भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 895

हो? ।। १२७ ।। कृत्वा हि पूर्वं मित्राणि यः पश्चान्नानुतिष्ठति । न स मित्राणि लभते कृच्छ्रास्वापत्सु दुर्मतिः ।। १२८ ।। 'जो खोटी बुद्धिवाला मनुष्य पहले बहुत-से मित्र बनाकर पीछे उस मित्रभावमें स्थिर नहीं रहता है, वह कष्टदायिनी विपत्तिमें पड़नेपर उन मित्रोंको नहीं पाता है अर्थात् उनसे उसको सहायता नहीं मिलती ।। १२८ ।। सत्कृतोऽहं त्वया मित्र सामर्थ्यादात्मनः सखे । स मां मित्रत्वमापन्नमुपभोक्तुं त्वमर्हसि ।। १२९ ।। 'सखे! मित्र! तुमने अपनी शक्तिके अनुसार मेरा पूरा सत्कार किया है और मैं भी तुम्हारा मित्र हो गया हूँ; अतः तुम्हें मेरे साथ रहकर इस मित्रताका सुख भोगना चाहिये ।। १२९ ।। यानि मे सन्ति मित्राणि ये च सम्बन्धिबान्धवाः । सर्वे त्वां पूजयिष्यन्ति शिष्या गुरुमिव प्रियम् ।। १३० ।। 'मेरे जो भी मित्र, सम्बन्धी और बन्धु-बान्धव हैं, वे सब तुम्हारी उसी प्रकार सेवा-पूजा करेंगे, जैसे शिष्य अपने श्रद्धेय गुरुकी करते हैं ।। १३० ।। अहं च पूजयिष्ये त्वां समित्रगणबान्धवम् । जीवितस्य प्रदातारं कृतज्ञः को न पूजयेत् ।। १३१ ।। 'मैं भी मित्रों और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा सदा ही आदर-सत्कार करूँगा। संसारमें ऐसा कौन पुरुष होगा, जो अपने जीवनदाताकी पूजा न करे? ।। १३१ ।। ईश्वरो मे भवानस्तु स्वशरीरगृहस्य च । अर्थानां चैव सर्वेषामनुशास्ता च मे भव ।। १३२ ।। 'तुम मेरे शरीरके और मेरे घरके भी स्वामी हो जाओ। मेरी जो कुछ भी सम्पत्ति है, वह सारी-की-सारी तुम्हारी है। तुम उसके शासक और व्यवस्थापक बनो ।। १३२ ।। अमात्यो मे भव प्राज्ञ पितेवेह प्रशाधि माम् । न तेऽस्ति भयमस्मत्तो जीवितेनात्मनः शपे ।। १३३ ।। 'विद्वन्! तुम मेरे मन्त्री हो जाओ और पिताकी भाँति मुझे कर्तव्यका उपदेश दो। मैं अपने जीवनकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हें हमलोगोंकी ओरसे कोई भय नहीं है ।। १३३ ।। बुद्ध्या त्वमुशना साक्षाद् बलेनाधिकृता वयम् । त्वं मन्त्रबलयुक्तो हि दत्त्वा जीवितमद्य मे ।। १३४ ।। 'तुम साक्षात् शुक्राचार्यके समान बुद्धिमान् हो। तुममें मन्त्रणाका बल है। आज तुमने मुझे जीवनदान देकर अपने मन्त्रणाबलसे हम सब लोगोंके हृदयपर अधिकार प्राप्त कर लिया है' ।। १३४ ।।