महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश
सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश
भीष्म उवाच
गिरं तां मधुरां श्रुत्वा गौतमो विस्मितस्तदा ।
कौतूहलान्वितो राजन् राजधर्माणमैक्षत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! पक्षीकी वह मधुर वाणी सुनकर गौतमको बड़ा आश्चर्य हुआ। वह कौतूहलपूर्ण दृष्टिसे राजधर्माकी ओर देखने लगा ॥ १ ॥
राजधर्मोवाच
भोः कश्यपस्य पुत्रोऽहं माता दाक्षायणी च मे ।
अतिथिस्त्वं गुणोपेतः स्वागतं ते द्विजोत्तम ॥ २ ॥
**राजधर्मा बोला—**द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि कश्यपका पुत्र हूँ। मेरी माता दक्ष प्रजापतिकी कन्या हैं। आप गुणवान् अतिथि हैं, मैं आपका स्वागत करता हूँ ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
तस्मै दत्त्वा स सत्कारं विधिदृष्टेन कर्मणा ।
शालपुष्पमयीं दिव्यां बृसीं वै समकल्पयत् ॥ ३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! ऐसा कहकर राजधर्माने शास्त्रीय विधिके अनुसार गौतमका सत्कार किया। शालके फूलोंका आसन बनाकर उसे बैठनेके लिये दिया ॥ ३ ॥
भगीरथरथाक्रान्तदेशान् गङ्गानिषेवितान् ।
ये चरन्ति महामीनास्तांश्च तस्यान्व कल्पयत् ॥ ४ ॥
राजा भगीरथके रथसे आक्रान्त हुए जिन भूभागोंमें श्रीगङ्गाजी प्रवाहित होती हैं, वहाँ गङ्गाजीके जलमें जो बड़े-बड़े मत्स्य विचरते हैं, उन्हींमेंसे कुछ मत्स्योंको लाकर राजधर्माने गौतमके लिये भोजनकी व्यवस्था की ॥ ४ ॥
वह्निं चापि सुसंदीप्तं मीनांश्चापि सुपीवरान् ।
स गौतमायातिथये न्यवेदयत काश्यपिः ॥ ५ ॥
कश्यपके उस पुत्रने अग्नि प्रज्वलित कर दी और मोटे-मोटे मत्स्य लाकर अपने अतिथि गौतमको अर्पित कर दिये ॥ ५ ॥
भुक्तवन्तं च तं विप्रं प्रीतात्मानं महातपाः ।
क्लमापनयनार्थं स पक्षाभ्यामभ्यवीजयत् ॥ ६ ॥
वह ब्राह्मण उन मत्स्योंको पकाकर जब खा चुका और उसकी अन्तरात्मा तृप्त हो गयी, तब वह महातपस्वी पक्षी उसकी थकावट दूर करनेके लिये अपने पंखोंसे हवा करने लगा ॥ ६ ॥
ततो विश्रान्तमासीनं गोत्रप्रश्नमपृच्छत । सोऽब्रवीद् गौतमोऽस्मीति ब्रह्म नान्यदुदाहरत् ॥ ७ ॥ विश्रामके पश्चात् जब वह बैठा, तब राजधर्मोने उससे गोत्र पूछा। गौतमने कहा—‘मेरा नाम गौतम है और मैं जातिसे ब्राह्मण हूँ।’ इससे अधिक कोई बात वह बता न सका ॥ ७ ॥
तस्मै पर्णमयं दिव्यं दिव्यपुष्पाधिवासितम् । गन्धाढ्यं शयनं प्रादात् स शिश्ये तत्र वै सुखम् ॥ ८ ॥ तब पक्षीने उसके लिये पत्तोंका दिव्य बिछावन तैयार किया, जो फूलोंसे अधिवासित होनेके कारण सुगन्धसे मँह-मँह महक रहा था। वह बिछावन उसे दिया और गौतम उसपर सुखपूर्वक सोया ॥ ८ ॥
अथोपविष्टं शयने गौतमं धर्मराट् तदा । पप्रच्छ काश्यपो वाग्मी किमागमनकारणम् ॥ ९ ॥ धर्मराज! जब गौतम उस बिछौनेपर बैठा तब बात-चीतमें कुशल कश्यपकुमारने पूछा—‘ब्रह्मन्! आप इधर किसलिये आये हैं? ॥ ९ ॥
ततोऽब्रवीद् गौतमस्तं दरिद्रोऽहं महामते । समुद्रगमनाकांक्षी द्रव्यार्थमिति भारत ॥ १० ॥ भारत! तब गौतमने उससे कहा—‘महामते! मैं दरिद्र हूँ और धनके लिये समुद्रतटपर जानेकी इच्छा लेकर घरसे चला हूँ’ ॥ १० ॥
तं काश्यपोऽब्रवीत् प्रीतो नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि । कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ सद्रव्यो यास्यसे गृहान् ॥ ११ ॥ यह सुनकर राजधर्मोने प्रसन्न होकर कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! अब आप वहाँतक जानेके लिये उत्सुक न हों, यहीं आपका काम हो जायगा। आप यहींसे धन लेकर अपने घरको जाइयेगा ॥ ११ ॥
चतुर्विधा ह्यर्थसिद्धिर्बृहस्पतिमंतं यथा । पारम्पर्यं तथा दैवं काम्यं मैत्रमिति प्रभो ॥ १२ ॥ ‘प्रभो! बृहस्पतिजीके मतके अनुसार अर्थकी सिद्धि चार प्रकारसे होती है—वंशपरम्परासे, प्रारब्धकी अनुकूलतासे, धनके लिये किये गये सकामकर्मसे और मित्रके सहयोगसे ॥ १२ ॥
प्रादुर्भूतोऽस्मि ते मित्रं सुहृत्त्वं च मम त्वयि । सोऽहं तथा यतिष्यामि भविष्यसि यथार्थवान् ॥ १३ ॥ ‘मैं आपका मित्र हो गया हूँ, आपके प्रति मेरा सौहार्द बढ़ गया है; अतः मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे आपको अर्थकी प्राप्ति हो जायगी’ ॥ १३ ॥
ततः प्रभातसमये सुखं दृष्ट्वाब्रवीदिदम् ।
गच्छ सौम्य पथानेन कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ १४ ॥
इतस्त्रियोजनं गत्वा राक्षसाधिपतिर्महान् ।
विरूपाक्ष इति ख्यातः सखा मम महाबलः ॥ १५ ॥
तदनन्तर! जब प्रातःकाल हुआ तब राजधर्माने ब्राह्मणके सुखका उपाय सोचकर इस प्रकार कहा—'सौम्य! इस मार्गसे जाइये, आपका कार्य सिद्ध हो जायगा। यहाँसे तीन योजन दूर जानेपर जो नगर मिलेगा, वहाँ महाबली राक्षसराज विरूपाक्ष रहते हैं, वे मेरे महान् मित्र हैं ॥
