विद्ध होनेवाले पर्वतके समान तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥ २ ॥

स कर्णं कर्णिना कर्णे पीतेन निशितेन च ।
विव्याध सुभृशं संख्ये तैलधौतेन मारिष ॥ ३ ॥
माननीय नरेश! फिर उन्होंने भी युद्धस्थलमें तेलके धोये हुए पानीदार तीखे 'कर्णी' नामक बाणसे कर्णके कानमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३ ॥

स कुण्डलं महच्चारु कर्णस्यापातयद् भुवि ।
तपनीयं महाराज दीप्तं ज्योतिरिवाम्बरात् ॥ ४ ॥
महाराज! भीमने कर्णके सोनेके बने हुए विशाल एवं सुन्दर कुण्डलको आकाशसे चमकते हुए तारेके समान पृथ्वीपर काट गिराया ॥ ४ ॥

अथापरेण भल्लेन सूतपुत्रं स्तनान्तरे ।
आजघान भृशं क्रुद्धो हसन्निव वृकोदरः ॥ ५ ॥
तदनन्तर भीमसेनने अत्यन्त कुपित हो हँसते हुए-से दूसरे भल्लसे सूतपुत्रकी छातीमें बड़े जोरसे आघात किया ॥ ५ ॥

पुनरस्य त्वरन् भीमो नाराचान् दश भारत ।
रणे प्रैषीन्महाबाहुर्निर्मुक्ताशीविषोपमान् ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! फिर महाबाहु भीमने बड़ी उतावलीके साथ केंचुलसे छूटे हुए विषधर सर्पोंके समान दस नाराच उस रणक्षेत्रमें कर्णपर चलाये ॥ ६ ॥

ते ललाटं विनिर्भिद्य सूतपुत्रस्य भारत ।

विविशुश्चोदितास्तेन वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ७ ॥ भारत! उनके चलाये हुए वे नाराच सूतपुत्रका ललाट छेद करके बाँबीमें सर्पोंके समान उसके भीतर घुस गये ॥ ७ ॥

ललाटस्थैस्ततो बाणैः सूतपुत्रो व्यरोचत । नीलोत्पलमयीं मालां धारयन् वै यथा पुरा ॥ ८ ॥ ललाटमें स्थित हुए उन बाणोंद्वारा सूतपुत्रकी उसी प्रकार शोभा हुई, जैसे वह पहले मस्तकपर नील कमलकी माला धारण करके सुशोभित होता था ॥ ८ ॥

सोऽतिविद्धो भृशं कर्णः पाण्डवेन तरस्विना । रथकूबरमालम्ब्य न्यमीलयत लोचने ॥ ९ ॥ वेगवान् पाण्डुपुत्र भीमके द्वारा अत्यन्त घायल कर दिये जानेपर कर्णने रथके कूबरका सहारा लेकर आँखें बंद कर लीं ॥ ९ ॥

स मुहूर्तात् पुनः संज्ञां लेभे कर्णः परंतपः । रुधिरोक्षितसर्वाङ्गः क्रोधमाहारयत् परम् ॥ १० ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले कर्णको पुनः दो ही घड़ीके बाद चेत हो गया। उस समय उसका सारा शरीर रक्तसे भीग गया था। उस दशामें उसे बड़ा क्रोध हुआ ॥ १० ॥

ततः क्रुद्धो रणे कर्णः पीडितो दृढधन्वना । वेगं चक्रे महावेगो भीमसेनरथं प्रति ॥ ११ ॥ सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले भीमसेनसे पीड़ित हुए महान् वेगशाली कर्णने रणभूमिमें कुपित हो भीमसेनके रथकी ओर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ ११ ॥

तस्मै कर्णः शतं राजंस्तिक्ष्णां गार्ध्रवाससाम् । अमर्षी बलवान् क्रुद्धः प्रेषयामास भारत ॥ १२ ॥ राजन्! भरतनन्दन! अमर्षशील एवं क्रोधमें भरे हुए बलवान् कर्णने भीमसेनपर गीधके पंखवाले सौ बाण चलाये ॥ १२ ॥

ततः प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डवः । समरे तमनादृत्य तस्य वीर्यमचिन्तयन् ॥ १३ ॥ तब समरभूमिमें कर्णके पराक्रमको कुछ न समझते हुए उसकी अवहेलना करके पाण्डुनन्दन भीमसेनने उसके ऊपर भयंकर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ १३ ॥

कर्णस्ततो महाराज पाण्डवं नवभिः शरैः । आजघानोरसि क्रुद्धः क्रुद्धरूपं परंतप ॥ १४ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! तब कर्णने कुपित हो क्रोधमें भरे हुए पाण्डुपुत्र भीमसेनकी छातीमें नौ बाण मारे ॥ १४ ॥

तावुभौ नरशार्दूलौ शार्दूलाविव दंष्ट्रिणौ । जीमूताविव चान्योन्यं प्रववर्षतुराहवे ॥ १५ ॥

