महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दुर्योधनापराधेन कर्णस्य शकुनेस्तथा ।
दुःशासनचतुर्थानां कुरवो निधनं गताः ॥ ६१ ॥
दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि—इन्हीं चारोंके अपराधसे सारे कौरव मारे गये हैं ॥ ६१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाषमाणे तु गाङ्गेये पुरुषर्षभे ।
तूष्णीं बभूव कौरव्यो मध्ये तेषां महात्मनाम् ॥ ६२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पुरुषप्रवर गंगानन्दन भीष्मजीके ऐसा कहनेपर उन महामनस्वी पुरुषोंके बीचमें बैठे हुए कुरुकुलकुमार युधिष्ठिर चुप हो गये ॥ ६२ ॥
तच्छ्रुत्वा विस्मयं जग्मुर्धृतराष्ट्रादयो नृपाः ।
सम्पूज्य मनसा कृष्णं सर्वे प्राञ्जलयोऽभवन् ॥ ६३ ॥
भीष्मजीकी बात सुनकर धृतराष्ट्र आदि राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सभी मन-ही-मन श्रीकृष्णकी पूजा करते हुए उन्हें हाथ जोड़ने लगे ॥ ६३ ॥
ऋषयश्चापि ते सर्वे नारदप्रमुखास्तदा ।
प्रतिगृह्याभ्यनन्दन्त तद्वाक्यं प्रतिपूज्य च ॥ ६४ ॥
नारद आदि सम्पूर्ण महर्षि भी भीष्मजीके वचन सुनकर उनकी प्रशंसा करते हुए बहुत प्रसन्न हुए ॥ ६४ ॥
इत्येतदखिलं सर्वैः पाण्डवो भ्रातृभिः सह ।
श्रुतवान् सुमहाश्चर्यं पुण्यं भीष्मानुशासनम् ॥ ६५ ॥
इस प्रकार पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंके साथ यह भीष्मजीका सारा पवित्र अनुशासन सुना, जो अत्यन्त आश्चर्यजनक था ॥ ६५ ॥
युधिष्ठिरस्तु गाङ्गेयं विश्रान्तं भूरिदक्षिणम् ।
पुनरेव महाबुद्धिः पर्यपृच्छन्महीपतिः ॥ ६६ ॥
तदनन्तर बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंका दान करनेवाले गंगानन्दन भीष्मजी जब विश्राम ले चुके, तब महाबुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर पुनः प्रश्न करने लगे ॥ ६६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषप्रस्तावे
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महापुरुष श्रीकृष्णकी प्रशंसाविषयक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४८ ॥
१४९-
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
(यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ।।
जिनके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य जन्म-मृत्यु-रूप संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है, सबकी उत्पत्तिके कारणभूत उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।।
नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥)
सम्पूर्ण प्राणियोंके आदिभूत, पृथ्वीको धारण करनेवाले, अनेक रूपधारी और सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुको प्रणाम है ।।
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण विधिरूप धर्म तथा पापोंका क्षय करनेवाले धर्म-रहस्योंको सब प्रकार सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्मसे फिर पूछा ।। १ ।।
युधिष्ठिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ।। २ ।।
युधिष्ठिर बोले— दादाजी! समस्त जगत्में एक ही देव कौन है तथा इस लोकमें एक ही परम आश्रयस्थान कौन है? किस देवकी स्तुति—गुण-कीर्तन करनेसे तथा किस देवका नाना प्रकारसे बाह्य और आन्तरिक पूजन करनेसे मनुष्य कल्याणकी प्राप्ति कर सकते हैं? ।। २ ।।
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन् मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ।। ३ ।।
आप समस्त धर्मोंमें किस धर्मको परम श्रेष्ठ मानते हैं? तथा किसका जप करनेसे जीव जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है? ।। ३ ।।
भीष्म उवाच
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ ४ ॥ भीष्मजीने कहा—बेटा! स्थावर-जंगमरूप संसारके स्वामी, ब्रह्मादि देवोंके देव, देश-काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न, क्षर-अक्षरसे श्रेष्ठ पुरुषोत्तमका सहस्रनामोंके द्वारा निरन्तर तत्पर रहकर गुण-संकीर्तन करनेसे पुरुष सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ४ ॥
तमेव चार्चयन् नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ५ ॥ तथा उसी विनाशरहित पुरुषका सब समय भक्तिसे युक्त होकर पूजन करनेसे, उसीका ध्यान करनेसे तथा स्तवन एवं नमस्कार करनेसे पूजा करनेवाला सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ५ ॥
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन् नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ ६ ॥ उस जन्म-मृत्यु आदि छः भाव-विकारोंसे रहित, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर, लोकाध्यक्ष देवकी निरन्तर स्तुति करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे पार हो जाता है ॥ ६ ॥
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ ७ ॥ ब्राह्मणोंके हितकारी, सब धर्मोंको जाननेवाले, प्राणियोंकी कीर्तिको बढ़ानेवाले, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, समस्त भूतोंके उत्पत्ति-स्थान एवं संसारके कारणरूप परमेश्वरका स्तवन करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे छूट जाता है ॥ ७ ॥