तं गच्छ द्विजमुख्य त्वं स मद्वाक्यप्रचोदितः ।
कामानभीप्सितांस्तुभ्यं दाता नास्त्यत्र संशयः ॥ १६ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! आप उनके पास जाइये। वे मेरे कहनेसे आपको यथेष्ट धन देंगे और आपकी मनोवाञ्छित कामनाएँ पूर्ण करेंगे, इसमें संशय नहीं है' ॥ १६ ॥
इत्युक्तः प्रययौ राजन् गौतमो विगतक्लमः ।
फलान्यमृतकल्पानि भक्षयन् स यथेष्टतः ॥ १७ ॥
चन्दनागुरुमुख्यानि त्वक्पत्राणां वनानि च ।
तस्मिन् पथि महाराज सेवमानो द्रुतं ययौ ॥ १८ ॥
राजन्! उसके ऐसा कहनेपर गौतम वहाँसे चल दिया। उसकी सारी थकावट दूर हो चुकी थी। महाराज! मार्गमें तेजपातोंके वनमें, जहाँ चन्दन और अगुरुके वृक्षोंकी प्रधानता थी, विश्राम करता और इच्छानुसार अमृतके समान मधुर फल खाता हुआ वह बड़ी तेजीसे आगे बढ़ता चला गया ॥ १७-१८ ॥
ततो मेरुव्रजं नाम नगरं शैलतोरणम् ।
शैलप्राकारवप्रं च शैलयन्त्राकुलं तथा ॥ १९ ॥
चलते-चलते वह मेरुव्रज नामक नगरमें जा पहुँचा, जिसके चारों ओर पर्वतोंके टीले और पर्वतोंकी ही चहारदीवारी थी। उसका सदर फाटक भी एक पर्वत ही था। नगरकी रक्षाके लिये सब ओर शिलाकी बड़ी-बड़ी चट्टानें और मशीनें थीं ॥ १९ ॥
विदितश्चाभवत् तस्य राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ।
प्रहितः सुहृदा राजन् प्रीयमाणः प्रियातिथिः ॥ २० ॥
परम बुद्धिमान् राक्षसराज विरूपाक्षको सेवकोंद्वारा यह सूचना दी गयी कि राजन्! आपके मित्रने अपने एक प्रिय अतिथिको आपके पास भेजा है, वह बहुत प्रसन्न है ॥ २० ॥
ततः स राक्षसेन्द्रः स्वान् प्रेष्यानाह युधिष्ठिर ।
गौतमो नगरद्वारात् शीघ्रामानीयतामिति ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! यह समाचार पाते ही राक्षसराजने अपने सेवकोंसे कहा—'गौतमको नगरद्वारसे शीघ्र यहाँ लाया जाय' ॥ २१ ॥
ततः पुरवरात् तस्मात् पुरुषाः श्येनचेष्टनाः । गौतमेत्यभिभाषन्तः पुरद्वारमुपागमन् ॥ २२ ॥ यह आदेश प्राप्त होते ही राजसेवक गौतमको पुकारते हुए बाजकी तरह झपटकर उस श्रेष्ठ नगरके फाटकपर आये ॥ २२ ॥
ते तमूचुर्महाराज राजप्रेष्यास्तदा द्विजम् । त्वरस्व तूर्णमागच्छ राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ॥ २३ ॥ महाराज! राजाके उन सेवकोंने उस समय उस ब्राह्मणसे कहा—‘ब्रह्मन्! जल्दी कीजिये। शीघ्र आइये। महाराज आपसे मिलना चाहते हैं ॥ २३ ॥
राक्षसाधिपतिर्वीरो विरूपाक्ष इति श्रुतः । स त्वां त्वरति वै द्रष्टुं तत् क्षिप्रं संविधीयताम् ॥ २४ ॥ ‘विरूपाक्ष नामसे प्रसिद्ध वीर राक्षसराज आपको देखनेके लिये उतावले हो रहे हैं; अतः आप शीघ्रता कीजिये’ ॥ २४ ॥
ततः स प्राद्रवद् विप्रो विस्मयाद् विगतक्लमः । गौतमः परमर्द्धिं तां पश्यन् परमविस्मितः ॥ २५ ॥ बुलावा सुनते ही गौतमकी थकावट दूर हो गयी। वह विस्मित होकर दौड़ पड़ा। राक्षसराजकी उस महा-समृद्धिको देखकर उसे बड़ा आश्चर्य होता था ॥ २५ ॥
तैरेव सहितो राज्ञो वेश्म तूर्णमुपाद्रवत् । दर्शनं राक्षसेन्द्रस्य कांक्षमाणो द्विजस्तदा ॥ २६ ॥ राक्षसराजके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये वह ब्राह्मण उन सेवकोंके साथ शीघ्र ही राजमहलमें जा पहुँचा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७० ॥
१७१-
एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना
भीष्म उवाच
ततः स विदितो राज्ञः प्रविश्य गृहमुत्तमम् ।
पूजितो राक्षसेन्द्रेण निषसादासनोत्तमे ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर राजाको उसके आगमनकी सूचना दी गयी और वह उनके उत्तम भवनमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ राक्षसराजने उसका विधिवत् पूजन किया। तत्पश्चात् वह एक उत्तम आसनपर विराजमान हुआ ॥ १ ॥
पृष्टश्च गोत्रचरणं स्वाध्यायं ब्रह्मचारिकम् ।
न तत्र व्याजहारान्यद् गोत्रमात्रादृते द्विजः ॥ २ ॥
विरूपाक्षने गौतमसे उसके गोत्र, शाखा और ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक किये गये स्वाध्यायके विषयमें प्रश्न किया; परंतु उसने गोत्र (जाति)-के सिवा और कुछ नहीं बताया ॥ २ ॥
ब्रह्मवर्चसहीनस्य स्वाध्यायोपरतस्य च ।
गोत्रमात्रविदो राजा निवासं समपृच्छत ॥ ३ ॥
तब ब्राह्मणोचित तेजसे हीन, स्वाध्यायसे उपरत, केवल गोत्र अथवा जातिका नाम जाननेवाले उस ब्राह्मणसे राजाने उसका निवासस्थान पूछा ॥ ३ ॥
राक्षस उवाच
क्व ते निवासः कल्याण किंगोत्रा ब्राह्मणी च ते ।
तत्त्वं ब्रूहि न भीः कार्या विश्वसस्व यथासुखम् ॥ ४ ॥
