महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दिव्यं वर्षसहस्रं वै सर्वे ते ऋषिभिः सह ।। ३४ ।। नारायणानुशास्ता हि तदा देवी सरस्वती । विवेश तानृषीन् सर्वाँल्लोकानां हितकाम्यया ।। ३५ ।। उपर्युक्त ऋषियोंने अन्य ऋषियोंके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या करके भगवान् नारायणकी आराधना की थी। उससे प्रसन्न होकर भगवान्ने सरस्वतीदेवीको उनके पास भेजा। नारायणकी आज्ञासे सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये उस समय सरस्वती देवीने उन सम्पूर्ण ऋषियोंके भीतर प्रवेश किया था ।। ३४-३५ ।।
ततः प्रवर्तिता सम्यक् तपोविद्भिर्द्विजातिभिः । शब्दे चार्थे च हेतौ च एषा प्रथमसर्गजा ।। ३६ ।। तब उन तपस्वी ब्राह्मणोंने शब्द, अर्थ और हेतुसे युक्त वाणीका प्रयोग किया। यह उनकी प्रथम रचना थी ।। ३६ ।।
आदावेव हि तच्छास्त्रमोंकारस्वरपूजितम् । ऋषिभिः श्रावितं यत्र तत्र कारुणिको ह्यसौ ।। ३७ ।। उस शास्त्रके आरम्भमें ही ॐकार स्वरका प्रयोग किया गया है। ऋषियोंने सबसे पहले जहाँ उस शास्त्रको सुनाया, वहाँ वे करुणामय भगवान् विराजमान् थे ।।
ततः प्रसन्नो भगवाननिर्देश्यशरीरगः । ऋषीनुवाच तान् सर्वानदृश्यः पुरुषोत्तमः ।। ३८ ।। तदनन्तर अनिर्वचनीय शरीरमें स्थित भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न हो अदृश्य रहकर ही उन सब ऋषियोंसे बोले— ।। ३८ ।।
कृतं शतसहस्रं हि श्लोकानामिदमुत्तमम् । लोकतन्त्रस्य कृत्स्नस्य यस्माद् धर्मः प्रवर्तते ।। ३९ ।। 'मुनिवरो! तुमलोगोंने एक लाख श्लोकोंका यह उत्तम शास्त्र बनाया है। इससे सम्पूर्ण लोकतन्त्रका धर्म प्रचलित होगा ।। ३९ ।।
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यस्मादेतद् भविष्यति । यजुर्ऋक्सामभिर्जुष्टमथर्वाङ्गिरसैस्तथा ।। ४० ।। 'प्रवृत्ति और निवृत्तिके विषयमें यह ऋक्, यजुः, साम और अथर्व वेदके मन्त्रोंसे अनुमोदित ग्रन्थके समान प्रमाणभूत होगा ।। ४० ।।
यथा प्रमाणं हि मया कृतो ब्रह्मा प्रसादतः । रुद्रश्च क्रोधजो विप्रा यूयं प्रकृतयस्तथा ।। ४१ ।। सूर्याचन्द्रमसौ वायुर्भूमिरापोऽग्निरेव च । सर्वे च नक्षत्रगणा यच्च भूताभिशब्दितम् ।। ४२ ।। अधिकारेषु वर्तन्ते यथास्वं ब्रह्मवादिनः । सर्वे प्रमाणं हि यथा तथा तच्छास्त्रमुत्तमम् ।। ४३ ।।
भविष्यति प्रमाणं वै एतन्मदनुशासनम् । 'ब्राह्मणो! जैसे मेरे प्रसादसे उत्पन्न ब्रह्मा प्रमाणभूत हैं एवं जैसे क्रोधसे उत्पन्न रुद्र, तुम सब प्रजापति, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, भूमि, जल, अग्नि, सम्पूर्ण नक्षत्रगण तथा अन्यान्य भूतनामधारी पदार्थ और ब्रह्मवादी ऋषिगण अपने-अपने अधिकारके अनुसार बर्ताव करते हुए प्रमाणभूत माने जाते हैं, उसी प्रकार तुमलोगोंका बनाया हुआ यह उत्तम शास्त्र भी प्रामाणिक माना जायगा, यह मेरी आज्ञा है ।। ४१-४३ १/३ ।। तस्मात् प्रवक्ष्यते धर्मान् मनुः स्वायम्भुवः स्वयम् ।। ४४ ।। उशना बृहस्पतिश्चैव यदोत्पन्नौ भविष्यतः । तदा प्रवक्ष्यतः शास्त्रं युष्मन्मतिभिरुद्धृतम् ।। ४५ ।। 'स्वायम्भुव मनु स्वयं इसी ग्रन्थके अनुसार धर्मोंका उपदेश करेंगे। शुक्राचार्य और बृहस्पति जब प्रकट होंगे तब वे भी तुम्हारी बुद्धिसे निकले हुए इस शास्त्रका प्रवचन करेंगे ।। ४४-४५ ।। स्वायम्भुवेषु धर्मेषु शास्त्रे चौशनसे कृते । बृहस्पतिमते चैव लोकेषु प्रतिचारिते ।। ४६ ।। युष्मत्कृतमिदं शास्त्रं प्रजापालो वसुस्ततः । बृहस्पतिसकाशाद् वै प्राप्स्यते द्विजसत्तमाः ।। ४७ ।। 'द्विजश्रेष्ठगण! स्वायम्भुव मनुके धर्मशास्त्र, शुक्राचार्यके शास्त्र तथा बृहस्पतिके मतका जब लोकमें प्रचार हो जायगा, तब प्रजापालक वसु (राजा उपरिचर) बृहस्पतिजीसे तुम्हारे बनाये हुए इस शास्त्रका अध्ययन करेगा ।। ४६-४७ ।। स हि सद्भावितो राजा मद्भक्तश्च भविष्यति । तेन शास्त्रेण लोकेषु क्रियाः सर्वाः करिष्यति ।। ४८ ।। 'सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित वह राजा मेरा बड़ा भक्त होगा और लोकमें उसी शास्त्रके अनुसार सम्पूर्ण कार्य करेगा ।। ४८ ।। एतद्धि युष्मच्छास्त्राणां शास्त्रमुत्तमसंज्ञितम् । एतदर्थ्यं च धर्म्यं च रहस्यं चैतदुत्तमम् ।। ४९ ।। 'तुम्हारा बनाया हुआ यह शास्त्र सब शास्त्रोंसे श्रेष्ठ माना जायगा। यह धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं उत्तम रहस्यमय ग्रन्थ है ।। ४९ ।। अस्य प्रवर्त्तनाच्चैव प्रजावन्तो भविष्यथ । स च राजश्रिया युक्तो भविष्यति महान् वसुः ।। ५० ।। इसके प्रचारसे तुम सब लोग संतानवान् होओगे; अर्थात् तुम्हारी प्रजाकी वृद्धि होगी तथा राजा उपरिचर भी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं महान् पुरुष होगा ।। ५० ।। संस्थिते तु नृपे तस्मिन् शास्त्रमेतत् सनातनम् । अन्तर्धास्यति तत् सर्वमेतद् वः कथितं मया ।। ५१ ।।
'उस राजाके दिवंगत होनेके बाद यह सनातन शास्त्र सर्वसाधारणकी दृष्टिसे लुप्त हो जायगा। इसके सम्बन्धमें सारी बातें मैंने तुमलोगोंको बता दीं' ॥ ५१ ॥
एतावदुक्त्वा वचनमदृश्यः पुरुषोत्तमः ।
