भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1273, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1273

तुम इसीको सत्य समझो। कर्म करनेवाला मनुष्य उन कर्मोंका फल न भोगे, ऐसा कोई पुरुष न इस पृथ्वीपर है न स्वर्गमें ।। न शक्यं कर्म चाभोक्तुं सदेवासुरमानुषैः ।। कर्मणा ग्रथितो लोक आदिप्रभृति वर्तते । देवता, असुर और मनुष्य कोई भी अपने कर्मोंका फल भोगे बिना नहीं रह सकता। आदिकालसे ही यह संसार कर्मसे गूँथा हुआ है ।। एतदुद्देशतः प्रोक्तं कर्मपाकफलं प्रति ।। यदन्यच्च मया नोक्तं यस्मिंस्ते कर्मसंग्रहे । बुद्धितर्केण तत् सर्वं तथा वेदितुमर्हसि ।। कथितं श्रोतुकामाया भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।। कर्मोंके परिणामके विषयमें ये बातें संक्षेपसे बतायी गयी हैं। कर्मसंचयके विषयमें जो बात मैंने अबतक नहीं कही हो, उसे भी तुम्हें अपनी बुद्धिद्वारा तर्क—ऊहापोह करके जान लेना चाहिये। तुम्हें सुननेकी इच्छा थी, इसलिये मैंने ये सारी बातें बतायीं। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् भगनेत्रघ्न मानुषाणां विचेष्टितम् । सर्वमात्मकृतं चेति श्रुतं मे भगवन्मतम् ।। लोके ग्रहकृतं सर्वं मत्वा कर्म शुभाशुभम् । तदेव ग्रहनक्षत्रं प्रायशः पर्युपासते ।। एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि । **उमाने पूछा—**भगवन्! भगनेत्रनाशन! आपका मत है कि मनुष्योंकी जो भली-बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनीका फल है। आपके इस मतको मैंने अच्छी तरह सुना; परंतु लोकमें यह देखा जाता है कि लोग समस्त शुभाशुभ कर्मफलको ग्रहजनित मानकर प्रायः उन ग्रहनक्षत्रोंकी ही आराधना करते रहते हैं। क्या उनकी यह मान्यता ठीक है? देव! यही मेरा संशय है। आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वविनिश्चयम् ।। नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव शुभाशुभनिवेदकाः । मानवानां महाभागे न तु कर्मकराः स्वयम् ।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! तुमने उचित संदेह उपस्थित किया है। इस विषयमें जो सिद्धान्त मत है, उसे सुनो। महाभागे! ग्रह और नक्षत्र मनुष्योंके शुभ और अशुभकी सूचनामात्र देनेवाले हैं। वे स्वयं कोई काम नहीं करते हैं ।।