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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन

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चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

इमे जना नरश्रेष्ठ प्रशंसन्ति सदा भुवि ।
धर्मस्य शीलमेवादौ ततो मे संशयो महान् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नरश्रेष्ठ! पितामह! भूमण्डलके ये सभी मनुष्य सर्वप्रथम धर्मके अनुरूप शीलकी ही अधिक प्रशंसा करते हैं; अतः इस विषयमें मुझे बड़ा भारी संदेह हो गया है ॥ १ ॥

यदि तच्छक्यमस्माभिर्ज्ञातुं धर्मभृतां वर ।
श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं यथैतदुपलभ्यते ॥ २ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ! यदि मै उसे जान सकूँ तो जिस प्रकार शीलकी उपलब्धि होती है, वह सब सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥

कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत ।
किंलक्षणं च तत् प्रोक्तं ब्रूहि मे वदतां वर ॥ ३ ॥
भारत! वह शील कैसे प्राप्त होता है? यह सुननेकी मेरी बड़ी इच्छा है। वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! उसका क्या लक्षण बताया गया है? यह मुझसे कहिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

पुरा दुर्योधनेनेह धृतराष्ट्राय मानद ।
आख्यातं तप्यमानेन श्रियं दृष्ट्वा तथागताम् ॥ ४ ॥
इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह ।
सभायां चाह वचनं तत् सर्वं शृणु भारत ॥ ५ ॥
भवतस्तां सभां दृष्ट्वा समृद्धिं चाप्यनुत्तमाम् ।
दुर्योधनस्तदाऽऽसीनः सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**दूसरोंको मान देनेवाले महाराज! भरतनन्दन! पहले इन्द्रप्रस्थमें (राजसूययज्ञके समय) भाइयोंसहित तुम्हारी वैसी अद्भुत श्री-सम्पत्ति, वह परम उत्तम सभा और समृद्धि देखकर संतप्त हुए दुर्योधनने कौरवसभामें बैठकर पिता धृतराष्ट्रसे अपनी गहरी चिन्ता प्रकट की—सारी मनोव्यथा कह सुनायी। उसने सभामें जो बातें कही थीं, वह सब सुनो ॥

श्रुत्वा हि धृतराष्ट्रश्च दुर्योधनवचस्तदा ।
अब्रवीत् कर्णसहितं दुर्योधनमिदं वचः ॥ ७ ॥
उस समय धृतराष्ट्रने दुर्योधनकी बात सुनकर कर्णसहित उससे इस प्रकार कहा ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

किमर्थं तप्यसे पुत्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
श्रुत्वा त्वामनुनेष्यामि यदि सम्यग् भविष्यति ॥ ८ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**बेटा! तुम किसलिये संतप्त हो रहे हो? यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ, सुनकर यदि उचित होगा तो तुम्हें समझानेका प्रयत्न करूँगा ॥ ८ ॥

त्वया च महदैश्वर्यं प्राप्तं परपुरञ्जय ।
किंकरा भ्रातरः सर्वे मित्रसम्बन्धिनः सदा ॥ ९ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले वीर! तुमने भी तो महान् ऐश्वर्य प्राप्त किया है? तुम्हारे समस्त भाई, मित्र और सम्बन्धी सदा तुम्हारी सेवामें उपस्थित रहते हैं ॥

आच्छादयसि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम् ।
आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः ॥ १० ॥
तुम अच्छे-अच्छे वस्त्र ओढ़ते-पहनते हो, पिशितौदन खाते हो और 'आजानेय' अश्व (अरबी घोड़े) तुम्हारा रथ खींचते हैं, फिर तुम क्यों सफेद और दुबले हुए जाते हो? ॥ १० ॥

दुर्योधन उवाच

दश तानि सहस्राणि स्नातकानां महात्मनाम् ।
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ॥ ११ ॥
**दुर्योधनने कहा—**पिताजी! युधिष्ठिरके महलमें दस हजार महामनस्वी स्नातक ब्राह्मण प्रतिदिन सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ॥ ११ ॥

दृष्ट्वा च तां सभां दिव्यां दिव्यपुष्पफलान्विताम् ।
अश्वांस्तित्तिरकल्माषान् वस्त्राणि विविधानि च ॥ १२ ॥
दृष्ट्वा तां पाण्डवेयानामृद्धिं वैश्रवणीं शुभाम् ।
अमित्राणां सुमहतीमनुशोचामि भारत ॥ १३ ॥
भारत! दिव्य फल-फूलोंसे सुशोभित वह दिव्य सभा, वे तीतरके समान रंगवाले चितकबरे घोड़े और वे भाँति-भाँतिके दिव्य वस्त्र (अपने पास कहाँ हैं? वह सब) देखकर अपने शत्रु पाण्डवोंके उस कुबेरके समान शुभ एवं विशाल ऐश्वर्यका अवलोकन करके मैं निरन्तर शोकमें डूबा जा रहा हूँ ॥ १२-१३ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

यदीच्छसि श्रियं तात यादृशी सा युधिष्ठिरे । विशिष्टां वा नरव्याघ्र शीलवान् भव पुत्रक ॥ १४ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**तात! पुरुषसिंह! बेटा! युधिष्ठिरके पास जैसी सम्पत्ति है, वैसी या उससे भी बढ़कर राजलक्ष्मीको यदि तुम पाना चाहते हो तो शीलवान् बनो ॥ १४ ॥ शीलेन हि त्रयो लोकाः शक्या जेतुं न संशयः । न हि किंचिदसाध्यं वै लोके शीलवतां भवेत् ॥ १५ ॥ इसमें संशय नहीं है कि शीलके द्वारा तीनों लोकोंपर विजय पायी जा सकती है। शीलवानोंके लिये संसारमें कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १५ ॥ एकरात्रेण मान्धाता त्र्यहेण जनमेजयः । सप्तरात्रेण नाभागः पृथिवीं प्रतिपेदिरे ॥ १६ ॥ मान्धाताने एक ही दिनमें, जनमेजयने तीन ही दिनोंमें और नाभागने सात दिनोंमें ही इस पृथिवीका राज्य प्राप्त किया था ॥ १६ ॥ एते हि पार्थिवाः सर्वे शीलवन्तो दयान्विताः । अतस्तेषां गुणक्रीता वसुधा स्वयमागता ॥ १७ ॥ ये सभी राजा शीलवान् और दयालु थे। अतः उनके द्वारा गुणोंके मोल खरीदी हुई यह पृथ्वी स्वयं ही उनके पास आयी थी ॥ १७ ॥

