भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

इमे जना नरश्रेष्ठ प्रशंसन्ति सदा भुवि ।
धर्मस्य शीलमेवादौ ततो मे संशयो महान् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नरश्रेष्ठ! पितामह! भूमण्डलके ये सभी मनुष्य सर्वप्रथम धर्मके अनुरूप शीलकी ही अधिक प्रशंसा करते हैं; अतः इस विषयमें मुझे बड़ा भारी संदेह हो गया है ॥ १ ॥

यदि तच्छक्यमस्माभिर्ज्ञातुं धर्मभृतां वर ।
श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं यथैतदुपलभ्यते ॥ २ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! यदि मै उसे जान सकूँ तो जिस प्रकार शीलकी उपलब्धि होती है, वह सब सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥

कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत ।
किंलक्षणं च तत् प्रोक्तं ब्रूहि मे वदतां वर ॥ ३ ॥
भारत! वह शील कैसे प्राप्त होता है? यह सुननेकी मेरी बड़ी इच्छा है। वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! उसका क्या लक्षण बताया गया है? यह मुझसे कहिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

पुरा दुर्योधनेनेह धृतराष्ट्राय मानद ।
आख्यातं तप्यमानेन श्रियं दृष्ट्वा तथागताम् ॥ ४ ॥
इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह ।
सभायां चाह वचनं तत् सर्वं शृणु भारत ॥ ५ ॥
भवतस्तां सभां दृष्ट्वा समृद्धिं चाप्यनुत्तमाम् ।
दुर्योधनस्तदाऽऽसीनः सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**दूसरोंको मान देनेवाले महाराज! भरतनन्दन! पहले इन्द्रप्रस्थमें (राजसूययज्ञके समय) भाइयोंसहित तुम्हारी वैसी अद्भुत श्री-सम्पत्ति, वह परम उत्तम सभा और समृद्धि देखकर संतप्त हुए दुर्योधनने कौरवसभामें बैठकर पिता धृतराष्ट्रसे अपनी गहरी चिन्ता प्रकट की—सारी मनोव्यथा कह सुनायी। उसने सभामें जो बातें कही थीं, वह सब सुनो ॥