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण धर्मोंमें मैं इसी धर्मको सबसे बड़ा मानता हूँ कि मनुष्य कमलनयन भगवान् वासुदेवका भक्तिपूर्वक गुण-संकीर्तनरूप स्तुतियोंसे सदा अर्चन करे ॥ ८ ॥
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ ९ ॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १० ॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ ११ ॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १२ ॥ पृथ्वीपते! जो परम महान् तेजःस्वरूप है, जो परम महान् तपःस्वरूप है, जो परम महान् ब्रह्म है, जो सबका परम आश्रय है, जो पवित्र करनेवाले तीर्थादिकोंमें परम पवित्र है, मंगलोंका भी मंगल है, देवोंका भी देव है तथा जो भूतप्राणियोंका अविनाशी पिता है,
कल्पके आदिमें जिससे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं और फिर युगका क्षय होनेपर महाप्रलयमें जिसमें वे विलीन हो जाते हैं, उस लोकप्रधान, संसारके स्वामी, भगवान् विष्णुके हजार नामोंको मुझसे सुनो, जो पाप और संसार-भयको दूर करनेवाले हैं ॥ ९—१२ ॥
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १३ ॥
महान् आत्मस्वरूप विष्णुके जो नाम गुणके कारण प्रवृत्त हुए हैं, उनमेंसे जो-जो प्रसिद्ध हैं और मन्त्रद्रष्टा मुनियोंद्वारा जो सर्वत्र गाये गये हैं, उन समस्त नामोंको पुरुषार्थ-सिद्धिके लिये वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद् भूतभृद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १४ ॥
ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १ विश्वम्-विराट्स्वरूप, २ विष्णुः-सर्वव्यापी, ३ वषट्कारः-जिनके उद्देश्यसे यज्ञमें वषट् क्रिया की जाती है, ऐसे यज्ञस्वरूप, ४ भूतभव्यभवत्प्रभुः-भूत, भविष्यत् और वर्तमानके स्वामी, ५ भूतकृत्-रजोगुणको स्वीकार करके ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी रचना करनेवाले, ६ भूतभृत्-सत्त्वगुणको स्वीकार करके सम्पूर्ण भूतोंका पालन-पोषण करनेवाले, ७ भावः-नित्यस्वरूप होते हुए भी स्वतः उत्पन्न होनेवाले, ८ भूतात्मा-सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, ९ भूतभावनः-भूतोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले ॥ १४ ॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ १५ ॥
१० पूतात्मा-पवित्रात्मा, ११ परमात्मा-परमश्रेष्ठ नित्यशुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव, १२ मुक्तानां परमा गतिः-मुक्त पुरुषोंकी सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप, १३ अव्ययः-कभी विनाशको प्राप्त न होनेवाले, १४ पुरुषः-पुर अर्थात् शरीरमें शयन करनेवाले, १५ साक्षी-बिना किसी व्यवधानके सब कुछ देखनेवाले, १६ क्षेत्रज्ञः-क्षेत्र अर्थात् समस्त प्रकृतिरूप शरीरको पूर्णतया जाननेवाले, १७ अक्षरः-कभी क्षीण न होनेवाले ॥ १५ ॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ १६ ॥
१८ योगः-मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके निरोधरूप योगसे प्राप्त होनेवाले, १९ योगविदां नेता-योगको जाननेवाले भक्तोंके स्वामी, २० प्रधानपुरुषेश्वरः-प्रकृति और पुरुषके स्वामी, २१ नारसिंहवपुः-मनुष्य और सिंह दोनोंके-जैसा शरीर धारण करनेवाले नरसिंहरूप, २२ श्रीमान्-वक्षःस्थलमें सदा श्रीको धारण करनेवाले, २३ केशवः-(क) ब्रह्मा, (अ) विष्णु और (ईश) महादेव—इस प्रकार त्रिमूर्तिस्वरूप, २४ पुरुषोत्तमः-क्षर और अक्षर—इन दोनोंसे सर्वथा उत्तम ॥ १६ ॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ १७ ॥ २५ सर्वः-सर्वरूप, २६ शर्वः-सारी प्रजाका प्रलयकालमें संहार करनेवाले, २७ शिवः-तीनों गुणोंसे परे कल्याणस्वरूप, २८ स्थाणुः-स्थिर, २९ भूतादिः-भूतोंके आदिकारण, ३० निधिरव्ययः-प्रलयकालमें सब प्राणियोंके लीन होनेके लिये अविनाशी स्थानरूप, ३१ सम्भवः-अपनी इच्छासे भली प्रकार प्रकट होनेवाले, ३२ भावनः-समस्त भोक्ताओंके फलोंको उत्पन्न करनेवाले, ३३ भर्ता-सबका भरण करनेवाले, ३४ प्रभवः-उत्कृष्ट (दिव्य) जन्मवाले, ३५ प्रभुः-सबके स्वामी, ३६ ईश्वरः- उपाधिरहित ऐश्वर्यवाले ॥ १७ ॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ १८ ॥ ३७ स्वयम्भूः-स्वयं उत्पन्न होनेवाले, ३८ शम्भुः-भक्तोंके लिये सुख उत्पन्न करनेवाले, ३९ आदित्यः-द्वादश आदित्योंमें विष्णुनामक आदित्य, ४० पुष्कराक्षः-कमलके समान नेत्रवाले, ४१ महास्वनः-वेदरूप अत्यन्त महान् घोषवाले, ४२ अनादिनिधनः-जन्म-मृत्युसे रहित, ४३ धाता-विश्वको धारण करनेवाले, ४४ विधाता-कर्म और उसके फलोंकी रचना करनेवाले, ४५ धातुरुत्तमः-कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेवाले एवं सर्वश्रेष्ठ ॥ १८ ॥