दुर्योधन उवाच

कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत । येन शीलेन तैः प्राप्ता क्षिप्रमेव वसुन्धरा ॥ १८ ॥ **दुर्योधनने पूछा—**भारत! जिसके द्वारा उन राजाओंने शीघ्र ही भूमण्डलका राज्य प्राप्त कर लिया, वह शील कैसे प्राप्त होता है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १८ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदेन पुरा प्रोक्तं शीलमाश्रित्य भारत ॥ १९ ॥ **धृतराष्ट्र बोले—**भरतनन्दन! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसे नारदजीने पहले शीलके प्रसंगमें कहा था ॥ १९ ॥ प्रह्लादेन हृतं राज्यं महेन्द्रस्य महात्मनः । शीलमाश्रित्य दैत्येन त्रैलोक्यं च वशे कृतम् ॥ २० ॥ दैत्यराज प्रह्लादने शीलका ही आश्रय लेकर महामना महेन्द्रका राज्य हर लिया और तीनों लोकोंको भी अपने वशमें कर लिया ॥ २० ॥ ततो बृहस्पतिं शक्रः प्राञ्जलिः समुपस्थितः । तमुवाच महाप्राज्ञः श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥ २१ ॥

तब महाबुद्धिमान् इन्द्र हाथ जोड़कर बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हुए और उनसे बोले—‘भगवन्! मैं अपने कल्याणका उपाय जानना चाहता हूँ’ ॥ २१ ॥
ततो बृहस्पतिस्तस्मै ज्ञानं नैःश्रेयसं परम् ।
कथयामास भगवान् देवेन्द्राय कुरूद्वह ॥ २२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तब भगवान् बृहस्पतिने उन देवेन्द्रको कल्याणकारी परम ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २२ ॥
एतावच्छ्रेय इत्येव बृहस्पतिरभाषत ।
इन्द्रस्तु भूयः पप्रच्छ को विशेषो भवेदिति ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् इतना ही श्रेय (कल्याणका उपाय) है, ऐसा बृहस्पतिने कहा। तब इन्द्रने फिर पूछा—‘इससे विशेष वस्तु क्या है?’ ॥ २३ ॥

बृहस्पतिरुवाच
विशेषोऽस्ति महांस्तात भार्गवस्य महात्मनः ।
अत्रागमय भद्रं ते भूय एव सुरर्षभ ॥ २४ ॥
बृहस्पतिने कहा— तात! सुरश्रेष्ठ! इससे भी विशेष महत्त्वपूर्ण वस्तुका ज्ञान महात्मा शुक्राचार्यको है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम उन्हींके पास जाकर पुनः उस वस्तुका ज्ञान प्राप्त करो ॥ २४ ॥
आत्मनस्तु ततः श्रेयो भार्गवात् सुमहातपाः ।
ज्ञानमागमयत् प्रीत्या पुनः स परमद्युतिः ॥ २५ ॥
तब परम तेजस्वी महातपस्वी इन्द्रने प्रसन्नता-पूर्वक शुक्राचार्यसे पुनः अपने लिये श्रेयका ज्ञान प्राप्त किया ॥ २५ ॥
तेनापि समनुज्ञातो भार्गवेण महात्मना ।
श्रेयोऽस्तीति पुनर्भूयः शुक्रम्राह शतक्रतुः ॥ २६ ॥
महात्मा भार्गवने जब उन्हें उपदेश दे दिया, तब इन्द्रने पुनः शुक्राचार्यसे पूछा—‘क्या इससे भी विशेष श्रेय है’? ॥ २६ ॥
भार्गवस्त्वाह सर्वज्ञः प्रह्लादस्य महात्मनः ।
ज्ञानमस्ति विशेषेणेत्युक्तो हृष्टश्च सोऽभवत् ॥ २७ ॥
तब सर्वज्ञ शुक्राचार्यने कहा— ‘महात्मा प्रह्लादको इससे विशेष श्रेयका ज्ञान है।’ यह सुनकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए ॥ २७ ॥
स ततो ब्राह्मणो भूत्वा प्रह्लादं पाकशासनः ।
गत्वा प्रोवाच मेधावी श्रेय इच्छामि वेदितुम् ॥ २८ ॥
तदनन्तर बुद्धिमान् इन्द्र ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रह्लादके पास गये और बोले—‘राजन्! मैं श्रेय जानना चाहता हूँ’ ॥ २८ ॥

प्रह्लादस्त्वब्रवीद् विप्रं क्षणो नास्ति द्विजर्षभ । त्रैलोक्यराज्यसक्तस्य ततो नोपदिशामि ते ॥ २९ ॥ प्रह्लादने ब्राह्मणसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! त्रिलोकीके राज्यकी व्यवस्थामें व्यस्त रहनेके कारण मेरे पास समय नहीं है, अतः मैं आपको उपदेश नहीं दे सकूँगा’ ॥ २९ ॥

ब्राह्मणस्त्वब्रवीद् राजन् यस्मिन् काले क्षणो भवेत् । तदोपदेष्टुमिच्छामि यदाचर्यमनुत्तमम् ॥ ३० ॥ यह सुनकर ब्राह्मणने कहा—‘राजन्! जब आपको अवसर मिले, उसी समय मैं आपसे सर्वोत्तम आचरणीय धर्मका उपदेश ग्रहण करना चाहता हूँ’ ॥ ३० ॥

ततः प्रीतोऽभवद् राजा प्रह्लादो ब्रह्मवादिनः । तथेत्युक्त्वा शुभे काले ज्ञानतत्त्वं ददौ तदा ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणकी इस बातसे राजा प्रह्लादको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ‘तथास्तु’ कहकर उसकी बात मान ली और शुभ समयमें उसे ज्ञानका तत्त्व प्रदान किया ॥

ब्राह्मणोऽपि यथान्यायं गुरुवृत्तिमनुत्तमाम् । चकार सर्वभावेन यदस्य मनसेप्सितम् ॥ ३२ ॥ ब्राह्मणने भी उनके प्रति यथायोग्य परम उत्तम गुरु-भक्तिपूर्ण बर्ताव किया और उनके मनकी रुचिके अनुसार सब प्रकारसे उनकी सेवा की ॥ ३२ ॥

पृष्टश्च तेन बहुशः प्राप्तं कथमनुत्तमम् । त्रैलोक्यराज्यं धर्मज्ञ कारणं तद् ब्रवीहि मे । प्रह्लादोऽपि महाराज ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणने प्रह्लादसे बारंबार पूछा—‘धर्मज्ञ! आपको यह त्रिलोकीका उत्तम राज्य कैसे प्राप्त हुआ? इसका कारण मुझे बताइये। महाराज! तब प्रह्लाद भी ब्राह्मणसे इस प्रकार बोले— ॥ ३३ ॥

प्रह्लाद उवाच

नासूयामि द्विजान् विप्र राजास्मीति कदाचन । काव्यानि वदतां तेषां संयच्छामि वहामि च ॥ ३४ ॥ **प्रह्लादने कहा—**विप्रवर! ‘मैं राजा हूँ’ इस अभिमानमें आकर कभी ब्राह्मणोंकी निन्दा नहीं करता; बल्कि जब वे मुझे शुक्रनीतिका उपदेश करते हैं, तब मैं संयमपूर्वक उनकी बातें सुनता हूँ और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करता हूँ ॥ ३४ ॥

ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते संयच्छन्ति च मां सदा । ते मां काव्यपथे युक्तं शुश्रूषुमनसूयकम् ॥ ३५ ॥ धर्मात्मानं जितक्रोधं नियतं संयतेन्द्रियम् । समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥ ३६ ॥

वे ब्राह्मण विश्वस्त होकर मुझे नीतिका उपदेश देते और सदा संयममें रखते हैं। मैं सदा ही यथाशक्ति शुक्राचार्यके बताये हुए नीतिमार्गपर चलता, ब्राह्मणोंकी सेवा करता, किसीके दोष नहीं देखता और धर्ममें मन लगाता हूँ। क्रोधको जीतकर मन और इन्द्रियोंको काबूमें किये रहता हूँ। अतः जैसे मधुकी मक्खियाँ शहदके छत्तेको फूलोंके रससे सींचती रहती हैं, उसी प्रकार उपदेश देनेवाले ब्राह्मण मुझे शास्त्रके अमृतमय वचनोंसे सींचा करते हैं॥ ३५-३६॥

सोऽहं वागग्रविद्यानां रसानामवलेहिता ।
स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥ ३७ ॥
मैं उनकी नीति-विद्याओंके रसका आस्वादन करता हूँ और जैसे चन्द्रमा नक्षत्रोंपर शासन करते हैं, उसी प्रकार मैं भी अपनी जातिवालोंपर राज्य करता हूँ॥

एतत् पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् ।
यद् ब्राह्मणमुखे काव्यमेतच्छ्रुत्वा प्रवर्त्तते ॥ ३८ ॥
ब्राह्मणके मुखमें जो शुक्राचार्यका नीतिवाक्य है, यही इस भूतपर अमृत है, यही सर्वोत्तम नेत्र है। राजा इसे सुनकर इसीके अनुसार बर्ताव करे॥ ३८ ॥

एतावच्छ्रेय इत्याह प्रह्लादो ब्रह्मवादिनम् ।
शुश्रूषितस्तेन तदा दैत्येन्द्रो वाक्यमब्रवीत् ॥ ३९ ॥
इतना ही श्रेय है, यह बात प्रह्लादने उस ब्रह्मवादी ब्राह्मणसे कहा। इसके बाद भी उसके सेवा-शुश्रूषा करनेपर दैत्यराजने उससे यह बात कही—॥ ३९ ॥

यथावद् गुरुवृत्त्या ते प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते प्रदातास्मि न संशयः ॥ ४० ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हारे द्वारा की हुई यथोचित गुरुसेवासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। मैं उसे दूँगा। इसमें संशय नहीं है’॥ ४० ॥

कृतमित्येव दैत्येन्द्रमुवाच स च वै द्विजः ।
प्रह्लादस्त्वब्रवीत् प्रीतो गृह्यतां वर इत्युत ॥ ४१ ॥
तब उस ब्राह्मणने दैत्यराजसे कहा—‘आपने मेरी सारी अभिलाषा पूर्ण कर दी’। यह सुनकर प्रह्लाद और भी प्रसन्न हुए और बोले—‘कोई वर अवश्य माँगो’॥ ४१ ॥

ब्राह्मण उवाच

यदि राजन् प्रसन्नस्त्वं मम चेदिच्छसि प्रियम् ।
भवतः शीलमिच्छामि प्राप्तुमेष वरो मम ॥ ४२ ॥
**ब्राह्मण बोला—**राजन्! यदि आप प्रसन्न हैं और मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे आपका ही शील प्राप्त करनेकी इच्छा है, यही मेरा वर है॥ ४२ ॥

ततः प्रीतस्तु दैत्येन्द्रो भयमस्याभवन्महत् ।

वरे प्रदिष्टे विप्रेण नाल्पतेजायमित्युत ॥ ४३ ॥
यह सुनकर दैत्यराज प्रह्लाद प्रसन्न तो हुए; परंतु उनके मनमें बड़ा भारी भय समा गया। ब्राह्मणके वर माँगनेपर वे सोचने लगे कि यह कोई साधारण तेजवाला पुरुष नहीं है ॥ ४३ ॥

एवमस्त्विति स प्राह प्रह्लादो विस्मितस्तदा ।
उपाकृत्य तु विप्राय वरं दुःखान्वितोऽभवत् ॥ ४४ ॥
फिर भी ‘एवमस्तु’ कहकर प्रह्लादने वह वर दे दिया। उस समय उन्हें बड़ा विस्मय हो रहा था। ब्राह्मणको वह वर देकर वे बहुत दुखी हो गये ॥ ४४ ॥

दत्ते वरे गते विप्रे चिन्ताऽऽसीन्महती तदा ।
प्रह्लादस्य महाराज निश्चयं न च जग्मिवान् ॥ ४५ ॥
महाराज! वर देनेके पश्चात् जब ब्राह्मण चला गया, तब प्रह्लादको बड़ी भारी चिन्ता हुई। वे सोचने लगे—क्या करना चाहिये? परंतु किसी निश्चयपर पहुँच न सके ॥ ४५ ॥

तस्य चिन्तयतस्तावच्छायाभूतं महाद्युति ।
तेजो विग्रहवत् तात शरीरमजहात् तदा ॥ ४६ ॥
तात! वे चिन्ता कर ही रहे थे कि उनके शरीरसे परम कान्तिमान् छायामय तेज मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ। उसने उनके शरीरको त्याग दिया था ॥ ४६ ॥

तमपृच्छन्महाकायं प्रह्लादः को भवानिति ।
प्रत्याहतं तु शीलोऽस्मि त्यक्तो गच्छाम्यहं त्वया ॥ ४७ ॥
प्रह्लादने उस विशालकाय पुरुषसे पूछा—‘आप कौन हैं?’ उसने उत्तर दिया—‘मैं शील हूँ। तुमने मुझे त्याग दिया है, इसलिये मैं जा रहा हूँ’ ॥ ४७ ॥

तस्मिन् द्विजोत्तमे राजन् वत्स्याम्यहमनिन्दिते ।
योऽसौ शिष्यत्वमागम्य त्वयि नित्यं समाहितः ॥ ४८ ॥
‘राजन्! अब मैं उस अनिन्दित श्रेष्ठ ब्राह्मणके शरीरमें निवास करूँगा, जो प्रतिदिन तुम्हारा शिष्य बनकर यहाँ बड़ी सावधानीके साथ रहता था’ ॥ ४८ ॥