**राक्षसराज बोले—**भद्र! तुम्हारा निवास कहाँ है? तुम्हारी पत्नी किस गोत्रकी कन्या है? यह सब ठीक-ठीक बताओ। भय न करो। मुझपर विश्वास करो और सुखसे रहो ॥ ४ ॥
गौतम उवाच
मध्यदेशप्रसूतोऽहं वासो मे शबरालये ।
शूद्रा पुनर्भूभार्या मे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
**गौतमने कहा—**राक्षसराज! मेरा जन्म तो हुआ है मध्यदेशमें, किंतु मैं एक भीलके घरमें रहता हूँ। मेरी स्त्री शूद्र जातिकी है और मुझसे पहले दूसरेकी पत्नी रह चुकी है। यह बात मैं आपसे सत्य ही कहता हूँ ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
ततो राजा विममृशे कथं कार्यमिदं भवेत् । कथं वा सुकृतं मे स्यादिति बुद्ध्यान्वचिन्तयत् ॥ ६ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यह सुनकर राक्षसराज मन-ही-मन विचार करने लगे कि अब किस तरह काम करना चाहिये? कैसे मुझे पुण्य प्राप्त हो सकता है? इस प्रकार उन्होंने बारंबार बुद्धि लगाकर सोचा और विचारा ॥ ६ ॥
अयं वै जन्मना विप्रः सुहृत् तस्य महात्मनः । सम्प्रेषितश्च तेनायं काश्यपेन ममान्तिकम् ॥ ७ ॥ तस्य प्रियं करिष्यामि स हि मामाश्रितः सदा । भ्राता मे बान्धवश्चासौ सखा च हृदयङ्गमः ॥ ८ ॥ वे मन ही-मन कहने लगे, 'यह केवल जन्मसे ही ब्राह्मण है; परंतु महात्मा राजधर्माका सुहृद् है। उन कश्यपकुमारने ही इसे यहाँ मेरे पास भेजा है; अतः उनका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। वह सदा मुझपर भरोसा रखता है और मेरा भाई, बान्धव तथा हार्दिक मित्र भी है ॥ ७-८ ॥
कार्तिक्यामद्य भोक्तारः सहस्रं मे द्विजोत्तमाः । तत्रायमपि भोक्ता च देयमस्मै च मे धनम् ॥ ९ ॥ स चाद्य दिवसः पुण्यो ह्यतिथिश्चायमागतः । संकल्पितं चैव धनं किं विचार्यमतः परम् ॥ १० ॥ 'आज कार्तिककी पूर्णिमा है। आजके दिन सहस्रों श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे यहाँ भोजन करेंगे। उन्हींमें यह भी भोजन कर लेगा, उन्हींके साथ इसे भी धन देना चाहिये। आज पुण्य दिवस है, यह ब्राह्मण अतिथिरूपसे यहाँ आया है और मैंने धन दान करनेका संकल्प कर ही रक्खा है। अब इसके बाद क्या विचार करना है?' ॥
ततः सहस्रं विप्राणां विदुषां समलंकृतम् । स्नातानामनुसम्प्राप्तं सुमहत् क्षौमवाससाम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर भोजनके समय हजारों विद्वान् ब्राह्मण स्नान करके रेशमी वस्त्र और अलंकार धारण किये वहाँ आ पहुँचे ॥ ११ ॥
तानागतान् द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो विशाम्पते । यथार्हं प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥ प्रजानाथ! विरूपाक्षने वहाँ पधारे हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार यथायोग्य स्वागत-सत्कार किया ॥ १२ ॥
बृस्यस्तेषां तु संन्यस्ता राक्षसेन्द्रस्य शासनात् । भूमौ वरकुशाः स्तीर्णाः प्रेष्यैर्भरतसत्तम ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! राक्षसराजकी आज्ञासे सेवकोंने जमीनपर उनके लिये कुशके सुन्दर आसन बिछा दिये ।। १३ ।।
तासु ते पूजिता राज्ञा निषण्णा द्विजसत्तमाः ।
तिलदर्भौदकेनाथ अर्चिता विधिवद् द्विजाः ।। १४ ।।
राजाके द्वारा सम्मानित वे श्रेष्ठ ब्राह्मण जब उन आसनोंपर विराजमान हो गये तब विरूपाक्षने तिल, कुश और जल लेकर उनका विधिवत् पूजन किया ।। १४ ।।
विश्वेदेवाः सपितरः साग्नयश्चोपकल्पिताः ।
विलिप्ताः पुष्पवन्तश्च सुप्रचाराः सुपूजिताः ।
व्यराजन्त महाराज नक्षत्रपतयो यथा ।। १५ ।।
उनमें विश्वेदेवों, पितरों तथा अग्निदेवकी भावना करके उन सबको चन्दन लगाया, फूलोंकी मालाएँ पहनायीं और सुन्दर रीतिसे उनकी पूजा की। महाराज! उन आसनोंपर बैठकर वे ब्राह्मण चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगे ।। १५ ।।
ततो जाम्बूनदीः पात्रीर्वज्राङ्का विमलाः शुभाः ।
वरान्नपूर्णा विप्रेभ्यः प्रादान्मधुघृतप्लुताः ।। १६ ।।
तत्पश्चात् उसने हीरोंसे जड़ी हुई सोनेकी स्वच्छ सुन्दर थालियोंमें घीसे बने हुए मीठे पकवान परोसकर उन ब्राह्मणोंके आगे रख दिये ।। १६ ।।
तस्य नित्यं सदाऽऽषाढ्यां माघ्यां च बहवो द्विजाः ।
ईप्सितं भोजनवरं लभन्ते सत्कृतं सदा ।। १७ ।।
उसके यहाँ आषाढ़ और माघकी पूर्णिमाको सदा बहुत-से ब्राह्मण सत्कारपूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार उत्तम भोजन पाते थे ।। १७ ।।
विशेषतस्तु कार्त्तिक्यां द्विजेभ्यः सम्प्रयच्छति ।
शरद् व्यपाये रत्नानि पौर्णमास्यामिति श्रुतिः ।। १८ ।।
विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको, जब कि शरद्-ऋतुकी समाप्ति होती है, वह ब्राह्मणोंको रत्नोंका दान करता था; ऐसा सुननेमें आया है ।। १८ ।।