विसृज्य तानृषीन् सर्वान् कामपि प्रसृतो दिशम् ॥ ५२ ॥
अदृश्यभावसे ऐसी बात कहकर भगवान् पुरुषोत्तम उन समस्त ऋषियोंको वहीं छोड़कर किसी अज्ञात दिशाकी ओर चल दिये ॥ ५२ ॥
ततस्ते लोकपितरः सर्वलोकार्थचिन्तकाः ।
प्रावर्तयन्त तच्छास्त्रं धर्मयोनिं सनातनम् ॥ ५३ ॥
तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंका हितचिन्तन करनेवाले उन लोकपिता प्रजापतियोंने धर्मके मूलभूत उस सनातन शास्त्रका जगत्में प्रचार किया ॥ ५३ ॥
उत्पन्नेऽङ्गिरसे चैव युगे प्रथमकल्पिते ।
साङ्गोपनिषदं शास्त्रं स्थापयित्वा बृहस्पतौ ॥ ५४ ॥
जग्मुर्यथेप्सितं देशं तपसे कृतनिश्चयाः ।
धारणाः सर्वलोकानां सर्वधर्मप्रवर्तकाः ॥ ५५ ॥
फिर आदिकल्पके प्रारम्भिक युगमें जब बृहस्पतिका प्रादुर्भाव हुआ, तब उन्होंने साङ्गोपाङ्ग वेद और उपनिषदों-सहित वह शास्त्र उनको पढ़ाया। तदनन्तर सब धर्मोंका प्रचार और समस्त लोकोंको धर्ममर्यादाके भीतर स्थापित करनेवाले वे ऋषिगण तपस्याका निश्चय करके अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ॥ ५४-५५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणका महत्त्वविषयक तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं)
राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान्की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना
षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान्की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना
भीष्म उवाच
ततोऽतीते महाकल्पे उत्पन्नेऽङ्गिरसः सुते ।
बभूवुर्निर्वृता देवा जाते देवपुरोहिते ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर बीते हुए महान् कल्पके आरम्भमें जब अंगिराके पुत्र बृहस्पति उत्पन्न हुए और देवताओंके पुरोहित बन गये, तब देवताओंको बड़ा संतोष प्राप्त हुआ ॥ १ ॥
बृहद् ब्रह्म महच्चेति शब्दाः पर्यायवाचकाः ।
एभिः समन्वितो राजन् गुणैर्विद्वान् बृहस्पतिः ॥ २ ॥
राजन्! बृहत्, ब्रह्म और महत्—ये तीनों शब्द एक अर्थके वाचक हैं। इन तीनों शब्दोंके गुण देवपुरोहितमें मौजूद थे; इसलिये वे विद्वान् देवगुरु ‘बृहस्पति’ कहलाते थे ॥
तस्य शिष्यो बभूवाग्र्यो राजोपरिचरो वसुः ।
अधीतवांस्तदा शास्त्रं सम्यक् चित्रशिखण्डिजम् ॥ ३ ॥
उनके श्रेष्ठ शिष्य हुए राजा उपरिचर वसु, जिन्होंने उनसे उन दिनों चित्रशिखण्डियोंके बनाये हुए तन्त्रशास्त्रका विधिवत् अध्ययन किया ॥ ६ ॥
स राजा भावितः पूर्वं दैवेन विधिना वसुः ।
पालयामास पृथिवीं दिवमाखण्डलो यथा ॥ ४ ॥
वे राजा उपरिचर वसु पहले दैवविधानसे भावित हो इस पृथ्वीका उसी प्रकार पालन करने लगे, जैसे इन्द्र स्वर्गका ॥ ४ ॥
तस्य यज्ञो महानासीदश्वमेधो महात्मनः ।
बृहस्पतिरुपाध्यायस्तत्र होता बभूव ह ॥ ५ ॥
एक समय उन महात्मा नरेशने महान् अश्व-मेधयज्ञका आयोजन किया। उसमें उनके उपाध्याय बृहस्पति होता हुए ॥ ५ ॥
प्रजापतिसुताश्चात्र सदस्याश्चाभवंस्त्रयः ।
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः ॥ ६ ॥
प्रजापतिके तीन पुत्र एकत, द्वित और त्रित नामक महर्षि उस यज्ञमें सदस्य हुए ॥ ६ ॥
धनुषाख्योऽथ रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू । ऋषिर्मेधातिथिश्चैव ताण्ड्यश्चैव महानृषिः ॥ ७ ॥ ऋषिः शान्तिर्महाभागस्तथा वेदशिराश्च यः । ऋषिश्रेष्ठश्च कपिलः शालिहोत्रपिता स्मृतः ॥ ८ ॥ आद्यः कठस्तैत्तिरिश्च वैशम्पायनपूर्वजः । कण्वोऽथ देवहोत्रश्च एते षोडश कीर्तिताः ॥ ९ ॥ इनके सिवा (तेरह सदस्य और थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—) धनुष, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, मुनिवर मेधातिथि, महर्षि ताण्ड्य, महाभाग शान्तिमुनि, वेदशिरा, शालिहोत्रके पिता ऋषिश्रेष्ठ कपिल, आद्यकठ, वैशम्पायनके बड़े भाई तैत्तिरि, कण्व और देवहोत्र। ये कुल मिलाकर सोलह सदस्य बताये गये हैं ॥ ७–९ ॥
सम्भूताः सर्वसम्भारस्तस्मिन् राजन् महाक्रतौ । न तत्र पशुघातोऽभूत् स राजैवं स्थितोऽभवत् ॥ १० ॥ राजन्! उस महान् यज्ञमें सारे सामान एकत्र किये गये; परंतु उसमें किसी पशुका वध नहीं हुआ। वे राजा उपरिचर इसी भावसे उस यज्ञमें स्थित हुए थे ॥ १० ॥
अहिंस्रः शुचिरक्षुद्रो निराशीः कर्मसंस्तुतः । आरण्यकपदोद्भूता भागास्तत्रोपकल्पिताः ॥ ११ ॥ वे हिंसाभावसे रहित, पवित्र, उदार तथा कामनाओंसे रहित थे और इसी भावसे कर्ममें प्रवृत्त हुए थे। जंगलमें उत्पन्न हुए फल-मूल आदि पदार्थोंसे ही उस यज्ञमें देवताओंके भाग निश्चित किये गये थे ॥ ११ ॥
प्रीतस्ततोऽस्य भगवान् देवदेवः पुरातनः । साक्षात् तं दर्शयामास सोऽदृश्योऽन्येन केनचित् ॥ १२ ॥ उस समय पुराणपुरुष देवाधिदेव भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया; परंतु दूसरे किसीको उनका दर्शन नहीं हुआ ॥ १२ ॥
स्वयं भागमुपाघ्राय पुरोडाशं गृहीतवान् । अदृश्येन हृतो भागो देवेन हरिमेधसा ॥ १३ ॥ भगवान् हयग्रीवने स्वयं अदृश्य रहकर ही अपने लिये अर्पित पुरोडाशको ग्रहण किया और उसे सूँघकर अपने अधीन कर लिया ॥ १३ ॥
