भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1355, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1355

जब प्रधान प्रकृतिको प्राप्त हो जाय और गुणोंकी साम्यावस्थारूप महाप्रलय उपस्थित हो जाय, तब मेरा समस्त इन्द्रियों और उनके विषयोंसे वियोग हो जाय ।। निष्कैकवल्यपदं तात काङ्क्षेऽहं परमं तव । एकीभावस्त्वया मेऽस्तु न मे जन्म भवेत् पुनः ॥ तात! मैं तुम्हारे लिये परम मोक्षकी आकांक्षा रखता हूँ। आपके साथ मेरा एकीभाव हो जाय। इस संसारमें फिर मेरा जन्म न हो ।। त्वद्बुद्धिस्त्वद्गतप्राणस्त्वद्भक्तस्त्वत्परायणः । त्वामेवाहं स्मरिष्यामि मरणे पर्युपस्थिते ॥ मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मेरी बुद्धि आपमें ही लगी रहे। मेरे प्राण आपमें ही लीन रहें। मेरा आपमें ही भक्तिभाव बना रहे और मैं सदा आपकी ही शरणमें पड़ा रहूँ। इस प्रकार मैं निरन्तर आपका ही स्मरण करता रहूँ ।। पूर्वदेहकृता ये मे व्याधयः प्रविशन्तु माम् । अर्दयन्तु च दुःखानि ऋणं मे प्रतिमुञ्चतु ॥ पूर्व शरीरमें मैंने जो दुष्कर्म किये हों, उनके फलस्वरूप रोग-व्याधि मेरे शरीरमें प्रवेश करें और नाना प्रकारके दुःख मुझे आकर सतावें। इन सबका जो मेरे ऊपर ऋण है, वह उतर जाय ।। अनुध्यातोऽसि देवेश न मे जन्म भवेत् पुनः । तस्माद् ब्रवीमि कर्माणि ऋणं मे न भवेदिति ॥ देवेश्वर! मैंने इसलिये आपका स्मरण किया है कि फिर मेरा जन्म न हो; अतः फिर कहता हूँ कि मेरे कर्म नष्ट हो जायँ और मुझपर किसीका ऋण बाकी न रह जाय ।। उपतिष्ठन्तु मां सर्वे व्याधयः पूर्वसंचिताः । अनृणो गन्तुमिच्छामि तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ पूर्व जन्ममें जिन कर्मोंका मेरे द्वारा संचय किया गया है, वे सभी रोग मेरे शरीरमें उपस्थित हो जायँ। मैं सबसे उऋण होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जाना चाहता हूँ ।।

श्रीभगवानुवाच

अहं भगवतस्तस्य मम चासौ सनातनः । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ श्रीभगवान् बोले— नारद! मैं उस सौभाग्यशाली भक्तका हूँ और वह भक्त भी मेरा सनातन सखा है। मैं उसके लिये कभी अदृश्य नहीं होता और न वही कभी मेरी दृष्टिसे ओझल होता है ।। कर्मेन्द्रियाणि संयम्य पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च ।

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