सुवर्णं रजतं चैव मणीनथ च मौक्तिकान् ।। १९ ।।
वज्रान् महाधनांश्चैव वैदूर्याजिनराङ्कवान् ।
रत्नराशीन् विनिक्षिप्य दक्षिणार्थे स भारत ।। २० ।।
ततः प्राह द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो महाबलः ।
गृह्णीत रत्नान्येतानि यथोत्साहं यथेष्टतः ।। २१ ।।
येषु येषु च भाण्डेषु भुक्तं वो द्विजसत्तमाः ।
तान्येवादाय गच्छध्वं स्ववेश्मानीति भारत ।। २२ ।।
भारत! भोजनके पश्चात् ब्राह्मणोंके समक्ष बहुत-से सोने, चाँदी, मणि, मोती, बहुमूल्य हीरे, वैदूर्यमणि, रंकुमृगके चर्म तथा रत्नोंके कई ढेर लगाकर महाबली विरूपाक्षने उन श्रेष्ठ
ब्राह्मणोंसे कहा—'द्विजवरो! आपलोग अपनी इच्छा और उत्साहके अनुसार इन रत्नोंको उठा ले जायँ और जिनमें आपलोगोंने भोजन किया है, उन पात्रोंको भी अपने घर लेते जायँ'॥ १९—२२॥
इत्युक्तवचने तस्मिन् राक्षसेन्द्रे महात्मनि।
यथेष्टं तानि रत्नानि जगृहूर्ब्राह्मणर्षभाः॥ २३॥
उन महात्मा राक्षसराजके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मणोंने इच्छानुसार उन सब रत्नोंको ले लिया॥ २३॥
ततो महार्हैस्ते सर्वे रत्नैर्भ्यर्चिताः शुभैः।
ब्राह्मणा मृष्टवसनाः सुप्रीताः स्म ततोऽभवन्॥ २४॥
तत्पश्चात् उन सुन्दर एवं महामूल्यवान् रत्नोंद्वारा पूजित हुए वे सभी उज्ज्वल वस्त्रधारी ब्राह्मण बड़े प्रसन्न हुए॥
ततस्तान् राक्षसेन्द्रश्च द्विजानाह पुनर्वचः।
नानादेशगतान् राजन् राक्षसान् प्रतिषिध्य वै॥ २५॥
अद्यैकं दिवसं विप्रा न वोऽस्तीह भयं क्वचित्।
राक्षसेभ्यः प्रमोदध्वमिष्टतो यात माचिरम्॥ २६॥
राजन्! इसके बाद राक्षसराज विरूपाक्षने नाना देशोंसे आये हुए राक्षसोंको हिंसा करनेसे रोककर उन ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रगण! आज एक दिनके लिये आपलोगोंको राक्षसोंकी ओरसे कहीं कोई भय नहीं है; अतः आनन्द कीजिये और शीघ्र ही अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइये। विलम्ब न कीजिये'॥ २५-२६॥
ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे विप्रसंघाः समन्ततः।
गौतमोऽपि सुवर्णस्य भारमादाय सत्वरः॥ २७॥
कृच्छ्रात् समुद्धरन् भारं न्यग्रोधं समुपागमत्।
न्यषीदच्च परिश्रान्तः क्लान्तश्च क्षुधितश्च सः॥ २८॥
यह सुनकर सब ब्राह्मणसमुदाय चारों ओर भाग चले। गौतम भी सुवर्णका भारी भार लेकर बड़ी कठिनाईसे ढोता हुआ जल्दी-जल्दी चलकर बरगदके पास आया। वहाँ पहुँचते ही थककर बैठ गया। वह भूखसे पीड़ित और क्लान्त हो रहा था॥ २७-२८॥
ततस्तमभ्यगाद् राजन् राजधर्मा खगोत्तमः।
स्वागतेनाभिनन्दंश्च गौतमं मित्रवत्सलः॥ २९॥
राजन्! तत्पश्चात् पक्षियोंमें श्रेष्ठ मित्रवत्सल राजधर्मा गौतमके पास आया और स्वागतपूर्वक उसका अभिनन्दन किया॥ २९॥
तस्य पक्षाग्रविक्षेपैः क्लमं व्यपनयत् खगः।
पूजां चाप्यकरोद् धीमान् भोजनं चाप्यकल्पयत्॥ ३०॥
उस बुद्धिमन् पक्षीने अपने पंखोंके अग्रभागका संचालन करके उसे हवा की और उसकी सारी थकावट दूर कर दी; फिर उसका पूजन किया तथा उसके लिये भोजनकी व्यवस्था की॥ ३०॥
स भुक्तवान् सुविश्रान्तो गौतमोऽचिन्तयत् तदा।
हाटकस्याभिरूपस्य भारोऽयं सुमहान् मया॥ ३१॥
गृहीतो लोभमोहाभ्यां दूरं च गमनं मम।
न चास्ति पथि भोक्तव्यं प्राणसंधारणं मम॥ ३२॥
भोजन करके विश्राम कर लेनेपर गौतम इस प्रकार चिन्ता करने लगा—'अहो! मैंने लोभ और मोहसे प्रेरित होकर सुन्दर सुवर्णका यह महान् भार ले लिया है। अभी मुझे बहुत दूर जाना है। रास्तेमें खानेके लिये कुछ भी नहीं है, जिससे मेरे प्राणोंकी रक्षा हो सके॥
किं कृत्वा धारयेयं वै प्राणानित्यभ्यचिन्तयत्।
ततः स पथि भोक्तव्यं प्रेक्षमाणो न किंचन॥ ३३॥
कृतघ्नः पुरुषव्याघ्र मनसेदमचिन्तयत्।
अयं बकपतिः पार्श्वे मांसराशिः स्थितो महान्॥ ३४॥
इमं हत्वा गृहीत्वा च यास्येऽहं समभिद्रुतम्॥ ३५॥
'अब मैं कौन-सा उपाय करके अपने प्राणोंको धारण कर सकूँगा?' इस प्रकारकी चिन्तामें वह मग्न हो गया। पुरुषसिंह! तदनन्तर मार्गमें भोजनके लिये कुछ भी न देखकर उस कृतघ्नने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—'यह बगुलोंका राजा राजधर्मा मेरे पास ही तो है। यह मांसका एक बहुत बड़ा ढेर है। इसीको मारकर ले लूँ और शीघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दूँ'॥ ३३—३५॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७१॥
कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना
भीष्म उवाच
अथ तत्र महार्चिष्माननलो वातसारथिः ।
तस्याविदूरे रक्षार्थं खगेन्द्रेण कृतोऽभवत् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! पक्षिराज राजधर्माने अपने मित्र गौतमकी रक्षाके लिये उससे थोड़ी दूरपर आग प्रज्वलित कर दी थी, जिससे हवाका सहारा पाकर बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं ॥ १ ॥
