भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1415, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1415

धारयिष्यति यश्चैनं महापुरुषसम्भवम् । शृणुयात् कथयेद् वा यः स श्रेयो लभते परम् ।। ४५ ।। जो महापुरुष श्रीकृष्णके इस प्रभावको सुनेगा, कहेगा और याद रखेगा, उसको परम कल्याणकी प्राप्ति होगी ।। ४५ ।।

भवितारश्च तस्याथ सर्वे कामा यथेप्सिताः । प्रेत्य स्वर्गं च लभते नरो नास्त्यत्र संशयः ।। ४६ ।। उसके सारे अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होंगे और वह मनुष्य मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोक पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। ४६ ।।

न्याय्यं श्रेयोऽभिकामेन प्रतिपत्तुं जनार्दनः । एष एवाक्षयो विप्रैः स्तुतो राजन् जनार्दनः ।। ४७ ।। अतः जिसे कल्याणकी इच्छा हो, उस पुरुषको जनार्दनकी शरण लेनी चाहिये। राजन्! इन अविनाशी श्रीकृष्णकी ही ब्राह्मणोंने स्तुति की है ।। ४७ ।।

महेश्वरमुखोत्सृष्टा ये च धर्मगुणाः स्मृताः । ते त्वया मनसा धार्याः कुरुराज दिवानिशम् ।। ४८ ।। कुरुराज! भगवान् शंकरके मुखसे जो धर्म-सम्बन्धी गुण प्रतिपादित हुए हैं, उन सबको तुम्हें दिन-रात अपने हृदयमें धारण करना चाहिये ।। ४८ ।।

एवं ते वर्तमानस्य सम्यग्दण्डधरस्य च । प्रजापालनदक्षस्य स्वर्गलोको भविष्यति ।। ४९ ।। ऐसा बर्ताव करते हुए यदि तुम न्यायोचित रीतिसे दण्ड धारण करके प्रजापालनमें कुशलतापूर्वक लगे रहोगे तो तुम्हें स्वर्गलोक प्राप्त होगा ।। ४९ ।।

धर्मेणापि सदा राजन् प्रजा रक्षितुमर्हसि । यस्तस्य विपुलॊ दण्डः सम्यग्धर्मः स कीर्त्यते ।। ५० ।। राजन्! तुम धर्मपूर्वक सदा प्रजाकी रक्षा करते रहो। प्रजापालनके लिये जो दण्डका उचित उपयोग किया जाता है, वह धर्म ही कहलाता है ।। ५० ।।

य एष कथितो राजन् मया सज्जनसंनिधौ । शङ्करस्योमया सार्धं संवादो धर्मसंहितः ।। ५१ ।। नरेश्वर! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो धर्मविषयक संवाद हुआ था, उसे इन सत्पुरुषोंके निकट मैंने तुम्हें सुना दिया ।। ५१ ।।

श्रुत्वा वा श्रोतुकामो वाप्यर्चयेद् वृषभध्वजम् । विशुद्धेनेह भावेन य इच्छेद् भूतिमात्मनः ।। ५२ ।। जो अपना कल्याण चाहता हो, वह पुरुष यह संवाद सुनकर अथवा सुननेकी कामना रखकर विशुद्धभावसे भगवान् शंकरकी पूजा करे ।। ५२ ।।

एष तस्यानवद्यस्य नारदस्य महात्मनः ।