महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1173, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'यद्यपि मैं इस समय जिस शृगालयोनिमें हूँ, इसकी गणना भी पापयोनियोंमें ही है, तथापि दूसरी बहुत-सी पापयोनियाँ इससे भी नीची श्रेणीकी हैं ॥ २२ ॥ जात्यैवैके सुखितराः सन्त्यन्ये भृशदुःखिताः । नैकान्तं सुखमेवेह क्वचित्पश्यामि कस्यचित् ॥ २३ ॥ 'कुछ देवता आदि जातिसे ही सुखी हैं, दूसरे पशु आदि जातिसे ही अत्यन्त दुखी हैं; परंतु मैं कहीं किसीको ऐसा नहीं देखता, जिसको सर्वथा सुख ही सुख हो ॥ २३ ॥ मनुष्या ह्याढ्यतां प्राप्य राज्यमिच्छन्त्यनन्तरम् । राज्याद् देवत्वमिच्छन्ति देवत्वादिन्द्रतामपि ॥ २४ ॥ 'मनुष्य धनी हो जानेपर राज्य पाना चाहते हैं, राज्यसे देवत्वकी इच्छा करते हैं और देवत्वसे फिर इन्द्रपद प्राप्त करना चाहते हैं ॥ २४ ॥ भवेस्त्वं यद्यपि त्वाढ्यो न राजा न च दैवतम् । देवत्वं प्राप्य चेन्द्रत्वं नैव तुष्येस्तथा सति ॥ २५ ॥ 'यदि आप धनी हो जायँ तो भी ब्राह्मण होनेके कारण राजा नहीं हो सकते। यदि कदाचित् राजा हो जायँ तो देवता नहीं हो सकते। देवता और इन्द्रका पद भी पा जायँ तो भी आप उतनेसे संतुष्ट नहीं रह सकेंगे ॥ २५ ॥ न तृप्तिः प्रियलाभेऽस्ति तृष्णा नाद्भिः प्रशाम्यति । सम्प्रज्वलति सा भूयः समिद्भिरिव पावकः ॥ २६ ॥ 'प्रिय वस्तुओंका लाभ होनेसे कभी तृप्ति नहीं होती। बढ़ती हुई तृष्णा जलसे नहीं बुझती। ईंधन पाकर जलनेवाली आगके समान वह और भी प्रज्वलित होती जाती है ॥ २६ ॥ अस्त्येव त्वयि शोकोऽपि हर्षश्चापि तथा त्वयि । सुखदुःखे तथा चोभे तत्र का परिदेवना ॥ २७ ॥ 'तुम्हारे भीतर शोक भी है और हर्ष भी। साथ ही सुख और दुःख दोनों हैं; फिर शोक करना किस कामका? ॥ २७ ॥ परिच्छिद्यैव कामानां सर्वेषां चैव कर्मणाम् । मूलं बुद्धीन्द्रियग्रामं शकुन्तानिव पञ्जरे ॥ २८ ॥ 'बुद्धि और इन्द्रियाँ ही समस्त कामनाओं और कर्मोंकी मूल हैं। उन्हें पिंजड़ेमें बंद पक्षियोंकी तरह अपने काबूमें रखा जाय तो कोई भय नहीं है ॥ २८ ॥ न द्वितीयस्य शिरसच्छेदं विद्यते क्वचित् । न च पाणेस्तृतीयस्य यन्नास्ति न ततो भयम् ॥ २९ ॥ 'मनुष्यको दूसरे सिर और तीसरे हाथके कटनेका कभी भय नहीं होता है। जो वास्तवमें है ही नहीं, उसके कारण भय भी नहीं होता है ॥ २९ ॥ न खल्वप्यरसज्ञस्य कामः क्वचन जायते ।