महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जब प्रधान प्रकृतिको प्राप्त हो जाय और गुणोंकी साम्यावस्थारूप महाप्रलय उपस्थित हो जाय, तब मेरा समस्त इन्द्रियों और उनके विषयोंसे वियोग हो जाय ।। निष्कैकवल्यपदं तात काङ्क्षेऽहं परमं तव । एकीभावस्त्वया मेऽस्तु न मे जन्म भवेत् पुनः ॥ तात! मैं तुम्हारे लिये परम मोक्षकी आकांक्षा रखता हूँ। आपके साथ मेरा एकीभाव हो जाय। इस संसारमें फिर मेरा जन्म न हो ।। त्वद्बुद्धिस्त्वद्गतप्राणस्त्वद्भक्तस्त्वत्परायणः । त्वामेवाहं स्मरिष्यामि मरणे पर्युपस्थिते ॥ मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मेरी बुद्धि आपमें ही लगी रहे। मेरे प्राण आपमें ही लीन रहें। मेरा आपमें ही भक्तिभाव बना रहे और मैं सदा आपकी ही शरणमें पड़ा रहूँ। इस प्रकार मैं निरन्तर आपका ही स्मरण करता रहूँ ।। पूर्वदेहकृता ये मे व्याधयः प्रविशन्तु माम् । अर्दयन्तु च दुःखानि ऋणं मे प्रतिमुञ्चतु ॥ पूर्व शरीरमें मैंने जो दुष्कर्म किये हों, उनके फलस्वरूप रोग-व्याधि मेरे शरीरमें प्रवेश करें और नाना प्रकारके दुःख मुझे आकर सतावें। इन सबका जो मेरे ऊपर ऋण है, वह उतर जाय ।। अनुध्यातोऽसि देवेश न मे जन्म भवेत् पुनः । तस्माद् ब्रवीमि कर्माणि ऋणं मे न भवेदिति ॥ देवेश्वर! मैंने इसलिये आपका स्मरण किया है कि फिर मेरा जन्म न हो; अतः फिर कहता हूँ कि मेरे कर्म नष्ट हो जायँ और मुझपर किसीका ऋण बाकी न रह जाय ।। उपतिष्ठन्तु मां सर्वे व्याधयः पूर्वसंचिताः । अनृणो गन्तुमिच्छामि तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ पूर्व जन्ममें जिन कर्मोंका मेरे द्वारा संचय किया गया है, वे सभी रोग मेरे शरीरमें उपस्थित हो जायँ। मैं सबसे उऋण होकर भगवान् विष्णुके परम धामको जाना चाहता हूँ ।।
श्रीभगवानुवाच
अहं भगवतस्तस्य मम चासौ सनातनः । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ श्रीभगवान् बोले— नारद! मैं उस सौभाग्यशाली भक्तका हूँ और वह भक्त भी मेरा सनातन सखा है। मैं उसके लिये कभी अदृश्य नहीं होता और न वही कभी मेरी दृष्टिसे ओझल होता है ।। कर्मेन्द्रियाणि संयम्य पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि च ।
दशेन्द्रियाणि मनसि अहङ्कारे तथा मनः ॥ अहङ्कारं तथा बुद्धौ बुद्धिमात्मनि योजयेत् । साधक पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर उन दसों इन्द्रियोंको मनमें विलीन करे। मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको आत्मामें लगावे ॥
यतबुद्धीन्द्रियः पश्यन् बुद्ध्या बुद्धयेत् परात्परम् । ममायमिति यस्याहं येन सर्वमिदं ततम् । पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको संयममें रखकर बुद्धिके द्वारा परात्पर परमात्माका अनुभव करे कि यह परमेश्वर मेरा है और मैं इसका हूँ, तथा इसीने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥
आत्मनाऽऽत्मनि संयोज्य परमात्मान्यनुस्मरेत् ॥ ततो बुद्धेः परं बुद्ध्वा लभते न पुनर्भवम् । मरणे समनुप्राप्ते यश्चैवं मामनुस्मरेत् ॥ अपि पापसमाचारः स याति परमां गतिम् । स्वयं ही अपने-आपको परमात्माके ध्यानमें लगाकर निरन्तर उनका स्मरण करे, तदनन्तर बुद्धिसे भी परे परमात्माको जानकर मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मृत्युकाल आनेपर इस प्रकार मेरा स्मरण करता है, वह पुरुष पहलेका पापाचारी रहा हो तो भी परम गतिको प्राप्त होता है ॥
ओं नमो भगवते तस्मै देहिनां परमात्मने ॥ नारायणाय भक्तानामेकनिष्ठाय शाश्वते । समस्त देहधारियोंके परमात्मा तथा भक्तोंके प्रति एकमात्र निष्ठा रखनेवाले उन सनातन भगवान् नारायणको नमस्कार है ॥
इमामनुस्मृतिं दिव्यां वैष्णवीं सुसमाहितः ॥ स्वपन् विबुध्यंश्च पठन् यत्र तत्र समभ्यसेत् । यह दिव्य वैष्णवी-अनुस्मृति विद्या है। मनुष्य एकाग्रचित्त होकर सोते, जागते और स्वाध्याय करते समय जहाँ कहीं भी इसका जप करता रहे ॥
पौर्णमास्याममायां च द्वादश्यां च विशेषतः ॥ श्रावयेच्छ्रद्दधानांश्च मद्भक्तांश्च विशेषतः । पूर्णिमा, अमावास्या तथा विशेषतः द्वादशी तिथिको मेरे श्रद्धालु भक्तोंको इसका श्रवण करावे ॥
यद्यहङ्कारमाश्रित्य यज्ञदानतपःक्रियाः ॥ कुर्वंस्तत्फलमाप्नोति पुनरावर्तनं तु तत् । यदि कोई अहंकारका आश्रय लेकर यज्ञ, दान और तपरूप कर्म करे तो उसका फल उसे मिलता है। परंतु वह आवागमनके चक्करमें डालनेवाला होता है ॥
अभ्यर्चयन् पितॄन् देवान् पठन् जुह्वन् बलिं ददत् ।।
ज्वलन्नग्निं स्मरेद् यो मां स याति परमां गतिम् ।
जो देवताओं और पितरोंकी पूजा, पाठ, होम और बलिवैश्वदेव करते तथा अग्निमें आहुति देते समय मेरा स्मरण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ।।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ।।
यज्ञं दानं तपस्तस्मात् कुर्यादाशीर्विवर्जितः ।
यज्ञ, दान और तप—ये मनीषी पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं; अतः यज्ञ, दान और तपका निष्कामभावसे अनुष्ठान करे ।।
नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।।
तस्याक्षयो भवेल्लोकः श्वपाकस्यापि नारद ।
नारद! जो मेरा भक्त श्रद्धापूर्वक मेरे लिये केवल नमस्कारमात्र बोल देता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षयलोककी प्राप्ति होती है ।।
किं पुनर्ये यजन्ते मां साधका विधिपूर्वकम् ।।
श्रद्धावन्तो यतात्मानस्ते मां यान्ति मदाश्रिताः ।