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ १९ ॥ ४६ अप्रमेयः-प्रमाणादिसे जाननेमें न आ सकनेवाले, ४७ हृषीकेशः-इन्द्रियोंके स्वामी, ४८ पद्मनाभः-जगत्के कारणरूप कमलको अपनी नाभिमें स्थान देनेवाले, ४९ अमरप्रभुः-देवताओंके स्वामी, ५० विश्वकर्मा-सारे जगत्की रचना करनेवाले, ५१ मनुः-प्रजापति मनुरूप, ५२ त्वष्टा-संहारके समय सम्पूर्ण प्राणियोंको क्षीण करनेवाले, ५३ स्थविष्ठः-अत्यन्त स्थूल, ५४ स्थविरो ध्रुवः-अति प्राचीन एवं अत्यन्त स्थिर ॥ १९ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ २० ॥ ५५ अग्राह्यः-मनसे भी ग्रहण न किये जा सकनेवाले, ५६ शाश्वतः-सब कालमें स्थित रहनेवाले, ५७ कृष्णः-सबके चित्तको बलात् अपनी ओर आकर्षित करनेवाले परमानन्दस्वरूप, ५८ लोहिताक्षः-लाल नेत्रोंवाले, ५९ प्रतर्दनः-प्रलयकालमें प्राणियोंका संहार करनेवाले, ६० प्रभूतः-ज्ञान, ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न, ६१ त्रिककुब्धाम-ऊपर-नीचे और मध्यभेदवाली तीनों दिशाओंके आश्रयरूप, ६२ पवित्रम्-सबको पवित्र करनेवाले, ६३ मङ्गलं परम्-परम मंगलस्वरूप ॥ २० ॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ २१ ॥
६४ ईशानः-सर्वभूतोंके नियन्ता, ६५ प्राणदः-सबके प्राणदाता, ६६ प्राणः-
प्राणस्वरूप, ६७ ज्येष्ठः-सबके कारण होनेसे सबसे बड़े, ६८ श्रेष्ठः-सबमें उत्कृष्ट होनेसे
परम श्रेष्ठ, ६९ प्रजापतिः- ईश्वररूपसे सारी प्रजाओंके स्वामी, ७० हिरण्यगर्भः-
ब्रह्माण्डरूप हिरण्यमय अण्डके भीतर ब्रह्मारूपसे व्याप्त होनेवाले, ७१ भूगर्भः-पृथ्वीको
गर्भमें रखनेवाले, ७२ माधवः-लक्ष्मीके पति, ७३ मधुसूदनः-मधुनामक दैत्यको
मारनेवाले ।। २१ ।।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ।। २२ ।।
७४ ईश्वरः-सर्वशक्तिमान् ईश्वर, ७५ विक्रमी-शूरवीरतासे युक्त, ७६ धन्वी-शार्ङ्गधनुष
रखनेवाले, ७७ मेधावी-अतिशय बुद्धिमान्, ७८ विक्रमः-गरुड़ पक्षीद्वारा गमन करनेवाले,
७९ क्रमः-क्रमविस्तारके कारण, ८० अनुत्तमः-सर्वोत्कृष्ट, ८१ दुराधर्षः-किसीसे भी
तिरस्कृत न हो सकनेवाले, ८२ कृतज्ञः-अपने निमित्तसे थोड़ा-सा भी त्याग किये जानेपर
उसे बहुत माननेवाले यानि पत्र-पुष्पादि थोड़ी-सी वस्तु समर्पण करनेवालोंको भी मोक्ष दे
देनेवाले, ८३ कृतिः-पुरुष-प्रयत्नके आधाररूप, ८४ आत्मवान्-अपनी ही महिमामें
स्थित ।। २२ ।।
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। २३ ।।
८५ सुरेशः-देवताओंके स्वामी, ८६ शरणम्-दीन-दुखियोंके परम आश्रय, ८७ शर्म-
परमानन्दस्वरूप, ८८ विश्वरेताः-विश्वके कारण, ८९ प्रजाभवः-सारी प्रजाको उत्पन्न
करनेवाले, ९० अहः-प्रकाशरूप, ९१ संवत्सरः-कालरूपसे स्थित, ९२ व्यालः-
शेषनागस्वरूप, ९३ प्रत्ययः-उत्तम बुद्धिसे जाननेमें आनेवाले, ९४ सर्वदर्शनः-सबके
द्रष्टा ।। २३ ।।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ।। २४ ।।
९५ अजः-जन्मरहित, ९६ सर्वेश्वरः-समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर, ९७ सिद्धः-नित्यसिद्ध,
९८ सिद्धिः-सबके फलस्वरूप, ९९ सर्वादिः-सब भूतोंके आदि कारण, १०० अच्युतः-
अपनी स्वरूप-स्थितिसे कभी त्रिकालमें भी च्युत न होनेवाले, १०१ वृषाकपिः-धर्म और
वराहरूप, १०२ अमेयात्मा-अप्रमेयस्वरूप, १०३ सर्वयोगविनिःसृतः-नाना प्रकारके
शास्त्रोक्त साधनोंसे जाननेमें आनेवाले ।। २४ ।।
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मासम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।। २५ ।।
१०४ वसुः-सब भूतोंके वासस्थान, १०५ वसुमनाः-उदार मनवाले, १०६ सत्यः-
सत्यस्वरूप, १०७ समात्मा-सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक आत्मारूपसे विराजनेवाले, १०८
असम्मितः-समस्त पदार्थोंसे मापे न जा सकनेवाले, १०९ समः-सब समय समस्त विकारोंसे रहित, ११० अमोघः-भक्तोंके द्वारा पूजन, स्तवन अथवा स्मरण किये जानेपर उन्हें वृथा न करके पूर्णरूपसे उनका फल प्रदान करनेवाले, १११ पुण्डरीकाक्षः-कमलके समान नेत्रोंवाले, ११२ वृषकर्मा-धर्ममय कर्म करनेवाले, ११३ वृषाकृतिः-धर्मकी स्थापना करनेके लिये विग्रह धारण करनेवाले ।। २५ ।।
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुविश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ।। २६ ।।
११४ रुद्रः-दुःखके कारणको दूर भगा देनेवाले, ११५ बहुशिराः-बहुत-से सिरोंवाले, ११६ बभ्रुः-लोकोंका भरण करनेवाले, ११७ विश्वयोनिः-विश्वको उत्पन्न करनेवाले, ११८ शुचिश्रवाः-पवित्र कीर्तिवाले, ११९ अमृतः-कभी न मरनेवाले, १२० शाश्वतस्थाणुः-नित्य सदा एकरस रहनेवाले एवं स्थिर, १२१ वरारोहः-आरूढ़ होनेके लिये परम उत्तम अपुनरावृत्तिस्थानरूप, १२२ महातपाः-प्रताप (प्रभाव) रूप महान् तपवाले ।। २६ ।।
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ।। २७ ।।
१२३ सर्वगः-कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले, १२४ सर्वविद्भानुः-सब कुछ जाननेवाले प्रकाशरूप, १२५ विष्वक्सेनः-युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालनेवाले, १२६ जनार्दनः-भक्तोंके द्वारा अभ्युदयनिःश्रेयसरूप परम पुरुषार्थकी याचना किये जानेवाले, १२७ वेदः-वेदरूप, १२८ वेदवित्-वेद तथा वेदके अर्थको यथावत् जाननेवाले, १२९ अव्यङ्गः-ज्ञानादिसे परिपूर्ण अर्थात् किसी प्रकार अधूरे न रहनेवाले सर्वांगपूर्ण, १३० वेदाङ्गः-वेदरूप अंगोंवाले, १३१ वेदवित्-वेदोंको विचारनेवाले, १३२ कविः-सर्वज्ञ ।। २७ ।।
