महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः
कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप
नारद उवाच
कर्णस्य बाहुवीर्येण प्रणयेन दमेन च ।
तुतोष भृगुशार्दूलो गुरुशुश्रूषया तथा ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं—राजन्! कर्णके बाहुबल, प्रेम, इन्द्रिय-संयम तथा गुरुसेवासे भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी बहुत संतुष्ट हुए ॥ १ ॥
तस्मै स विधिवत् कृत्स्नं ब्रह्मास्त्रं सनिवर्तनम् ।
प्रोवाचाखिलमव्यग्रं तपस्वी तत् तपस्विने ॥ २ ॥
तदनन्तर तपस्वी परशुरामने तपस्यामें लगे हुए कर्णको शान्तभावसे प्रयोग और उपसंहार विधिसहित सम्पूर्ण ब्रह्मास्त्रकी विधिपूर्वक शिक्षा दी ॥ २ ॥
विदितास्त्रस्ततः कर्णो रममाणोऽश्रमे भृगोः ।
चकार वै धनुर्वेदे यत्नमद्भुतविक्रमः ॥ ३ ॥
ब्रह्मास्त्रका ज्ञान प्राप्त करके कर्ण परशुरामजीके आश्रममें प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा। उस अद्भुत पराक्रमी वीरने धनुर्वेदके अभ्यासके लिये बड़ा परिश्रम किया ॥ ३ ॥
ततः कदाचिद् रामस्तु चरन्नाश्रममन्तिकात् ।
कर्णेन सहितो धीमानुपवासेन कर्शितः ॥ ४ ॥
सुष्वाप जामदग्न्यस्तु विश्रम्भोत्पन्नसौहृदः ।
कर्णस्योत्सङ्ग आधाय शिरः क्लान्तमना गुरुः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् एक समय बुद्धिमान् परशुरामजी कर्णके साथ अपने आश्रमके निकट ही घूम रहे थे। उपवास करनेके कारण उनका शरीर दुर्बल हो गया था। कर्णके ऊपर उनका पूरा विश्वास होनेके कारण उसके प्रति सौहार्द हो गया था। वे मन-ही-मन थकावटका अनुभव करते थे, इसलिये गुरुवर जमदग्निनन्दन परशुरामजी कर्णकी गोदमें सिर रखकर सो गये ॥ ४-५ ॥
अथ कृमिः श्लेष्ममेदोमांसशोणितभोजनः ।
दारुणो दारुणस्पर्शः कर्णस्याभ्याशमागतः ॥ ६ ॥
इसी समय लार, मेदा, मांस और रक्तका आहार करनेवाला एक भयानक कीड़ा, जिसका स्पर्श (डंक मारना) बड़ा भयंकर था, कर्णके पास आया ॥ ६ ॥
स तस्योरुमथासाद्य बिभेद रुधिराशनः ।
न चैनमशकत् क्षेप्तुं हन्तुं वापि गुरोर्भयात् ॥ ७ ॥