वे दोनों पुरुषसिंह दाढ़ोंवाले दो सिंहोंके समान परस्पर जूझ रहे थे और आकाशमें दो मेघोंके समान युद्धस्थलमें वे दोनों एक-दूसरेपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ १५ ॥
तलशब्दरवैश्चैव त्रासयेतां परस्परम् ।
शरजालैश्च विविधैस्त्रासयामासतुर्मृधे ॥ १६ ॥
अन्योन्यं समरे क्रुद्धौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ।
वे अपनी हथेलियोंके शब्दसे एक-दूसरेको डराते हुए युद्धस्थलमें विविध बाणसमूहोंद्वारा परस्पर त्रास पहुँचा रहे थे। वे दोनों वीर समरमें कुपित हो एक-दूसरेके किये हुए प्रहारका प्रतीकार करनेकी अभिलाषा रखते थे ॥ १६ १/२ ॥
ततो भीमो महाबाहुः सूतपुत्रस्य भारत ॥ १७ ॥
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा ननाद परवीरहा ।
भरतनन्दन! तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबाहु भीमसेनने क्षुरप्रके द्वारा सूतपुत्रके धनुषको काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १७ १/२ ॥
तदपास्य धनुश्छिन्नं सूतपुत्रो महारथः ॥ १८ ॥
अन्यत् कार्मुकमादत्त भारघ्नं वेगवत्तरम् ।
तब महारथी सूतपुत्र कर्णने उस कटे हुए धनुषको फेंककर भार निवारण करनेमें समर्थ और अत्यन्त वेगशाली दूसरा धनुष हाथमें लिया ॥ १८ १/२ ॥
तदप्यथ निमेषार्धाच्चिच्छेदास्य वृकोदरः ॥ १९ ॥
तृतीयं च चतुर्थं च पञ्चमं षष्ठमेव हि ।
सप्तमं चाष्टमं चैव नवमं दशमं तथा ॥ २० ॥
एकादशं द्वादशं च त्रयोदशमथापि च ।
चतुर्दशं पञ्चदशं षोडशं च वृकोदरः ॥ २१ ॥
परंतु भीमसेनने आधे निमेषमें ही उसे भी काट दिया। इसी प्रकार तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठे, सातवें, आठवें, नवें, दसवें, ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें, चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें धनुषको भी भीमसेनने काट डाला ॥ १९—२१ ॥
तथा सप्तदशं वेगादष्टादशमथापि वा ।
बहूनि भीमश्चिच्छेद कर्णस्यैवं धनूंषि हि ॥ २२ ॥
इतना ही नहीं, भीमने सत्रहवें, अठारहवें तथा और भी बहुत-से कर्णके धनुषोंको वेगपूर्वक काट दिया ॥ २२ ॥
निमेषार्धात् ततः कर्णो धनुर्हस्तो व्यतिष्ठत ।
दृष्ट्वा स कुरुसौवीरसिन्धुवीरबलक्षयम् ॥ २३ ॥
सवर्मध्वजशस्त्रैश्च पतितैः संवृतां महीम् ।
हस्त्यश्वरथदेहांश्च गतासून् प्रेक्ष्य सर्वशः ॥ २४ ॥
सूतपुत्रस्य संरम्भाद् दीप्तं वपुरजायत ।

इतनेपर भी कर्ण आधे ही निमेषमें दूसरा धनुष हाथमें लेकर खड़ा हो गया। कुरु, सौवीर तथा सिंधुदेशके वीरोंकी सेनाका विनाश, सब ओर गिरे हुए कवच, ध्वज तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे आच्छादित हुई भूमि और प्राणशून्य हाथी, घोड़े एवं रथियोंके शरीरोंको सब ओर देखकर सूतपुत्र कर्णका शरीर क्रोधसे उद्दीप्त हो उठा ।।

स विस्फार्य महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ।। २५ ।। भीमं प्रैक्षत राधेयो घोरं घोरेण चक्षुषा । उस समय राधानन्दन कर्णने कुपित हो अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषकी टंकार करते हुए भयानक भीमसेनको घोर दृष्टिसे देखा ।। २५ १/२ ।।

ततः क्रुद्धः शरानस्यन् सूतपुत्रो व्यरोचत ।। २६ ।। मध्यंदिनगतोऽर्चिष्मान् शरदीव दिवाकरः । तत्पश्चात् सूतपुत्र कुपित हो बाणोंकी वर्षा करता हुआ शरत्कालके दोपहरके तेजस्वी सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगा ।। २६ १/२ ।।

मरीचिविकचस्येव राजन् भानुमतो वपुः ।। २७ ।। आसीदाधिरथेर्घोरं वपुः शरशताचितम् । राजन्! अधिरथपुत्र कर्णका भयंकर शरीर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त था। वह किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान जान पड़ता था ।। २७ १/२ ।।

कराभ्यामाददानस्य संदधानस्य चाशुगान् ।। २८ ।। कर्षतो मुञ्चतो बाणान् नान्तरं ददृशे रणे । उस रणभूमिमें दोनों हाथोंसे बाणोंको लेते, धनुषपर रखते, खींचते और छोड़ते हुए कर्णके इन कार्योंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ।। २८ १/२ ।।

अग्निचक्रोपमं घोरं मण्डलीकृतमायुधम् ।। २९ ।। कर्णस्यासीन्महीपाल सव्यदक्षिणमस्यतः । भूपाल! दायें-बायें बाण चलाते हुए कर्णका मण्डलाकार धनुष अग्निचक्रके समान भयंकर प्रतीत होता था ।। २९ १/२ ।।

स्वर्णपुङ्खाः सुनिशिताः कर्णचापच्युताः शराः ।। ३० ।। प्राच्छादयन्महाराज दिशः सूर्यस्य च प्रभाः । महाराज! कर्णके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय पंखवाले अत्यन्त तीखे बाणोंने सम्पूर्ण दिशाओं तथा सूर्यकी प्रभाको भी ढक दिया ।। ३० १/२ ।।

ततः कनकपुङ्खानां शराणां नतपर्वणाम् ।। ३१ ।। धनुश्च्युतानां वियति ददृशे बहुधा व्रजः । तदनन्तर धनुषसे छूटे हुए झुकी हुई गाँठ तथा सुवर्णमय पंखवाले बहुत-से बाणोंके समूह आकाशमें दृष्टिगोचर होने लगे ।। ३१ १/२ ।।

बाणासनादाधिरथेः प्रभवन्ति स्म सायकाः ॥ ३२ ॥
श्रेणीकृता व्यरोचन्त राजन् क्रौञ्चा इवाम्बरे ।
राजन्! अधिरथपुत्रके धनुषसे जो बाण छूटते थे, वे श्रेणीबद्ध होकर आकाशमें क्रौंच पक्षियोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ३२ १/२ ॥
गार्ध्रपत्रान् शिलाधौतान् कार्तस्वरविभूषितान् ॥ ३३ ॥
महावेगान् प्रदीप्ताग्रान् मुमोचाधिरथिः शरान् ।
सूतपुत्रने गीधके पाँखवाले, शिलापर तेज किये, सुवर्णभूषित, महान् वेगशाली और प्रज्वलित अग्र-भागवाले बहुत-से बाण छोड़े ॥ ३३ १/२ ॥
ते तु चापबलोद्भूताः शातकुम्भविभूषिताः ॥ ३४ ॥
अजस्रमपतन् बाणा भीमसेनरथं प्रति ।
धनुषके बलसे उठे हुए वे सुवर्णभूषित बाण भीमसेनके रथपर लगातार गिर रहे थे ॥ ३४ १/२ ॥
ते व्योम्नि रुक्मविकृता व्यकाशन्त सहस्रशः ॥ ३५ ॥
शलभानामिव व्राताः शराः कर्णसमीरिताः ।
कर्णके चलाये हुए सहस्रों सुवर्णमय बाण आकाशमें टिड्डीदलोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३५ १/२ ॥
चापादाधिरथेर्बाणाः प्रपतन्तश्चकाशिरे ॥ ३६ ॥
एको दीर्घ इवात्यर्थमाकाशे संस्थितः शरः ।
सूतपुत्रके धनुषसे गिरते हुए बाण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो एक ही अत्यन्त विशाल-सा बाण आकाशमें खड़ा हो ॥ ३६ १/२ ॥
पर्वतं वारिधाराभिश्चादयन्निव तोयदः ॥ ३७ ॥
कर्णः प्राच्छादयत् क्रुद्धो भीमं सायकवृष्टिभिः ।
क्रोधमें भरे हुए कर्णने अपने बाणोंकी वर्षासे भीमसेनको उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे बादल जलकी धाराओंसे पर्वतको ढक देता है ॥ ३७ १/२ ॥
तत्र भारत भीमस्य बलं वीर्यं पराक्रमम् ॥ ३८ ॥
व्यवसायं च पुत्रास्ते ददृशुः सहसैनिकाः ।
भारत! वहाँ सैनिकोंसहित आपके पुत्रोंने भीमसेनके बल, वीर्य, पराक्रम और उद्योगको देखा ॥ ३८ १/२ ॥
तां समुद्रमिवोद्भूतां शरवृष्टिं समुत्थिताम् ॥ ३९ ॥
अचिन्तयित्वा भीमस्तु क्रुद्धः कर्णमुपाद्रवत् ।
क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने समुद्रकी भाँति उठी हुई उस बाण-वर्षाकी तनिक भी परवा न करके कर्णपर धावा बोल दिया ॥ ३९ १/२ ॥