स चापि पार्श्वे सुष्वोप विश्वस्तो बकराट् तदा ।
कृतघ्नस्तु स दुष्टात्मा तं जिघांसुरथाग्रतः ॥ २ ॥
ततोऽलातेन दीप्तेन विश्वस्तं निजघान तम् ।
निहत्य च मुदा युक्तः सोऽनुबन्धं न दृष्टवान् ॥ ३ ॥
बकराजको भी मित्रपर विश्वास था; इसलिये उस समय उसके पास ही सो गया। इधर वह दुष्टात्मा कृतघ्न उसका वध करनेकी इच्छासे उठा और विश्वासपूर्वक सोये हुए राजधर्माको सामनेसे जलती हुई लकड़ी लेकर उसके द्वारा मार डाला। उसे मारकर वह बहुत प्रसन्न हुआ, मित्रके वधसे जो पाप लगता है, उसकी ओर उसकी दृष्टि नहीं गयी ॥ २-३ ॥
स तं विपक्षरोमाणं कृत्वाग्नावपचत् तदा ।
तं गृहीत्वा सुवर्णं च ययौ द्रुततरं द्विजः ॥ ४ ॥
उसने मरे हुए पक्षीके पंख और बाल नोचकर उसे आगमें पकाया और उसे साथमें ले सुवर्णका बोझ सिरपर उठाकर वह ब्राह्मण बड़ी तेजीके साथ वहाँसे चल दिया ॥ ४ ॥
(ततो दाक्षायणीपुत्रं नागतं तं तु भारत ।
विरूपाक्षश्चिन्तयन् वै हृदयेन विदूयता ॥)
भारत! उस दिन दक्षकन्याका पुत्र राजधर्मा अपने मित्र विरूपाक्षके यहाँ न जा सका; इससे विरूपाक्ष व्याकुल हृदयसे उसके लिये चिन्ता करने लगा ।।
ततोऽन्यस्मिन् गते चाह्नि विरूपाक्षोऽब्रवीत् सुतम् ।
न प्रेक्षे राजधर्माणमद्य पुत्र खगोत्तमम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर दूसरा दिन भी व्यतीत हो जानेपर विरूपाक्षने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! मैं आज पक्षियोंमें श्रेष्ठ राजधर्माको नहीं देख रहा हूँ ॥ ५ ॥
स पूर्वसंध्यां ब्रह्माणं वन्दितुं याति सर्वदा । मां वा दृष्ट्वा कदाचित् स न गच्छति गृहं खगः ॥ ६ ॥ ‘वे पक्षिप्रवर प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्माजीकी वन्दना करनेके लिये जाया करते थे और वहाँसे लौटनेपर मुझसे मिले बिना कभी अपने घर नहीं जाते थे ॥ ६ ॥
उभे द्विरात्रिसंध्ये वै नाभ्यगात् स ममालयम् । तस्मान्न शुद्धयते भावो मम स ज्ञायतां सुहृत् ॥ ७ ॥ ‘आज दो संध्याएँ व्यतीत हो गयीं; किंतु वह मेरे घरपर नहीं पधारे, अतः मेरे मनमें संदेह पैदा हो गया है। तुम मेरे मित्रका पता लगाओ ॥ ७ ॥
स्वाध्यायेन वियुक्तो हि ब्रह्मवर्चसव्रर्जितः । तद्व्रतस्तत्र मे शंका हन्यात् तं स द्विजाधमः ॥ ८ ॥ ‘वह अधम ब्राह्मण गौतम स्वाध्यायरहित और ब्रह्मतेजसे शून्य था तथा हिंसक जान पड़ता था। उसीपर मेरा संदेह है। कहीं वह मेरे मित्रको मार न डाले ॥ ८ ॥
दुराचारस्तु दुर्बुद्धिरिङ्गितैर्लक्षितो मया । निष्कृपो दारुणाकारो दुष्टो दस्युरिवाधमः ॥ ९ ॥ ‘उसकी चेष्टाओंसे मैंने लक्षित किया तो वह मुझे दुर्बुद्धि एवं दुराचारी तथा दयाहीन प्रतीत होता था। वह आकारसे ही बड़ा भयानक और दुष्ट दस्युके समान अधम जान पड़ता था ॥ ९ ॥
गौतमः स गतस्तत्र तेनोद्विग्नं मनो मम । पुत्र शीघ्रमितो गत्वा राजधर्मनिवेशनम् ॥ १० ॥ ज्ञायतां स विशुद्धात्मा यदि जीवति मा चिरम् । ‘नीच गौतम यहाँसे लौटकर फिर उन्हींके निवास-स्थानपर गया था; इसलिये मेरे मनमें उद्वेग हो रहा है। बेटा! तुम शीघ्र यहाँसे राजधर्माके घरपर जाओ और पता लगाओ कि वे शुद्धात्मा पक्षिराज जीवित हैं या नहीं। इस कार्यमें विलम्ब न करो’ ॥ १० १/२ ॥
स एवमुक्तस्त्वरितो रक्षोभिः सहितो ययौ ॥ ११ ॥ न्यग्रोधं तत्र चापश्यत् कङ्कालं राजधर्मणः । पिताकी ऐसी आज्ञा पाकर वह तुरंत ही राक्षसोंके साथ उस वटवृक्षके पास गया। वहाँ उसे राजधर्माका कंकाल अर्थात् उसके पंख, हड्डियों और पैरोंका समूह दिखायी दिया ॥ ११ १/२ ॥
स रुदन्नगमत् पुत्रो राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ॥ १२ ॥ त्वरमाणः परं शक्त्या गौतमग्रहणाय वै । बुद्धिमान् राक्षसराजका पुत्र राजधर्माकी यह दशा देखकर रो पड़ा और उसने पूरी शक्ति लगाकर गौतमको शीघ्र पकड़नेकी चेष्टा की ॥ १२ १/२ ॥
ततोऽविदूरे जगृहुर्गौतमं राक्षसास्तदा ॥ १३ ॥