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ।। २८ ।।
१३३ लोकाध्यक्षः-समस्त लोकोंके अधिपति, १३४ सुराध्यक्षः-देवताओंके अध्यक्ष, १३५ धर्माध्यक्षः-अनुरूप फल देनेके लिये धर्म और अधर्मका निर्णय करनेवाले, १३६ कृताकृतः-कार्यरूपसे कृत और कारणरूपसे अकृत, १३७ चतुरात्मा-ब्रह्मा, विष्णु, महेश और निराकार ब्रह्म—इन चार स्वरूपोंवाले, १३८ चतुर्व्यूहः-उत्पत्ति, स्थिति, नाश और रक्षारूप चार व्यूहवाले, १३९ चतुर्दंष्ट्रः-चार दाढ़ोंवाले नरसिंहरूप, १४० चतुर्भुजः-चार भुजाओंवाले, वैकुण्ठवासी भगवान् विष्णु ।। २८ ।।
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।। २९ ।।
१४१ भ्राजिष्णुः-एकरस प्रकाशस्वरूप, १४२ भोजनम्-ज्ञानियोंद्वारा भोगनेयोग्य अमृतस्वरूप, १४३ भोक्ता-पुरुषरूपसे भोक्ता, १४४ सहिष्णुः-सहनशील, १४५
जगदादिजः-जगत्के आदिमें हिरण्यगर्भ रूपसे स्वयं उत्पन्न होनेवाले, १४६ अनघः-पापरहित, १४७ विजयः-ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि गुणोंमें सबसे बढ़कर, १४८ जेता-स्वभावसे ही समस्त भूतोंको जीतनेवाले, १४९ विश्वयोनिः-सबके कारणरूप, १५० पुनर्वसुः-पुनः-पुनः अवतार-शरीरोंमें निवास करनेवाले ।। २९ ।।
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ।। ३० ।।
१५१ उपेन्द्रः-इन्द्रके छोटे भाई, १५२ वामनः-वामनरूपसे अवतार लेनेवाले, १५३ प्रांशुः-तीनों लोकोंको लाँघनेके लिये त्रिविक्रमरूपसे ऊँचे होनेवाले, १५४ अमोघः-अव्यर्थ चेष्टावाले, १५५ शुचिः-स्मरण, स्तुति और पूजन करनेवालोंको पवित्र कर देनेवाले, १५६ ऊर्जितः-अत्यन्त बलशाली, १५७ अतीन्द्रः-स्वयंसिद्ध ज्ञान-ऐश्वर्यादिके कारण इन्द्रसे भी बढ़े-चढ़े हुए, १५८ संग्रहः-प्रलयके समय सबको समेट लेनेवाले, १५९ सर्गः-सृष्टिके कारणरूप, १६० धृतात्मा-जन्मादिसे रहित रहकर स्वेच्छासे स्वरूप धारण करनेवाले, १६१ नियमः-प्रजाको अपने-अपने अधिकारोंमें नियमित करनेवाले, १६२ यमः-अन्तःकरणमें स्थित होकर नियमन करनेवाले ।। ३० ।।
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ।। ३१ ।।
१६३ वेद्यः-कल्याणकी इच्छावालोंके द्वारा जानने योग्य, १६४ वैद्यः-सब विद्याओंके जाननेवाले, १६५ सदायोगी-सदा योगमें स्थित रहनेवाले, १६६ वीरहा-धर्मकी रक्षाके लिये असुर योद्धाओंको मार डालनेवाले, १६७ माधवः-विद्याके स्वामी, १६८ मधुः-अमृतकी तरह सबको प्रसन्न करनेवाले, १६९ अतीन्द्रियः-इन्द्रियोंसे सर्वथा अतीत, १७० महामायः-मायावियोंपर भी माया डालनेवाले, महान् मायावी, १७१ महोत्साहः-जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके लिये तत्पर रहनेवाले परम उत्साही, १७२ महाबलः-महान् बलशाली ।। ३१ ।।
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ।। ३२ ।।
१७३ महाबुद्धिः-महान् बुद्धिमान्, १७४ महावीर्यः-महान् पराक्रमी, १७५ महाशक्तिः-महान् सामर्थ्यवान्, १७६ महाद्युतिः-महान् कान्तिमान्, १७७ अनिर्देश्यवपुः-वर्णन करनेमें न आने योग्य स्वरूप, १७८ श्रीमान्-ऐश्वर्यवान्, १७९ अमेयात्मा-जिसका अनुमान न किया जा सके ऐसे आत्मावाले, १८० महाद्रिधृक्-अमृतमन्थन और गोरक्षणके समय मन्दराचल और गोवर्धन नामक महान् पर्वतोंको धारण करनेवाले ।। ३२ ।।
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ।। ३३ ।।
१८१ महेष्वासः-महान् धनुषवाले, १८२ महीभर्ता-पृथ्वीको धारण करनेवाले, १८३ श्रीनिवासः-अपने वक्षःस्थलमें श्रीको निवास देनेवाले, १८४ सतां गतिः-सत्पुरुषोंके परम आश्रय, १८५ अनिरुद्धः-किसीके भी द्वारा न रुकनेवाले, १८६ सुरानन्दः-देवताओंको आनन्दित करनेवाले, १८७ गोविन्दः-वेदवाणीके द्वारा अपनेको प्राप्त करा देनेवाले, १८८ गोविदां पतिः-वेदवाणीको जाननेवालोंके स्वामी ।। ३३ ।। मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।। ३४ ।। १८९ मरीचिः-तेजस्वियोंके भी परम तेजरूप, १९० दमनः-प्रमाद करनेवाली प्रजाको यम आदिके रूपसे दमन करनेवाले, १९१ हंसः-पितामह ब्रह्माको वेदका ज्ञान करानेके लिये हंसरूप धारण करनेवाले, १९२ सुपर्णः-सुन्दर पंखवाले गरुड़स्वरूप, १९३ भुजगोत्तमः-सर्पोंमें श्रेष्ठ शेषनागरूप, १९४ हिरण्यनाभः-सुवर्णके समान रमणीय नाभिवाले, १९५ सुतपाः-बदरिकाश्रममें नर-नारायणरूपसे सुन्दर तप करनेवाले, १९६ पद्मनाभः-कमलके समान सुन्दर नाभिवाले, १९७ प्रजापतिः-सम्पूर्ण प्रजाओंके पालनकर्ता ।। ३४ ।। अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः संधाता सन्धिमान्स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ।। ३५ ।। १९८ अमृत्युः-मृत्युसे रहित, १९९ सर्वदृक्-सब कुछ देखनेवाले, २०० सिंहः-दुष्टोंका विनाश करनेवाले, २०१ संधाता-प्राणियोंको उनके कर्मोंके फलोंसे संयुक्त करनेवाले, २०२ सन्धिमान्-सम्पूर्ण यज्ञ और तपोंके फलोंको भोगनेवाले, २०३ स्थिरः-सदा एक रूप, २०४ अजः-दुर्गुणोंको दूर हटा देनेवाले, २०५ दुर्मर्षणः-किसीसे