बृहस्पतिस्ततः क्रुद्धः स्रुचमुद्यम्य वेगितः । आकाशं घ्नन् स्रुचः पातै रोषादश्रूण्यवर्तयत् ॥ १४ ॥ यह देख बृहस्पति क्रोधमें भर गये। उन्होंने बड़े वेगसे स्रुवा उठा लिया और आकाशमें उसे दे मारा। साथ ही वे रोषवश अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ १४ ॥
उवाच चोपरिचरं मया भागोऽयमुद्यतः । ग्राह्यः स्वयं हि देवेन मत्प्रत्यक्षं न संशयः ॥ १५ ॥
फिर वे राजा उपरिचरसे बोले—'मैंने जो यह भाग प्रस्तुत किया है, उसे भगवान्को मेरी आँखोंके सामने प्रकट होकर ग्रहण करना चाहिये, यही न्याय है, इसमें संशय नहीं है' ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
उद्यता यज्ञभागा हि साक्षात् प्राप्ताः सुरैरिह ।
किमर्थमिह न प्राप्तो दर्शनं स हरिर्विभुः ॥ १६ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जब सभी देवताओंने प्रत्यक्ष दर्शन देकर अपने-अपने भाग ग्रहण किये, तब भगवान् विष्णुने उस यज्ञमें पधारकर भी क्यों प्रत्यक्ष दर्शन नहीं दिया? ॥ १६ ॥
भीष्म उवाच
ततः स तं समुद्भूतं भूमिपालो महान् वसुः ।
प्रसादयामास मुनिं सदस्यास्ते च सर्वशः ॥ १७ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इसका कारण बताता हूँ, सुनो। वे महान् भूपाल वसु तथा अन्य सम्पूर्ण सदस्य मिलकर उस समय रोषमें भरे हुए मुनि बृहस्पतिको मनाने लगे ॥ १७ ॥
ऊचुश्चैनमसम्भ्रान्ता न रोषं कर्तुमर्हसि ।
नैष धर्मः कृतयुगे यस्त्वं रोषमचीकृथाः ॥ १८ ॥
सब लोग शान्तचित्त होकर उनसे बोले—'मुने! आप रोष न करें। आपने जो रोष किया है, यह सत्ययुगका धर्म नहीं है ॥ १८ ॥
अरोषणो ह्यसौ देवो यस्य भागोऽयमुद्यतः ।
न शक्यः स त्वया द्रष्टुमस्माभिर्वा बृहस्पते ॥ १९ ॥
यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति ।
'बृहस्पते! जिनको यह भाग समर्पित किया गया है वे भगवान् कभी क्रोध नहीं करते। हम और आप उन्हें स्वेच्छासे नहीं देख सकते हैं। जिसपर वे कृपा करते हैं वही उनका दर्शन कर पाता है' ॥ १९ १/२ ॥
एकतद्वितत्रिताश्चोचुस्ततश्चित्रशिखण्डिनः ॥ २० ॥
वयं हि ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः परिकीर्तिताः ।
गता निःश्रेयसार्थं हि कदाचिद् दिशमुत्तराम् ॥ २१ ॥
तदनन्तर एकत, द्वित और त्रितने तथा चित्रशिखण्डी नामवाले ऋषियोंने उनसे कहा—'बृहस्पते! हमलोग ब्रह्माजीके मानसपुत्र कहलाते हैं। एक बार अपने कल्याणकी इच्छासे हम सबने उत्तर दिशाकी यात्रा की ॥ २०-२१ ॥
तप्त्वा वर्षसहस्राणि चरित्वा तप उत्तमम् ।
एकपादाः स्थिताः सम्यक् काष्ठभूताः समाहिताः ॥ २२ ॥
मेरोरुत्तरभागे तु क्षीरोदस्यानुकूलतः ।
स देशो यत्र नस्तप्तं तपः परमदारुणम् ॥ २३ ॥
कथं पश्येम हि वयं देवं नारायणात्मकम् ।
वरेण्यं वरदं तं वै देवदेवं सनातनम् ॥ २४ ॥
‘वहाँ मेरुके उत्तर और क्षीरसागरके किनारे एक पवित्र स्थान है, जहाँ हमलोगोंने हजार वर्षोंतक एकाग्रचित्त हो काष्ठकी भाँति एक पैरसे खड़े होकर बड़ी कठोर तपस्या की थी। वह उत्तम तपस्या करके हम यही चाहते थे कि किसी तरह वरदायक सनातन देवाधिदेव वरणीय भगवान् नारायणका दर्शन कर लें ॥ २२-२४ ॥
कथं पश्येम हि वयं देवं नारायणं त्विति ।
अथ व्रतस्यावभृथे वागुवाचाशरीरिणी ॥ २५ ॥
स्निग्धगम्भीरया वाचा प्रहर्षणकरी विभो ।
‘हम बारंबार यही सोचते थे कि हमें श्रीनारायणदेवका दर्शन कैसे प्राप्त होगा? तदनन्तर व्रतकी समाप्ति होनेपर हमें हर्ष प्रदान करनेवाली किसी शरीररहित वाणीने स्नेहपूर्ण गम्भीर स्वरसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ १/२ ॥
सुतप्तं वस्तपो विप्राः प्रसन्नेनान्तरात्मना ॥ २६ ॥
यूयं जिज्ञासवो भक्ताः कथं द्रक्ष्यथ तं विभुम् ।
‘ब्राह्मणो! तुमने प्रसन्न हृदयसे भलीभाँति तप किया है। तुम भगवान्के भक्त हो और यह जानना चाहते हो कि उन सर्वव्यापी परमात्माका दर्शन कैसे हो? ॥
क्षीरोदधेरुत्तरतः श्वेतद्वीपो महाप्रभः ॥ २७ ॥
तत्र नारायणपरा मानवाश्चन्द्रवर्चसः ।
‘इसका उपाय सुनो। क्षीरसागरके उत्तरभागमें अत्यन्त प्रकाशमान श्वेतद्वीप है। वहाँ भगवान् नारायणका भजन करनेवाले पुरुष रहते हैं, जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् हैं ॥ २७ १/२ ॥
एकान्तभावोपगतास्ते भक्ताः पुरुषोत्तमम् ॥ २८ ॥
ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्ति सनातनम् ।
अनिन्द्रिया निराहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः ॥ २९ ॥
‘वे स्थूल इन्द्रियोंसे रहित, निराहार और निश्चेष्ट होते हैं। उनके शरीरसे मनोहर सुगन्ध निकलती रहती है तथा वे भगवान्के अनन्य भक्त होते हैं और सहस्रों किरणोंवाले उन सनातनदेव भगवान् पुरुषोत्तममें प्रवेश कर जाते हैं ॥ २८-२९ ॥
एकान्तिनस्ते पुरुषाः श्वेतद्वीपनिवासिनः ।
गच्छध्वं तत्र मुनयस्तत्रात्मा मे प्रकाशितः ॥ ३० ॥