रुक्मपृष्ठं महच्चापं भीमस्यासीद् विशाम्पते ॥ ४० ॥
आकर्षान्-मण्डलीभूतं शक्रचापमिवापरम् ।
तस्माच्छराः प्रादुरासन् पूरयन्त इवाम्बरम् ॥ ४१ ॥
प्रजानाथ! सुवर्णमय पृष्ठवाला भीमसेनका विशाल धनुष प्रत्यंचा खींचनेसे मण्डलाकार हो दूसरे इन्द्र-धनुषके समान प्रतीत हो रहा था। उससे जो बाण प्रकट होते थे, वे मानो आकाशको भर रहे थे ॥ ४०-४१ ॥
सुवर्णपुङ्खैर्भीमेन सायकैर्नतपर्वभिः ।
गगने रचिता माला काञ्चनीव व्यरोचत ॥ ४२ ॥
भीमसेनने झुकी हुई गाँठ और सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे आकाशमें सोनेकी माला-सी रच डाली थी, जो बड़ी शोभा पा रही थी ॥ ४२ ॥
ततो व्योम्नि विषक्तानि शरजालानि भागशः ।
आहतानि व्यशीर्यन्त भीमसेनस्य पत्रिभिः ॥ ४३ ॥
उस समय भीमसेनके बाणोंसे आहत होकर आकाशमें फैले हुए बाणोंके जाल टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गये ॥ ४३ ॥
कर्णस्य शरजालौघैर्भीमसेनस्य चोभयोः ।
अग्निसफुलिङ्गसंस्पर्शैरृजोगतिभिराहवे ॥ ४४ ॥
तैस्तैः कनकपुङ्खानां द्यौरासीत् संवृता व्रजैः ।
कर्ण और भीमसेन दोनोंके बाणसमूह स्पर्श करनेपर आगकी चिनगारियोंके समान प्रतीत होते थे। अनायास ही उनकी युद्धमें सर्वत्र गति थी। सुवर्णमय पंखवाले उन बाणोंके समूहसे सारा आकाश छा गया था ॥
न स्म सूर्यस्तदा भाति न स्म वाति समीरणः ॥ ४५ ॥
शरजालावृते व्योम्नि न प्राज्ञायत किंचन ।
उस समय न तो सूर्यका पता चलता था और न वायु ही चल पाती थी। बाणोंके समूहसे आच्छादित हुए आकाशमें कुछ भी जान नहीं पड़ता था ॥ ४५ १/२ ॥
स भीमं छादयन् बाणैः सूतपुत्रः पृथग्विधैः ॥ ४६ ॥
उपारोहदनादृत्य तस्य वीर्यं महात्मनः ।
सूतपुत्र कर्ण नाना प्रकारके बाणोंद्वारा भीमसेनको आच्छादित करता हुआ उन महामनस्वी वीरके पराक्रमका तिरस्कार करके उनपर चढ़ आया ॥ ४६ १/२ ॥
तयोर्विसृजतोस्तत्र शरजालानि मारिष ॥ ४७ ॥
वायुभूतान्यदृश्यन्त संसक्तानीतरेतरम् ।
माननीय नरेश! उन दोनोंके छोड़े हुए बाणसमूह वहाँ परस्पर सटकर अत्यन्त वेगके कारण वायुस्वरूप दिखायी देते थे ॥ ४७ १/२ ॥
अन्योन्यशरसंस्पर्शात् तयोर्मनुजसिंहयोः ॥ ४८ ॥

आकाशे भरतश्रेष्ठ पावकः समजायत ।
भरतश्रेष्ठ! उन दोनों पुरुषसिंहोंके बाणोंके परस्पर टकरानेसे आकाशमें आग प्रकट हो जाती थी ॥ ४८ १/२ ॥
तथा कर्णः शितान् बाणान् कर्मारपरिमार्जितान् ॥ ४९ ॥
सुवर्णविकृतान् क्रुद्धः प्राहिणोद् वधकाङ्क्षया ।
कर्णने कुपित होकर भीमसेनके वधकी इच्छासे सुनारके माँजे हुए सुवर्णभूषित तीखे बाणोंका प्रहार किया ॥ ४९ १/२ ॥
तानन्तरिक्षे विशिखैस्त्रिधैकैकमशातयत् ॥ ५० ॥
विशेषयन् सूतपुत्रं भीमस्तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
परन्तु भीमसेनने अपनेको सूतपुत्रसे विशिष्ट सिद्ध करते हुए बाणोंद्वारा आकाशमें उन बाणोंमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन टुकड़े कर डाले और कर्णसे कहा—'अरे! खड़ा रह' ॥ ५० १/२ ॥
पुनश्चासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डवः ॥ ५१ ॥
अमर्षी बलवान् क्रुद्धो दिधक्षन्निव पावकः ।
फिर क्रोध एवं अमर्षमें भरे हुए बलवान् भीमसेनने जलानेकी इच्छावाले अग्निदेवके समान भयंकर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ५१ १/२ ॥
ततश्चटचटाशब्दो गोधाघातादभूत् तयोः ॥ ५२ ॥
तलशब्दश्च सुमहान् सिंहनादश्च भैरवः ।
रथनेमिनिनादश्च ज्याशब्दश्चैव दारुणः ॥ ५३ ॥
उस समय उन दोनोंके गोहचर्मके बने हुए दस्तानोंके आघातसे चटाचटकी आवाज होने लगी। साथ ही हथेलीका शब्द और महाभयंकर सिंहनाद भी होने लगा। रथके पहियोंकी घरघराहट और प्रत्यंचाकी भयंकर टंकार भी कानोंमें पड़ने लगी ॥ ५२-५३ ॥
योधा व्युपरमन् युद्धाद् दिदृक्षन्तः पराक्रमम् ।
कर्णपाण्डवयो राजन् परस्परवधैषिणोः ॥ ५४ ॥
राजन्! परस्पर वधकी इच्छा रखनेवाले कर्ण और भीमसेनके पराक्रमको देखनेकी अभिलाषासे समस्त योद्धा युद्धसे उपरत हो गये ॥ ५४ ॥
देवर्षिसिद्धगन्धर्वाः साधु साध्वित्यपूजयन् ।
मुमुचुः पुष्पवर्षं च विद्याधरगणास्तथा ॥ ५५ ॥
देवता, ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व और विद्याधरगण 'साधु-साधु' कहकर उन दोनोंकी प्रशंसा और फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ ५५ ॥
ततो भीमो महाबाहुः संरम्भी दृढविक्रमः ।
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य शरैर्विव्याध सूतजम् ॥ ५६ ॥

तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सुदृढ़ पराक्रमी महाबाहु भीमसेनने अपने अस्त्रोंद्वारा कर्णके अस्त्रोंका निवारण करके उसे बाणोंसे बींध डाला ।। ५६ ।। कर्णोऽपि भीमसेनस्य निवार्येषून् महाबलः । प्राहिणोन्नव नाराचानाशीविषसमान् रणे ।। ५७ ।। महाबली कर्णने भी रणक्षेत्रमें भीमसेनके बाणोंका निवारण करके उनके ऊपर विषैले सर्पोंके समान नौ नाराच चलाये ।। ५७ ।। तावद्विरथ तान् भीमो व्योम्नि चिच्छेद पत्रिभिः । नाराचान् सूतपुत्रस्य तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।। ५८ ।। भीमसेनने उतने ही बाणोंसे आकाशमें सूतपुत्रके सारे नाराच काट डाले और उससे कहा 'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ततो भीमो महाबाहुः शरं क्रुद्धान्तकोपमम् । मुमोचाधिरथेर्वीरो यमदण्डमिवापरम् ।। ५९ ।। तत्पश्चात् महाबाहु वीर भीमसेनने कर्णके ऊपर ऐसा बाण चलाया, जो क्रुद्ध यमराजके समान तथा दूसरे यमदण्डके सदृश भयंकर था ।। ५९ ।। तमापतन्तं चिच्छेद राधेयः प्रहसन्निव । त्रिभिः शरैः शरं राजन् पाण्डवस्य प्रतापवान् ।। ६० ।। राजन्! अपने ऊपर आते हुए भीमसेनके उस बाणको प्रतापी राधानन्दन कर्णने तीन बाणोंद्वारा हँसते हुए-से काट डाला ।। ६० ।। पुनश्चासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डवः । तस्य तान्याददे कर्णः सर्वाण्यस्त्राण्यभीतवत् ।। ६१ ।। तब पाण्डुनन्दन भीमने पुनः भयानक बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी; परंतु कर्णने उन सब अस्त्रोंको निर्भयतापूर्वक आत्मसात् कर लिया ।। ६१ ।। युध्यमानस्य भीमस्य सूतपुत्रोऽस्त्रमायया । तस्येषुधी धनुर्ज्यां च बाणैः संनतपर्वभिः ।। ६२ ।। रश्मीन् योक्त्राणि चाश्वानां क्रुद्धः कर्णोऽच्छिनन्मृधे । तस्याश्वांश्च पुनहर्त्वा सूतं विव्याध पञ्चभिः ।। ६३ ।। क्रोधमें भरे हुए सूतपुत्र कर्णने अपने अस्त्रोंकी मायासे तथा झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा युद्धपरायण भीमसेनके दो तरकसों, धनुषकी प्रत्यंचा, बागडोर तथा घोड़े जोतनेकी रस्सियोंको भी युद्धस्थलमें काट डाला। फिर घोड़ोंको भी मारकर सारथिको पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ।। ६२-६३ ।। सोऽपसृत्य द्रुतं सूतो युधामन्यो रथं ययौ । विहसन्निव भीमस्य क्रुद्धः कालानलद्युतिः ।। ६४ ।। ध्वजं चिच्छेद राधेयः पताकां च व्यपातयत् ।

सारथि वहाँसे भागकर तुरंत ही युधामन्युके रथपर चढ़ गया। इधर क्रोधमें भरे हुए कालाग्निके समान तेजस्वी राधापुत्र कर्णने भीमसेनका उपहास-सा करते हुए उनकी ध्वजा और पताकाको भी काट गिराया ।।

स विधन्वा महाबाहुरथ शक्तिं परामृशत् ।। ६५ ।। तां व्यवासृजदाविध्य क्रुद्धः कर्णरथं प्रति । धनुष कट जानेपर कुपित हुए महाबाहु भीमसेनने शक्ति हाथमें ली और उसे घुमाकर कर्णके रथपर दे मारा ।। ६५ १/२ ।।

तामाधिरथिरायस्तः शक्तिं काञ्चनभूषणाम् ।। ६६ ।। आपतन्तीं महोल्काभां चिच्छेद दशभिः शरैः । कर्ण कुछ थक-सा गया था, तो भी उसने बहुत बड़ी उल्काके समान अपनी ओर आती हुई उस सुवर्णभूषित शक्तिको दस बाणोंसे काट दिया ।। ६६ १/२ ।।

सापतद् दशधा छिन्ना कर्णस्य निशितैः शरैः ।। ६७ ।। अस्यतः सूतपुत्रस्य मित्रार्थे चित्रयोधिनः । मित्रके हितके लिये विचित्र युद्ध करनेवाले तथा बाणप्रहारमें तत्पर सूतपुत्र कर्णके तीखे बाणोंसे दस टुकड़ोंमें कटकर वह शक्ति धरतीपर गिर पड़ी ।। ६७ १/२ ।।