भी सहन नहीं किये जा सकनेवाले, २०६ शास्ता-सबपर शासन करनेवाले, २०७ विश्रुतात्मा-वेदशास्त्रोंमें प्रसिद्ध स्वरूपवाले, २०८ सुरारिहा-देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाले ।। ३५ ।। गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ।। ३६ ।। २०९ गुरुः-सब विद्याओंका उपदेश करनेवाले, २१० गुरुतमः-ब्रह्मा आदिको भी ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले, २११ धाम-सम्पूर्ण जगत्के आश्रय, २१२ सत्यः-सत्यस्वरूप, २१३ सत्यपराक्रमः-अमोघ पराक्रमवाले, २१४ निमिषः-योगनिद्रासे मुँदे हुए नेत्रोंवाले, २१५ अनिमिषः-मत्स्यरूपसे अवतार लेनेवाले, २१६ स्रग्वी-वैजयन्तीमाला धारण करनेवाले, २१७ वाचस्पतिरुदारधीः-सारे पदार्थोंको प्रत्यक्ष करनेवाली बुद्धिसे युक्त समस्त विद्याओंके पति ।। ३६ ।। अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ।। ३७ ।।
२१८ अग्रणीः-४ मुमुक्षुओंको उत्तम पदपर ले जानेवाले, २१९ ग्रामणीः-भूतसमुदायके नेता, २२० श्रीमान्-सबसे बढ़ी-चढ़ी कान्तिवाले, २२१ न्यायः-प्रमाणोंके आश्रयभूत तर्ककी मूर्ति, २२२ नेता-जगत्-रूप यन्त्रको चलानेवाले, २२३ समीरणः-श्वासरूपसे प्राणियोंसे चेष्टा करानेवाले, २२४ सहस्रमूर्धा-हजार सिरवाले, २२५ विश्वात्मा-विश्वके आत्मा, २२६ सहस्राक्षः-हजार आँखोंवाले, २२७ सहस्रपात्-हजार पैरोंवाले ।। ३७ ।।
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहःसंवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ।। ३८ ।।
२२८ आवर्तनः-संसारचक्रको चलानेके स्वभाववाले, २२९ निवृत्तात्मा-संसारबन्धनसे नित्य मुक्तस्वरूप, २३० संवृतः-अपनी योगमायासे ढके हुए, २३१ सम्प्रमर्दनः-अपने रुद्र आदि स्वरूपसे सबका मर्दन करनेवाले, २३२ अहःसंवर्तकः-सूर्यरूपसे सम्यक्तया दिनके प्रवर्तक, २३३ वह्निः-हविको वहन करनेवाले अग्निदेव, २३४ अनिलः-प्राणरूपसे वायुस्वरूप, २३५ धरणीधरः-वराह और शेषरूपसे पृथिवीको धारण करनेवाले ।। ३८ ।।
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग् विश्वभुग् विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ।। ३९ ।।
२३६ सुप्रसादः-शिशुपालादि अपराधियोंपर भी कृपा करनेवाले, २३७ प्रसन्नात्मा-प्रसन्न स्वभाववाले, २३८ विश्वधृक्-जगत्को धारण करनेवाले, २३९ विश्वभुक्-विश्वका पालन करनेवाले, २४० विश्वः-सर्वव्यापी, २४१ सत्कर्ता-भक्तोंका सत्कार करनेवाले, २४२ सत्कृतः-पूजितोंसे भी पूजित, २४३ साधुः-भक्तोंके कार्य साधनेवाले, २४४ जह्नुः-संहारके समय जीवोंका लय करनेवाले, २४५ नारायणः-जलमें शयन करनेवाले, २४६ नरः-भक्तोंको परमधाममें ले जानेवाले ।। ३९ ।।
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।। ४० ।।
२४७ असंख्येयः-जिसके नाम और गुणोंकी संख्या न की जा सके, २४८ अप्रमेयात्मा-किसीसे भी मापे न जा सकनेवाले, २४९ विशिष्टः-सबसे उत्कृष्ट, २५० शिष्टकृत्-श्रेष्ठ बनानेवाले, २५१ शुचिः-परम शुद्ध, २५२ सिद्धार्थः-इच्छित अर्थको सर्वथा सिद्ध कर चुकनेवाले, २५३ सिद्धसंकल्पः-सत्य-संकल्पवाले, २५४ सिद्धिदः-कर्म करनेवालोंको उनके अधिकारके अनुसार फल देनेवाले, २५५ सिद्धिसाधनः-सिद्धिरूप क्रियाके साधक ।। ४० ।।
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ।। ४१ ।।
२५६ वृषाही-द्वादशाहादि यज्ञोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले, २५७ वृषभः-भक्तोंके लिये इच्छित वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, २५८ विष्णुः-शुद्ध सत्त्वमूर्ति, २५९ वृषपर्वा-
परमधाममें आरूढ़ होनेकी इच्छावालोंके लिये धर्मरूप सीढ़ियोंवाले, २६० वृषोदरः-अपने उदरमें धर्मको धारण करनेवाले, २६१ वर्धनः-भक्तोंको बढ़ानेवाले, २६२ वर्धमानः-संसाररूपसे बढ़नेवाले, २६३ विविक्तः-संसारसे पृथक् रहनेवाले, २६४ श्रुतिसागरः-वेदरूप जलके समुद्र ॥ ४१ ॥
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ ४२ ॥
२६५ सुभुजः जगत्की रक्षा करनेवाली अति सुन्दर भुजाओंवाले, २६६ दुर्धरः-ध्यानद्वारा कठिनतासे धारण किये जा सकनेवाले, २६७ वाग्मी-वेदमयी वाणीको उत्पन्न करनेवाले, २६८ महेन्द्रः-ईश्वरोंके भी ईश्वर, २६९ वसुदः-धन देनेवाले, २७० वसुः-धनरूप, २७१ नैकरूपः-अनेक रूपधारी, २७२ बृहद्रूपः-विश्वरूपधारी, २७३ शिपिविष्टः-सूर्यकिरणोंमें स्थित रहनेवाले, २७४ प्रकाशनः-सबको प्रकाशित करनेवाले ॥ ४२ ॥
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ४३ ॥
२७५ ओजस्तेजोद्युतिधरः-प्राण और बल, शूरवीरता आदि गुण तथा ज्ञानकी दीप्तिको धारण करनेवाले, २७६ प्रकाशात्मा-प्रकाशरूप, २७७ प्रतापनः-सूर्य आदि अपनी विभूतियोंसे विश्वको तप्त करनेवाले, २७८ ऋद्धः-धर्म, ज्ञान और वैराग्यादिसे सम्पन्न, २७९ स्पष्टाक्षरः-ओंकाररूप स्पष्ट अक्षरवाले, २८० मन्त्रः-ऋक्, साम और यजुके मन्त्रस्वरूप, २८१ चन्द्रांशुः-संसारतापसे संतप्तचित्त पुरुषोंको चन्द्रमाकी किरणोंके समान आह्लादित करनेवाले, २८२ भास्करद्युतिः-सूर्यके समान प्रकाशस्वरूप ॥ ४३ ॥
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ४४ ॥