फिर जो साधक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मेरे आश्रित हो श्रद्धा और विधिके साथ मेरी आराधना करते हैं, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है? ।।
कर्माण्याद्यन्तवन्तीह मद्भक्तो नान्तमश्नुते ।।
मामेव तस्माद् देवर्षे ध्याहि नित्यमतन्द्रितः ।
अवाप्स्यसि ततः सिद्धिं द्रक्ष्यस्येव पदं मम ।।
देवर्षे! सारे कर्म और उनके फल आदि-अन्तवाले हैं; परंतु मेरा भक्त अन्तवान् (विनाशशील) फलका उपभोग नहीं करता; अतः तुम सदा आलस्यरहित होकर मेरा ही ध्यान करो। इससे तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी और तुम मेरे परमधामका दर्शन कर लोगे ।।
अज्ञानाय च यो ज्ञानं दद्याद् धर्मोपदेशतः ।
कृत्स्नां वा पृथिवीं दद्यात् तेन तुल्यं च तत्फलम् ।।
जो धर्मोपदेशके द्वारा अज्ञानी पुरुषको ज्ञान प्रदान करता है अथवा जो किसीको समूची पृथ्वीका दान कर देता है तो उस ज्ञानदानका फल इस पृथ्वीदानके बराबर ही माना जाता है ।।
तस्मात् प्रदेयं साधुभ्यो जन्मबन्धभयापहम् ।
एवं दत्त्वा नरश्रेष्ठ श्रेयो वीर्यं च विन्दति ।।
नरश्रेष्ठ नारद! इसलिये साधु पुरुषोंको जन्म और बन्धनके भयको दूर करनेवाला ज्ञान ही देना चाहिये। इस प्रकार ज्ञान देकर मनुष्य कल्याण और बल प्राप्त करता है ।।
अश्वमेधसहस्राणां सहस्रं यः समाचरेत् ।
नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ॥
जो दस लाख अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान कर ले, वह भी उस पदको नहीं पा सकता, जो मेरे भक्तोंको प्राप्त हो जाता है ॥
भीष्म उवाच
एवं पृष्टः पुरा तेन नारदेन सुरर्षिणा ।
यदुवाच तदा शम्भुस्तदुक्तं तव सुव्रत ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**सुव्रत! इस प्रकार पूर्वकालमें देवर्षि नारदके पूछनेपर कल्याणमय भगवान् विष्णुने उस समय जो कुछ कहा था, वह सब तुम्हें बता दिया ॥
त्वमप्येकमना भूत्वा ध्याहि ध्येयं गुणातिगम् ।
भजस्व सर्वभावेन परमात्मानमव्ययम् ॥
तुम भी एकचित्त होकर उन गुणातीत परमात्माका ध्यान करो और सम्पूर्ण भक्तिभावसे उन्हीं अविनाशी परमात्माका भजन करो ॥
श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं दिव्यं नारायणेरितम् ।
अत्यन्तभक्तिमान् देव एकान्तत्वमुपेयिवान् ॥
भगवान् नारायणका कहा हुआ यह दिव्य वचन सुनकर अत्यन्त भक्तिमान् देवर्षि नारद भगवान्के प्रति एकाग्रचित्त हो गये ॥
नारायणमृषिं देवं दशवर्षाण्यनन्यभाक् ।
इदं जपन् वै प्राप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥
जो पुरुष अनन्यभावसे दस वर्षोंतक ऋषि-प्रवर नारायणदेवका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ॥
किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने ।
नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥
जिसकी भगवान् जनार्दनमें भक्ति है, उसे बहुत-से मन्त्रोंद्वारा क्या लेना है? 'ॐ नमो नारायणाय' यह एकमात्र मन्त्र ही सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला है ॥
इमां रहस्यां परमामनुस्मृति-
मधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् ।
विहाय दुःखान्यवमुच्य सङ्कटात्
स वीतरागो विचरेन्महीमिमाम् ॥)
इस परम गोपनीय अनुस्मृति विद्याका स्वाध्याय करके मनुष्य भगवान्के प्रति दृढ़ निष्ठा रखनेवाली बुद्धि प्राप्त कर लेता है। वह सारे दुःखोंको दूर करके संकटसे मुक्त एवं वीतराग हो इस पृथ्वीपर सर्वत्र विचरण करता है ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अन्तर्भूमिविक्रीडनं नाम
नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भूमिके भीतर भगवान्
वाराहकी क्रीड़ानामक दो सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८६ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १२२ १/३ श्लोक हैं)
* इस श्लोकमें वर्णित भावके अनुसार सनातन शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये—नादनेन सहितः सनादनः। दकारस्थाने तकारो छान्दसः। जो नादके साथ हो, वह ‘सनादन’ कहलाता है। सनादनके दकारके स्थानमें तकार हो जानेसे ‘सनातन’ बनता है।
१. आश्रावय, २. अस्तु श्रौषट्, ३. यज, ४. ये यजामहे, ५. वषट्।
गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन
दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
योगं मे परमं तात मोक्षस्य वद भारत ।
तमहं तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ तात भरतनन्दन! आप मुझे मोक्षके साधनभूत परम योगका उपदेश कीजिये। मैं उसे यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं मोक्षसंयुक्तं शिष्यस्य गुरुणा सह ॥ २ ॥
**भीष्मजी बोले—**राजन्! इस विषयमें एक शिष्यका गुरुके साथ जो मोक्षसम्बन्धी संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
कश्चिद् ब्राह्मणमासीनमाचार्यमृषिसत्तमम् ।
तेजोराशिं महात्मानं सत्यसंधं जितेन्द्रियम् ॥ ३ ॥
शिष्यः परममेधावी श्रेयोऽर्थी सुसमाहितः ।
चरणावुपसंगृह्य स्थितः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ ४ ॥
किसी समयकी बात है, एक विद्वान् ब्राह्मण श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे। वे आचार्यकोटिके पण्डित और श्रेष्ठतम महर्षि थे। देखनेमें महान् तेजकी राशि जान पड़ते थे। बड़े महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे। एक दिन उनकी सेवामें कोई परम मेधावी कल्याणकामी एवं समाहितचित्त शिष्य आया (जो चिरकालतक उनकी शुश्रूषा कर चुका था), वह उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़ सामने खड़ा हो इस प्रकार बोला— ॥ ३-४ ॥