स चर्मादत्त कौन्तेयो जातरूपपरिष्कृतम् ।। ६८ ।। खड्गं चान्यतरप्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जयस्य वा । तब कुन्तीकुमार भीमसेनने युद्धमें सम्मुख मृत्यु अथवा विजय इन दोनोंमें से एकका निश्चितरूपसे वरण करनेकी इच्छा रखकर ढाल और सुवर्णभूषित तलवार हाथमें ले ली ।। ६८ १/२ ।।

तदस्य तरसा क्रुद्धो व्यधमच्चर्म सुप्रभम् ।। ६९ ।। शरैर्बहुभिरत्युग्रैः प्रहसन्निव भारत । भारत! उस समय क्रोधमें भरे हुए कर्णने हँसते हुए-से वेगपूर्वक बहुत-से अत्यन्त भयंकर बाण मारकर भीमसेनकी चमकीली ढाल नष्ट कर दी ।। ६९ १/२ ।।

स विचर्मा महाराज विरथः क्रोधमूर्च्छितः ।। ७० ।। असिं प्रासृजदाविध्य त्वरन् कर्णरथं प्रति । महाराज! ढाल और रथसे रहित हुए भीमसेनने क्रोधसे आतुर हो बड़ी उतावलीके साथ कर्णके रथपर तलवार घुमाकर चला दी ।। ७० १/२ ।।

स धनुः सूतपुत्रस्य सज्यं छित्त्वा महानसिः ।। ७१ ।। पपात भुवि राजेन्द्र क्रुद्धः सर्प इवाम्बरात् । राजेन्द्र! वह बड़ी तलवार आकाशसे कुपित सर्पकी भाँति आकर सूतपुत्र कर्णके प्रत्यंचासहित धनुषको काटती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी ।। ७१ १/२ ।।

ततः प्रहस्याधिरथिरन्यदादाय कार्मुकम् ।। ७२ ।। शत्रुघ्नं समरे क्रुद्धो दृढज्यं वेगवत्तरम् । व्यायच्छत् स शरान् कर्णः कुन्तीपुत्रजिघांसया ।। ७३ ।। सहस्रशो महाराज रुक्मपुङ्खान् सुतेजनान् । यह देखकर अधिरथपुत्र कर्ण ठाठाकर हँस पड़ा और समरांगणमें कुपित हो उसने शत्रुविनाशकारी सुदृढ़ प्रत्यंचावाला अत्यन्त वेगशाली दूसरा धनुष हाथमें लेकर उसपर कुन्तीपुत्रके वधकी इच्छासे सुवर्णमय पंखवाले सहस्रों अत्यन्त तीखे बाणोंका संधान किया ।। ७२-७३ १/२ ।। स वध्यमानो बलवान् कर्णचापच्युतैः शरैः ।। ७४ ।। वैहायसं प्राक्रमद् वै कर्णस्य व्यथयन्मनः । कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा घायल किये जाते हुए बलवान् भीमसेन कर्णके मनमें व्यथा उत्पन्न करते हुए उसे पकड़नेके लिये आकाशमें उछले ।। ७४ १/२ ।। स तस्य चरितं दृष्ट्वा संग्रामे विजयैषिणः ।। ७५ ।। लयमास्थाय राधेयो भीमसेनमवञ्चयत् । संग्राममें विजय चाहनेवाले भीमसेनका वह चरित्र देख राधापुत्र कर्णने अपना अंग सिकोड़कर भीमसेनके आक्रमणको विफल कर दिया ।। ७५ १/२ ।।

तं च दृष्ट्वा रथोपस्थे निलीनं व्यथितेन्द्रियम् ।। ७६ ।। ध्वजमस्य समासाद्य तस्थौ भीमो महीतले । कर्णकी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो गयी थीं। वह रथके पिछले भागमें दुबक गया था। उसे उस अवस्थामें देखकर भीमसेन उसके ध्वजका सहारा लेकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ।। ७६ १/२ ।।

तदस्य कुरवः सर्वे चारणाश्चाभ्यपूजयन् ।। ७७ ।। यदियेष रथात् कर्णं हर्तुं तार्क्ष्य इवोरगम् । जैसे गरुड़ सर्पको दबोच लेते हैं, उसी प्रकार भीमसेनने कर्णको उसके रथसे पकड़ ले जानेकी जो इच्छा की थी, उनके इस कर्मकी समस्त कौरवों तथा चारणोंने भी प्रशंसा की ।। ७७ १/२ ।।

स च्छिन्नधन्वा विरथः स्वधर्ममनुपालयन् ।। ७८ ।। स्वरथं पृष्ठतः कृत्वा युद्धायैव व्यवस्थितः । धनुष कट जाने तथा रथहीन होनेपर भी स्वधर्मका पालन करते हुए भीमसेन अपने रथको पीछे करके युद्धके लिये ही खड़े रहे ।। ७८ १/२ ।।

