भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1417, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1417

दुर्योधनापराधेन कर्णस्य शकुनेस्तथा ।
दुःशासनचतुर्थानां कुरवो निधनं गताः ॥ ६१ ॥
दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि—इन्हीं चारोंके अपराधसे सारे कौरव मारे गये हैं ॥ ६१ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्भाषमाणे तु गाङ्गेये पुरुषर्षभे ।
तूष्णीं बभूव कौरव्यो मध्ये तेषां महात्मनाम् ॥ ६२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पुरुषप्रवर गंगानन्दन भीष्मजीके ऐसा कहनेपर उन महामनस्वी पुरुषोंके बीचमें बैठे हुए कुरुकुलकुमार युधिष्ठिर चुप हो गये ॥ ६२ ॥

तच्छ्रुत्वा विस्मयं जग्मुर्धृतराष्ट्रादयो नृपाः ।
सम्पूज्य मनसा कृष्णं सर्वे प्राञ्जलयोऽभवन् ॥ ६३ ॥
भीष्मजीकी बात सुनकर धृतराष्ट्र आदि राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सभी मन-ही-मन श्रीकृष्णकी पूजा करते हुए उन्हें हाथ जोड़ने लगे ॥ ६३ ॥

ऋषयश्चापि ते सर्वे नारदप्रमुखास्तदा ।
प्रतिगृह्याभ्यनन्दन्त तद्वाक्यं प्रतिपूज्य च ॥ ६४ ॥
नारद आदि सम्पूर्ण महर्षि भी भीष्मजीके वचन सुनकर उनकी प्रशंसा करते हुए बहुत प्रसन्न हुए ॥ ६४ ॥

इत्येतदखिलं सर्वैः पाण्डवो भ्रातृभिः सह ।
श्रुतवान् सुमहाश्चर्यं पुण्यं भीष्मानुशासनम् ॥ ६५ ॥
इस प्रकार पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंके साथ यह भीष्मजीका सारा पवित्र अनुशासन सुना, जो अत्यन्त आश्चर्यजनक था ॥ ६५ ॥

युधिष्ठिरस्तु गाङ्गेयं विश्रान्तं भूरिदक्षिणम् ।
पुनरेव महाबुद्धिः पर्यपृच्छन्महीपतिः ॥ ६६ ॥
तदनन्तर बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंका दान करनेवाले गंगानन्दन भीष्मजी जब विश्राम ले चुके, तब महाबुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर पुनः प्रश्न करने लगे ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषप्रस्तावे
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महापुरुष श्रीकृष्णकी प्रशंसाविषयक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४८ ॥