महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1264, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंलेते हैं और प्रतिदिन क्रय-विक्रयके समय जब उन बाटोंको रखकर अनाज तौलते हैं, तब
सभीके मालमेंसे आधेकी चोरी कर लेते हैं। जो क्रोध करते, दूसरोंके शरीरपर चोट करके
उसके अंगोंमें दोष उत्पन्न कर देते हैं, जो मूर्ख मांस खाते और सदा झूठ बोलते हैं, शोभने!
ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर छोटे शरीरवाले बौने और कुबड़े होते हैं ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिद् दृश्यन्ते मानुषेषु वै ।
उन्मत्ताश्च पिशाचाश्च पर्यटन्तो यतस्ततः ।।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा- भगवन्! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग उन्मत्त और पिशाचोंके समान इधर-
उधर घूमते दिखायी देते हैं। उनकी ऐसी अवस्थामें कौन-सा कर्म-फल कारण है? यह मुझे
बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि दर्पाहङ्कारसंयुताः ।
बहुधा प्रलपन्त्येव हसन्ति च परान् भृशम् ।।
मोहयन्ति परान् भोगैर्मदनैर्लोभकारणात् ।
वृद्धान् गुरूंश्च ये मूर्खा वृथैवापहसन्ति च ।।
शौण्डा विदग्धाः शास्त्रेषु तथैवानृतवादिनः ।।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
उन्मत्ताश्च पिशाचाश्च भवन्त्येव न संशयः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले दर्प और अहंकारसे युक्त हो नाना
प्रकारकी अंटशंट बातें करते हैं, दूसरोंकी खूब हँसी उड़ाते हैं, लोभवश, उन्मत्त बना
देनेवाले भोगोंद्वारा दूसरोंको मोहित करते हैं, जो मूर्ख वृद्धों और गुरुजनोंका व्यर्थ ही
उपहास करते हैं तथा शास्त्रज्ञानमें चतुर एवं प्रवीण होनेपर भी सदा झूठ बोलते हैं, शोभने!
ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर उन्मत्तों और पिशाचोंके समान भटकते फिरते हैं;
इसमें संशय नहीं है ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिन्तिरपत्याः सुदुःखिताः ।
यतन्तो न लभन्त्येव अपत्यानि यतस्ततः ।।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा- भगवन्! कुछ मनुष्य संतानहीन होनेके कारण अत्यन्त दुःखी रहते हैं।
वे जहाँ-तहाँसे प्रयत्न करनेपर भी संतानलाभसे वंचित ही रह जाते हैं। किस कर्मविपाकसे