राजधर्मशरीरं च पक्षास्थिचरणोज्झितम् । तदनन्तर कुछ ही दूर जानेपर राक्षसोंने गौतमको पकड़ लिया। साथ ही उन्हें पंख, पैर और हड्डियोंसे रहित राजधर्माकी लाश भी मिल गयी ॥ १३ १/२ ॥ तमादायाथ रक्षांसि द्रुतं मेरुव्रजं ययुः ॥ १४ ॥ राज्ञश्च दर्शयामासुः शरीरं राजधर्मणः । कृतघ्नं परुषं तं च गौतमं पापकारिणम् ॥ १५ ॥ गौतमको लेकर वे राक्षस शीघ्र ही मेरुव्रजमें गये। वहाँ उन्होंने राजाको राजधर्माका मृत शरीर दिखाया और पापाचारी कृतघ्न गौतमको भी सामने खड़ा कर दिया ॥ रुरोद राजा तं दृष्ट्वा सामात्यः सपुरोहितः । आर्तनादश्च सुमहानभूत् तस्य निवेशने ॥ १६ ॥ सस्त्रीकुमारं च पुरं बभूवास्वस्थमानसम् । अपने मित्रको इस दशामें देखकर मन्त्री और पुरोहितोंके साथ राजा विरूपाक्ष फूट-फूटकर रोने लगे। उनके महलमें महान् आर्तनाद गूँजने लगा। स्त्री और बच्चोंसहित सारे नगरमें शोक छा गया। किसीका भी मन स्वस्थ न रहा ॥ अथाब्रवीन्नृपः पुत्रं पापोऽयं वध्यतामिति ॥ १७ ॥ अस्य मांसैरिमे सर्वे विहरन्तु यथेष्टतः । तब राजाने अपने पुत्रको आज्ञा दी—'बेटा! इस पापीको मार डालो। ये समस्त राक्षस इसके मांसका यथेष्ट उपयोग करें ॥ १७ १/२ ॥ पापाचारः पापकर्मा पापात्मा पापसाधनः ॥ १८ ॥ हन्तव्योऽयं मम मतिर्भवद्भिरिति राक्षसाः । 'राक्षसो! यह पापाचारी, पापकर्मा और पापात्मा है। इसके सारे साधन पापमय हैं; अतः तुम्हें इसका वध कर देना चाहिये, यही मेरा मत है' ॥ १८ १/२ ॥ इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसा घोरविक्रमाः ॥ १९ ॥ नैच्छन्त तं भक्षयितुं पापकर्माणमित्युत । राक्षसराजके इस प्रकार आदेश देनेपर भी भयानक पराक्रमी राक्षसोंने गौतमको खानेकी इच्छा नहीं की; क्योंकि वह घोर पापाचारी था ॥ १९ १/२ ॥ दस्यूनां दीयतामेष साध्वद्य पुरुषाधमः ॥ २० ॥ इत्यूचुस्ते महाराज राक्षसेन्द्रं निशाचराः । शिरोभिः प्रणताः सर्वे व्याहरन् राक्षसाधिपम् ॥ २१ ॥ न दातुमर्हसि त्वं नो भक्षणायस्य किल्विषम् ।
महाराज! उन निशाचरोंने राक्षसराजसे कहा—'प्रभो! इस नराधमका मांस दस्युओंको दे दिया जाय, आप हमें इसका पाप खानेके लिये न दें' इस प्रकार समस्त राक्षसोंने राक्षसराजके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रार्थना की॥ २०-२१ १/२॥
एवमस्त्विति तानाह राक्षसेन्द्रो निशाचरान्॥ २२॥
दस्यूनां दीयतामेष कृतघ्नोऽद्यैव राक्षसाः।
यह सुनकर राक्षसराजने उन निशाचरोंसे कहा—'राक्षसो! ऐसा ही सही, इस कृतघ्नको आज ही डाकुओंके हवाले कर दो'॥ २२ १/२॥
इत्युक्ता राक्षसास्तेन शूलपट्टिशपाणयः॥ २३॥
कृत्वा तं खण्डशः पापं दस्युभ्यः प्रददुस्तदा।
राजाकी ऐसी आज्ञा पाकर हाथमें शूल और पट्टिश धारण किये राक्षसोंने पापी गौतमके टुकड़े-टुकड़े करके उसे दस्युओंको सौंप दिया॥ २३ १/२॥
दस्यवश्चापि नैच्छन्त तमत्तुं पापकारिणम्।
क्रव्यादा अपि राजेन्द्र कृतघ्नं नोपभुञ्जते॥ २४॥
राजेन्द्र! उन दस्युओंने भी उस पापाचारीका मांस खानेकी इच्छा नहीं की। मांसाहारी जीव-जन्तु भी कृतघ्नका मांस काममें नहीं लेते हैं॥ २४॥
ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा।
निष्कृतिर्विहिता राजन् कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः॥ २५॥
राजन्! ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रतभङ्ग करने वालोंके लिये शास्त्रमें प्रायश्चित्तका विधान है; परंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं बताया गया है॥
मित्रद्रोही नृशंसश्च कृतघ्नश्च नराधमः।
क्रव्यादैः कृमिभिश्चैव न भुज्यन्ते हि तादृशाः॥ २६॥
मित्रद्रोही, नृशंस, नराधम तथा कृतघ्न—ऐसे मनुष्योंका मांस मांसभक्षी जीव-जन्तु तथा कीड़े भी नहीं खाते हैं॥ २६॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २७ श्लोक हैं)
राजधर्मा और गौतमका पुनः जीवित होना
त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजधर्मा और गौतमका पुनः जीवित होना
भीष्म उवाच
ततश्चितां बकपतेः कारयामास राक्षसः ।
रत्नैर्गन्धैश्च बहुभिर्वस्त्रैश्च समलंकृताम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर विरूपाक्षने बकराजके लिये एक चिता तैयार करायी। उसे बहुत से रत्नों, सुगन्धित चन्दनों तथा वस्त्रोंसे खूब सजाया गया था ॥ १ ॥
ततः प्रज्वाल्य नृपतिर्बकराजं प्रतापवान् ।
प्रेतकार्याणि विधिवद् राक्षसेन्द्रश्चकार ह ॥ २ ॥
तत्पश्चात् बकराजके शवको उसके ऊपर रखकर प्रतापी राक्षसराजने उसमें आग लगायी और विधिपूर्वक मित्रका दाह-कर्म सम्पन्न किया ॥ २ ॥
तस्मिन् काले च सुरभिर्देवी दाक्षायणी शुभा ।
उपरिष्टात् ततस्तस्य सा बभूव पयस्विनी ॥ ३ ॥
उसी समय दिव्य-धेनु दक्षकन्या सुरभिदेवी वहाँ आकर आकाशमें ठीक चिताके ऊपर खड़ी हो गयीं ॥
तस्या वक्त्राच्च्युतः फेनः क्षीरमिश्रस्तदानघ ।
सोऽपतद् वै ततस्तस्यां चितायां राजधर्मणः ॥ ४ ॥
अनघ! उनके मुखसे जो दूधमिश्रित फेन झरकर गिरा, वह राजधर्माकी उस चितापर पड़ा ॥ ४ ॥
ततः संजीवितस्तेन बकराजस्तदानघ ।
उत्पत्य च समीयाय विरूपाक्षं बकाधिपः ॥ ५ ॥
निष्पाप नरेश! उससे उस समय बकराज जी उठा और वह उड़कर विरूपाक्षसे जा मिला ॥ ५ ॥
ततोऽभ्ययाद् देवराजो विरूपाक्षपुरं तदा ।
प्राह चेदं विरूपाक्षं दिष्ट्या संजीवितस्त्वया ॥ ६ ॥
उसी समय देवराज इन्द्र विरूपाक्षके नगरमें आये और विरूपाक्षसे इस प्रकार बोले—‘बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे द्वारा बकराजको जीवन मिला’ ॥ ६ ॥
