भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश

भीष्म उवाच

गिरं तां मधुरां श्रुत्वा गौतमो विस्मितस्तदा ।
कौतूहलान्वितो राजन् राजधर्माणमैक्षत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! पक्षीकी वह मधुर वाणी सुनकर गौतमको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह कौतूहलपूर्ण दृष्टिसे राजधर्माकी ओर देखने लगा ॥ १ ॥

राजधर्मोवाच

भोः कश्यपस्य पुत्रोऽहं माता दाक्षायणी च मे ।
अतिथिस्त्वं गुणोपेतः स्वागतं ते द्विजोत्तम ॥ २ ॥
**राजधर्मा बोला—**द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि कश्यपका पुत्र हूँ। मेरी माता दक्ष प्रजापतिकी कन्या हैं। आप गुणवान् अतिथि हैं, मैं आपका स्वागत करता हूँ ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

तस्मै दत्त्वा स सत्कारं विधिदृष्टेन कर्मणा ।
शालपुष्पमयीं दिव्यां बृसीं वै समकल्पयत् ॥ ३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! ऐसा कहकर राजधर्माने शास्त्रीय विधिके अनुसार गौतमका सत्कार किया। शालके फूलोंका आसन बनाकर उसे बैठनेके लिये दिया ॥ ३ ॥