इत्युक्त्वान्तर्हितं तद् वै शक्रं चान्वाविशत् प्रभो ।
तस्मिंस्तेजसि याते तु तादृग्रूपस्ततोऽपरः ॥ ४९ ॥
शरीरान्निःसृतस्तस्य को भवानिति चाब्रवीत् ।
धर्मं प्रह्लाद मां विद्धि यत्रासौ द्विजसत्तमः ॥ ५० ॥
तत्र यास्यामि दैत्येन्द्र यतः शीलं ततो ह्यहम् ।
प्रभो! ऐसा कहकर शील अदृश्य हो गया और इन्द्रके शरीरमें समा गया। उस तेजके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे दूसरा वैसा ही तेज प्रकट हुआ। प्रह्लादने पूछा—‘आप कौन हैं?’ उसने उत्तर दिया—‘प्रह्लाद! मुझे धर्म समझो। जहाँ वह श्रेष्ठ ब्राह्मण है, वहीं जाऊँगा। दैत्यराज! जहाँ शील होता है, वहीं मैं भी रहता हूँ’ ॥ ४९-५० ½ ॥

ततोऽपरो महाराज प्रज्वलन्निव तेजसा ।। ५१ ।। शरीरान्निःसृतस्तस्य प्रह्लादस्य महात्मनः । महाराज! तदनन्तर महात्मा प्रह्लादके शरीरसे एक तीसरा पुरुष प्रकट हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था ।। ५१ १/२ ।।

को भवानिति पृष्टश्च तमाह स महाद्युतिः ।। ५२ ।। सत्यं विद्ध्यसुरेन्द्राद्य प्रयास्ये धर्ममन्वहम् । 'आप कौन हैं?' यह प्रश्न होनेपर उस महातेजस्वीने उन्हें उत्तर दिया—'असुरेन्द्र! मुझे सत्य समझो! मैं अब धर्मके पीछे-पीछे जाऊँगा' ।। ५२ १/२ ।।

तस्मिन्ननुगते सत्ये महान् वै पुरुषोऽपरः ।। ५३ ।। निष्चक्राम ततस्तस्मात् पृष्टश्चाह महाबलः । वृत्तं प्रह्लाद मां विद्धि यतः सत्यं ततो ह्यहम् ।। ५४ ।। सत्यके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे दूसरा महापुरुष प्रकट हुआ। परिचय पूछनेपर उस महाबलीने उत्तर दिया—प्रह्लाद! मुझे सदाचार समझो। जहाँ सत्य होता है, वहीं मैं भी रहता हूँ ।। ५३-५४ ।।

तस्मिन् गते महाशब्दः शरीरात् तस्य निर्ययौ । पृष्टश्चाह बलं विद्धि यतो वृत्तमहं ततः ।। ५५ ।। उसके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे महान् शब्द करता हुआ पुनः एक पुरुष प्रकट हुआ। उसने पूछनेपर बताया—'मुझे बल समझो। जहाँ सदाचार होता है, वहीं मेरा भी स्थान है' ।। ५५ ।।

इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र यतो वृत्तं नराधिप । ततः प्रभामयी देवी शरीरात् तस्य निर्ययौ ।। ५६ ।। तामपृच्छत् स दैत्येन्द्रः सा श्रीरित्येनमब्रवीत् । उषितास्मि स्वयं वीर त्वयि सत्यपराक्रम ।। ५७ ।। त्वया त्यक्ता गमिष्यामि बलं ह्यनुगता ह्यहम् । नरेश्वर! ऐसा कहकर बल सदाचारके पीछे चला गया। तत्पश्चात् प्रह्लादके शरीरसे एक प्रभामयी देवी प्रकट हुई। दैत्यराजने उससे पूछा—'आप कौन हैं?' वह बोली—'मैं लक्ष्मी हूँ। सत्यपराक्रमी वीर! मैं स्वयं ही आकर तुम्हारे शरीरमें निवास करती थी, परंतु अब तुमने मुझे त्याग दिया; इसलिये चली जाऊँगी; क्योंकि मैं बलकी अनुगामिनी हूँ' ।। ५६-५७ १/२ ।।

ततो भयं प्रादुरासीत् प्रह्लादस्य महात्मनः ।। ५८ ।। अपृच्छत् स ततो भूयः क्व यासि कमलालये । त्वं हि सत्यव्रता देवी लोकस्य परमेश्वरी । कश्चासौ ब्राह्मणश्रेष्ठस्तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।। ५९ ।।

तब महात्मा प्रह्लादको बड़ा भय हुआ। उन्होंने पुनः पूछा—'कमलालये! तुम कहाँ जा रही हो, तुम तो सत्यव्रता देवी और सम्पूर्ण जगत्की परमेश्वरी हो। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? यह मैं ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ' ।। ५८-५९ ।।

श्रीरुवाच

स शक्रो ब्रह्मचारी यस्त्वत्तश्चैवोपशिक्षितः ।
त्रैलोक्ये ते यदैश्वर्यं तत् तेनापहृतं प्रभो ।। ६० ।।
लक्ष्मीने कहा— प्रभो! तुमने जिसे उपदेश दिया है, उस ब्रह्मचारी ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् इन्द्र थे। तीनों लोकोंमें जो तुम्हारा ऐश्वर्य फैला हुआ था, वह उन्होंने हर लिया ।। ६० ।।
शीलेन हि त्रयो लोकास्त्वया धर्मज्ञ निर्जिताः ।
तद्विज्ञाय सुरेन्द्रेण तव शीलं हृतं प्रभो ।। ६१ ।।
धर्मज्ञ! तुमने शीलके द्वारा ही तीनों लोकोंपर विजय पायी थी। प्रभो! यह जानकर ही सुरेन्द्रने तुम्हारे शीलका अपहरण कर लिया है ।। ६१ ।।
धर्मः सत्यं तथा वृत्तं बलं चैव तथाप्यहम् ।
शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशयः ।। ६२ ।।
महाप्राज्ञ! धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं (लक्ष्मी)—ये सब सदा शीलके ही आधारपर रहते हैं—शील ही इन सबकी जड़ है। इसमे संशय नहीं है ।। ६२ ।।

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा गता श्रीस्तु ते च सर्वे युधिष्ठिर ।
दुर्योधनस्तु पितरं भूय एवाब्रवीद् वचः ।। ६३ ।।
शीलस्य तत्त्वमिच्छामि वेत्तुं कौरवनन्दन ।
प्राप्यते च यथा शीलं तं चोपायं वदस्व मे ।। ६४ ।।
भीष्मजी कहते हैं— 'युधिष्ठिर! यों कहकर लक्ष्मी तथा वे शील आदि समस्त सद्गुण इन्द्रके पास चले गये। इस कथाको सुनकर दुर्योधनने पुनः अपने पितासे कहा—'कौरवनन्दन! मैं शीलका तत्त्व जानना चाहता हूँ। शील जिस तरह प्राप्त हो सके, वह उपाय भी मुझे बताइये' ।। ६३-६४ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

सोपायं पूर्वमुद्दिष्टं प्रह्रादेन महात्मना ।
संक्षेपेण तु शीलस्य शृणु प्राप्तिं नरेश्वर ।। ६५ ।।
धृतराष्ट्रने कहा— नरेश्वर! शीलका स्वरूप और उसे पानेका उपाय—ये दोनों बातें महात्मा प्रह्लादने पहले ही बतायी हैं। मैं संक्षेपसे शीलकी प्राप्तिका उपायमात्र बता रहा हूँ,