‘मुनियो! वे श्वेतद्वीपके निवासी मेरे एकान्त भक्त हैं, तुम वहीं जाओ। वहाँ मेरे स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन होता है’ ॥ ३० ॥ अथ श्रुत्वा वयं सर्वे वाचं तामशरीरिणीम् । यथाख्यातेन मार्गेण तं देशं प्रतिपेदिरे ॥ ३१ ॥ ‘इस आकाशवाणीको सुनकर हमलोग उसके बताये हुए मार्गसे उस स्थानको गये ॥ ३१ ॥ प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं तच्चित्तास्तद्दिदृक्षवः । ततोऽस्मद्दृष्टिविषयस्तदा प्रतिहतोऽभवत् ॥ ३२ ॥ ‘श्वेत नामक महाद्वीपमें पहुँचकर हमारा चित्त भगवान्में ही लगा रहा। हम उनके दर्शनकी इच्छासे उत्कण्ठित हो रहे थे। वहाँ जाते ही हमारी दृष्टिशक्ति प्रतिहत हो गयी ॥ ३२ ॥ न च पश्याम पुरुषं तत्तेजोहृतदर्शनाः । ततो नः प्रादुरभवद् विज्ञानं दैवयोगजम् ॥ ३३ ॥ न किलातप्ततपसा शक्यते द्रष्टुमञ्जसा । ‘वहाँके निवासियोंके तेजसे आँखें चौंधिया जानेके कारण हम वहाँ किसी पुरुषको देख नहीं पाते थे। तदनन्तर दैवयोगसे हमारे हृदयमें यह ज्ञान प्रकट हुआ कि तपस्या किये बिना हमलोग भगवान्को सुगमतापूर्वक नहीं देख सकते ॥ ३३ १/२ ॥ ततः पुनर्वर्षशतं तप्त्वा तात्कालिकं महत् ॥ ३४ ॥ व्रतावसाने च शुभान् नरान् ददृशिरे वयम् । श्वेतांश्चन्द्रप्रतीकाशान् सर्वलक्षणलक्षितान् ॥ ३५ ॥ ‘तदनन्तर हमने तत्काल पुनः सौ वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उस तपोमय व्रतके पूर्ण होनेपर हमलोगोंको वहाँके शुभलक्षण पुरुषोंका दर्शन हुआ, जो चन्द्रमाके समान गौरवर्ण और सब प्रकारके उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे ॥ ३४-३५ ॥ नित्याञ्जलिकृतान् ब्रह्म जपतः प्रागुदङ्मुखान् । मानसो नाम स जपो जप्यते तैर्महात्मभिः ॥ ३६ ॥ ‘वे प्रतिदिन ईशानकोणकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े हुए ब्रह्मका मानसजप करते थे ॥ ३६ ॥ तेनैकाग्रमनस्त्वेन प्रीतो भवति वै हरिः । याऽभवन्मुनिशार्दूल भाः सूर्यस्य युगक्षये ॥ ३७ ॥ एकैकस्य प्रभा तादृक् साभवन्मानवस्य ह । ‘उनके मनकी इस एकाग्रतासे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते थे। मुनिश्रेष्ठ! प्रलयकालमें सूर्यकी जैसी प्रभा होती है, वैसी ही उस द्वीपमें रहनेवाले प्रत्येक पुरुषकी थी ॥ तेजोनिवासः स द्वीप इति वै मेनिरे वयम् ॥ ३८ ॥
न तत्राभ्यधिकः कश्चित् सर्वे ते समतेजसः । ‘हमलोगोंने तो यही समझा कि यह द्वीप तेजका ही निवासस्थान है। वहाँ कोई किसीसे बढ़कर नहीं था। सबका तेज समान था ।। ३८ १/२ ।।
अथ सूर्यसहस्रस्य प्रभां युगपदुत्थिताम् ।। ३९ ।। सहसा दृष्टवन्तः स्म पुनरेव बृहस्पते । ‘बृहस्पते! थोड़ी ही देरमें हमारे सामने एक ही साथ हजारों सूर्योंके समान प्रभा प्रकट हुई। हमारी दृष्टि सहसा उस ओर खिंच गयी ।। ३९ १/२ ।।
सहिताश्चाभ्यधावन्त ततस्ते मानवा द्रुतम् ।। ४० ।। कृताञ्जलिपुटा हृष्टा नम इत्येव वादिनः । ‘तदनन्तर वहाँके निवासी पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ दोनों हाथ जोड़े ‘नमो नमः’ कहते हुए एक ही साथ तीव्र गतिसे उस तेजकी ओर दौड़े ।। ४० १/२ ।।
ततो हि वदतां तेषामश्रौष्म विपुलं ध्वनिम् ।। ४१ ।। बलिः किलोपह्रियते तस्य देवस्य तैनरैः । ‘इसके बाद जब वे स्तुति करने लगे, तब उनकी तुमुल ध्वनि हमारे कानोंमें पड़ी। वे सब लोग उन तेजोमय भगवान्को पूजाकी सामग्री अर्पण कर रहे थे ।।
वयं तु तेजसा तस्य सहसा हृतचेतसः ।। ४२ ।। न किंचिदपि पश्यामो हतचक्षुर्बलेन्द्रियाः । ‘भगवान्के उस अनिर्वचनीय तेजने हमारे चित्तको सहसा खींच लिया था; परंतु हमारे नेत्र, बल और इन्द्रियाँ प्रतिहत हो गयी थीं, इसलिये हम स्पष्ट रूपसे कुछ देख नहीं पाते थे ।। ४२ १/२ ।।
एकस्तु शब्दो विततः श्रुतोऽस्माभिरुदीरितः ।। ४३ ।। जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ।। ४४ ।। ‘परंतु एक शब्द जो उच्चस्वरसे उच्चारित होकर दूरतक फैल रहा था, हमने भी सुना। सब लोग कह रहे थे—‘पुण्डरीकाक्ष! आपकी जय हो। विश्वभावन! आपको प्रणाम है। महापुरुषोंके भी पूर्वज हृषीकेश! आपको नमस्कार है’ ।। ४३-४४ ।।
इति शब्दः श्रुतोऽस्माभिः शिक्षाक्षरसमन्वितः । एतस्मिन्नन्तरे वायुः सर्वगन्धवहः शुचिः ।। ४५ ।। दिव्यान्युवाह पुष्पाणि कर्मण्यांश्चौषधीस्तथा । तैरिष्टः पञ्चकालज्ञैर्हरिरेकान्तिभिर्नरैः ।। ४६ ।। भक्त्या परमया युक्तैर्मनोवाक्कर्मभिस्तदा ।
'शिक्षा और अक्षरसे युक्त यह वाक्य हमलोगोंको श्रवणगोचर हुआ। इतनेहीमें पवित्र और सुगन्धित वायु बहुत-से दिव्य पुष्प और कार्योपयोगी ओषधियाँ ले आयी, जिनसे वहाँके पंचकालवेत्ता अनन्य भक्तों ने बड़ी भक्तिके साथ मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन श्रीहरिका पूजन किया ।। ४५-४६ १/२ ।।
नूनं तत्रागतो देवो यथा तैर्वागुदीरिता ।। ४७ ।।
वयं त्वेनं न पश्यामो मोहितास्तस्य मायया ।
'जैसी बातचीत उन्होंने की थी, उससे हमें विश्वास हो गया था कि निश्चय ही यहाँ भगवान् पधारे हुए हैं, परंतु उन्हींकी मायासे मोहित होनेके कारण हम उन्हें देख नहीं पाते थे ।। ४७ १/२ ।।
मारुते संनिवृत्ते च बलौ च प्रतिपादिते ।। ४८ ।।
चिन्ताव्याकुलितात्मानो जाताः स्मोऽङ्गिरसां वर ।
'बृहस्पते! जब उस सुगन्धित वायुका चलना बंद हो गया और भगवान्को बलिसमर्पणका कार्य पूर्ण हो गया तब हमलोग मन-ही-मन चिन्तासे व्याकुल हो उठे ।।
मानवानां सहस्रेषु तेषु वै शुद्धयोनिषु ।। ४९ ।।
अस्मान् कश्चिन्मनसा चक्षुषा वाप्यपूजयत् ।