तद् विहत्यास्य राधेयस्तत एनं समभ्ययात् ॥ ७९ ॥
संरम्भात् पाण्डवं संख्ये युद्धाय समुपस्थितम् ।
उनके रथ आदि साधनोंको नष्ट करके राधानन्दन कर्णने फिर क्रोधपूर्वक रणक्षेत्रमें युद्धके लिये उपस्थित हुए इन पाण्डुपुत्र भीमसेनपर आक्रमण किया ॥ ७९ १/२ ॥
तौ समेतौ महाराज स्पर्धमानौ महाबलौ ॥ ८० ॥
जीमूताविव धर्मान्ते गर्जमानौ नरर्षभौ ।
महाराज! एक-दूसरेसे स्पर्धा रखनेवाले वे दोनों नरश्रेष्ठ महाबली वीर परस्पर भिड़कर वर्षा-ऋतुमें गर्जना करनेवाले दो मेघोंके समान गरज रहे थे ॥ ८० १/२ ॥
तयोरासीत् सम्प्रहारः क्रुद्धयोर्नरसिंहयोः ॥ ८१ ॥
अमृष्यमाणयोः संख्ये देवदानवयोरिव ।
युद्धस्थलमें अमर्ष और क्रोधसे भरे हुए उन दोनों पुरुषसिंहोंका संग्राम देव-दानव-युद्धके समान भयंकर हो रहा था ॥ ८१ १/२ ॥
क्षीणशस्त्रस्तु कौन्तेयः कर्णेन समभिद्रुतः ॥ ८२ ॥
दृष्ट्वार्जुनहतान् नागान् पतितान् पर्वतोपमान् ।
रथमार्गविघातार्थं व्यायुधः प्रविवेश ह ॥ ८३ ॥
जब कुन्तीकुमार भीमसेनके सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो गये, उनके पास एक भी आयुध शेष नहीं रह गया और कर्णके द्वारा उनपर पूर्ववत् आक्रमण होता रहा, तब वे रथके मार्गको बंद कर देनेके लिये अर्जुनके मारे हुए पर्वताकार हाथियोंको वहाँ गिरा देख उनके भीतर प्रवेश कर गये ॥ ८२-८३ ॥
हस्तिनां व्रजमासाद्य रथदुर्गं प्रविश्य च ।
पाण्डवो जीविताकाङ्क्षी राधेयं नाभ्यहारयत् ॥ ८४ ॥
हाथियोंके समूहमें पहुँचकर मानो वे रथके आक्रमणसे बचनेके लिये दुर्गके भीतर प्रविष्ट हो गये हों, ऐसा अनुभव करते हुए पाण्डुपुत्र भीम केवल अपने प्राण बचानेकी इच्छा करने लगे, उन्होंने राधापुत्र कर्णपर प्रहार नहीं किया ॥
व्यवस्थानमथाकाङ्क्षन् धनंजयशरैर्हतम् ।
उद्यम्य कुञ्जरं पार्थस्तस्थौ परपुरंजयः ॥ ८५ ॥
महौषधिसमायुक्तं हनूमानिव पर्वतम् ।
शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले कुन्तीकुमार भीमसेन यह चाहते थे कि कर्णके बाणोंसे बचनेके लिये कोई व्यवधान (आड़) मिल जाय; इसीलिये वे अर्जुनके बाणोंसे मारे गये एक हाथीकी लाशको उठाकर चुपचाप खड़े हो गये। उस समय वे संजीवन नामक महान् औषधिसे युक्त पर्वत उठाये हुए हनुमान्‌जीके समान जान पड़ते थे ॥ ८५ १/२ ॥
तमस्य विशिखैः कर्णो व्यधमत् कुञ्जरं पुनः ॥ ८६ ॥
हस्त्यङ्गान्यथ कर्णाय प्राहिणोत् पाण्डुनन्दनः ।

चक्राण्यश्वांस्तथा चान्यद् यद् यत् पश्यति भूतले ॥ ८७ ॥
तत् तदादाय चिक्षेप क्रुद्धः कर्णाय पाण्डवः ।
तदस्य सर्वं चिच्छेद क्षिप्तं क्षिप्तं शितैः शरैः ॥ ८८ ॥
कर्णने अपने बाणोंद्वारा उस हाथीके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तब पाण्डुनन्दन भीमने हाथीके कटे हुए अंगोंको ही कर्णपर फेंकना शुरू किया। रथोंके पहिये, घोड़ोंकी लाशें तथा और भी जो-जो वस्तुएँ वे धरतीपर पड़ी देखते, उन्हें उठाकर क्रोधपूर्वक कर्णपर फेंकते थे; परंतु वे जो-जो वस्तु फेंकते, उन सबको कर्ण अपने तीखे बाणोंसे काट डालता था ॥ ८६—८८ ॥
भीमोऽपि मुष्टिमुद्यम्य वज्रगर्भां सुदारुणाम् ।
हन्तुमैच्छत् सूतपुत्रं संस्मरन्नर्जुनं क्षणात् ॥ ८९ ॥
शक्तोऽपि नावधीत् कर्णं समर्थः पाण्डुनन्दनः ।
रक्षमाणः प्रतिज्ञां तां या कृता सव्यसाचिना ॥ ९० ॥
अब भीमसेनने अपने अंगूठेको मुट्ठीके भीतर करके वज्रतुल्य अत्यन्त भयंकर घूँसा तानकर सूतपुत्र कर्णको मार डालनेकी इच्छा की। तबतक क्षणभरमें उन्हें अर्जुनकी याद आ गयी। अतः सव्यसाची अर्जुनने पहले जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी रक्षा करते हुए पाण्डुनन्दन भीमने समर्थ एवं शक्तिशाली होनेपर भी उस समय कर्णका वध नहीं किया ॥ ८९-९० ॥
तमेवं व्याकुलं भीमं भूयो भूयः शितैः शरैः ।
मूर्च्छयाभिपरीताङ्गमकरोत् सूतनन्दनः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार वहाँ बाणोंके आघातसे व्याकुल हुए भीमसेनको सूतपुत्र कर्णने बारंबार अपने पैने बाणोंकी मारसे मूर्च्छित-सा कर दिया ॥ ९१ ॥
व्यायुधं नावधीच्चैनं कर्णः कुन्त्या वचः स्मरन् ।
धनुषोऽग्रेण तं कर्णः सोऽभिद्रुत्य परामृशत् ॥ ९२ ॥
परंतु कुन्तीके वचनका स्मरण करके उसने शस्त्रहीन भीमसेनका वध नहीं किया। कर्णने उनके पास जाकर अपने धनुषकी नोकसे उनका स्पर्श किया ॥ ९२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 974)

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भीमसेनका कर्णके रथपर हाथीकी लाश फेंकना

धनुषा स्पृष्टमात्रेण क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ।
आच्छिद्य स धनुस्तस्य कर्णं मूर्धन्यताडयत् ॥ ९३ ॥
धनुषका स्पर्श होते ही वे क्रोधमें भरे हुए सर्पके समान फुफकार उठे और उन्होंने कर्णके हाथसे वह धनुष छीनकर उसे उसीके मस्तकपर दे मारा ॥ ९३ ॥

ताडितो भीमसेनेन क्रोधादारक्तलोचनः ।
विहसन्निव राधेयो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ९४ ॥
भीमसेनकी मार खाकर राधापुत्र कर्णकी आँखें लाल हो गयीं। उसने हँसते हुए-से यह बात कही— ॥ ९४ ॥

पुनः पुनस्तूबरक मूढ औदरिकेति च ।
अकृतास्त्रक मा योत्सीर्बाल संग्रामकातर ॥ ९५ ॥
‘ओ बिना दाढ़ी-मूंछके नपुंसक! ओ मूर्ख! अरे पेटू! तू तो अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानसे सर्वथा शून्य है। युद्धभीरु कायर! छोकरे! अब फिर कभी युद्ध न करना ॥ ९५ ॥