ध्यान देकर सुनो ।। ६५ ।।
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ।। ६६ ।।
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दया करना और यथाशक्ति दान देना—यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं ।। ६६ ।।
यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम् ।
अपत्रपेत वा येन न तत् कुर्यात् कथंचन ।। ६७ ।।
अपना जो भी पुरुषार्थ और कर्म दूसरोंके लिये हितकर न हो अथवा जिसे करनेमें संकोचका अनुभव होता हो, उसे किसी तरह नहीं करना चाहिये ।। ६७ ।।
तत्तु कर्म तथा कुर्याद् येन श्लाघ्येत संसदि ।
शीलं समासेनेतत् ते कथितं कुरुसत्तम ।। ६८ ।।
जो कर्म जिस प्रकार करनेसे भरी सभामें मनुष्यकी प्रशंसा हो, उसे उसी प्रकार करना चाहिये। कुरुश्रेष्ठ! यह तुम्हें थोड़ेमें शीलका स्वरूप बताया गया है ।। ६८ ।।
यद्यप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति श्रियं क्वचित् ।
न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च न सन्ति ते ।। ६९ ।।
तात! नरेश्वर! यद्यपि कहीं-कहीं शीलहीन मनुष्य भी राजलक्ष्मीको प्राप्त कर लेते हैं, तथापि वे चिरकालतक उसका उपभोग नहीं कर पाते और जड़मूलसहित नष्ट हो जाते हैं ।। ६९ ।।
एतद् विदित्वा तत्त्वेन शीलवान् भव पुत्रक ।
यदिच्छसि श्रियं तात सुविशिष्टां युधिष्ठिरात् ।। ७० ।।
बेटा! यदि तुम युधिष्ठिरसे भी अच्छी सम्पत्ति प्राप्त करना चाहो तो इस उपदेशको यथार्थरूपसे समझकर शीलवान् बनो ।। ७० ।।

भीष्म उवाच

एतत् कथितवान् पुत्रे धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
एतत् कुरुष्व कौन्तेय ततः प्राप्स्यसि तत् फलम् ।। ७१ ।।
भीष्मजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! राजा धृतराष्ट्रने अपने पुत्रको यह उपदेश दिया था। तुम भी इसका आचरण करो, इससे तुम्हें भी वही फल प्राप्त होगा ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि शीलवर्णनं नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें शीलवर्णनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।।

१२५-

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना

युधिष्ठिर उवाच

शीलं प्रधानं पुरुषे कथितं ते पितामह ।
कथं त्वाशा समुत्पन्ना या चाशा तद् वदस्व मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने पुरुषमें शीलको ही प्रधान बताया है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आशाकी उत्पत्ति कैसे हुई? आशा क्या है? यह भी मुझे बताइये ॥ १ ॥

संशयो मे महानेष समुत्पन्नः पितामह ।
छेत्ता च तस्य नान्योऽस्ति त्वत्तः परपुरञ्जय ॥ २ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले पितामह! मेरे मनमें यह महान् संशय उत्पन्न हुआ है। इसका निवारण करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ २ ॥

पितामहाशा महती ममासीद्धि सुयोधने ।
प्राप्ते युद्धे तु तद् युक्तं तत् कर्तार्यमिति प्रभो ॥ ३ ॥
पितामह! दुर्योधनपर मेरी बड़ी भारी आशा थी कि युद्धका अवसर उपस्थित होनेपर वह उचित कार्य करेगा। प्रभो! मैं समझता था कि वह युद्ध किये बिना ही मुझे आधा राज्य लौटा देगा ॥ ३ ॥

सर्वस्याशा सुमहती पुरुषस्योपजायते ।
तस्यां विहन्यमानायां दुःखो मृत्युर्न संशयः ॥ ४ ॥
प्रायः सभी मनुष्योंके हृदयमें कोई-न-कोई बड़ी आशा पैदा होती ही है। उसके भंग होनेपर महान् दुःख होता है। किसी-किसीकी मृत्यूतक हो जाती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥

सोऽहं हताशो दुर्बुद्धिः कृतस्तेन दुरात्मना ।
धार्तराष्ट्रेण राजेन्द्र पश्य मन्दात्मतां मम ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! उस दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रने मुझ दुर्बुद्धिको हताश कर दिया। देखिये, मैं कैसा मन्दभाग्य हूँ ॥ ५ ॥

आशां महत्तरां मन्ये पर्वतादपि सद्रुमात् ।
आकाशादपि वा राजन्नप्रमेयैव वा पुनः ॥ ६ ॥

राजन्! मैं आशाको वृक्षसहित पर्वतसे भी बहुत बड़ी मानता हूँ अथवा वह आकाशसे भी बढ़कर अप्रमेय है ।। एषा चैव कुरुश्रेष्ठ दुर्विचिन्त्या सुदुर्लभा । दुर्लभत्वाच्च पश्यामि किमन्यद् दुर्लभं ततः ।। ७ ।। कुरुश्रेष्ठ! वह अचिन्त्य और परम दुर्लभ है—उसे जीतना कठिन है। उसके दुर्लभ या दुर्जय होनेके कारण ही मैं उसे इतनी बड़ी देखता और समझता हूँ। भला, आशासे बढ़कर दुर्लभ और क्या है? ।। ७ ।।

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि युधिष्ठिर निबोध तत् । इतिहासं सुमित्रस्य निर्वृत्तमृषभस्य च ।। ८ ।। भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें मैं राजा सुमित्र तथा ऋषभ मुनिका पूर्वघटित इतिहास तुम्हें बताऊँगा। उसे ध्यान देकर सुनो ।। ८ ।। सुमित्रो नाम राजर्षिर्हैहयो मृगयां गतः । ससार स मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा ।। ९ ।। राजर्षि सुमित्र हैहयवंशी राजा थे। एक दिन वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ उन्होंने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे एक मृगको घायल करके उसका पीछा करना आरम्भ किया ।। ९ ।। स मृगो बाणमादाय ययावमितविक्रमः । स च राजा बलात् तूर्णं ससार मृगयूथपम् ।। १० ।। वह मृग बहुत तेज दौड़नेवाला था। वह राजाका बाण लिये-दिये भाग निकला। राजाने भी बलपूर्वक मृगोंके उस यूथपतिका तुरंत पीछा किया ।। १० ।। ततो निम्नं स्थलं चैव स मृगोऽद्रवदाशुगः । मुहूर्तमिव राजेन्द्र समेन स पथागमत् ।। ११ ।। राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक भागनेवाला वह मृग वहाँसे नीची भूमिकी ओर दौड़ा। फिर दो ही घड़ीमें वह समतल मार्गसे भागने लगा ।। ११ ।। ततः स राजा तारुण्यादौरसेन बलेन च । ससार बाणासनभृत् सखड्गोऽसौ तनुत्रवान् ।। १२ ।। राजा भी नौजवान और हार्दिक बलसे सम्पन्न थे, उन्होंने कवच बाँध रखा था। वे धनुष-बाण और तलवार लिये उसका पीछा करने लगे ।। १२ ।। ततो नदान् नदींश्चैव पल्वलानि वनानि च । अतिक्रम्याभ्यतिक्रम्य ससारैको वनेचरः ।। १३ ।।

