महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2403, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी महिमाका वर्णन
जनमेजय उवाच
बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।
को ह्यत्र पुरुषः श्रेष्ठः को वा योनिरिहोच्यते ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! पुरुष अनेक हैं या एक? इस जगत्में कौन पुरुष सबसे श्रेष्ठ है? अथवा किसे यहाँ सबकी उत्पत्तिका स्थान बताया जाता है? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
बहवः पुरुषा लोके सांख्ययोगविचारणे ।
नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**कुरुकुलका भार वहन करनेवाले नरेश! सांख्य और योगकी विचारधाराके अनुसार इस जगत्में पुरुष अनेक हैं। वे 'एकपुरुषवाद' नहीं स्वीकार करते हैं ॥ २ ॥
बहूनां पुरुषाणां च यथैका योनिरुच्यते ।
तथा तं पुरुषं विश्वं व्याख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥ ३ ॥
नमस्कृत्वा च गुरवे व्यासाय विदितात्मने ।
तपोयुक्ताय दान्ताय वन्द्याय परमर्षये ॥ ४ ॥
बहुत-से पुरुषोंकी उत्पत्तिका स्थान एक ही पुरुष कैसे बताया जाता है? यह समझानेके लिये आत्मज्ञानी, तपस्वी, जितेन्द्रिय एवं वन्दनीय परमर्षि गुरु व्यासजीको नमस्कार करके मैं तुम्हारे सामने अधिक गुणशाली विश्वात्मा पुरुषकी व्याख्या करूँगा ॥ ३-४ ॥
इदं पुरुषसूक्तं हि सर्ववेदेषु पार्थिव ।
ऋतं सत्यं च विख्यातमृषिसिंहेन चिन्तितम् ॥ ५ ॥
राजन्! यह पुरुषसम्बन्धी सूक्त तथा ऋत और सत्य सम्पूर्ण वेदोंमें विख्यात है। ऋषिसिंह व्यासने इसका भलीभाँति चिन्तन किया है ॥ ५ ॥
उत्सर्गेणापवादेन ऋषिभिः कपिलादिभिः ।
अध्यात्मचिन्तामाश्रित्य शास्त्राण्युक्तानि भारत ॥ ६ ॥
भारत! कपिल आदि ऋषियोंने सामान्य और विशेषरूपमें अध्यात्म-तत्त्वका चिन्तन करके विभिन्न शास्त्रोंका प्रतिपादन किया है ॥ ६ ॥