उपासनात् प्रसन्नोऽसि यदि वै भगवन् मम ।
संशयो मे महान् कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।
कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत् सम्यग्ब्रूहि यत्परम् ॥ ५ ॥
'भगवन्! यदि आप मेरी सेवासे प्रसन्न हैं तो मेरे मनमें जो एक बड़ा भारी संदेह है, उसे दूर करनेकी कृपा करें—मेरे प्रश्नकी विशद व्याख्या करें। मैं इस संसारमें कहाँसे आया हूँ
और आप भी कहाँसे आये हैं? यह भलीभाँति समझाकर बताइये। इसके सिवा जो परम तत्त्व है, उसका भी विवेचन कीजिये ॥ ५ ॥
कथं च सर्वभूतेषु समेषु द्विजसत्तम ।
सम्यग्वृत्ता निवर्तन्ते विपरीताः क्षयोदयाः ॥ ६ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! पृथ्वी आदि सम्पूर्ण महाभूत सर्वत्र समान हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर उन्हींसे निर्मित हुए हैं तो भी उनमें क्षय और वृद्धि—ये दोनों विपरीतभाव क्यों होते हैं? ॥ ६ ॥
वेदेषु चापि यद् वाक्यं लौकिकं व्यापकं च यत् ।
एतद् विद्वन् यथातत्त्वं सर्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ७ ॥
'वेदों और स्मृतियोंमें भी जो लौकिक और व्यापक धर्मोंका वर्णन है, उनमें भी विषमता है। अतः विद्वन्! इन सबकी आप यथार्थरूपसे व्याख्या करें' ॥ ७ ॥
गुरुरुवाच
शृणु शिष्य महाप्राज्ञ ब्रह्मगुह्यमिदं परम् ।
अध्यात्मं सर्वविद्यानामागमानां च यद्वसु ॥ ८ ॥
**गुरुने कहा—**वत्स! सुनो। महामते! तुमने जो बात पूछी है, वह वेदोंका उत्तम एवं गूढ़ रहस्य है। यही अध्यात्मतत्त्व है तथा यही समस्त विद्याओं और शास्त्रोंका सर्वस्व है ॥ ८ ॥
वासुदेवः परमिदं विश्वस्य ब्रह्मणो मुखम् ।
सत्यं ज्ञानमथो यज्ञस्तितिक्षा दम आर्जवम् ॥ ९ ॥
सम्पूर्ण वेदका मुख जो प्रणव है वह तथा सत्य, ज्ञान, यज्ञ, तितिक्षा, इन्द्रिय-संयम, सरलता और परम तत्त्व—यह सब कुछ वासुदेव ही है ॥ ९ ॥
पुरुषं सनातनं विष्णुं यं तं वेदविदो विदुः ।
स्वर्गप्रलयकर्तारमव्यक्तं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १० ॥
वेदज्ञजन उसीको सनातन पुरुष और विष्णु भी मानते हैं। वही संसारकी सृष्टि और प्रलय करनेवाला अव्यक्त एवं सनातन ब्रह्म है ॥ १० ॥
तदिदं ब्रह्म वार्ष्णेयमितिहासं शृणुष्व मे ।
ब्राह्मणो ब्राह्मणैः श्राव्यो राजन्यः क्षत्रियैस्तथा ॥ ११ ॥
वैश्यो वैश्यैस्तथा श्राव्यः शूद्रः शूद्रैर्महामनाः ।
माहात्म्यं देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः ॥ १२ ॥
वही ब्रह्म वृष्णिकुलमें श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण हुआ, इस कथाको तुम मुझसे सुनो। ब्राह्मण ब्राह्मणको, क्षत्रिय क्षत्रियको, वैश्य वैश्यको तथा शूद्र महामनस्वी शूद्रको, अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णुका माहात्म्य सुनावे ॥ ११-१२ ॥
अर्हस्त्वमसि कल्याणं वार्ष्णेयं शृणु यत्परम् ।
कालचक्रमनाद्यन्तं भावाभावस्वलक्षणम् ॥ १३ ॥
त्रैलोक्यं सर्वभूतेशे चक्रवत्परिवर्तते ।
तुम भी यह सब सुननेके योग्य अधिकारी हो; अतः भगवान् श्रीकृष्णका जो कल्याणमय उत्कृष्ट माहात्म्य है, उसे सुनो। यह जो सृष्टि-प्रलयरूप अनादि, अनन्त कालचक्र है, वह श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। सर्वभूतेश्वर श्रीकृष्णमें ये तीनों लोक चक्रकी भाँति घूम रहे हैं ।। १३ ½ ।।
यत्तदक्षरमव्यक्तममृतं ब्रह्म शाश्वतम् ।
वदन्ति पुरुषव्याघ्र केशवं पुरुषर्षभम् ॥ १४ ॥
पुरुषसिंह! पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको ही अक्षर, अव्यक्त, अमृत एवं सनातन परब्रह्म कहते हैं ॥ १४ ॥
पितॄन् देवानृषींश्चैव तथा वै यक्षराक्षसान् ।
नागासुरमनुष्यांश्च सृजते परमोऽव्ययः ॥ १५ ॥
ये अविनाशी परमात्मा श्रीकृष्ण ही पितर, देवता, ऋषि, यक्ष, राक्षस, नाग, असुर और मनुष्य आदिकी रचना करते हैं ॥ १५ ॥
तथैव वेदशास्त्राणि लोकधर्मांश्च शाश्वतान् ।
प्रलयं प्रकृतिं प्राप्य युगादौ सृजते पुनः ॥ १६ ॥
इसी प्रकार प्रलयकाल बीतनेपर कल्पके आरम्भमें प्रकृतिका आश्रय ले भगवान् श्रीकृष्ण ही ये वेद-शास्त्र और सनातन लोक-धर्मोंको पुनः प्रकट करते हैं ॥ १६ ॥
यथर्तौवृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ १७ ॥
जैसे ऋतु-परिवर्तनके साथ ही भिन्न-भिन्न ऋतुओंके नाना प्रकारके वे-ही-वे लक्षण प्रकट होते रहते हैं, वैसे ही प्रत्येक कल्पके आरम्भमें पूर्व कल्पोंके अनुसार तदनुरूप भावोंकी अभिव्यक्ति होती रहती है ।।
अथ यद्यद् यदा भाति कालयोगाद् युगादिषु ।
तत् तदुत्पद्यते ज्ञानं लोकयात्राविधानजम् ॥ ८ ॥
काल-क्रमसे युगादिमें जब-जब जो-जो वस्तु भासित होती है, लोक-व्यवहारवश तब-तब उसी-उसी विषयका ज्ञान प्रकट होता रहता है ।। १८ ।।
युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।
लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ॥ १९ ॥
कल्पके अन्तमें लुप्त हुए वेदों और इतिहासोंको कल्पके आरम्भमें स्वयम्भू ब्रह्माके आदेशसे महर्षियोंने तपस्याद्वारा सबसे पहले उपलब्ध किया था ।। १९ ।।
वेदविद् वेद भगवान् वेदाङ्गानि बृहस्पतिः ।
भार्गवो नीतिशास्त्रं तु जगाद जगतो हितम् ॥ २० ॥