'वहाँ शुद्ध कुलवाले सहस्रों पुरुष थे; परंतु उनमेंसे किसीने मनसे अथवा दृष्टिपातद्वारा भी हमलोगोंका सत्कार नहीं किया ।। ४९ १/२ ।।
तेऽपि स्वस्था मुनिगणा एकभावमनुव्रताः ।। ५० ।।
नास्मासु दधिरे भावं ब्रह्मभावमनुष्ठिताः ।
वहाँ जो स्वस्थ मुनिगण थे, वे भी अनन्य भावसे भगवान्के भजनमें ही मन लगाये रहते थे। उन ब्रह्मभावमें स्थित मुनियोंने हमलोगोंकी ओर ध्यान नहीं दिया ।। ५० १/२ ।।
ततोऽस्मान् सुपरिश्रान्तांस्तपसा चातिकर्शितान् ।। ५१ ।।
उवाच स्वस्थं किमपि भूतं तत्राशरीरकम् ।
'हमलोग तपस्यासे थककर अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। उस समय हमलोगोंसे किसी शरीररहित स्वस्थ प्राणी (देवता) ने कहा ।। ५१ १/२ ।।
देव उवाच
दृष्टा वः पुरुषाः श्वेताः सर्वेन्द्रियविवर्जिताः ।। ५२ ।।
दृष्टो भवति देवेश एभिर्दृष्टैर्द्विजोत्तमैः ।
देवता बोले— मुनिवरो! तुमलोगोंने श्वेतद्वीपनिवासी श्वेतकाय इन्द्रियरहित पुरुषोंका दर्शन किया। इन श्रेष्ठ द्विजोंके दर्शन होनेसे साक्षात् देवेश्वर भगवान्का ही दर्शन हो जाता है ।। ५२ १/२ ।।
गच्छध्वं मुनयः सर्वे यथागतमितोऽचिरात् ।। ५३ ।।
न स शक्यस्त्वभक्तेन द्रष्टुं देवः कथंचन ।
मुनियो! तुम सब लोग जैसे आये हो, वैसे ही शीघ्र लौट जाओ। भगवान्में अनन्य भक्ति हुए बिना किसीको किसी तरह भी उनका साक्षात् दर्शन नहीं हो सकता ।।
कामं कालेन महता एकान्तित्वमुपागतैः ।। ५४ ।।
शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभामण्डलदुर्द्दशः ।
हाँ, बहुत समयतक उनकी भक्ति करते-करते जब पूरी अनन्यता आ जायगी, तब ज्योतिःपुंजके कारण कठिनाईसे देखे जानेवाले भगवान्का दर्शन सम्भव हो सकता है ।। ५४ १/२ ।।
महत् कार्यं च कर्तव्यं युष्माभिर्द्विजसत्तमाः ।। ५५ ।।
इतः कृतयुगेऽतीते विपर्यासं गतेऽपि च ।
वैवस्वतेऽन्तरे विप्राः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ।। ५६ ।।
सुराणां कार्यसिद्धयर्थं सहाया वै भविष्यथ ।
विप्रवरो! इस समय तुम्हें अभी बहुत बड़ा काम करना है। इस सत्ययुगके बीतनेपर जब धर्ममें किंचित् व्यतिक्रम आ जायगा और वैवस्वत मन्वन्तरके त्रेतायुगका आरम्भ होगा, उस समय देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये तुमलोग ही सहायक होगे ।। ५५-५६ १/२ ।।
ततस्तदद्भुतं वाक्यं निशम्यैवामृतोपमम् ।। ५७ ।।
तस्य प्रसादात् प्राप्ताः स्मो देशमीप्सितमञ्जसा ।
‘यह अमृतके समान मधुर एवं अद्भुत वचन सुनकर हमलोग भगवान्की कृपासे अनायास ही अपने अभीष्ट स्थानपर आ पहुँचे ।। ५७ १/२ ।।
एवं सुतपसा चैव हव्यकव्यैस्तथैव च ।। ५८ ।।
देवोऽस्माभिर्न दृष्टः स कथं त्वं द्रष्टुमर्हसि ।
‘बृहस्पते! इस प्रकार हमने बड़ी भारी तपस्या की, हव्य-कव्योंके द्वारा भगवान्का पूजन भी किया, तो भी हमें उनका दर्शन न हो सका। फिर तुम कैसे अनायास ही उनका दर्शन पा लोगे? ।। ५८ १/२ ।।
नारायणो महद्भूतं विश्वसृग्हव्यकव्यभुक् ।। ५९ ।।
अनादिनिधनोऽव्यक्तो देवदानवपूजितः ।
‘भगवान् नारायण सबसे महान् देवता हैं। वे ही संसारके स्रष्टा और हव्य-कव्यके भोक्ता हैं। उनका आदि और अन्त नहीं है। उन अव्यक्त परमेश्वरकी देवता और दानव भी पूजा करते हैं’ ।। ५९ १/२ ।।
एवमेकतवाक्येन द्वितत्रितमतेन च ।। ६० ।।
अनुनीतः सदस्यैश्च बृहस्पतिरुदारधीः ।
समापयत् ततो यज्ञं दैवतं समपूजयत् ।। ६१ ।।
इस प्रकार एकतके कहनेसे, द्वित और त्रितकी सम्मतिसे तथा अन्य सदस्योंद्वारा अनुनय किये जानेसे उदारबुद्धि बृहस्पतिने उस यज्ञको समाप्त किया और भगवान्की पूजा की॥ ६०-६१॥
समाप्तयज्ञो राजापि प्रजां पालितवान् वसुः ।
ब्रह्मशापाद् दिवो भ्रष्टः प्रविवेश महीं ततः ॥ ६२ ॥
राजा वसु भी यज्ञ पूरा करके प्रजाका पालन करने लगे। एक बार ब्रह्मशापसे उन्हें स्वर्गसे भ्रष्ट होना पड़ा था। उस समय वे पृथ्वीके भीतर रसातलमें समा गये थे॥ ६२ ॥
स राजा राजशार्दूल सत्यधर्मपरायणः ।
अन्तर्भूमिगतश्चैव सततं धर्मवत्सलः ॥ ६३ ॥
नारायणपरो भूत्वा नारायणजयं जपन् ।
तस्यैव च प्रसादेन पुनरेवोत्थितस्तु सः ॥ ६४ ॥
महीतलाद् गतः स्थानं ब्रह्मणः समनन्तरम् ।
परां गतिमनुप्राप्त इति नैष्ठिकमञ्जसा ॥ ६५ ॥
नृपश्रेष्ठ! सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले सत्यधर्मपरायण राजा उपरिचर भूमिके भीतर प्रवेश करके भी निरन्तर नारायण-मन्त्रका जप करते हुए भी उन्हींकी आराधनामें तत्पर रहते थे। अतः उन्हींकी कृपासे वे पुनः ऊपरको उठे और भूतलसे ब्रह्मलोकमें जाकर उन्होंने परम गति प्राप्त कर ली। अनायास ही उन्हें निष्ठावानोंकी यह उत्तम गति प्राप्त हो गयी॥ ६३—६५॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महत्ताका वर्णनविषयक तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३६ ॥
यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अधःपतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथ
सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अधःपतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा
युधिष्ठिर उवाच