उधर वह वनमें विचरनेवाला मृग अकेला ही अनेकों नदों, नदियों, गड्डों और जंगलोंको बारंबार लाँघता हुआ आगे-आगे भागता जा रहा था ॥ १३ ॥

स तु कामान्मृगो राजन्नासाद्यासाद्य तं नृपम् । पुनरभ्येति जवनो जवेन महता ततः ॥ १४ ॥ राजन्! वह वेगशाली मृग अपनी इच्छासे ही राजाके निकट आ-आकर पुनः बड़े वेगसे आगे भागता था ॥ १४ ॥

स तस्य बाणैर्बहुभिः समभ्यस्तो वनेचरः । प्रक्रीडन्निव राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ॥ १५ ॥ राजेन्द्र! यद्यपि राजाके बहुत-से बाण उसके शरीरमें धँस गये थे, तथापि वह वनचारी मृग खेल करता हुआ-सा बारंबार उनके निकट आ जाता था ॥ १५ ॥

पुनश्चजवमास्थाय जवनो मृगयूथपः । अतीत्यातीत्य राजेन्द्र पुनरभ्येति चान्तिकम् ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! वह मृगसमूहोंका सरदार था। उसका वेग बड़ा तीव्र था। वह बारंबार बड़े वेगसे छलाँग मारता और दूरतककी भूमि लाँघ-लाँघकर पुनः निकट आ जाता था ॥ १६ ॥

तस्य मर्मच्छिदं घोरं तीक्ष्णं चामित्रकर्शनः । समादाय शरं श्रेष्ठं कार्मुके तु तथासृजत् ॥ १७ ॥ तब शत्रुसूदन नरेशने एक बड़ा भयंकर तीखा बाण हाथमें लिया, जो मर्मस्थलोंको विदीर्ण कर देनेवाला था। उस श्रेष्ठ बाणको उन्होंने धनुषपर रखा ॥ १७ ॥

ततो गव्यूतिमात्रेण मृगयूथपयूथपः । तस्य बाणपथं मुक्त्वा तस्थिवान् प्रहसन्निव ॥ १८ ॥ यह देख मृगोंका वह यूथपति राजाके बाणका मार्ग छोड़कर दो कोस दूर जा पहुँचा और हँसता हुआ-सा खड़ा हो गया ॥ १८ ॥

तस्मिन् निपतिते बाणे भूमौ ज्वलिततेजसि । प्रविवेश महारण्यं मृगो राजाप्यथाद्रवत् ॥ १९ ॥ जब राजाका वह तेजस्वी बाण पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब मृग एक महान् वनमें घुस गया, राजाने उस समय भी उसका पीछा नहीं छोड़ा ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥

१२६-

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षड्‌विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना

भीष्म उवाच

प्रविश्य स महारण्यं तापसानामथाश्रमम् ।
आससाद ततो राजा श्रान्तश्चोपाविशत् तदा ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस महान् वनमें प्रवेश करके राजा सुमित्र तापसोंके आश्रमपर जा पहुँचे और वहाँ थककर बैठ गये ॥ १ ॥

तं कार्मुकधरं दृष्ट्वा श्रमार्तं क्षुधितं तदा ।
समेत्य ऋषयस्तस्मिन् पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥ २ ॥
वे परिश्रमसे पीड़ित और भूखसे व्याकुल हो रहे थे। उस अवस्थामें धनुष धारण किये राजा सुमित्रको देखकर बहुत-से ऋषि उनके पास आये और सबने मिलकर उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया ॥ २ ॥

स पूजामृषिभिर्दत्तां सम्प्रगृह्य नराधिपः ।
अपृच्छत् तापसान् सर्वांस्तपसो वृद्धिमुत्तमाम् ॥ ३ ॥
ऋषियोंद्वारा किये गये उस स्वागत-सत्कारको ग्रहण करके राजाने भी उन सब तापसोंसे उनकी तपस्याकी भलीभाँति वृद्धि होनेका समाचार पूछा ॥ ३ ॥

ते तस्य राज्ञो वचनं सम्प्रगृह्य तपोधनाः ।
ऋषयो राजशार्दूलं तमपृच्छन् प्रयोजनम् ॥ ४ ॥
उन तपस्याके धनी महर्षियोंने राजाके वचनोंको सादर ग्रहण करके उन नृपश्रेष्ठके वहाँ आनेका प्रयोजन पूछा ॥ ४ ॥

केन भद्र सुखार्थेन सम्प्राप्तोऽसि तपोवनम् ।
पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशो धन्वी बाणी नरेश्वर ॥ ५ ॥
‘कल्याणस्वरूप नरेश्वर! किस सुखके लिये आप इस तपोवनमें तलवार बाँधे धनुष और बाण लिये पैदल ही चले आये हैं? ॥ ५ ॥

एतदिच्छामहे श्रोतुं कुतः प्राप्तोऽसि मानद ।
कस्मिन् कुले तु जातस्त्वं किंनामा चासि ब्रूहि नः ॥ ६ ॥
‘मानद! हम यह सब सुनना चाहते हैं, आप कहाँसे पधारे हैं? किस कुलमें आपका जन्म हुआ है? तथा आपका नाम क्या है? ये सारी बातें हमें बताइये’ ॥