श्रावयामास चेन्द्रस्तं विरूपाक्षं पुरातनम् ।
यथा शापः पुरा दत्तो ब्रह्मणा राजधर्मणः ॥ ७ ॥
इन्द्रने विरूपाक्षको एक प्राचीन घटना सुनायी, जिसके अनुसार ब्रह्माजीने पहले राजधर्माको शाप दिया था ॥ ७ ॥
यदा बकपती राजन् ब्रह्माणं नोपसर्पति ।
ततो रोषादिदं प्राह खगेन्द्राय पितामहः ॥ ८ ॥
राजन्! एक समय जब बकराज ब्रह्माजीकी सभामें नहीं पहुँच सके, तब पितामहने बड़े रोषमें भरकर इन पक्षिराजको शाप देते हुए कहा— ॥ ८ ॥
यस्मान्मूढो मम सभां नागतोऽसौ बकाधमः ।
तस्माद् वधं स दुष्टात्मा नचिरात् समवाप्स्यति ॥ ९ ॥
‘वह मूर्ख और नीच बगला मेरी सभामें नहीं आया है; इसलिये शीघ्र ही उस दुष्टात्माको वधका कष्ट भोगना पड़ेगा’ ॥ ९ ॥
तदयं तस्य वचनान्निहतो गौतमेन वै ।
तेनैवामृतसिक्तश्च पुनः संजीवितो बकः ॥ १० ॥
ब्रह्माजीके उस वचनसे ही गौतमने इनका वध किया और ब्रह्माजीने ही पुनः अमृत छिड़ककर राजधर्माको जीवन-दान दिया है ॥ १० ॥
राजधर्मा बकः प्राह प्रणिपत्य पुरन्दरम् ।
यदि तेऽनुग्रहकृता मयि बुद्धिः सुरेश्वर ॥ ११ ॥
सखायं मे सुदयितं गौतमं जीवयेत्युत ।
तदनन्तर राजधर्मा बकने इन्द्रको प्रणाम करके कहा—‘सुरेश्वर! यदि आपकी मुझपर कृपा है तो मेरे प्रिय मित्र गौतमको भी जीवित कर दीजिये’ ॥ ११ १/२ ॥
तस्य वाक्यं समादाय वासवः पुरुषर्षभ ॥ १२ ॥
सिक्त्वामृतेन तं विप्रं गौतमं जीवयत् तदा ।
‘पुरुषप्रवर! उसके अनुरोधको स्वीकार करके इन्द्र-देवने गौतम ब्राह्मणको भी अमृत छिड़ककर जिला दिया ॥
सभाण्डोपस्करं राजंस्तमासाद्य बकाधिपः ॥ १३ ॥
सम्परिष्वज्य सुहृदं प्रीत्या परमया युतः ।
राजन्! बर्तन और सुवर्ण आदि सब सामग्रीसहित प्रिय सुहृद् गौतमको पाकर बकराजने बड़े प्रेमसे उसको हृदयसे लगा लिया ॥ १३ १/२ ॥
अथ तं पापकर्माणं राजधर्मा बकाधिपः ॥ १४ ॥
विसर्जयित्वा सधनं प्रविवेश स्वमालयम् ।
फिर बकराज राजधर्माने उस पापाचारीको धनसहित विदा करके अपने घरमें प्रवेश किया ॥ १४ १/२ ॥
यथोचितं च स बको ययौ ब्रह्मसदस्तथा ॥ १५ ॥
ब्रह्मा चैनं महात्मानमातिथ्येनाभ्यपूजयत् ।
तदनन्तर बकराज यथोचित रीतिसे ब्रह्माजीकी सभामें गया और ब्रह्माजीने उस महात्माका आतिथ्य-सत्कार किया ॥ १५ १/२ ॥
गौतमश्चापि सम्प्राप्य पुनस्तं शबरालयम् ।
शूद्रायां जनयामास पुत्रान् दुष्कृतकारिणः ॥ १६ ॥
गौतम भी पुनः भीलोंके ही गाँवमें जाकर रहने लगा। वहाँ उसने उस शूद्रजातिकी स्त्रीके पेटसे ही अनेक पापाचारी पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ १६ ॥
शापश्च सुमहांस्तस्य दत्तः सुरगणैस्तदा ।
कुक्षौ पुनर्भूवाः पापोऽयं जनयित्वा चिरात् सुतान् ॥ १७ ॥
निरयं प्राप्स्यति महत् कृतघ्नोऽयमिति प्रभो ।
तब देवताओंने गौतमको महान् शाप देते हुए कहा—'यह पापी कृतघ्न है और दूसरा पति स्वीकार करनेवाली शूद्रजातीय स्त्रीके पेटसे बहुत दिनोंसे संतान पैदा करता आ रहा है। इस पापके कारण यह घोर नरकमें पड़ेगा' ॥
एतत् प्राह पुरा सर्वं नारदो मम भारत ॥ १८ ॥
संस्मृत्य चापि सुमहदाख्यानं भरतर्षभ ।
मयापि भवते सर्वं यथावदनुवर्णितम् ॥ १९ ॥
भारत! यह सारा प्रसङ्ग पूर्वकालमें मुझसे महर्षि नारदने कहा था। भरतश्रेष्ठ! इस महान् आख्यानको याद करके मैंने तुम्हारे समक्ष सब यथार्थरूपसे कहा है ॥
कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् ।
अश्रद्धेयः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ २० ॥
कृतघ्नको कैसे यश प्राप्त हो सकता है? उसे कैसे स्थान और सुखकी उपलब्धि हो सकती है? कृतघ्न विश्वासके योग्य नहीं होता। कृतघ्नके उद्धारके लिये शास्त्रोंमें कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है ॥
मित्रद्रोहो न कर्तव्यः पुरुषेण विशेषतः ।
मित्रध्रुङ् नरकं घोरमनन्तं प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥
मनुष्यको विशेष ध्यान देकर मित्रद्रोहके पापसे बचना चाहिये। मित्रद्रोही मनुष्य अनन्तकालके लिये घोर नरकमें पड़ता है ॥ २१ ॥
कृतज्ञेन सदा भाव्यं मित्रकामेन चैव ह ।
मित्राच्च लभते सर्वं मित्रात् पूजां लभेत च ॥ २२ ॥
प्रत्येक मनुष्यको सदा कृतज्ञ होना चाहिये और मित्रकी इच्छा रखनी चाहिये; क्योंकि मित्रसे सब कुछ प्राप्त होता है। मित्रके सहयोगसे सदा सम्मानकी प्राप्ति होती है ॥
मित्राद् भोगांश्च भुञ्जीत मित्रेणापत्सु मुच्यते ।
सत्कारैरुत्तमैर्मित्रं पूजयेत विचक्षणः ॥ २३ ॥
मित्रकी सहायतासे भोगोंकी भी उपलब्धि होती है और मित्रद्वारा मनुष्य आपत्तियोंसे छुटकारा पा जाता है, अतः बुद्धिमान् पुरुष उत्तम सत्कारोंद्वारा मित्रका पूजन करे ॥