यदा भागवतोऽत्यर्थमासीद् राजा महान् वसुः ।
किमर्थं स परिभ्रष्टो विवेश विवरं भुवः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! राजा वसु जब भगवान्के अत्यन्त भक्त और महान् पुरुष थे, तब वे स्वर्गसे भ्रष्ट होकर पातालमें कैसे प्रविष्ट हुए? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ऋषीणां चैव संवादं त्रिदशानां च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें ज्ञानीजन ऋषियों और देवताओंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासको उद्धृत किया करते हैं— ॥ २ ॥
अजेन यष्टव्यमिति प्राहुर्देवा द्विजोत्तमान् ।
स च छागोऽप्यजो ज्ञेयो नान्यः पशुरिति स्थितिः ॥ ३ ॥
‘अजके द्वारा यज्ञ करना चाहिये—ऐसा विधान है।' ऐसा कहकर देवताओंने वहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियोंसे कहा, 'यहाँ अजका अर्थ बकरा समझना चाहिये, दूसरा पशु नहीं, ऐसा निश्चय है' ॥ ३ ॥
ऋषय ऊचुः
बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः ।
अजसंज्ञानि बीजानि छागं नो हन्तुमर्हथ ॥ ४ ॥
ऋषियोंने कहा— देवताओ! यज्ञोंमें बीजोंद्वारा यजन करना चाहिये, ऐसी वैदिकी श्रुति है। बीजोंका ही नाम अज है; अतः बकरेका वध करना हमें उचित नहीं है ॥ ४ ॥
नैष धर्मः सतां देवा यत्र वध्येत वै पशुः ।
इदं कृतयुगं श्रेष्ठं कथं वध्येत वै पशुः ॥ ५ ॥
देवताओ! जहाँ कहीं भी यज्ञमें पशुका वध हो, वह सत्पुरुषोंका धर्म नहीं है। यह श्रेष्ठ सत्ययुग चल रहा है। इसमें पशुका वध कैसे किया जा सकता है? ॥
भीष्म उवाच
तेषां संवदतामेवमृषीणां विबुधैः सह ।
मार्गगतो नृपश्रेष्ठस्तं देशं प्राप्तवान् वसुः ॥ ६ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार जब ऋषियोंका देवताओंके साथ संवाद चल रहा था, उसी समय नृपश्रेष्ठ वसु भी उस मार्गसे आ निकले और उस स्थानपर पहुँच गये ॥ ६ ॥
अन्तरिक्षचरः श्रीमान् समग्रबलवाहनः ।
तं दृष्ट्वा सहसाऽऽयान्तं वसुं ते त्वन्तरिक्षगम् ॥ ७ ॥
ऊचुर्द्विजातयो देवानेष च्छेत्स्यति संशयम् ।
यज्वा दानपतिः श्रेष्ठः सर्वभूतहितप्रियः ॥ ८ ॥
श्रीमान् राजा उपरिचर अपनी सेना और वाहनोंके साथ आकाशमार्गसे चलते थे। उन अन्तरिक्षचारी वसुको सहसा आते देख ब्रह्मर्षियोंने देवताओंसे कहा—'ये नरेश हमलोगोंका संदेह दूर कर देंगे; क्योंकि ये यज्ञ करनेवाले, दानपति, श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण भूतोंके हितैषी एवं प्रिय हैं ॥ ७-८ ॥
कथंस्विदन्यथा ब्रूयादेष वाक्यं महान् वसुः ।
एवं ते संविदं कृत्वा विबुधा ऋषयस्तथा ॥ ९ ॥
अपृच्छन् सहिताभ्येत्य वसुं राजानमन्तिकात् ।
'ये महान् पुरुष वसु शास्त्रके विपरीत वचन कैसे कह सकते हैं।' ऐसी सम्मति करके देवताओं और ऋषियोंने एक साथ राजा वसुके पास आकर अपना प्रश्न उपस्थित किया— ॥ ९ १/२ ॥
भो राजन् केन यष्टव्यमजेनाहोस्विदौषधैः ॥ १० ॥
एतन्नः संशयं छिन्धि प्रमाणं नो भवान् मतः ।
'राजन्! किसके द्वारा यज्ञ करना चाहिये? बकरेके द्वारा अथवा अन्नद्वारा? हमारे इस संदेहका आप निवारण करें। हमलोगोंकी रायमें आप ही प्रामाणिक व्यक्ति हैं' ॥ १० १/२ ॥
स तान् कृताञ्जलिर्भूत्वा परिपप्रच्छ वै वसुः ॥ ११ ॥
कस्य वै को मतः कामो ब्रूत सत्यं द्विजोत्तमाः ।
तब राजा वसुने हाथ जोड़कर उन सबसे पूछा—'विप्रवरो! आपलोग सच-सच बताइये, आपलोगोंमेंसे किस पक्षको कौन-सा मत अभीष्ट है? कौन अजका अर्थ बकरा मानता है और कौन अन्न?' ॥ ११ १/२ ॥
ऋषय ऊचुः
धान्यैर्यष्टव्यमित्येव पक्षोऽस्माकं नराधिप ॥ १२ ॥
देवानां तु पशुः पक्षो मतो राजन् वदस्व नः ।
ऋषि बोले—नरेश्वर! हमलोगोंका पक्ष यह है कि अन्नसे यज्ञ करना चाहिये तथा देवताओंका पक्ष यह है कि छाग नामक पशुके द्वारा यज्ञ होना चाहिये। राजन्! अब आप हमें अपना निर्णय बताइये॥ १२१/३॥
भीष्म उवाच
देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात् ॥ १३॥
छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा ।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! देवताओंका मत जानकर राजा वसुने उन्हींका पक्ष लेकर कह दिया कि अजका अर्थ है, छाग (बकरा); अतः उसीके द्वारा यज्ञ करना चाहिये॥ १३१/३॥
कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः ॥ १४॥
ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थवादिनम् ।
यह सुनकर वे सभी सूर्यके समान तेजस्वी ऋषि कुपित हो उठे और विमानपर बैठकर देवपक्षकी बात कहनेवाले वसुसे बोले—॥ १४१/३॥
सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद् दिवः पत ॥ १५॥
अद्यप्रभृति ते राजन्नाकाशे विहता गतिः ।
अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्त्वा प्रवेक्ष्यसि ॥ १६॥
‘राजन्! तुमने यह जानकर भी कि अजका अर्थ अन्न है, देवताओंका पक्ष लिया है; इसलिये स्वर्गसे नीचे गिर जाओ। आजसे तुम्हारी आकाशमें विचरनेकी शक्ति नष्ट हो गयी। हमारे शापके आघातसे तुम पृथ्वीको भेदकर पातालमें प्रवेश करोगे॥ १५-१६॥
(विरुद्धं वेदसूत्राणामुक्तं यदि भवेन्नृप ।
वयं विरुद्धवचना यदि तत्र पतामहे ॥)