ततः स राजा सर्वेभ्यो द्विजेभ्यः पुरुषर्षभ ।

आचचक्षे यथान्यायं परिचर्यां च भारत ॥ ७ ॥
पुरुषप्रवर भरतनन्दन! तदनन्तर राजा सुमित्रने उन समस्त ब्राह्मणोंसे यथोचित बात कही और अपना कार्यक्रम बताया— ॥ ७ ॥
हैहयानां कुले जातः सुमित्रो मित्रनन्दनः ।
चरामि मृगयूथानि निघ्नन् बाणैः सहस्रशः ॥ ८ ॥
‘तपोधनो! मेरा जन्म हैहय-कुलमें हुआ है। मैं मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाला राजा सुमित्र हूँ और सहस्रों बाणोंके आघातसे मृग-समूहोंका विनाश करता हुआ विचर रहा हूँ ॥ ८ ॥
बलेन महता गुप्तः सामात्यः सावरोधनः ।
मृगस्तु विद्धो बाणेन मया सरति शल्यवान् ॥ ९ ॥
‘मेरे साथ बहुत बड़ी सेना थी। उसके द्वारा सुरक्षित हो मैं मन्त्री और अन्तःपुरके साथ आया था, परंतु मेरे बाणोंसे घायल हुआ एक मृग बाणसहित इधर ही भाग निकला ॥ ९ ॥
तं द्रवन्तमनुप्राप्तो वनमेतद् यदृच्छया ।
भवत्सकाशं नष्टश्रीर्हताशः श्रमकर्शितः ॥ १० ॥
‘उस भागते हुए मृगके पीछे मैं अकस्मात् इस वनमें आपलोगोंके समीप आ पहुँचा हूँ। मेरी सारी शोभा नष्ट हो गयी है। मैं हताश होकर भारी परिश्रमसे कष्ट पा रहा हूँ ॥ १० ॥
किं नु दुःखमतोऽन्यद् वै यदहं श्रमकर्शितः ।
भवतामाश्रमं प्राप्तो हताशो भ्रष्टलक्षणः ॥ ११ ॥
‘मैंने परिश्रमके कारण जो इतना कष्ट पाया है और अपने राजचिह्नोंसे भ्रष्ट होकर एक हताशकी भाँति आपके आश्रममें पैर रखा है, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ॥ ११ ॥
न राजलक्षणत्यागो न पुरस्य तपोधनाः ।
दुःखं करोति तत् तीव्रं यथाऽऽशा विहता मम ॥ १२ ॥
‘तपोधनो! नगर तथा राजचिह्नोंका परित्याग मुझे वैसा तीव्र कष्ट नहीं दे रहा है, जैसा कि मेरी भग्न हुई आशा दे रही है ॥ १२ ॥
हिमवान् वा महाशैलः समुद्रो वा महोदधिः ।
महत्त्वान्नान्वपद्येतां नभसो वान्तरं तथा ॥ १३ ॥
आशायास्तपसि श्रेष्ठास्तथा नान्तमहं गतः ।
भवतां विदितं सर्वं सर्वज्ञा हि तपोधनाः ॥ १४ ॥
‘महान् पर्वत हिमालय अथवा अगाध जलराशि समुद्र अपनी विशालताके द्वारा आशाकी समानता नहीं कर सकते। तपस्यामें श्रेष्ठ तपोधनो! जैसे आकाशका कहीं अन्त नहीं है, उसी प्रकार मैं आशाका अन्त नहीं पा सका हूँ। आपको तो सब कुछ मालूम ही है; क्योंकि तपोधन मुनि सर्वज्ञ होते हैं ॥ १३-१४ ॥

भवन्तः सुमहाभागास्तस्मात् पृच्छामि संशयम् । आशावान् पुरुषो यः स्यादन्तरिक्षमथापि वा ॥ १५ ॥ किं नु ज्यायस्तरं लोके महत्त्वात् प्रतिभाति वः । एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं किमिह दुर्लभम् ॥ १६ ॥ ‘आप महान् सौभाग्यशाली तपस्वी हैं; इसलिये मैं आपसे अपने मनका संदेह पूछता हूँ। एक ओर आशावान् पुरुष हो और दूसरी ओर अनन्त आकाश हो तो जगत्‌में महत्ताकी दृष्टिसे आपलोगोंको कौन बड़ा जान पड़ता है? मैं इस बातको तत्त्वसे सुनना चाहता हूँ। भला, यहाँ आकर कौन-सी वस्तु दुर्लभ रहेगी? ॥ १५-१६ ॥

यदि गुह्यं न वो नित्यं तदा प्रब्रूत मा चिरम् । न गुह्यं श्रोतुमिच्छामि युष्मद्भ्यो द्विजसत्तमाः ॥ १७ ॥ ‘यदि आपके लिये सदा यह कोई गोपनीय रहस्य न हो तो शीघ्र इसका वर्णन कीजिये। विप्रवरों! मैं आपलोगोंसे ऐसी कोई बात नहीं सुनना चाहता, जो गोपनीय रहस्य हो ॥ १७ ॥

भवत् तपोविघातो वा यदि स्याद् विरमे ततः । यदि वास्ति कथायोगो योऽयं प्रश्नो मयेरितः ॥ १८ ॥ एतत् कारणसामर्थ्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । भवन्तोऽपि तपोनित्या ब्रूयुरेतत् समन्विताः ॥ १९ ॥ ‘यदि मेरे इस प्रश्नसे आपलोगोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ रहा हो तो मैं इससे विराम लेता हूँ और यदि आपके पास बातचीतका समय हो तो जो प्रश्न मैंने उपस्थित किया है, इसका आप समाधान करें। मैं इस आशाके कारण और सामर्थ्यके विषयमें ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ। आपलोग भी सदा तपमें संलग्न रहनेवाले हैं; अतः एकत्र होकर इस प्रश्नका विवेचन करें’ ॥ १८-१९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥

१२७-

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सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

ऋषभका राजा सुमित्रको वीरद्युम्न और तनु मुनिका वृत्तान्त सुनाना

भीष्म उवाच

ततस्तेषां समस्तानाम्मृषीणामृषिसत्तमः ।
ऋषभो नाम विप्रर्षिर्विस्मयन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर उन समस्त ऋषियोंमेंसे मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि ऋषभने विस्मित होकर इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

पुराहं राजशार्दूल तीर्थान्यनुचरन् प्रभो ।
समासादितवान् दिव्यं नरनारायणाश्रमम् ॥ २ ॥
नृपश्रेष्ठ! पहलेकी बात है, मैं सब तीर्थोंमें विचरण करता हुआ भगवान् नरनारायणके दिव्य आश्रममें जा पहुँचा ॥ २ ॥

यत्र सा बदरी रम्या ह्रदो वैहायसस्तथा ।
यत्र चाश्वशिरा राजन् वेदान् पठति शाश्वतान् ॥ ३ ॥
'राजन्! जहाँ वह रमणीय बदरीका वृक्ष है, जहाँ वैहायस* कुण्ड है तथा जहाँ अश्वशिरा (हयग्रीव) सनातन वेदोंका पाठ करते हैं (वहीं नरनारायणाश्रम है) ॥

तस्मिन् सरसि कृत्वाहं विधिवत् तर्पणं पुरा ।
पितॄणां देवतानां च ततोऽश्रममियां तदा ॥ ४ ॥
रेमाते यत्र तौ नित्यं नरनारायणावृषी ।
उस वैहायस कुण्डमें स्नान करके मैंने विधिपूर्वक देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद उस आश्रममें प्रवेश किया, जहाँ मुनिवर नर और नारायण नित्य सानन्द निवास करते हैं ॥ ४ १/२ ॥

अदूरादाश्रमं कञ्चिद् वासार्थमगमं तदा ॥ ५ ॥
तत्र चीराजिनधरं कृशमुच्चमतीव च ।
अद्राक्षमृषिमायान्तं तनुं नाम तपोधनम् ॥ ६ ॥
उसके बाद वहाँसे निकट ही एक-दूसरे आश्रममें मैं ठहरनेके लिये गया। वहाँ मुझे तनु नामवाले एक तपोधन ऋषि आते दिखायी दिये, जो चीर और मृगचर्म धारण किये हुए थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा और अत्यन्त दुर्बल था ॥ ५-६ ॥