परित्याज्यो बुधैः पापः कृतघ्नो निरपत्रपः ।
मित्रद्रोही कुलाङ्गारः पापकर्मा नराधमः ॥ २४ ॥
जो पापी, कृतघ्न, निर्लज्ज, मित्रद्रोही, कुलाङ्गार और पापाचारी हो, ऐसे अधम मनुष्यका विद्वान् पुरुष सदा त्याग करे ॥ २४ ॥
एष धर्मभृतां श्रेष्ठ प्रोक्तः पापो मया तव ।
मित्रद्रोही कृतघ्नो वै किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २५ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हें पापी, मित्रद्रोही और कृतघ्न पुरुषका परिचय दिया है। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तदा वाक्यं भीष्मेणोक्तं महात्मना ।
युधिष्ठिरः प्रीतमना बभूव जनमेजय ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा भीष्मका यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७३ ॥
(मोक्षधर्मपर्व)
(मोक्षधर्मपर्व)
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
धर्माः पितामहेनोक्ता राजधर्माश्रिताः शुभाः ।
धर्ममाश्रमिणां श्रेष्ठं वक्तुमर्हसि पार्थिव ॥ १ ॥
**राजा युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! यहाँ तक आपने राजधर्मसम्बन्धी श्रेष्ठ धर्मोंका उपदेश दिया। पृथ्वीनाथ! अब आप आश्रमियोंके उत्तम धर्मका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्ग्यः सत्यफलं तपः ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**युधिष्ठिर! वेदोंमें सर्वत्र सभी आश्रमोंके लिये स्वर्गसाधक यथार्थ फलकी प्राप्ति करानेवाली तपस्याका उल्लेख है। धर्मके बहुत-से द्वार हैं। संसारमें कोई ऐसी क्रिया नहीं है, जिसका कोई फल न हो ॥ २ ॥
यस्मिन् यस्मिंस्तु विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो-जो पुरुष जिस-जिस विषयमें पूर्ण निश्चयको पहुँच जाता है (जिसके द्वारा उसे अभीष्ट सिद्धिका विश्वास हो जाता है), उसीको वह कर्तव्य समझता है। दूसरे विषयको नहीं ॥ ३ ॥
यथा यथा च पर्येति लोकतन्त्रमसारवत् ।
तथा तथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः ॥ ४ ॥
मनुष्य जैसे-जैसे संसारके पदार्थोंको सारहीन समझता है, वैसे ही वैसे इनमें उसका वैराग्य होता जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥
एवं व्यवसिते लोके बहुदोषे युधिष्ठिर ।
आत्ममोक्षनिमित्तं वै यतेत मतिमान् नरः ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार यह जगत् अनेक दोषोंसे परिपूर्ण है, ऐसा निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष अपने मोक्षके लिये प्रयत्न करे ।। ५ ।।
युधिष्ठिर उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
यया बुद्ध्या नुदेच्छोकं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— दादाजी! धनके नष्ट हो जानेपर अथवा स्त्री, पुत्र या पिताके मर जानेपर किस बुद्धिसे मनुष्य अपने शोकका निवारण करे? यह मुझे बताइये ।। ६ ।।
भीष्म उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
अहो दुःखमिति ध्यायन् शोकस्यापचितिं चरेत् ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— वत्स! जब धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तब ‘ओह! संसार कैसा दुःखमय है’ यह सोचकर मनुष्य शोकको दूर करनेवाले शम-दम आदि साधनोंका अनुष्ठान करे ।। ७ ।।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा सेनजितं विप्रः कश्चिदेत्याब्रवीत् सुहृत् ॥ ८ ॥
इस विषयमें किसी हितैषी ब्राह्मणने राजा सेनजित्के पास आकर उन्हें जैसा उपदेश दिया था, उसी प्राचीन इतिहासको विज्ञ पुरुष दृष्टान्तके रूपमें प्रस्तुत किया करते हैं ।। ८ ।।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं राजानं शोकविह्वलम् ।
विषण्णमनसं दृष्ट्वा विप्रो वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
राजा सेनजित्के पुत्रकी मृत्यु हो गयी थी। वे उसीके शोककी आगसे जल रहे थे। उनका मन विषादमें डूबा हुआ था। उन शोकविह्वल नरेशको देखकर ब्राह्मणने इस प्रकार कहा— ।। ९ ।।
किं नु मुह्यसि मूढस्त्वं शोच्यः किमनुशोचसि ।
यदा त्वामपि शोचन्तः शोच्या यास्यन्ति तां गतिम् ॥ १० ॥
‘राजन्! तुम मूढ़ मनुष्यकी भाँति क्यों मोहित हो रहे हो? शोकके योग्य तो तुम स्वयं ही हो, फिर दूसरोंके लिये क्यों शोक करते हो? अजी! एक दिन ऐसा आयेगा, जब कि दूसरे शोचनीय मनुष्य तुम्हारे लिये भी शोक करते हुए उसी गतिको प्राप्त होंगे ।। १० ।।
त्वं चैवाहं च ये चान्ये त्वामुपासन्ति पार्थिव ।
सर्वे तत्र गमिष्यामो यत एवागता वयम् ॥ ११ ॥
‘पृथ्वीनाथ! तुम, मैं और ये दूसरे लोग जो इस समय तुम्हारे पास बैठे हैं; सब वहीं जायँगे, जहाँसे हम आये हैं’ ।। ११ ।।