२८३ अमृतांशूद्भवः-समुद्रमन्थन करते समय चन्द्रमाको उत्पन्न करनेवाले, २८४ भानुः-भासनेवाले, २८५ शशबिन्दुः-खरगोशके समान चिह्नवाले चन्द्रस्वरूप, २८६ सुरेश्वरः-देवताओंके ईश्वर, २८७ औषधम्-संसाररोगको मिटानेके लिये औषधरूप, २८८ जगतः सेतुः-संसार-सागरको पार करानेके लिये सेतुरूप, २८९ सत्यधर्मपराक्रमः-सत्यस्वरूप धर्म और पराक्रमवाले ॥ ४४ ॥
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत् कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ४५ ॥
२९० भूतभव्यभवन्नाथः-भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी, २९१ पवनः-वायुरूप, २९२ पावनः-जगत्को पवित्र करनेवाले, २९३ अनलः-अग्निस্বরূপ, २९४ कामहा-अपने भक्तजनोंके सकामभावको नष्ट करनेवाले, २९५ कामकृत्-भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, २९६ कान्तः-कमनीयरूप, २९७ कामः-(क) ब्रह्मा, (अ) विष्णु, (म) महादेव—
इस प्रकार त्रिदेवस्वरूप, २९८ कामप्रदः-भक्तोंको उनकी कामना की हुई वस्तुएँ प्रदान करनेवाले, २९९ प्रभुः-सर्वसामर्थ्यवान् ॥ ४५ ॥
युगादिकृद् युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्योऽव्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ४६ ॥
३०० युगादिकृत्-युगादिका आरम्भ करनेवाले, ३०१ युगावर्तः-चारों युगोंको चक्रके समान घुमानेवाले, ३०२ नैकमायः-अनेक मायाओंको धारण करनेवाले, ३०३ महाशनः-कल्पके अन्तमें सबको ग्रसन करनेवाले, ३०४ अदृश्यः-समस्त ज्ञानेन्द्रियोंके अविषय, ३०५ अव्यक्तरूपः-निराकार स्वरूपवाले, ३०६ सहस्रजित्-युद्धमें हजारों देवशत्रुओंको जीतनेवाले, ३०७ अनन्तजित्-युद्ध और क्रीड़ा आदिमें सर्वत्र समस्त भूतोंको जीतनेवाले ॥ ४६ ॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ४७ ॥
३०८ इष्टः-परमानन्दरूप होनेसे सर्वप्रिय, ३०९ अविशिष्टः-सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, ३१० शिष्टेष्टः-शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, ३११ शिखण्डी-मयूरपिच्छको अपना शिरोभूषण बना लेनेवाले, ३१२ नहुषः-भूतोंको मायासे बाँधनेवाले, ३१३ वृषः-कामनाओंको पूर्ण करनेवाले धर्मस्वरूप, ३१४ क्रोधहा-क्रोधका नाश करनेवाले, ३१५ क्रोधकृत्कर्ता-क्रोध करनेवाले दैत्यादिके विनाशक, ३१६ विश्वबाहुः-सब ओर बाहुओंवाले, ३१७ महीधरः-पृथ्वीको धारण करनेवाले ॥ ४७ ॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ४८ ॥
३१८ अच्युतः-छः भावविकारोंसे रहित, ३१९ प्रथितः-जगत्की उत्पत्ति आदि कर्मोंके कारण विख्यात, ३२० प्राणः-हिरण्यगर्भरूपसे प्रजाको जीवित रखनेवाले, ३२१ प्राणदः-सबका भरण-पोषण करनेवाले, ३२२ वासवानुजः-वामनावतारमें इन्द्रके अनुजरूपमें उत्पन्न होनेवाले, ३२३ अपां निधिः-जलको एकत्र रखनेवाले समुद्ररूप, ३२४ अधिष्ठानम्-उपादान कारणरूपसे सब भूतोंके आश्रय, ३२५ अप्रमत्तः-कभी प्रमाद न करनेवाले, ३२६ प्रतिष्ठितः-अपनी महिमामें स्थित ॥ ४८ ॥
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरंदरः ॥ ४९ ॥
३२७ स्कन्दः-स्वामिकार्तिकेयरूप, ३२८ स्कन्दधरः-धर्मपथको धारण करनेवाले, ३२९ धुर्यः-समस्त भूतोंके जन्मादिरूप धुरको धारण करनेवाले, ३३० वरदः-इच्छित वर देनेवाले, ३३१ वायुवाहनः-सारे वायुभेदोंको चलानेवाले, ३३२ वासुदेवः-सब भूतोंमें सर्वात्मारूपसे बसनेवाले, ३३३ बृहद्भानुः-महान् किरणोंसे युक्त एवं सम्पूर्ण जगत्को
प्रकाशित करनेवाले सूर्यरूप, ३३४ आदिकदेवः-सबके आदिकारण देव, ३३५ पुरंदरः-असुरोंके नगरोंका ध्वंस करनेवाले ॥ ४९ ॥ अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः । अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ५० ॥ ३३६ अशोकः-सब प्रकारके शोकसे रहित, ३३७ तारणः-संसारसागरसे तारनेवाले, ३३८ तारः-जन्म-जरा मृत्युरूप भयसे तारनेवाले, ३३९ शूरः-पराक्रमी, ३४० शौरिः-शूरवीर श्रीवसुदेवजीके पुत्र, ३४१ जनेश्वरः-समस्त जीवोंके स्वामी, ३४२ अनुकूलः-आत्मारूप होनेसे सबके अनुकूल, ३४३ शतावर्तः-धर्मरक्षाके लिये सैकड़ों अवतार लेनेवाले, ३४४ पद्मी-अपने हाथमें कमल धारण करनेवाले, ३४५ पद्मनिभेक्षणः-कमलके समान कोमल दृष्टिवाले ॥ ५० ॥ पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् । महर्द्धिर्ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ ५१ ॥ ३४६ पद्मनाभः-हृदय-कमलके मध्य निवास करनेवाले, ३४७ अरविन्दाक्षः-कमलके समान आँखोंवाले, ३४८ पद्मगर्भः-हृदयकमलमें ध्यान करनेयोग्य, ३४९ शरीरभृत्-अन्नरूपसे सबके शरीरोंका भरण करनेवाले, ३५० महर्द्धिः-महान् विभूतिवाले, ३५१ ऋद्धः-सबमें बढ़े-चढ़े, ३५२ वृद्धात्मा-पुरातन स्वरूप, ३५३ महाक्षः-विशाल नेत्रोंवाले, ३५४ गरुडध्वजः-गरुडके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले ॥ ५१ ॥ अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः । सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ ५२ ॥ ३५५ अतुलः-तुलणारहित, ३५६ शरभः-शरीरोंको प्रत्यगात्मरूपसे प्रकाशित करनेवाले, ३५७ भीमः-जिससे पापियोंको भय हो ऐसे भयानक, ३५८ समयज्ञः-समभावरूप यज्ञसे सम्पन्न, ३५९ हविर्हरिः-यज्ञोंमें हविर्भागको और अपना स्मरण करनेवालोंके पापोंको हरण करनेवाले, ३६० सर्वलक्षणलक्षण्यः-समस्त लक्षणोंसे लक्षित होनेवाले, ३६१ लक्ष्मीवान्-अपने वक्षःस्थलमें लक्ष्मीजीको सदा बसानेवाले, ३६२ समितिञ्जयः संग्रामविजयी ॥ ५२ ॥ विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः । महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ५३ ॥ ३६३ विक्षरः-नाशरहित, ३६४ रोहितः-मत्स्यविशेषका स्वरूप धारण करके अवतार लेनेवाले, ३६५ मार्गः-परमानन्दप्राप्तिके साधन-स्वरूप, ३६६ हेतुः-संसारके निमित्त और उपादान कारण, ३६७ दामोदरः-यशोदाजीद्वारा रस्सीसे बँधे हुए उदरवाले, ३६८ सहः-भक्तजनोंके अपराधोंको सहन करनेवाले, ३६९ महीधरः-पृथ्वीको धारण करनेवाले, ३७० महाभागः-महान् भाग्यशाली, ३७१ वेगवान्-तीव्रगतिवाले, ३७२ अमिताशनः-प्रलयकालमें सारे विश्वको भक्षण करनेवाले ॥ ५३ ॥
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ५४ ॥ ३७३ उद्भवः:-जगत्की उत्पत्तिके उपादानकारण, ३७४ क्षोभणः:-जगत्की उत्पत्तिके समय प्रकृति और पुरुषमें प्रविष्ट होकर उन्हें क्षुब्ध करनेवाले, ३७५ देवः:-प्रकाशस्वरूप, ३७६ श्रीगर्भः:-सम्पूर्ण ऐश्वर्यको अपने उदरमें रखनेवाले, ३७७ परमेश्वरः:-सर्वश्रेष्ठ शासन करनेवाले, ३७८ करणम्-संसारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े साधन, ३७९ कारणम्-जगत्के उपादान और निमित्तकारण, ३८० कर्ता-सबके रचयिता, ३८१ विकर्ता-विचित्र भुवनोंकी रचना करनेवाले, ३८२ गहनः-अपने विलक्षण स्वरूप, सामर्थ्य और लीलादिके कारण पहचाने न जा सकनेवाले, ३८३ गुहः:-मायासे अपने स्वरूपको ढक लेनेवाले ॥ ५४ ॥
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः । परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ५५ ॥ ३८४ व्यवसायः-ज्ञानस्वरूप, ३८५ व्यवस्थानः-लोकपालादिकोंको, समस्त जीवोंको, चारों वर्णाश्रमोंको एवं उनके धर्मोंको व्यवस्थापूर्वक रचनेवाले, ३८६ संस्थानः-प्रलयके सम्यक् स्थान, ३८७ स्थानदः-ध्रुवादि भक्तोंको स्थान देनेवाले, ३८८ ध्रुवः-अचल स्वरूप, ३८९ परर्द्धिः-श्रेष्ठ विभूतिवाले, ३९० परमस्पष्टः-ज्ञानस्वरूप होनेसे परम स्पष्टरूप, ३९१ तुष्टः-एकमात्र परमानन्दस्वरूप, ३९२ पुष्टः-एकमात्र सर्वत्र परिपूर्ण, ३९३ शुभेक्षणः-दर्शनमात्रसे कल्याण करनेवाले ॥ ५५ ॥
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ५६ ॥ ३९४ रामः-योगीजनोंके रमण करनेके लिये नित्यानन्दस्वरूप, ३९५ विरामः-प्रलयके समय प्राणियोंको अपनेमें विराम देनेवाले, ३९६ विरजः-रजोगुण तथा तमोगुणसे सर्वथा शून्य, ३९७ मार्गः-मुमुक्षुजनोंके अमर होनेके साधनस्वरूप, ३९८ नेयः-उत्तम ज्ञानसे ग्रहण करनेयोग्य, ३९९ नयः-सबको नियममें रखनेवाले, ४०० अनयः-स्वतन्त्र, ४०१ वीरः-पराक्रमशाली, ४०२ शक्तिमतां श्रेष्ठः-शक्तिमानोंमें भी अतिशय शक्तिमान्, ४०३ धर्मः-धर्मस्वरूप, ४०४ धर्मविदुत्तमः-समस्त धर्मवेत्ताओंमें उत्तम ॥ ५६ ॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ५७ ॥ ४०५ वैकुण्ठः-परमधामस्वरूप, ४०६ पुरुषः-विश्वरूप शरीरमें शयन करनेवाले, ४०७ प्राणः-प्राणवायुरूपसे चेष्टा करनेवाले, ४०८ प्राणदः-सर्गके आदिमें प्राण प्रदान करनेवाले, ४०९ प्रणवः-ओंकार-स्वरूप, ४१० पृथुः-विराट्रूपसे विस्तृत होनेवाले, ४११ हिरण्यगर्भः-ब्रह्मारूपसे प्रकट होनेवाले, ४१२ शत्रुघ्नः-देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाले, ४१३ व्याप्तः-कारणरूपसे सब कार्योंमें व्याप्त, ४१४ वायुः-पवनरूप, ४१५ अधोक्षजः-अपने स्वरूपसे क्षीण न होनेवाले ॥ ५७ ॥
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ५८ ॥ ४१६ ऋतुः-ऋतुस्वरूप, ४१७ सुदर्शनः-भक्तोंको सुगमतासे ही दर्शन दे देनेवाले, ४१८ कालः-सबकी गणना करनेवाले, ४१९ परमेष्ठी-अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेके स्वभाववाले, ४२० परिग्रहः-शरणाथियोंके द्वारा सब ओरसे ग्रहण किये जानेवाले, ४२१ उग्रः-सूर्यादिके भी भयके कारण, ४२२ संवत्सरः-सम्पूर्ण भूतोंके वासस्थान, ४२३ दक्षः-सब कार्योंको बड़ी कुशलतासे करनेवाले, ४२४ विश्रामः-विश्रामकी इच्छावाले मुमुक्षुओंको मोक्ष देनेवाले, ४२५ विश्वदक्षिणः-बलिके यज्ञमें समस्त विश्वको दक्षिणारूपमें प्राप्त करनेवाले ॥ ५८ ॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् । अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ५९ ॥ ४२६ विस्तारः-समस्त लोकोंके विस्तारके स्थान, ४२७ स्थावरस्थाणुः-स्वयं स्थितिशील रहकर पृथ्वी आदि, स्थितिशील पदार्थोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले, ४२८ प्रमाणम्-ज्ञानस्वरूप होनेके कारण स्वयं प्रमाणरूप, ४२९ बीजमव्ययम्-संसारके अविनाशी कारण, ४३० अर्थः-सुखस्वरूप होनेके कारण सबके द्वारा प्रार्थनीय, ४३१ अनर्थः-पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित, ४३२ महाकोशः-बड़े खजानेवाले, ४३३ महाभोगः-यथार्थ सुखरूप महान् भोगवाले, ४३४ महाधनः-अतिशय यथार्थ धनस्वरूप ॥ ५९ ॥