यत्र भोज्यं बहुविधं भक्ष्यं पेयं च पाण्डव ।

तत्र त्वं दुर्मते योग्यो न युद्धेषु कदाचन ॥ ९६ ॥
‘दुर्बुद्धि पाण्डव! जहाँ अनेक प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ रखी हों, तू वहीं रहनेके योग्य है! युद्धोंमें तुझे कभी नहीं आना चाहिये ॥ ९६ ॥
मूलपुष्पफलाहारो व्रतेषु नियमेषु च ।
उचितस्त्वं वने भीम न त्वं युद्धविशारदः ॥ ९७ ॥
‘भीम! वनमें रहकर तू फल-मूल और फूल खाकर व्रत एवं नियम आदि पालन करनेके योग्य है। युद्धकौशल तुझमें नाममात्रको भी नहीं है ॥ ९७ ॥
क्व युद्धं क्व मुनित्वं च वनं गच्छ वृकोदर ।
न त्वं युद्धोचितस्तात वनवासरतिर्भवान् ॥ ९८ ॥
‘वृकोदर! कहाँ युद्ध और कहाँ मुनिवृत्ति। जा, जा, वनमें चला जा। तात! तुझमें युद्धकी योग्यता नहीं है। तू तो वनवासका ही प्रेमी है ॥ ९८ ॥
(सूदं त्वामहमाजाने मात्स्ये प्रेष्यककारकम् ।)
सूदान् भृत्यजनान् दासांस्त्वं गृहे त्वरयन् भृशम् ।
योग्यस्ताडयितुं क्रोधाद् भोजनार्थं वृकोदर ॥ ९९ ॥
‘मैं तुझे अच्छी तरह जानता हूँ। तू मत्स्यराज विराट्का नौकर एक रसोइया रहा है। वृकोदर! तू तो घरमें रसोइयों, भृत्यजनों तथा दासोंको बहुत जल्दी भोजन तैयार करनेके लिये प्रेरणा देते हुए क्रोधसे उन्हें डाँटने और मारने-पीटनेकी योग्यता रखता है ॥ ९९ ॥
मुनिर्भूत्वाथवा भीम फलान्यादत्स्व दुर्मते ।
वनाय व्रज कौन्तेय न त्वं युद्धविशारदः ॥ १०० ॥
‘दुर्मति कुन्तीकुमार भीम! अथवा तू मुनि होकर वनमें चला जा। वहाँ इधर-उधरसे फल ले आ और खा। तू युद्धमें निपुण नहीं है ॥ १०० ॥
फलमूलाशने शक्तस्त्वं तथातिथिपूजने ।
न त्वां शस्त्रसमुद्योगे योग्यं मन्ये वृकोदर ॥ १०१ ॥
‘वृकोदर! तू फल-मूल खाने और अतिथिसत्कार करनेमें समर्थ है। मैं तुझे हथियार उठानेके योग्य नहीं मानता’ ॥ १०१ ॥
कौमारे यानि वृत्तानि विप्रियाणि विशाम्पते ।
तानि सर्वाणि चाप्येव रूक्षाण्यश्रावयद् भृशम् ॥ १०२ ॥
प्रजापालक नरेश! कर्णने बाल्यावस्थामें जो अप्रिय वृत्तान्त घटित हुए थे, उन सबका उल्लेख करते हुए बहुत-सी रूखी बातें सुनायीं ॥ १०२ ॥
अथैनं तत्र संलीनमस्पृशद् धनुषा पुनः ।
प्रहसंश्च पुनर्वाक्यं भीममाह वृषस्तदा ॥ १०३ ॥
तत्पश्चात् वहाँ छिपे हुए भीमसेनका कर्णने पुनः धनुषसे स्पर्श किया और उस समय उनका उपहास करते हुए फिर कहा— ॥ १०३ ॥

योद्धव्यं मारिषाण्यत्र न योद्धव्यं च मादृशैः । मादृशैर्युध्यमानानामेतच्चान्यच्च विद्यते ॥ १०४ ॥ 'आर्य! तुझे और लोगोंके साथ युद्ध करना चाहिये। मेरे-जैसे वीरोंके साथ नहीं। मेरे-जैसे योद्धाओंसे जूझनेवालोंकी ऐसी ही अथवा इससे भी बुरी दशा होती है ॥ १०४ ॥ गच्छ वा यत्र तौ कृष्णौ तौ त्वां रक्षिष्यतो रणे । गृहं वा गच्छ कौन्तेय किं ते युद्धेन बालक ॥ १०५ ॥ 'अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं, वहीं चला जा। वे रणभूमिमें तेरी रक्षा करेंगे अथवा कुन्तीकुमार! तू घर चला जा। बच्चे! तुझे युद्धसे क्या लाभ है?' ॥ १०५ ॥ कर्णस्य वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽतिदारुणम् । उवाच कर्णं प्रहसन् सर्वेषां शृण्वतां वचः ॥ १०६ ॥ कर्णके ये अत्यन्त कठोर वचन सुनकर भीमसेन ठठाकर हँस पड़े और सबके सुनते हुए उससे इस प्रकार बोले— ॥ १०६ ॥ जितस्त्वमसकृद् दुष्ट कत्थसे किं वृथाऽऽत्मना । जयाजयौ महेन्द्रस्य लोके दृष्टौ पुरातनैः ॥ १०७ ॥ 'अरे दुष्ट! मैंने तुझे एक बार नहीं, बारंबार हराया है; फिर क्यों व्यर्थ अपने ही मुँहसे अपनी बड़ाई कर रहा है। संसारमें पूर्वपुरुषोंने देवराज इन्द्रकी भी कभी जय और कभी पराजय होती देखी है ॥ १०७ ॥ मल्लयुद्धं मया सार्धं कुरु दुष्कुलसम्भव । महाबलो महाभोगी कीचको निहतो यथा ॥ १०८ ॥ तथा त्वां घातयिष्यामि पश्यत्सु सर्वराजसु । 'नीच कुलमें पैदा हुए कर्ण! आ, मेरे साथ मल्ल-युद्ध कर ले। जैसे मैंने महान् बलशाली महाभोगी कीचकको पीस डाला था, उसी प्रकार इन समस्त राजाओंके देखते-देखते मैं तुझे अभी मौतके हवाले कर दूँगा' ॥ १०८ १/२ ॥ भीमस्य मतमाज्ञाय कर्णो बुद्धिमतां वरः ॥ १०९ ॥ विरराम रणात् तस्मात् पश्यतां सर्वधन्विनाम् । भीमसेनका यह अभिप्राय जानकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कर्ण समस्त धनुर्धरोंके सामने ही उस युद्धसे हट गया ॥ १०९ १/२ ॥ एवं तं विरथं कृत्वा कर्णो राजन् व्यकत्थयत् ॥ ११० ॥ प्रमुखे वृष्णिसिंहस्य पार्थस्य च महात्मनः । ततो राजन् शिलाधौतान् शरान् शाखामृगध्वजः ॥ १११ ॥ प्राहिणोत् सूतपुत्राय केशवेन प्रचोदितः ।