‘नरेश्वर! तुमने यदि वेद और सूत्रोंके विरुद्ध कहा हो तो हमारा यह शाप अवश्य लागू हो और यदि हम शास्त्रविरुद्ध वचन कहते हों तो हमारा पतन हो जाय’॥
ततस्तस्मिन् मुहूर्तेऽथ राजोपरिचरस्तदा ।
अधो वै सम्बभूवाशु भूमेर्विवरगो नृप ॥ १७॥
राजन्! ऋषियोंके इतना कहते ही उसी क्षण राजा उपरिचर आकाशसे नीचे आ गये और तत्काल पृथ्वीके विवरमें प्रवेश कर गये॥ १७॥
स्मृतिस्त्वेनं न हि जहौ तदा नारायणाज्ञया ।
देवास्तु सहिताः सर्वे वसोः शापविमोक्षणम् ॥ १८॥
चिन्तयामासुर्व्यग्राः सुकृतं हि नृपस्य तत् ।
अनेनास्मत्कृते राज्ञा शापः प्राप्तो महात्मना ॥ १९॥
उस समय भी भगवान् नारायणकी आज्ञासे उनकी स्मरणशक्ति उन्हें छोड़ न सकी। इधर सब देवता एकत्र होकर राजाको शापसे छुटकारा दिलानेका उपाय सोचने लगे। वे शान्तभावसे परस्पर बोले—‘राजाने तो पुण्य-ही-पुण्य किया है। उन महात्मा नरेशको हमारे कारणसे ही यह शाप प्राप्त हुआ है ।। १८-१९ ।।
अस्य प्रतिप्रियं कार्यं सहितैर्नो दिवौकसः ।
इति बुद्ध्या व्यवस्याशु गत्वा निश्चयमीश्वराः ॥ २० ॥
ऊचुः संहृष्टमनसो राजोपरिचरं तदा ।
‘देवताओ! हमलोगोंको एक साथ होकर उनका अतिशय प्रिय करना चाहिये।' अपनी बुद्धिके द्वारा ऐसा निश्चय करके वे सभी देवता राजा उपरिचर वसुके पास जाकर प्रसन्नचित्त हो बोले— ।। २० १/२ ।।
ब्रह्मण्यदेवभक्तस्त्वं सुरासुरगुरुर्हरिः ॥ २१ ॥
कामं स तव तुष्टात्मा कुर्याच्छापविमोक्षणम् ।
‘राजन्! तुम ब्रह्मण्यदेव भगवान् विष्णुके भक्त हो और वे श्रीहरि देवता तथा असुर सबके गुरु हैं। उनका मन तुमपर संतुष्ट है; इसलिये वे तुम्हारी इच्छाके अनुसार तुम्हें अवश्य शापसे मुक्त कर देंगे ।। २१ १/२ ।।
मानना तु द्विजातीनां कर्तव्या वै महात्मनाम् ॥ २२ ॥
अवश्यं तपसा तेषां फलितव्यं नृपोत्तम ।
यतस्त्वं सहसा भ्रष्ट आकाशान्मेदिनीतलम् ॥ २३ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! तुम्हें महात्मा ब्राह्मणोंका सदा ही समादर करना चाहिये। अवश्य ही यह उनकी तपस्याका फल है; जिससे तुम आकाशसे सहसा भ्रष्ट होकर पातालमें चले आये हो ।। २२-२३ ।।
एकं त्वनुग्रहं तुभ्यं दद्मो वै नृपसत्तम ।
यावत् त्वं शापदोषेण कालमासिष्यसेऽनघ ॥ २४ ॥
भूमेर्विवरगो भूत्वा तावत् त्वं कालमाप्स्यसि ।
यज्ञेषु सुहुतां विप्रैर्वसोधारां समाहितैः ॥ २५ ॥
‘निष्पाप नृपशिरोमणे! हम तुम्हें अपना एक अनुग्रह प्रदान करते हैं। तुम शापदोषके कारण जबतक-जितने समयतक पृथ्वीके विवरमें रहोगे, तबतक एकाग्रचित्त ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञोंमें दी हुई वसुधाराकी आहुति तुम्हें प्राप्त होती रहेगी ।। २४-२५ ।।
प्राप्स्यसेऽस्मदनुध्यानान्मा च त्वां ग्लानिरस्पृशत् ।
न क्षुत्पिपासे राजेन्द्र भूमेश्छिद्रे भविष्यतः ॥ २६ ॥
वसोधाराभिपीतत्वात् तेजसाऽऽप्यायितेन च ।
स देवोऽस्मद्वरात् प्रीतो ब्रह्मलोकं हि नेष्यति ॥ २७ ॥
'राजेन्द्र! हमारे चिन्तनसे तुम्हें वसुधाराकी प्राप्ति होगी, जिससे ग्लानि तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकेगी और इस पातालमें रहते हुए भी तुम्हें भूख और प्यासका कष्ट नहीं होगा; क्योंकि वसुधाराका पान करनेसे तुम्हारे तेजकी वृद्धि होती रहेगी। हमारे वरदानसे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न हो तुम्हें ब्रह्मलोकमें ले जायँगे'॥ एवं दत्त्वा वरं राज्ञे सर्वे ते च दिवौकसः । गताः स्वभवनं देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ २८ ॥ इस प्रकार राजाको वरदान देकर वे सब देवता तथा तपोधन ऋषि अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २८ ॥ चक्रे वसुस्ततः पूजां विष्वक्सेनाय भारत । जप्यं जगौ च सततं नारायणमुखोद्गतम् ॥ २९ ॥ भारत! तदनन्तर वसुने भगवान् विष्वक्सेनकी पूजा आरम्भ की और भगवान् नारायणके मुखसे प्रकट हुए जपनीय मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) का निरन्तर जप करने लगे ॥ २९ ॥ तत्रापि पञ्चभिर्यज्ञैः पञ्चकालानरिंदम । अयजद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवरगोऽपि सन् ॥ ३० ॥ शत्रुदमन युधिष्ठिर! वहाँ पातालके विवरमें रहते हुए भी राजा उपरिचर पाँच समय पाँच यज्ञोंद्वारा देवेश्वर श्रीहरिकी आराधना करते थे ॥ ३० ॥ ततोऽस्य तुष्टो भगवान् भक्त्या नारायणो हरिः । अनन्यभक्तस्य सततस्तत्परस्य जितात्मनः ॥ ३१ ॥ उन्होंने अपने मनको जीत लिया था और वे सदा भगवान्के भजनमें ही लगे रहते थे। अपने उस अनन्य भक्तकी भक्तिसे भगवान् श्रीनारायण हरि बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३१ ॥ वरदो भगवान् विष्णुः समीपस्थं द्विजोत्तमम् । गरुत्मन्तं महावेगमाबभाषेप्सितं तदा ॥ ३२ ॥ फिर उन वरदायक भगवान् विष्णुने अपने पास ही खड़े हुए महान् वेगशाली पक्षिराज गरुड़से अपनी अभीष्ट बात इस प्रकार कही— ॥ ३२ ॥ द्विजोत्तम महाभाग पश्यतां वचनान्मम । सम्राड् राजा वसुर्नाम धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ ३३ ॥ 'महाभाग पक्षिप्रवर! तुम मेरी आज्ञासे कठोर व्रतका पालन करनेवाले धर्मात्मा सम्राट् राजा वसुके पास जाकर उन्हें देखो ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणानां प्रकोपेन प्रविष्टो वसुधातलम् । मानितास्ते तु विप्रेन्द्रास्त्वं तु गच्छ द्विजोत्तम ॥ ३४ ॥ 'पक्षिराज! वे ब्राह्मणोंके कोपसे पातालमें प्रविष्ट हुए हैं। फिर भी उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका सदा सम्मान ही किया है; अतः तुम उनके पास जाओ ॥ ३४ ॥
