महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 833, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंआचचक्षे यथान्यायं परिचर्यां च भारत ॥ ७ ॥
पुरुषप्रवर भरतनन्दन! तदनन्तर राजा सुमित्रने उन समस्त ब्राह्मणोंसे यथोचित बात कही और अपना कार्यक्रम बताया— ॥ ७ ॥
हैहयानां कुले जातः सुमित्रो मित्रनन्दनः ।
चरामि मृगयूथानि निघ्नन् बाणैः सहस्रशः ॥ ८ ॥
‘तपोधनो! मेरा जन्म हैहय-कुलमें हुआ है। मैं मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाला राजा सुमित्र हूँ और सहस्रों बाणोंके आघातसे मृग-समूहोंका विनाश करता हुआ विचर रहा हूँ ॥ ८ ॥
बलेन महता गुप्तः सामात्यः सावरोधनः ।
मृगस्तु विद्धो बाणेन मया सरति शल्यवान् ॥ ९ ॥
‘मेरे साथ बहुत बड़ी सेना थी। उसके द्वारा सुरक्षित हो मैं मन्त्री और अन्तःपुरके साथ आया था, परंतु मेरे बाणोंसे घायल हुआ एक मृग बाणसहित इधर ही भाग निकला ॥ ९ ॥
तं द्रवन्तमनुप्राप्तो वनमेतद् यदृच्छया ।
भवत्सकाशं नष्टश्रीर्हताशः श्रमकर्शितः ॥ १० ॥
‘उस भागते हुए मृगके पीछे मैं अकस्मात् इस वनमें आपलोगोंके समीप आ पहुँचा हूँ। मेरी सारी शोभा नष्ट हो गयी है। मैं हताश होकर भारी परिश्रमसे कष्ट पा रहा हूँ ॥ १० ॥
किं नु दुःखमतोऽन्यद् वै यदहं श्रमकर्शितः ।
भवतामाश्रमं प्राप्तो हताशो भ्रष्टलक्षणः ॥ ११ ॥
‘मैंने परिश्रमके कारण जो इतना कष्ट पाया है और अपने राजचिह्नोंसे भ्रष्ट होकर एक हताशकी भाँति आपके आश्रममें पैर रखा है, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ॥ ११ ॥
न राजलक्षणत्यागो न पुरस्य तपोधनाः ।
दुःखं करोति तत् तीव्रं यथाऽऽशा विहता मम ॥ १२ ॥
‘तपोधनो! नगर तथा राजचिह्नोंका परित्याग मुझे वैसा तीव्र कष्ट नहीं दे रहा है, जैसा कि मेरी भग्न हुई आशा दे रही है ॥ १२ ॥
हिमवान् वा महाशैलः समुद्रो वा महोदधिः ।
महत्त्वान्नान्वपद्येतां नभसो वान्तरं तथा ॥ १३ ॥
आशायास्तपसि श्रेष्ठास्तथा नान्तमहं गतः ।
भवतां विदितं सर्वं सर्वज्ञा हि तपोधनाः ॥ १४ ॥
‘महान् पर्वत हिमालय अथवा अगाध जलराशि समुद्र अपनी विशालताके द्वारा आशाकी समानता नहीं कर सकते। तपस्यामें श्रेष्ठ तपोधनो! जैसे आकाशका कहीं अन्त नहीं है, उसी प्रकार मैं आशाका अन्त नहीं पा सका हूँ। आपको तो सब कुछ मालूम ही है; क्योंकि तपोधन मुनि सर्वज्ञ होते हैं ॥ १३-१४ ॥