महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2249, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिव्यं वर्षसहस्रं वै सर्वे ते ऋषिभिः सह ।। ३४ ।। नारायणानुशास्ता हि तदा देवी सरस्वती । विवेश तानृषीन् सर्वाँल्लोकानां हितकाम्यया ।। ३५ ।। उपर्युक्त ऋषियोंने अन्य ऋषियोंके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या करके भगवान् नारायणकी आराधना की थी। उससे प्रसन्न होकर भगवान्ने सरस्वतीदेवीको उनके पास भेजा। नारायणकी आज्ञासे सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये उस समय सरस्वती देवीने उन सम्पूर्ण ऋषियोंके भीतर प्रवेश किया था ।। ३४-३५ ।।
ततः प्रवर्तिता सम्यक् तपोविद्भिर्द्विजातिभिः । शब्दे चार्थे च हेतौ च एषा प्रथमसर्गजा ।। ३६ ।। तब उन तपस्वी ब्राह्मणोंने शब्द, अर्थ और हेतुसे युक्त वाणीका प्रयोग किया। यह उनकी प्रथम रचना थी ।। ३६ ।।
आदावेव हि तच्छास्त्रमोंकारस्वरपूजितम् । ऋषिभिः श्रावितं यत्र तत्र कारुणिको ह्यसौ ।। ३७ ।। उस शास्त्रके आरम्भमें ही ॐकार स्वरका प्रयोग किया गया है। ऋषियोंने सबसे पहले जहाँ उस शास्त्रको सुनाया, वहाँ वे करुणामय भगवान् विराजमान् थे ।।
ततः प्रसन्नो भगवाननिर्देश्यशरीरगः । ऋषीनुवाच तान् सर्वानदृश्यः पुरुषोत्तमः ।। ३८ ।। तदनन्तर अनिर्वचनीय शरीरमें स्थित भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न हो अदृश्य रहकर ही उन सब ऋषियोंसे बोले— ।। ३८ ।।
कृतं शतसहस्रं हि श्लोकानामिदमुत्तमम् । लोकतन्त्रस्य कृत्स्नस्य यस्माद् धर्मः प्रवर्तते ।। ३९ ।। 'मुनिवरो! तुमलोगोंने एक लाख श्लोकोंका यह उत्तम शास्त्र बनाया है। इससे सम्पूर्ण लोकतन्त्रका धर्म प्रचलित होगा ।। ३९ ।।
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यस्मादेतद् भविष्यति । यजुर्ऋक्सामभिर्जुष्टमथर्वाङ्गिरसैस्तथा ।। ४० ।। 'प्रवृत्ति और निवृत्तिके विषयमें यह ऋक्, यजुः, साम और अथर्व वेदके मन्त्रोंसे अनुमोदित ग्रन्थके समान प्रमाणभूत होगा ।। ४० ।।
यथा प्रमाणं हि मया कृतो ब्रह्मा प्रसादतः । रुद्रश्च क्रोधजो विप्रा यूयं प्रकृतयस्तथा ।। ४१ ।। सूर्याचन्द्रमसौ वायुर्भूमिरापोऽग्निरेव च । सर्वे च नक्षत्रगणा यच्च भूताभिशब्दितम् ।। ४२ ।। अधिकारेषु वर्तन्ते यथास्वं ब्रह्मवादिनः । सर्वे प्रमाणं हि यथा तथा तच्छास्त्रमुत्तमम् ।। ४३ ।।