महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 988, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
इन्द्रोत मुनिका राजा जनमेजयको फटकारना
युधिष्ठिर उवाच
अबुद्धिपूर्वं यत् पापं कुर्याद् भरतसत्तम ।
मुच्यते स कथं तस्मादेतत् सर्वं वदस्व मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! यदि कोई पुरुष अनजानमें किसी तरहका पापकर्म कर बैठे तो वह उससे किस प्रकार मुक्त हो सकता है? यह सब मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि पुराणमृषिसंस्तुतम् ।
इन्द्रोतः शौनको विप्रो यदाह जनमेजयम् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें ऋषियों-द्वारा प्रशंसित एक प्राचीन प्रसंग एवं उपदेश तुम्हें सुनाऊँगा, जिसे शुनकवंशी विप्रवर इन्द्रोतने राजा जनमेजयसे कहा था ॥ २ ॥
आसीद् राजा महावीर्यः परिक्षिज्जनमेजयः ।
अबुद्धिपूर्वामागच्छद् ब्रह्महत्यां महीपतिः ॥ ३ ॥
पूर्वकालमें परिक्षित्के* पुत्र राजा जनमेजय बड़े पराक्रमी थे; परन्तु उन्हें बिना जाने ही ब्रह्महत्याका पाप लग गया था ॥ ३ ॥
ब्राह्मणाः सर्व एवैते तत्यजुः सपुरोहिताः ।
स जगाम वनं राजा दह्यमानो दिवानिशम् ॥ ४ ॥
इस बातको जानकर पुरोहितसहित सभी ब्राह्मणोंने जनमेजयको त्याग दिया। राजा चिन्तासे दिन-रात जलते हुए वनमें चले गये ॥ ४ ॥
प्रजाभिः स परित्यक्तश्चकार कुशलं महत् ।
अतिवेलं तपस्तेपे दह्यमानः स मन्युना ॥ ५ ॥
प्रजाने भी उन्हें गद्दीसे उतार दिया था; अतः वे वनमें रहकर महान् पुण्य कर्म करने लगे। दुःखसे दग्ध होते हुए वे दीर्घकालतक तपस्यामें लगे रहे ॥ ५ ॥
ब्रह्महत्यापनोदार्थमपृच्छद् ब्राह्मणान् बहून् ।
पर्यटन् पृथिवीं कृत्स्नां देशो देशे नराधिपः ॥ ६ ॥
राजाने सारी पृथ्वीके प्रत्येक देशमें घूम-घूमकर बहु-तेरे ब्राह्मणोंसे ब्रह्महत्या-निवारण के लिये उपाय पूछा ॥ ६ ॥
तत्रेतिहासं वक्ष्यामि धर्मस्यास्योपबृंहणम् ।