राजन्! इस प्रकार कर्णने भीमसेनको रथहीन करके जब वृष्णिवंशके सिंह भगवान् श्रीकृष्ण और महामना अर्जुनके सामने ही अपनी इतनी प्रशंसा की, तब श्रीकृष्णकी प्रेरणासे कपिध्वज अर्जुनने शिलापर स्वच्छ किये हुए बहुत-से बाणोंको सूतपुत्र कर्णपर चलाया ।। ११०-१११ १/२ ।।

ततः पार्थभुजोत्सृष्टाः शराः कनकभूषणाः ।। ११२ ।। गाण्डीवप्रभवाः कर्णं हंसाः क्रौञ्चमिवाविशन् । तत्पश्चात् अर्जुनकी भुजाओंसे छोड़े गये तथा गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए वे सुवर्णभूषित बाण कर्णके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे हंस क्रौंच पर्वतकी गुफाओंमें समा जाते हैं ।। ११२ १/२ ।।

स भुजङ्गैरिवाविष्टैर्गाण्डीवप्रेषितैः शरैः ।। ११३ ।। भीमसेनादपासेधत् सूतपुत्रं धनंजयः । इस प्रकार धनंजयने गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये रोषभरे सर्पोंके समान बाणोंद्वारा सूतपुत्र कर्णको भीमसेनसे दूर हटा दिया ।। ११३ १/२ ।।

स च्छिन्नधन्वा भीमेन धनंजयशराहतः ।। ११४ ।। कर्णो भीमादपायासीद् रथेन महता द्रुतम् । भीमसेनने कर्णके धनुषको तो पहलेसे ही तोड़ दिया था। इसलिये वह धनंजयके बाणोंसे घायल हो भीमसेनको छोड़कर अपने विशाल रथके द्वारा तुरंत ही वहाँसे दूर हट गया ।। ११४ १/२ ।।

भीमोऽपि सात्यकेर्वाहं समारुह्य नरर्षभः ।। ११५ ।। अन्वयाद् भ्रातरं संख्ये पाण्डवं सव्यसाचिनम् । इधर नरश्रेष्ठ भीमसेन भी सात्यकिके रथपर आरूढ़ हो युद्धस्थलमें सव्यसाची पाण्डुपुत्र भाई अर्जुनके पास जा पहुँचे ।। ११५ १/२ ।।

ततः कर्णं समुद्दिश्य त्वरमाणो धनंजयः ।। ११६ ।। नाराचं क्रोधताम्राक्षः प्रैषीन्मृत्युमिवान्तकः । तत्पश्चात् क्रोधसे लाल आँखें किये अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ कर्णको लक्ष्य करके एक नाराच चलाया, मानो यमराजने किसीके लिये मौत भेज दी हो ।। ११६ १/२ ।।

स गरुत्मानिवाकाशे प्रार्थयन् भुजगोत्तमम् ।। ११७ ।। नाराचोऽभ्यपतत् कर्णं तूर्णं गाण्डीवचोदितः । गाण्डीव धनुषसे छूटा हुआ वह नाराच आकाशमार्गसे तुरंत ही कर्णकी ओर चला, मानो गरुड़ किसी उत्तम सर्पको पकड़नेके लिये जा रहे हों ।। ११७ १/२ ।।

तमन्तरिक्षे नाराचं द्रौणिश्चिच्छेद पत्रिणा ।। ११८ ।। धनंजयभयात् कर्णमुज्जिहीर्षन् महारथः ।

उस समय अर्जुनके भयसे कर्णका उद्धार करनेकी इच्छा रखकर महारथी अश्वत्थामाने अपने बाणसे उस नाराचको आकाशमें ही काट दिया ।। ११८ १/२ ।।
ततो द्रौणिं चतुःषष्ट्या विव्याध कुपितोऽर्जुनः ।। ११९ ।।
शिलीमुखैर्महाराज मा गास्तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने अश्वत्थामाको चौंसठ बाण मारे और कहा—'खड़े रहो, भागना मत' ।। ११९ १/२ ।।
स तु मत्तगजाकीर्णमनीकं रथसंकुलम् ।। १२० ।।
तूर्णमभ्याविशद् द्रौणिर्धनंजयशरार्दितः ।
परंतु अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हो अश्वत्थामा तुरंत ही रथसे व्याप्त एवं मतवाले हाथियोंसे भरे हुए व्यूहके भीतर घुस गया ।। १२० १/२ ।।
ततः सुवर्णपृष्ठानां चापानां कूजतां रणे ।। १२१ ।।
शब्दं गाण्डीवघोषेण कौन्तेयोऽभ्यभवद् बली ।
तब बलवान् कुन्तीकुमार अर्जुनने रणक्षेत्रमें टंकार करते हुए सुवर्णमय पृष्ठभागवाले समस्त धनुषोंके सम्मिलित शब्दोंको अपने गाण्डीव धनुषके गम्भीर घोषसे दबा दिया ।। १२१ १/२ ।।
धनंजयस्तथा यान्तं पृष्ठतो द्रौणिमभ्यगात् ।। १२२ ।।
नातिदीर्घमिवाध्वानं शरैः संत्रासयन् बलम् ।
अर्जुन भागते हुए अश्वत्थामाके पीछे-पीछे अपने बाणोंद्वारा कौरव-सेनाको संत्रस्त करते हुए कुछ दूरतक गये ।। १२२ १/२ ।।
विदार्य देहान् नाराचैर्नरवारणवाजिनाम् ।। १२३ ।।
कङ्कबर्हिणवासोभिर्बलं व्यधमदर्जुनः ।
उस समय उन्होंने कंक और मोरकी पाँखोंसे युक्त नाराचोंद्वारा घोड़ों, हाथियों और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके सारी सेनाको तहस-नहस कर दिया ।।
तद् बलं भरतश्रेष्ठ सवाजिद्विपमानवम् ।। १२४ ।।
पाकशासनिरायत्तः पार्थः स निजघान ह ।। १२५ ।।
भरतश्रेष्ठ! उस समय सावधान हुए इन्द्रकुमार कुन्तीपुत्र अर्जुनने हाथी, घोड़ों और मनुष्योंसे भरी हुई उस सेनाका संहार कर डाला ।। १२४-१२५ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमकर्णयुद्धे
एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेन और कर्णका युद्धविषयक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल १२५ १/२ श्लोक हैं।)