उस समय स्वयं भगवान् ब्रह्माको वेदोंका, बृहस्पतिजीको वेदांगोंका और शुक्राचार्यको नीति-शास्त्रका ज्ञान हुआ तथा उन लोगोंने जगत्के हितके लिये उन सब विषयोंका उपदेश किया ॥ २० ॥ गान्धर्वं नारदो वेद भरद्वाजो धनुर्ग्रहम् । देवर्षिचरितं गार्ग्यः कृष्णात्रेयश्चिकित्सितम् ॥ २१ ॥ नारदजीको गान्धर्व वेदका, भरद्वाजको धनुर्वेदका, महर्षि गार्ग्यको देवर्षियोंके चरित्रका तथा कृष्णात्रेयको चिकित्साशास्त्रका ज्ञान हुआ ॥ २१ ॥ न्यायतन्त्राण्यनेकानि तैस्तैरुक्तानि वादिभिः । हेत्वागमसदाचारैर्यद्युक्तं तदुपास्यताम् ॥ २२ ॥ तर्कशील विद्वानोंने तर्कशास्त्रके अनेक ग्रन्थोंका प्रणयन किया। उन महर्षियोंने युक्तियुक्त शास्त्र और सदाचारके द्वारा जिस ब्रह्मका उपदेश किया है, उसीकी तुम भी उपासना करो ॥ २२ ॥ अनाद्यं तत्परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः । एकस्तद् वेद भगवान् धाता नारायणः प्रभुः ॥ २३ ॥ वह परब्रह्म अनादि और सबसे परे है। उसे न देवता जानते हैं न ऋषि। उसे तो एकमात्र जगत्पालक नारायण ही जानते हैं ॥ २३ ॥ नारायणादृषिगणास्तथा मुख्याः सुरासुराः । राजर्षयः पुराणाश्च परमं दुःखभेषजम् ॥ २४ ॥ नारायणसे ही ऋषियों, मुख्य-मुख्य देवताओं, असुरों तथा प्राचीन राजर्षियोंने उस ब्रह्मको जाना है; वह ब्रह्म-ज्ञान ही समस्त दुःखोंका परम औषध है ॥ २४ ॥ पुरुषाधिष्ठितान् भावान् प्रकृतिः सूयते यदा । हेतुयुक्तमतः पूर्वं जगत् सम्परिवर्तते ॥ २५ ॥ पुरुषद्वारा संकल्पमें लाये गये विविध पदार्थोंकी रचना प्रकृति ही करती है। इस प्रकृतिसे सर्वप्रथम कारणसहित जगत् उत्पन्न होता है ॥ २५ ॥ दीपादन्ये यथा दीपाः प्रवर्तन्ते सहस्रशः । प्रकृतिः सूयते तद्वदानन्त्यान् नापचीयते ॥ २६ ॥ जैसे एक दीपकसे दूसरे सहस्रों दीप जला लिये जाते हैं और पहले दीपकको कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार एक प्रकृति ही असंख्य पदार्थोंको उत्पन्न करती है और अनन्त होनेके कारण उसका क्षय नहीं होता ॥ अव्यक्तकर्मजा बुद्धिरहंकारं प्रसूयते । आकाशं चाप्यहंकाराद् वायुराकाशसम्भवः ॥ २७ ॥ अव्यक्त प्रकृतिमें क्षोभ होनेपर जिस बुद्धि (महत्तत्त्व) की उत्पत्ति होती है, वह बुद्धि अहंकारको जन्म देती है। अहंकारसे आकाश और आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती
है ॥ २७ ॥ वायोस्तेजस्ततश्चाप अद्भ्योऽथ वसुधोद्गता । मूलप्रकृतयो ह्यष्टौ जगदेतास्ववस्थितम् ॥ २८ ॥ वायुसे अग्निकी, अग्निसे जलकी और जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार ये आठ मूल-प्रकृतियाँ बतायी गयी हैं। इन्हींमें सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ २८ ॥ ज्ञानेन्द्रियाण्यतः पञ्च पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यपि । विषयाः पञ्च चैकं च विकारे षोडशं मनः ॥ २९ ॥ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय और एक मन—ये सोलह विकार कहे गये हैं। (इनमें मन तो अहंकारका विकार है और अन्य पन्द्रह अपने-अपने कारणरूप सूक्ष्म महाभूतोंके विकार हैं) ॥ २९ ॥ श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणं ज्ञानेन्द्रियाण्यथ । पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाक्कर्मणी अपि ॥ ३० ॥ श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ (लिंग) और वाक्—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं ॥ ३० ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च । विज्ञेयं व्यापकं चित्तं तेषु सर्वगतं मनः ॥ ३१ ॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच विषय हैं तथा इनमें व्यापक जो चित्त है, उसीको मन समझना चाहिये। मन सर्वगत कहा गया है ॥ ३१ ॥ रसज्ञाने तु जिह्वेयं व्याहृते वाक् तथोच्यते । इन्द्रियैर्विविधैर्युक्तं सर्वं व्यक्तं मनस्तथा ॥ ३२ ॥ रस-ज्ञानके समय मन ही यह रसना (जिह्वा)-रूप हो जाता है तथा बोलनेके समय वह मन ही वागिन्द्रिय कहलाता है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंके साथ मिलकर उन सबके रूपमें मन ही व्यक्त होता है ।। विद्यात् तु षोडशैतानि दैवतानि विभागशः । देहेषु ज्ञानकर्तारमुपासीनमुपासते ॥ ३३ ॥ दस इन्द्रिय, पञ्च महाभूत और एक मन—ये सोलह तत्त्व इस शरीरमें विभागपूर्वक रहते हैं। इनको देवतारूप जानना चाहिये। शरीरके भीतर जो ज्ञान प्रकट करनेवाला परमात्माके निकटस्थ जीवात्मा है, उसकी ये सोलहों देवता उपासना करते हैं ॥ ३३ ॥ तद्वत् सोमगुणा जिह्वा गन्धस्तु पृथिवीगुणः । श्रोत्रं नभोगुणं चैव चक्षुरग्नेर्गुणस्तथा । स्पर्शं वायुगुणं विद्यात् सर्वभूतेषु सर्वदा ॥ ३४ ॥ जिह्वा जलका कार्य है, घ्राणेन्द्रिय पृथिवीका कार्य है, श्रवणेन्द्रिय आकाशका और नेत्रेन्द्रिय अग्निका कार्य है तथा सम्पूर्ण भूतोंमें त्वचा नामकी इन्द्रियको सदा वायुका कार्य
समझना चाहिये ॥ ३४ ॥
मनः सत्त्वगुणं प्राहुः सत्त्वमव्यक्तजं तथा ।
सर्वभूतात्मभूतस्थं तस्माद् बुद्ध्येत बुद्धिमान् ॥ ३५ ॥
मनको महत्तत्त्वका कार्य कहा है और महत्तत्त्वको अव्यक्त प्रकृतिका कार्य कहा है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह समस्त भूतोंके आत्मारूप परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें स्थित जाने ॥ ३५ ॥
एते भावा जगत् सर्वं वहन्ति सचराचरम् ।
श्रिता विरजसं देवं यमाहुः प्रकृतेः परम् ॥ ३६ ॥
