भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 525

नाध्यापयन्त्यधीयन्ते यजन्ते याजयन्ति न ।। १३ ।। ब्राह्मणान् परिरक्षन्ति संग्रामेष्वपलायिनः । क्षत्रिया मे स्वकर्मस्था मामकान्तरमाविशः ।। १४ ।। मेरे राज्यमें जो क्षत्रिय हैं, वे अपने वर्णोचित कर्मोंमें लगे रहते हैं, वे वेदोंका अध्ययन तो करते हैं, परंतु अध्यापन नहीं करते; यज्ञ करते हैं, परंतु कराते नहीं हैं तथा दान देते हैं, किंतु स्वयं लेते नहीं हैं। मेरे राज्यके क्षत्रिय याचना नहीं करते; स्वयं ही याचकोंको मुँहमाँगी वस्तुएँ देते हैं। सत्यभाषी तथा धर्मसम्पादनमें कुशल हैं। वे ब्राह्मणोंकी रक्षा करते हैं और युद्धमें कभी पीठ नहीं दिखाते हैं तो भी तुम मेरे शरीरके भीतर कैसे प्रविष्ट हो गये? ।। १३-१४ ।।

कृषिगोरक्षवाणिज्यमुपजीवन्त्यमायया । अप्रमत्ताः क्रियावन्तः सुव्रताः सत्यवादिनः ।। १५ ।। संविभागं दमं शौचं सौहृदं च व्यपाश्रिताः । मम वैश्याः स्वकर्मस्था मामकान्तरमाविशः ।। १६ ।। मेरे राज्यके वैश्य भी अपने कर्मोंमें ही लगे रहते हैं। वे छल-कपट छोड़कर खेती, गोरक्षा और व्यापारसे जीविका चलाते हैं। प्रमादमें न पड़कर सदा सत्कर्मोंमें संलग्न रहते हैं। उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले और सत्यवादी हैं। अतिथियोंको देकर खाते हैं, इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं, शौचाचारका पालन करते और सबके प्रति सौहार्द बनाये रखते हैं तो भी मेरे भीतर तुम कैसे घुस आये? ।। १५-१६ ।।

त्रीन् वर्णानुपजीवन्ति यथावदनसूयकाः । मम शूद्राः स्वकर्मस्था मामकान्तरमाविशः ।। १७ ।। मेरे यहाँके शूद्र भी तीनों वर्णोंकी यथावत् सेवासे जीवन-निर्वाह करते हैं तथा परदोषदर्शनसे दूर ही रहते हैं। इस प्रकार वे भी अपने कर्मोंमें ही स्थित हैं, तथापि तुम मेरे भीतर कैसे घुस आये? ।। १७ ।।

कृपणानाथवृद्धानां दुर्बलातुरयोषिताम् । संविभक्तास्मि सर्वेषां मामकान्तरमाविशः ।। १८ ।। दीन, अनाथ, वृद्ध, दुर्बल, रोगी तथा स्त्री—इन सबको मैं अन्न-वस्त्र तथा औषध आदि आवश्यक वस्तुएँ देता रहता हूँ, तथापि तुम मेरे शरीरमें कैसे प्रविष्ट हो गये? ।। १८ ।।

कुलदेशादिधर्माणां प्रथितानां यथाविधि । अव्युच्छेत्तास्मि सर्वेषां मामकान्तरमाविशः ।। १९ ।। मैं अपने सुविख्यात कुल-धर्म, देश-धर्म तथा जाति-धर्मकी परम्पराका विधिपूर्वक पालन करता हुआ इन सब धर्मोंमेंसे किसीका भी लोप नहीं होने देता, तो भी तुम मेरे भीतर कैसे घुस आये? ।। १९ ।।

तपस्विनो मे विषये पूजिताः परिपालिताः ।