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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1261, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1261

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे आच्छादित होकर प्राणियोंके प्राणोंकी हिंसा करनेके लिये उनके अंग-भंग कर देते हैं, शस्त्रोंसे काटकर उन प्राणियोंको निश्चेष्ट बना देते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले पुरुष मरनेके बाद पुनर्जन्म लेनेपर अंगहीन होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वे स्वभावतः पंगुरूपमें उत्पन्न होते हैं अथवा जन्म लेनेके बाद पंगु हो जाते हैं ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचिद् ग्रन्थिभिः पिल्लकैस्तथा ।
क्लिश्यमानाः प्रदृश्यन्ते तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्य ग्रन्थि (गठिया), पिल्लक (फीलपाँव) आदि रोगोंसे कष्ट पाते देखे जाते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि ग्रन्थिभेदकरा नृणाम् ।
मुष्टिप्रहारपरुषा नृशंसाः पापकारिणः ।।
पाटकास्तोटकाश्चैव शूलतुन्दास्तथैव च ।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
ग्रन्थिभिः पिल्लकैश्चैव क्लिश्यन्ते भृशदुःखिताः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले लोगोंकी ग्रंथियोंका भेदन करनेवाले रहे हैं; जो मुष्टि-प्रहार करनेमें निर्दय, नृशंस, पापाचारी, तोड़-फोड़ करनेवाले और शूल चुभाकर पीड़ा देनेवाले रहे हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग फिर जन्म लेनेपर गठिया और फीलपाँवसे कष्ट पाते तथा अत्यन्त दुःखी होते हैं ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचित् पादरोगसमन्विताः ।
दृश्यन्ते सततं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा— भगवन्! देव! कुछ मनुष्य सदा पैरोंके रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि क्रोधलोभसमन्विताः ।
मनुजा देवतास्थानं स्वपादैर्भ्रंशयन्त्युत ।।
जानुभिः पार्ष्णिभिश्चैव प्राणिहिंसां प्रकुर्वते ।।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
पादरोगैर्बहुविधैर्बाध्यन्ते श्वपदादिभिः ।।