इस प्रकार ये सम्पूर्ण पदार्थ समस्त चराचर जगत्का भार वहन करते हैं। ये सब जो प्रकृतिसे अतीत रजोगुणरहित हैं, उस परमदेव परमात्माके आश्रित हैं ॥
नवद्वारं पुरं पुण्यमेतैर्भावैः समन्वितम् ।
व्याप्य शेते महानात्मा तस्मात् पुरुष उच्यते ॥ ३७ ॥
इन्हीं चौबीस पदार्थोंसे सम्पन्न इस नौ द्वारोंवाले पवित्र पुर (शरीर)-को व्याप्त करके इसमें इन सबसे जो महान् है वह आत्मा शयन करता है; इसलिये उसे ‘पुरुष’ कहते हैं ॥ ३७ ॥
अजरः सोऽमरश्चैव व्यक्ताव्यक्तोपदेशवान् ।
व्यापकः सगुणः सूक्ष्मः सर्वभूतगुणाश्रयः ॥ ३८ ॥
वह पुरुष जरा-मरणसे रहित, व्यापक, समस्त स्थूल-सूक्ष्म तत्त्वोंका प्रेरक, सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे युक्त, सूक्ष्म तथा सम्पूर्ण भूतों और उनके गुणोंका आश्रय है ॥ ३८ ॥
यथा दीपः प्रकाशात्मा ह्रस्वो वा यदि वा महान् ।
ज्ञानात्मानं तथा विद्यात् पुरुषं सर्वजन्तुषु ॥ ३९ ॥
जैसे दीपक छोटा हो या बड़ा, प्रकाशस्वरूप ही है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंमें स्थित जीवात्मा ज्ञानस्वरूप है, ऐसा समझे ॥ ३९ ॥
श्रोत्रं वेदयते वेद्यं स शृणोति स पश्यति ।
कारणं तस्य देहोऽयं स कर्ता सर्वकर्मणाम् ॥ ४० ॥
वही श्रवणेन्द्रियको उसके ज्ञेयभूत शब्दका बोध कराता है। तात्पर्य यह कि श्रवण और नेत्रोंद्वारा वही सुनता और देखता है। यह शरीर उसके शब्द आदि विषयोंके अनुभवमें निमित्त है। वह जीवात्मा ही समस्त कर्मोंका कर्ता है ॥ ४० ॥
अग्निर्दारुगतो यद्वद् भिन्ने दारौ न दृश्यते ।
तथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवानुदृश्यते ॥ ४१ ॥
अग्निर्यथा ह्युपायेन मथित्वा दारु दृश्यते ।
तथैवात्मा शरीरस्थो योगेनैवात्र दृश्यते ॥ ४२ ॥
जिस प्रकार अग्नि काष्ठमें व्याप्त रहनेपर भी काष्ठके चीरनेपर भी उसमें दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा शरीरमें रहता है, परंतु दिखायी नहीं देता—योगसे ही उसका दर्शन होता है। जैसे मन्थन आदि उपायोंद्वारा काष्ठको मथकर उनमें अग्निको प्रत्यक्ष किया जाता है, उसी प्रकार योगके द्वारा शरीरस्थ आत्माका साक्षात्कार किया जा सकता है॥ ४१-४२॥
नदीष्वापो यथा युक्ता यथा सूर्ये मरीचयः ।
संततत्वाद् यथा यान्ति तथा देहाः शरीरिणाम् ॥ ४३ ॥
जैसे नदियोंमें जल रहता ही है और सूर्यमें किरणें भी रहती ही हैं तथा वे जल और किरणें नदी और सूर्यसे नित्य सम्बद्ध होनेके कारण उनके साथ-साथ जाती हैं, उसी प्रकार देहधारियोंके सूक्ष्म शरीर भी जीवात्माके साथ ही रहते हैं और उसे साथ लेकर ही आते-जाते हैं॥ ४३॥
स्वप्नयोगे यथैवात्मा पञ्चेन्द्रियसमायुतः ।
देहमुत्सृज्य वै याति तथैवात्मोपलभ्यते ॥ ४४ ॥
जैसे स्वप्नमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंसहित जीवात्मा इस शरीरको छोड़कर अन्यत्र चला जाता है, वैसे ही मृत्युके बाद भी वह इस शरीरको छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण कर लेता है॥ ४४॥
कर्मणा बाध्यते रूपं कर्मणा चोपलभ्यते ।
कर्मणा नीयतेऽन्यत्र स्वकृतेन बलीयसा ॥ ४५ ॥
कर्मके द्वारा ही इस देहका बाध होता है; कर्मसे ही अन्य देहकी उपलब्धि होती है तथा अपने किये हुए प्रबल कर्मके द्वारा ही वह अन्य शरीरमें ले जाया जाता है॥ ४५॥
स तु देहाद् यथा देहं त्यक्त्वान्यं प्रतिपद्यते ।
तथान्यं सम्प्रवक्ष्यामि भूतग्रामं स्वकर्मजम् ॥ ४६ ॥
वह जीवात्मा जिस प्रकार एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर ग्रहण करता है तथा अपने कर्मोंसे उत्पन्न हुआ प्राणिसमुदाय जिस प्रकार अन्य देह धारण करता है, वह सब मैं तुम्हें बतलाता हूँ॥ ४६॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका निरूपणविषयक दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१०॥
संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन
एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन
गुरुरुवाच
चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
अव्यक्तप्रभवान्याहुरव्यक्तनिधनानि च ।
अव्यक्तलक्षणं विद्यादव्यक्तात्मात्मकं मनः ॥ १ ॥
गुरुजी कहते हैं— वत्स! जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके जो स्थावर और जङ्गम प्राणी हैं, वे सब अव्यक्तसे उत्पन्न हुए बताये गये हैं और अव्यक्तमें ही उन सबका लय होता है। जिसका कोई लक्षण व्यक्त न हो उसे अव्यक्त समझना चाहिये। मन अव्यक्त प्रकृतिके समान ही त्रिगुणात्मक है ॥ १ ॥
यथाश्वत्थकणीकायामन्तर्भूतो महाद्रुमः ।
निष्पन्नो दृश्यते व्यक्तमव्यक्तात् सम्भवस्तथा ॥ २ ॥
जैसे पीपलके छोटे-से बीजमें एक विशाल वृक्ष अव्यक्तरूपसे समाया हुआ है, जो बीजके उगनेपर वृक्षरूपमें परिणत हो प्रत्यक्ष दिखायी देता है, उसी प्रकार अव्यक्तसे व्यक्त जगत्की उत्पत्ति होती है ॥ २ ॥
अभिद्रवत्ययस्कान्तमयो निश्चेतनं यथा ।
स्वभावहेतुजा भावा यद्वदन्यदपीदृशम् ॥ ३ ॥
जिस प्रकार लोहा अचेतन होनेपर भी चुम्बककी ओर खिंच जाता है, वैसे ही शरीरके उत्पन्न होनेपर प्राणीके स्वाभाविक संस्कार तथा अविद्या, काम, कर्म आदि दूसरे गुण उसकी ओर खिंच आते हैं ॥ ३ ॥
तद्वद्व्यक्तजा भावाः कर्तुः कारणलक्षणाः ।
अचेतनाश्रेतयितुः कारणादभिसंहताः ॥ ४ ॥
इसी प्रकार उस अव्यक्तसे उत्पन्न हुए उपर्युक्त कारणस्वरूप भाव अचेतन होनेपर भी चेतनकर्ताके सम्बन्धसे चेतन-से होकर जानना आदि क्रियाके हेतु बन जाते हैं ॥ ४ ॥
न भूर्न खं द्यौर्भूतानि नर्षयो न सुरासुराः ।
