महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2293, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना
शौनक उवाच
कथं स भगवान् देवो यज्ञेष्वग्रहरः प्रभुः ।
यज्ञधारी च सततं वेदवेदाङ्गवित् तथा ॥ १ ॥
शौनकजीने कहा— सूतनन्दन! वे प्रभावशाली वेदवेद्य भगवान् नारायणदेव यज्ञोंमें प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले माने गये हैं तथा वे ही वेदों और वेदांगोंके ज्ञाता परमेश्वर नित्य-निरन्तर यज्ञधारी (यज्ञकर्ता) भी बताये गये हैं। एक ही भगवान्में यज्ञोंके कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों कैसे सम्भव होते हैं? ॥ १ ॥
निवृत्तं चास्थितो धर्मं क्षमी भागवतः प्रभुः ।
निवृत्तिधर्मान् विदधे स एव भगवान् प्रभुः ॥ २ ॥
सबके स्वामी क्षमाशील भगवान् नारायण स्वयं तो निवृत्तिधर्ममें ही स्थित हैं और उन्हीं सर्वशक्तिमान् भगवान्ने निवृत्तिधर्मोंका विधान किया है ॥ २ ॥
कथं प्रवृत्तिधर्मेषु भागार्हा देवताः कृताः ।
कथं निवृत्तिधर्माश्च कृता व्यावृत्तबुद्धयः ॥ ३ ॥
इस प्रकार निवृत्तिधर्मावलम्बी होते हुए भी उन्होंने देवताओंको प्रवृत्तिधर्मोंमें अर्थात् यज्ञादि कर्मोंमें भाग लेनेका अधिकारी क्यों बनाया? तथा ऋषि-मुनियोंको विषयोंसे विरक्तबुद्धि और निवृत्तिधर्मपरायण किस कारण बनाया? ॥ ३ ॥
एतं नः संशयं सौते छिन्धि गुह्यं सनातनम् ।
त्वया नारायणकथाः श्रुता वै धर्मसंहिताः ॥ ४ ॥
सूतनन्दन! यह गूढ़ संदेह हमारे मनमें सदा उठता रहता है, आप इसका निवारण कीजिये; क्योंकि आपने भगवान् नारायणकी बहुत-सी धर्मसंगत कथाएँ सुन रखी हैं ॥ ४ ॥
सौतिरुवाच
जनमेजयेन यत् पृष्टः शिष्यो व्यासस्य धीमतः ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि पौराणं शौनकोत्तम ॥ ५ ॥
सूतपुत्रने कहा— मुनिश्रेष्ठ शौनक! राजा जनमेजयने बुद्धिमान् व्यासजीके शिष्य वैशम्पायनजीके सम्मुख जो प्रश्न उपस्थित किया था, उस पुराणप्रोक्त विषयका मैं तुम्हारे