भूमेर्विवरसंगुप्तं गरुडेह ममाज्ञया । अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु मा चिरम् ॥ ३५ ॥ ‘गरुड! पृथ्वीके विवरमें सुरक्षितरूपसे रहनेवाले इन पातालचारी नृपश्रेष्ठ वसुको तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही आकाशचारी बना दो’ ॥ ३५ ॥
गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान् । विवेश विवरं भूमेर्यत्रास्ते पार्थिवो वसुः ॥ ३६ ॥ यह आज्ञा पाकर वायुके समान वेगशाली गरुड अपने दोनों पंख फैलाकर उड़े और पातालमें जहाँ राजा वसु विराजमान थे, घुस गये ॥ ३६ ॥
तत एनं समुत्क्षिप्य सहसा विनतासुतः । उत्पपात नभस्तूर्णं तत्र चैनममुञ्चत ॥ ३७ ॥ विनतानन्दन गरुड सहसा राजाको वहाँसे ऊपर उठाकर तुरंत आकाशमें ले उड़े और वहीं इन्हें छोड़ दिया ॥ ३७ ॥
अस्मिन् मुहूर्ते संजज्ञे राजोपरिचरः पुनः । सशरीरो गतश्चैव ब्रह्मलोकं नृपोत्तमः ॥ ३८ ॥ उसी क्षण राजा वसु पुनः उपरिचर हो गये। फिर वे नृपश्रेष्ठ सशरीर ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ ३८ ॥
एवं तेनापि कौन्तेय वाग्दोषाद् देवताज्ञया । प्राप्ता गतिरधस्तात् तु द्विजशापान्महात्मना ॥ ३९ ॥ कुन्तीनन्दन! इस प्रकार उस महामनस्वी नरेशने भी देवताओंकी आज्ञासे वाचिक अपराध करनेके कारण ब्राह्मणोंके शापसे अधोगति प्राप्त की थी ॥ ३९ ॥
केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरीरीश्वरः । ततः शीघ्रं जहौ शापं ब्रह्मलोकमवाप च ॥ ४० ॥ फिर उन्होंने केवल पुरुषप्रवर भगवान् श्रीहरिका सेवन किया, जिससे वे उस शापसे शीघ्र ही छूट गये और ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ४० ॥
भीष्म उवाच
एतत् ते सर्वमाख्यातं सम्भूता मानवा यथा । नारदोऽपि यथा श्वेतं द्वीपं स गतवानृषिः । तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ४१ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! श्वेतद्वीपके निवासी पुरुष जैसे हैं, उनकी सारी स्थिति मैंने तुमसे कह सुनायी। अब देवर्षि नारद जिस प्रकार श्वेतद्वीपमें गये, वह सब प्रसंग तुमसे कहूँगा। तुम एकचित्त होकर सुनो ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाका वर्णनविषयक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं)
३३८-
अष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नारदजीका दो सौ नामोंद्वारा भगवान्की स्तुति करना
भीष्म उवाच
प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं नारदो भगवानृषिः ।
ददर्श तानेव नरान् श्वेतांश्चन्द्रसमप्रभान् ॥ १ ॥
पूजयामास शिरसा मनसा तैश्च पूजितः ।
दिदृक्षुर्जप्यपरमः सर्वकृच्छ्रगतः स्थितः ॥ २ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस महान् श्वेतद्वीपमें पहुँचकर भगवान् देवर्षि नारदने जब वहाँके उन चन्द्रमाके समान कान्तिमान् पुरुषोंको देखा, तब मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और मन-ही-मन उनकी पूजा की। तत्पश्चात् श्वेतद्वीपनिवासी पुरुषोंने भी नारदजीका सत्कार किया। फिर वे भगवान्के दर्शनकी इच्छासे उनके नामका जप करने लगे एवं कठोर नियमोंका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ १-२ ॥
भूत्वैकाग्रमना विप्र ऊर्ध्वबाहुः समाहितः ।
स्तोत्रं जगौ स विश्वाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥ ३ ॥
नारदजी वहाँ अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर एकाग्रचित्त हो निर्गुण-सगुणरूप विश्वात्मा भगवान् नारायणकी इस प्रकार (दो सौ नामोंद्वारा) स्तुति करने लगे ॥ ३ ॥
नारद उवाच
१ नमस्ते देवदेवेश २ निष्क्रिय ३ निर्गुण ४ लोकसाक्षिन् ५ क्षेत्रज्ञ ६ पुरुषोत्तम ७ अनन्त ८ पुरुष ९ महापुरुष १० पुरुषोत्तम ११ त्रिगुण १२ प्रधान १३ अमृत १४ अमृताख्य १५ अनन्ताख्य १६ व्योम १७ सनातन १८ सदसद्व्यक्ताव्यक्त १९ ऋतधामन् २० आदिदेव २१ वसुप्रद २२ प्रजापते २३ सुप्रजापते २४ वनस्पते २५ महाप्रजापते २६ ऊर्जस्पते २७ वाचस्पते २८ जगतपते २९ मनस्पते ३० दिवस्पते ३१ मरुत्पते ३२ सलिलपते ३३ पृथिवीपते ३४ दिक्पते ३५ पूर्वनिवास ३६ गुह्य ३७ ब्रह्मपुरोहित ३८ ब्रह्मकायिक ३९ महाराजकिक ४० चातुर्महाराजिक ४१ भासुर ४२ महाभासुर ४३ सप्त-महाभाग ४४ याम्य ४५ महायाम्य ४६ संज्ञासंज्ञ ४७ तुषित ४८ महातुषित ४९ प्रमर्दन ५० परिनिर्मित ५१ अपरिनिर्मित ५२ वशवर्तिन् ५३ अपरिन्निन्दित ५४ अपरिमित ५५ वशवर्तिन् ५६ अवशवर्तिन् ५७ यज्ञ ५८ महायज्ञ ५९ यज्ञसम्भव ६० यज्ञयोने ६१ यज्ञगर्भ ६२ यज्ञहृदय ६३ यज्ञस्तुत ६४ यज्ञभागहर ६५ पञ्चयज्ञ ६६ पञ्चकाल-कर्तृपते ६७ पाञ्चरात्रिक ६८ वैकुण्ठ ६९ अपराजित ७० मानसिक ७१ नामनामिक ७२ परस्वामिन् ७३ सुस्नात ७४ हंस ७५ परमहंस ७६