नान्यदासीदृते जीवमासेदुर्न तु संहतम् ॥ ५ ॥
पहले पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, भूतगण, ऋषिगण तथा देवता और असुरगण इनमेंसे कोई नहीं था। चेतनके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं थी। जड-चेतनका संयोग भी नहीं था ॥ ५ ॥
पूर्वं नित्यं सर्वगतं मनोहेतुमलक्षणम् ।
अज्ञानकर्म निर्दिष्टमेतत् कारणलक्षणम् ॥ ६ ॥
आत्मा सबके पहले विद्यमान था। वह नित्य, सर्वगत, मनका भी हेतु और लक्षणरहित है। यह कारणस्वरूप समस्त जगत् अज्ञानका कार्य बताया गया है ॥ ६ ॥
तत्कारणैर्हि संयुक्तं कार्यसंग्रहकारकम् ।
येनैतद् वर्तते चक्रमनादिनिधनं महत् ॥ ७ ॥
इन कारणोंसे युक्त होकर जीव कर्मोंका संग्रह करता है। कर्मोंसे वासना और वासनाओंसे पुनः कर्म होते हैं। इस प्रकार यह अनादि, अनन्त महान् संसार-चक्र चलता रहता है ॥ ७ ॥
अव्यक्तनाभं व्यक्तारं विकारपरिमण्डलम् ।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं चक्रं स्निग्धाक्षं वर्तते ध्रुवम् ॥ ८ ॥
यह जन्म-मरणका प्रवाहरूप संसार चक्रके समान घूम रहा है। अव्यक्त उसकी नाभि है। व्यक्त (देह और इन्द्रिय आदि) उसके अरे हैं। सुख-दुःख, इच्छा आदि विकार इसकी नेमि हैं। आसक्ति धुरा है। यह चक्र निश्चितरूपसे घूमता रहता है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इस चक्रपर चालक बनकर बैठा हुआ है ॥ ८ ॥
स्निग्धत्वात् तिलवत् सर्वं चक्रेऽस्मिन् पीड्यते जगत् ।
तिलपीडैरिवाक्रम्य भोगैरज्ञानसम्भवैः ॥ ९ ॥
जैसे तेली लोग तेलसे युक्त होनेके कारण तिलोंको कोल्हूमें पेरते हैं, उसी प्रकार यह सारा जगत् आसक्तिग्रस्त होनेके कारण अज्ञानजनित भोगोंद्वारा दबा-दबाकर इस संसारचक्रमें पेरा जा रहा है ॥ ९ ॥
कर्म तत् कुरुते तर्षादहंकारपरिग्रहात् ।
कार्यकारणसंयोगे स हेतुरुपपादितः ॥ १० ॥
जीव अहंकारके अधीन होकर तृष्णाके कारण कर्म करता है और वह कर्म आगामी कार्य-कारण-संयोगमें हेतु बन जाता है ॥ १० ॥
नाभ्येति कारणं कार्यं न कार्यं कारणं तथा ।
कार्याणां तूपकरणे कालो भवति हेतुमान् ॥ ११ ॥
न तो कारण कार्यमें प्रवेश करता है और न कार्य कारणमें। कार्य करते समय काल ही उनकी सिद्धि और असिद्धिमें हेतु होता है ॥ ११ ॥
हेतुयुक्ताः प्रकृतयो विकाराश्चः परस्परम् ।
अन्योन्यमभिवर्तन्ते पुरुषाधिष्ठिताः सदा ॥ १२ ॥
हेतुसहित आठों प्रकृतियाँ और सोलह विकार—ये पुरुषसे अधिष्ठित हो सदा एक-दूसरेसे मिलते और सृष्टिका विस्तार करते हैं ॥ १२ ॥
राजसैस्तामसैर्भावैर्युतो हेतुबलान्वितः ।
क्षेत्रज्ञमेवानुयाति पांसुर्वातेरितो यथा ॥ १३ ॥
राजस और तामसभावोंसे युक्त हेतुबलसे प्रेरित सूक्ष्मशरीर क्षेत्रज्ञ जीवात्माके साथ-साथ ठीक उसी तरह दूसरे स्थूल शरीरमें चला जाता है, जैसे वायुद्वारा उड़ायी हुई धूल उसीके साथ-साथ एक स्थानसे दूसरे स्थानको जाती है ।। १३ ।।
न च तैः स्पृश्यते भावैर्न ते तेन महात्मना ।
सरजस्कोऽरजस्कश्च नैव वायुर्भवेद् यथा ।। १४ ।।
जैसे धूलके उड़नेसे वायु न तो धूलसे लिप्त होती है और न अलिप्त ही रहती है। उसी प्रकार न तो उन राजस, तामस आदि भावोंसे जीवात्मा लिप्त होता है और न अलिप्त ही रहता है ।। १४ ।।
तथैतदन्तरं विद्यात् सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्बुधः ।
अभ्यासात् स तथा युक्तो न गच्छेत् प्रकृतिं पुनः ।। १५ ।।
अतः विवेकी पुरुषको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका यह अन्तर जान लेना चाहिये। इन दोनोंके तादात्म्यका-सा अभ्यास हो जानेसे जीव ऐसा हो गया है कि उसे अपने शुद्ध स्वरूपका पता ही नहीं लगता ।। १५ ।।
संदेहमेतमुत्पन्नमच्छिनद् भगवानृषिः ।
तथा वार्तां समीक्षेत कृतलक्षणसम्मिताम् ।। १६ ।।
(भीष्मजी कहते हैं—) इस प्रकार उन महर्षि भगवान् गुरुदेवने शिष्यके उत्पन्न हुए इस संदेहको काट डाला। अतः विद्वान् पुरुष ऐसे उपायोंपर दृष्टि रखे, जो क्रियाद्वारा उद्देश्यकी सिद्धिमें सहायक हों ।। १६ ।।
बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः ।
ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा सम्पद्यते पुनः ।। १७ ।।
जैसे आगमें भूने हुए बीज नहीं उगते, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्निसे अविद्यादि सब क्लेशोंके दग्ध हो जानेपर जीवात्माको फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेना पड़ता ।। १७ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मका कथनविषयक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २११ ।।
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो यथा समुपलभ्यते ।
द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
निषिद्ध आचरणके त्याग, सत्त्व, रज और तमके कार्य एवं परिणामका तथा सत्त्वगुणके सेवनका उपदेश
भीष्म उवाच
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो यथा समुपलभ्यते ।
तेषां विज्ञाननिष्ठानामन्यत्तत्त्वं न रोचते ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! कर्मनिष्ठ पुरुषोंको जिस प्रकार प्रवृत्तिधर्मकी उपलब्धि होती है—वही उन्हें अच्छा लगता है, उसी प्रकार जो ज्ञानमें निष्ठा रखनेवाले हैं, उन्हें ज्ञानके सिवा दूसरी कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती ॥ १ ॥
दुर्लभा वेदविद्वांसो वेदोक्तेषु व्यवस्थिताः ।
प्रयोजनं महत्त्वात्तु मार्गमिच्छन्ति संस्तुतम् ॥ २ ॥