अन्यैर्नरैर्महाबाहो वपुषाष्टगुणान्वितम् ।
कृशता चापि राजर्षे न दृष्टा तादृशी क्वचित् ॥ ७ ॥

महाबाहो! उन महर्षिका शरीर दूसरे मनुष्योंसे आठ गुना लंबा था। राजर्षे! मैंने उनकी- जैसी दुर्बलता कहीं भी नहीं देखी है ॥ ७ ॥ शरीरमपि राजेन्द्र तस्य कानिष्ठिकासमम् । ग्रीवा बाहू तथा पादौ केशाश्चाद्भुतदर्शनाः ॥ ८ ॥ ‘राजेन्द्र! उनका शरीर भी कनिष्ठिका अंगुलीके समान पतला था। उनकी गर्दन, दोनों भुजाएँ, दोनों पैर और सिरके बाल भी अद्भुत दिखायी देते थे ॥ ८ ॥ शिरः कायानुरूपं च कर्णौ नेत्रे तथैव च । तस्य वाक्चैव चेष्टा च सामान्ये राजसत्तम ॥ ९ ॥ शरीरके अनुरूप ही उनके मस्तक, कान और नेत्र भी थे। नृपश्रेष्ठ! उनकी वाणी और चेष्टा साधारण थी ॥ ९ ॥ दृष्ट्वाहं तं कृशं विप्रं भीतः परमदुर्मनाः । पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥ १० ॥ मैं उन दुबले-पतले ब्राह्मणको देखकर डर गया और मन-ही-मन बहुत दुखी हो गया; फिर उनके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ा हो गया ॥ १० ॥ निवेद्य नामगोत्रे च पितरं च नरर्षभ । प्रदिष्टे चासने तेन शनैरहमुपाविशम् ॥ ११ ॥ नरश्रेष्ठ! उनके सामने नाम, गोत्र और पिताका परिचय देकर उन्हींके दिये हुए आसन पर धीरेसे बैठ गया ॥ ११ ॥ ततः स कथयामास कथां धर्मार्थसंहिताम् । ऋषिमध्ये महाराज तनुर्धर्मभृतां वरः ॥ १२ ॥ महाराज! तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तनु ऋषियोंके बीचमें बैठकर धर्म और अर्थसे युक्त कथा कहने लगे ॥ १२ ॥ तस्मिंस्तु कथयत्येव राजा राजीवलोचनः । उपायाज्जवनैरश्वैः सबलः सावरोधनः ॥ १३ ॥ उनके कथा कहते समय ही कमलके समान नेत्रोंवाले एक नरेश वेगशाली घोड़ोंद्वारा अपनी सेना और अन्तःपुरके साथ वहाँ आ पहुँचे ॥ १३ ॥ स्मरन् पुत्रमरण्ये वै नष्टं परमदुर्मनाः । भूरिद्युम्नपिता श्रीमान् वीरद्युम्नो महायशाः ॥ १४ ॥ उनका पुत्र जंगलमें खो गया था। उसकी याद करके वे बहुत दुखी हो रहे थे। उनके पुत्रका नाम था भूरिद्युम्न और वे उसके महायशस्वी पिता श्रीमान् वीरद्युम्न थे ॥ १४ ॥ इह द्रक्ष्यामि तं पुत्रं द्रक्ष्यामीहेति पार्थिवः । एवमाशाहृतो राजा चरन् वनमिदं पुरा ॥ १५ ॥

यहाँ उस पुत्रको अवश्य देखूँगा। यहाँ वह निश्चय ही दिखायी देगा। इसी आशासे बँधे हुए पृथ्वीपति राजा वीरद्युम्न उन दिनों उस वनमें विचर रहे थे ॥ १५ ॥
दुर्लभः स मया द्रष्टुं नूनं परमधार्मिकः ।
एकः पुत्रो महारण्ये नष्ट इत्यसकृत् तदा ॥ १६ ॥
‘वह बड़ा धर्मात्मा था। अब उसका दर्शन होना अवश्य ही मेरे लिये दुर्लभ है। एक ही बेटा था, वह भी इस विशाल वनमें खो गया’ इन्हीं बातोंको वे बार-बार दुहराते थे ॥ १६ ॥
दुर्लभः स मया द्रष्टुमाशा च महती मम ।
तया परीतगात्रोऽहं मुमूर्षुर्नात्र संशयः ॥ १७ ॥
‘मेरे लिये उसका दर्शन दुर्लभ है तो भी मेरे मनमें उसके मिलनेकी बड़ी भारी आशा लगी हुई है। उस आशाने मेरे सम्पूर्ण शरीरपर अधिकार कर लिया है। इसमें संदेह नहीं कि मैं उसके लिये मौतको भी स्वीकार कर लेना चाहता हूँ’ ॥ १७ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु भगवांस्तनुर्मुनिवरोत्तमः ।
अवाक्शिरा ध्यानपरो मुहूर्तमिव तस्थिवान् ॥ १८ ॥
राजाकी यह बात सुनकर मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् तनु नीचे सिर किये ध्यानमग्न हो दो घड़ीतक चुपचाप बैठे रह गये ॥ १८ ॥
तमनुध्यान्तमालक्ष्य राजा परमदुर्मनाः ।
उवाच वाक्यं दीनात्मा मन्दं मन्दमिवासकृत् ॥ १९ ॥
उनको चिन्तन करते देख परम दुखी हुए नरेश दीनहृदय हो मन्द-मन्द वाणीमें बारंबार इस प्रकार कहने लगे— ॥ १९ ॥
दुर्लभं किं नु देवर्षे आशायाश्चैव किं महत् ।
ब्रवीतु भगवानेतद् यदि गुह्यं न ते मयि ॥ २० ॥
‘देवर्षे! कौन वस्तु दुर्लभ है? और आशासे भी बड़ा क्या है? यदि आपकी दृष्टिमें यह बात मुझसे छिपानेयोग्य न हो तो आप इसे अवश्य बतावें’ ॥ २० ॥

मुनिरुवाच

महर्षिर्भगवान्स्तेन पूर्वमासीद् विमानितः ।
बालिशां बुद्धिमास्थाय मन्दभाग्यतयाऽऽत्मनः ॥ २१ ॥
**तब मुनिने कहा—**राजन्! आपके उस पुत्रने पहले कभी मूढ़ बुद्धिका आश्रय लेकर अपने दुर्भाग्यके कारण एक पूजनीय महर्षिका अपमान कर दिया था ॥
अर्थयन् कलशं राजन् काञ्चनं वल्कलानि च ।
अवज्ञापूर्वकेनापि न सम्पादितवांस्ततः ।
निर्विण्णः स तु विप्रर्षिर्निशश्वसः समपद्यत ॥ २२ ॥