भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1230, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1230

नान्योन्यं बध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः । परो ह्यधर्मो नैवास्ति संदेहो नापि जायते ॥ ११ ॥ वहाँ किसीके मनमें परायी स्त्रियोंके प्रति लोभ नहीं होता। सब लोग अपनी ही स्त्रियोंमें अनुरक्त रहते हैं। वहाँके निवासी धनके लिये एक दूसरेका वध नहीं करते। किसीको बन्धनमें नहीं डालते। उन्हें कभी महान् विस्मय नहीं होता। अधर्मका तो वहाँ नाम भी नहीं है। वहाँ किसीके मनमें संदेह नहीं पैदा होता है ॥ ११ ॥

कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते । पानासनाशनोपेताः प्रासादभवनाश्रयाः ॥ १२ ॥ सर्वकामैर्वृताः केचिद्धेमाभरणभूषिताः । प्राणधारणमात्रं तु केषांचिदुपपद्यते । श्रमेण महता केचित् कुर्वन्ति प्राणधारणम् ॥ १३ ॥ वहाँ किये हुए कर्मका फल प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है। उस लोकमें कुछ लोग बड़े-बड़े महलोंमें रहते, अच्छे आसनोंपर बैठते और उत्तमोत्तम वस्तुएँ खाते-पीते हैं। समस्त कामनाओंसे सम्पन्न और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित होते हैं तथा कुछ लोगोंको प्राणधारणमात्रके लिये भोजन प्राप्त होता है, कुछ लोग बड़े परिश्रमसे तपोमय जीवन व्यतीत करते हुए प्राण धारण करते हैं (इस प्रकार वह लोक इस लोकसे सर्वथा उत्कृष्ट है)* ॥ १२-१३ ॥

इह धर्मपराः केचित् केचिन्नैकृतिका नराः । सुखिता दुःखिताः केचिन्निर्धना धनिनोऽपरे ॥ १४ ॥ इस मनुष्यलोकमें कुछ मनुष्य धर्मपरायण होते हैं तो कुछ बड़े भारी ठग निकलते हैं। इसीलिये कोई सुखी और कोई दुखी होते हैं। कुछ धनवान् और कुछ लोग निर्धन हो जाते हैं ॥ १४ ॥

इह श्रमो भयं मोहः क्षुधा तीव्रा च जायते । लोभश्चार्थकृतो नृणां येन मुह्यन्त्यपण्डिताः ॥ १५ ॥ इहलोकमें श्रम, भय, मोह और तीव्र भूखका कष्ट होता है। मनुष्योंमें धनका लोभ विशेष होता है, जिससे अज्ञानी पुरुष मोहमें पड़ जाते हैं ॥ १५ ॥

इह वार्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कारिणः । यस्तद्भेदोभयं प्राज्ञः पाप्मना न स लिप्यते ॥ १६ ॥ इस देशमें धर्म और अधर्म करनेवाले मनुष्योंके विषयमें नाना प्रकारकी बातें सुनी जाती हैं। जो धर्म और अधर्म दोनोंके परिणामको जानता है, वह विद्वान् पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता है ॥ १६ ॥

सोपधं निकृतिः स्तेयं परिवादो ह्यसूयिता । परोपघातो हिंसा च पैशुन्यमनृतं तथा ॥ १७ ॥