वेदोंके विद्वान् और वेदोक्त कर्मोंमें निष्ठा रखनेवाले पुरुष प्रायः दुर्लभ हैं। जो अत्यन्त बुद्धिमान् हैं, वे पुरुष वेदोक्त दोनों मार्गोंमेंसे जो अधिक महत्त्वपूर्ण होनेके कारण सबके द्वारा प्रशंसित है, उस मोक्षमार्गको ही चाहते हैं ॥ २ ॥
सद्भिराचरितत्वात्तु वृत्तमेतदगर्हितम् ।
इयं सा बुद्धिरभ्येत्य यया याति परां गतिम् ॥ ३ ॥
सत्पुरुषोंने सदा इसी मार्गको ग्रहण किया है; अतः यही अनिन्द्य एवं निर्दोष है। यह वह बुद्धि है जिसके द्वारा चलकर मनुष्य परम गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥
शरीरवानुपादत्ते मोहात् सर्वान् परिग्रहान् ।
क्रोधलोभादिभिर्भावैर्युक्तो राजसतामसैः ॥ ४ ॥
जो देहाभिमानी है, वह मोहवश क्रोध, लोभ आदि राजस, तामस भावोंसे युक्त होकर सब प्रकारकी वस्तुओंके संग्रहमें लग जाता है ॥ ४ ॥
नाशुद्धमाचरेत् तस्मादभीप्सन् देहयापनम् ।
कर्मणा विवरं कुर्वन्न लोकानाप्नुयाच्छुभान् ॥ ५ ॥
अतः जो देह-बन्धनसे मुक्त होना चाहता हो, उसे कभी अशुद्ध (अवैध) आचरण नहीं करना चाहिये। वह निष्काम कर्मद्वारा मोक्षका द्वार खोले और स्वर्ग आदि पुण्यलोक पानेकी कदापि इच्छा न करे ॥ ५ ॥
लोहयुक्तं यथा हेम विपक्वं न विराजते ।
तथापक्वकषायाख्यं विज्ञानं न प्रकाशते ॥ ६ ॥
जैसे लोहयुक्त सुवर्ण आगमें पकाकर शुद्ध किये बिना अपने स्वरूपसे प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार चित्तके राग आदि दोषोंका नाश हुए बिना उसमें ज्ञानस्वरूप आत्मा प्रकाशित नहीं होता है ।। ६ ।।
यश्चाधर्मं चरेल्लोभात् कामक्रोधावनुप्लवन् ।
धर्म्यं पन्थानमाक्रम्य सानुबन्धो विनश्यति ।। ७ ।।
जो लोभवश काम-क्रोधका अनुसरण करते हुए धर्ममार्गका उल्लंघन करके अधर्मका आचरण करने लगता है, वह सगे-सम्बन्धियोंसहित नष्ट हो जाता है ।।
शब्दादीन् विषयांस्तस्मान्न संरागादयं व्रजेत् ।
क्रोधो हर्षो विषादश्च जायन्तेह परस्परात् ।। ८ ।।
अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको कभी रागके वशमें होकर शब्द आदि विषयोंका सेवन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वैसा करनेपर हर्ष, क्रोध और विषाद—इन सात्त्विक, राजस और तामस भावोंकी एक-दूसरेसे उत्पत्ति होती है ।। ८ ।।
पञ्चभूतात्मके देहे सत्त्वे राजसतामसे ।
कमभिष्टुवते चायं कं वाऽऽक्रोशति किं वदन् ।। ९ ।।
यह शरीर पाँच भूतोंका विकार है और सत्त्व, रज एवं तम—तीन गुणोंसे युक्त है। इसमें रहकर यह निर्विकार आत्मा क्या कहकर किसकी निन्दा और किसकी स्तुति करे ।। ९ ।।
स्पर्शरूपरसाद्येषु सङ्गं गच्छन्ति बालिशाः ।
नावगच्छन्त्यविज्ञानादात्मानं पार्थिवं गुणम् ।। १० ।।
अज्ञानी पुरुष स्पर्श, रूप और रस आदि विषयोंमें आसक्त होते हैं। वे विशिष्ट ज्ञानसे रहित होनेके कारण यह नहीं जानते हैं कि यह शरीर पृथ्वीका विकार है ।। १० ।।
मृन्मयं शरणं यद्वन्मृदैव परिलिप्यते ।
पार्थिवोऽयं तथा देहो मृद्विकारान्न नश्यति ।। ११ ।।
जैसे मिट्टीका घर मिट्टीसे ही लीपा जाता है तो सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर पृथ्वीके ही विकारभूत अन्न और जलके सेवनसे ही नष्ट नहीं होता है ।। ११ ।।
मधु तैलं पयः सर्पिर्मांसानि लवणं गुडः ।
धान्यानि फलमूलानि मृद्विकाराः सहाम्भसा ।। १२ ।।
मधु, तेल, दूध, घी, मांस, लवण, गुड़, धान्य, फल-मूल और जल—ये सभी पृथ्वीके ही विकार हैं ।। १२ ।।
यद्वत् कान्तारमातिष्ठन्नौत्सुक्यं समनुव्रजेत् ।
ग्राम्यमाहारमाद्यादस्वाद्वपि हि यापनम् ।। १३ ।।
तद्वत् संसारकान्तारमातिष्ठन् श्रमतत्परः ।
यात्रार्थमद्यादाहारं व्याधितो भेषजं यथा ।। १४ ।।
जैसे वनमें रहनेवाला संन्यासी स्वादिष्ट अन्न (मिठाई आदि)-के लिये उत्सुक नहीं होता। वह शरीर-निर्वाहके लिये स्वाधीन रूखा-सूखा ग्रामीण आहार भी ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार संसाररूपी वनमें रहनेवाला गृहस्थ परिश्रममें संलग्न हो जीवन-निर्वाहमात्रके लिये शुद्ध सात्त्विक आहार ग्रहण करे। ठीक उसी तरह, जैसे रोगी जीवनरक्षाके लिये औषध सेवन करता है ।। १३-१४ ।।
सत्यशौचार्जवत्यागैर्वर्चसा विक्रमेण च ।
क्षान्त्या धृत्या च बुद्ध्या च मनसा तपसैव च ।। १५ ।।
भावान् सर्वानुपावृत्तान् समीक्ष्य विषयात्मकान् ।
शान्तिमिच्छन्नदीनात्मा संयच्छेदिन्द्रियाणि च ।। १६ ।।
उदारचित्त पुरुष सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तेज, पराक्रम, क्षमा, धैर्य, बुद्धि, मन और तपके प्रभावसे समस्त विषयात्मक भावोंपर आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए शान्तिकी इच्छासे अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखे ।।
सत्त्वेन रजसा चैव तमसा चैव मोहिताः ।
चक्रवत् परिवर्तन्ते ह्यज्ञानाज्जन्तवो भृशम् ।। १७ ।।
अजितेन्द्रिय जीव अज्ञानवश सत्त्व, रज और तमसे मोहित हो निरन्तर चक्रकी तरह घूमते रहते हैं ।।
तस्मात् सम्यक् परीक्षेत दोषानज्ञानसम्भवान् ।
अज्ञानप्रभवं दुःखमहंकारं परित्यजेत् ।। १८ ।।
अतः विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह अज्ञानजनित दोषोंकी भलीभाँति परीक्षा करे तथा उस अज्ञानसे उत्पन्न हुए दुःख और अहंकारको त्याग दे ।। १८ ।।
महाभूतानीन्द्रियाणि गुणाः सत्त्वं रजस्तमः ।
त्रैलोक्यं सेश्वरं सर्वमहंकारे प्रतिष्ठितम् ।। १९ ।।
पञ्चमहाभूत, इन्द्रियाँ, शब्द आदि गुण, सत्त्व, रज और तम तथा लोकपालोंसहित तीनों लोक—यह सब कुछ अहंकारमें ही प्रतिष्ठित है ।। १९ ।।
यथेह नियतः कालो दर्शयत्यार्तवान् गुणान् ।
तद्वद्भूतेष्वहंकारं विद्यात् कर्मप्रवर्तकम् ।। २० ।।
जैसे इस जगत्में नियत काल यथासमय ऋतु-सम्बन्धी गुणोंको प्रकट कर दिखाता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंमें अहंकारको ही उनके कर्मोंका प्रवर्तक जानना चाहिये ।। २० ।।
सम्मोहकं तमो विद्यात् कृष्णमज्ञानसम्भवम् ।
प्रीतिदुःखनिबद्धांश्च समस्तांस्त्रीनथो गुणान् ।। २१ ।।
अहंकार सात्त्विक, राजस और तामस तीन प्रकारका होता है। तमोगुण मोहमें डालनेवाला तथा अन्धकारके समान काला है। उसे अज्ञानसे उत्पन्न हुआ समझना चाहिये।
प्रीति उत्पन्न करनेवाले भाव सात्त्विक हैं और दुःख देनेवाले राजस। इस प्रकार इन समस्त त्रिविध गुणोंका स्वरूप जानना चाहिये ॥ २१ ॥
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च निबोध तान् ।
प्रसादो हर्षजा प्रीतिरसंśदेहो धृतिः स्मृतिः ।
एतान् सत्त्वगुणान् विद्यादिमान् राजसतामसान् ॥ २२ ॥
कामक्रोधौ प्रमादश्च लोभमोहौ भयं क्लमः ।
विषादशोकावरतिर्मानदर्पावनार्यता ॥ २३ ॥
अब मैं तुम्हें सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणके कार्य बताता हूँ, सुनो। प्रसन्नता, हर्षजनित प्रीति, संदेहका अभाव, धैर्य और स्मृति—इन सबको सत्त्वगुणके कार्य समझो। काम, क्रोध, प्रमाद, लोभ, मोह, भय, क्लान्ति, विषाद, शोक, अप्रसन्नता, मान, दर्प और अनार्यता—इन्हें रजोगुण और तमोगुणके कार्य समझना चाहिये ॥ २२-२३ ॥
दोषाणामेवमादीनां परीक्ष्य गुरुलाघवम् ।
विमृशेदात्मसंस्थानमेकैकमनुसंततम् ॥ २४ ॥
इनके तथा ऐसे ही दूसरे दोषोंके बड़े-छोटेका विचार करके फिर इस बातकी परीक्षा करे कि इनमेंसे एक-एक दोष मुझमें है या नहीं। यदि है तो कितनी मात्रामें है (इस तरह विचार करते हुए सभी दोषोंसे छूटनेका प्रयत्न करे) ॥ २४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
के दोषा मनसा त्यक्ताः के बुद्ध्या शिथिलीकृताः ।
के पुनः पुनरायान्ति के मोहादफला इव ॥ २५ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! पूर्वकालके मुमुक्षुओंने किन-किन दोषोंका मनके द्वारा त्याग किया है और किन्हें बुद्धिके द्वारा शिथिल किया है? कौन दोष बारंबार आते हैं और कौन मोहवश फल देनेमें असमर्थ-से प्रतीत होते हैं? ॥ २५ ॥
केषां बलाबलं बुद्ध्या हेतुभिर्विमृशेद् बुधः ।
एष मे संशयस्तात तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २६ ॥
विद्वान् पुरुष अपनी बुद्धि तथा युक्तियोंद्वारा किन दोषोंके बलाबलका विचार करे। तात! पितामह! यह मेरा संशय है। आप मुझसे इसका विवेचन कीजिये ॥ २६ ॥
भीष्म उवाच
दोषैर्मूलादवच्छिन्नैर्विशुद्धात्मा विमुच्यते ।
विनाशयति सम्भूतमयस्मयमयो यथा ।
तथा कृतात्मा सहजैर्दोषैर्नश्यति तामसैः ॥ २७ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इन दोषोंका मूल कारण है अज्ञान। अतः मूलसहित इन दोषोंका नाश हो जानेपर मनुष्यका अन्तःकरण विशुद्ध होता है और वह संसार-बन्धनसे
मुक्त हो जाता है। जैसे लोहेकी बनी हुई छेनीकी धार लोहमयी साँकलको काटकर स्वयं भी नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार शुद्ध हुई बुद्धि तमोगुणजनित सहज दोषोंको नष्ट करके उनके साथ ही स्वयं भी शान्त हो जाती है ।। २७ ।। राजसं तामसं चैव शुद्धात्मकमकल्मषम् । तत् सर्वं देहिनां बीजं सत्त्वमात्मवतः समम् ।। २८ ।। यद्यपि रजोगुण, तमोगुण तथा काम, मोह आदि दोषोंसे रहित शुद्ध सत्त्वगुण—ये तीनों ही देहधारियोंकी देहकी उत्पत्तिके मूल कारण हैं, तथापि जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, उस पुरुषके लिये सत्त्वगुण ही समताका साधन है ।। २८ ।। तस्मादात्मवता वर्ज्यं रजश्व तम एव च । रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तं सत्त्वं निर्मलतामियात् ।। २९ ।। अतः जितात्मा पुरुषको रजोगुण और तमोगुणका त्याग ही करना चाहिये। इन दोनोंसे छूट जानेपर बुद्धि निर्मल हो जाती है ।। २९ ।। अथवा मन्त्रवद्ब्रूयुरात्मादानाय दुष्कृतम् । स वै हेतुरनादाने शुद्धधर्मानुपालने ।। ३० ।। अथवा बुद्धिको वशमें करनेके लिये शास्त्रविहित मन्त्रयुक्त यज्ञादि कर्मको कुछ लोग दोषयुक्त बताते हैं; परंतु वह मन्त्रयुक्त यज्ञादि धर्म भी निष्कामभावसे किये जानेपर वैराग्यका हेतु है। तथा शुद्ध धर्म—शम, दम आदिके निरन्तर पालनमें भी वही निमित्त बनता है ।। रजसाधर्मयुक्तानि कार्याण्यपि समाप्नुते । अर्थयुक्तानि चात्यर्थं कामान् सर्वांश्च सेवते ।। ३१ ।। मनुष्य रजोगुणके अधीन होनेपर उसके द्वारा भाँति-भाँतिके अधर्मयुक्त एवं अर्थयुक्त कर्म करने लगता है, तथा वह सम्पूर्ण भोगोंका अत्यन्त आसक्तिपूर्वक सेवन करता है ।। ३१ ।। तमसा लोभयुक्तानि क्रोधजानि च सेवते । हिंसाविहाराभिरतस्तन्द्रीनिद्रासमन्वितः ।। ३२ ।। तमोगुणद्वारा मनुष्य लोभ और क्रोधजनित कर्मोंका सेवन करता है, हिंसात्मक कर्मोंमें उसकी विशेष आसक्ति हो जाती है, तथा वह हर समय निद्रा-तन्द्रासे घिरा रहता है ।। ३२ ।। सत्त्वस्थः सात्त्विकान् भावान् शुद्धान् पश्यति संश्रितः । स देही विमलः श्रीमान् श्रद्धाविद्यासमन्वितः ।। ३३ ।। सत्त्वगुणमें स्थित हुआ पुरुष शुद्ध सात्त्विक भावोंको ही देखता और उन्हींका आश्रय लेता है। वह अत्यन्त निर्मल और कान्तिमान् होता है। उसमें श्रद्धा और विद्याकी प्रधानता होती है ।। ३३ ।।