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः । नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ६० ॥ ४३५ अनिर्विण्णः-उकताहटरूप विकारसे रहित, ४३६ स्थविष्ठः-विराट्रूपसे स्थित, ४३७ अभूः-अजन्मा, ४३८ धर्मयूपः-धर्मके स्तम्भरूप, ४३९ महामखः-महान् यज्ञस्वरूप, ४४० नक्षत्रनेमिः-समस्त नक्षत्रोंके केन्द्रस्वरूप, ४४१ नक्षत्री-चन्द्ररूप, ४४२ क्षमः-समस्त कार्योंमें समर्थ, ४४३ क्षामः-समस्त जगत्के निवासस्थान, ४४४ समीहनः-सृष्टि आदिके लिये भलीभाँति चेष्टा करनेवाले ॥ ६० ॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ६१ ॥ ४४५ यज्ञः-भगवान् विष्णु, ४४६ इज्यः-पूजनीय, ४४७ महेज्यः-सबसे अधिक उपासनीय, ४४८ क्रतुः-स्तम्भयुक्त यज्ञस्वरूप, ४४९ सत्रम्-सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेवाले, ४५० सतां गतिः-सत्पुरुषोंकी परम गति, ४५१ सर्वदर्शी-समस्त प्राणियोंको और उनके कार्योंको देखनेवाले, ४५२ विमुक्तात्मा-सांसारिक बन्धनसे नित्यमुक्त आत्मस्वरूप, ४५३ सर्वज्ञः-सबको जाननेवाले, ४५४ ज्ञानमुत्तमम्-सर्वोत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप ॥ ६१ ॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ६२ ॥
४५५ सुव्रतः-प्रणतपालनादि श्रेष्ठ व्रतोंवाले, ४५६ सुमुखः-सुन्दर और प्रसन्न मुखवाले, ४५७ सूक्ष्मः-अणुसे भी अणु, ४५८ सुघोषः-सुन्दर और गम्भीर वाणी बोलनेवाले, ४५९ सुखदः-अपने भक्तोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले, ४६० सुहृत्-प्राणिमात्रपर अहैतुकी दया करनेवाले परम मित्र, ४६१ मनोहरः-अपने रूप-लावण्य और मधुर भाषणादिसे सबके मनको हरनेवाले, ४६२ जितक्रोधः-क्रोधपर विजय करनेवाले अर्थात् अपने साथ अत्यन्त अनुचित व्यवहार करनेवालेपर भी क्रोध न करनेवाले, ४६३ वीरबाहुः-अत्यन्त पराक्रमशील भुजाओंसे युक्त, ४६४ विदारणः-अधर्मियोंको नष्ट करनेवाले ॥ ६२ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥
४६५ स्वापनः-प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको अज्ञाननिद्रामें शयन करानेवाले, ४६६ स्ववशः-स्वतन्त्र, ४६७ व्यापी-आकाशकी भाँति सर्वव्यापी, ४६८ नैकात्मा-प्रत्येक युगमें लोकोद्धारके लिये अनेक रूप धारण करनेवाले, ४६९ नैककर्मकृत्-जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप तथा भिन्न-भिन्न अवतारोंमें मनोहर लीलारूप अनेक कर्म करनेवाले, ४७० वत्सरः-सबके निवास-स्थान, ४७१ वत्सलः-भक्तोंके परम स्नेही, ४७२ वत्सी-वृन्दावनमें बछड़ोंका पालन करनेवाले, ४७३ रत्नगर्भः-रत्नोंको अपने गर्भमें धारण करनेवाले समुद्ररूप, ४७४ धनेश्वरः-सब प्रकारके धनोंके स्वामी ॥ ६३ ॥
धर्मगुब् धर्मकृद् धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ६४ ॥
४७५ धर्मगुप्-धर्मकी रक्षा करनेवाले, ४७६ धर्म-कृत्-धर्मकी स्थापना करनेके लिये स्वयं धर्मका आचरण करनेवाले, ४७७ धर्मी-सम्पूर्ण धर्मोंके आधार, ४७८ सत्-सत्यस्वरूप, ४७९ असत्-स्थूल जगत्स्वरूप, ४८० क्षरम्-सर्वभूतमय, ४८१ अक्षरम्-अविनाशी, ४८२ अविज्ञाता-क्षेत्रज्ञ जीवात्माको विज्ञाता कहते हैं, उनसे विलक्षण भगवान् विष्णु, ४८३ सहस्रांशुः-हजारों किरणोंवाले सूर्यस्वरूप, ४८४ विधाता-सबको अच्छी प्रकार धारण करनेवाले, ४८५ कृतलक्षणः-श्रीवत्स आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले ॥ ६४ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ ६५ ॥
४८६ गभस्तिनेमिः-किरणोंके बीचमें सूर्यरूपसे स्थित, ४८७ सत्त्वस्थः-अन्तर्यामीरूपसे समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित रहनेवाले, ४८८ सिंहः-भक्त प्रह्लादके लिये नृसिंह रूप धारण करनेवाले, ४८९ भूतमहेश्वरः-सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वर, ४९० आदिदेवः-सबके आदि कारण और दिव्यस्वरूप, ४९१ महादेवः-ज्ञानयोग
और ऐश्वर्य आदि महिमाओंसे युक्त, ४९२ देवेशः-समस्त देवोंके स्वामी, ४९३ देवभृद्गुरुः-देवोंका विशेषरूपसे भरण-पोषण करनेवाले उनके परम गुरु ।। ६५ ।।
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ।। ६६ ।।
४९४ उत्तरः-संसार-समुद्रसे उद्धार करनेवाले और सर्वश्रेष्ठ, ४९५ गोपतिः-गोपालरूपसे गायोंकी रक्षा करनेवाले, ४९६ गोप्ता-समस्त प्राणियोंका पालन और रक्षा करनेवाले, ४९७ ज्ञानगम्यः-ज्ञानके द्वारा जाननेमें आनेवाले, ४९८ पुरातनः-सदा एकरस रहनेवाले, सबके आदि पुराणपुरुष, ४९९ शरीरभूतभृत्-शरीरके उत्पादक पञ्चभूतोंका प्राणरूपसे पालन करनेवाले, ५०० भोक्ता-निरतिशय आनन्दपुंजको भोगनेवाले, ५०१ कपीन्द्रः-बंदरोंके स्वामी श्रीराम, ५०२ भूरिदक्षिणः-श्रीरामादि अवतारोंमें यज्ञ करते समय बहुत-सी दक्षिणा प्रदान करनेवाले ।। ६६ ।।
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।। ६७ ।।
५०३ सोमपः-यज्ञोंमें देवरूपसे और यजमानरूपसे सोमरसका पान करनेवाले, ५०४ अमृतपः-समुद्रमन्थनसे निकाला हुआ अमृत देवोंको पिलाकर स्वयं पीनेवाले, ५०५ सोमः-ओषधियोंका पोषण करनेवाले चन्द्रमारूप, ५०६ पुरुजित्-बहुतोंको विजय लाभ करनेवाले, ५०७ पुरुसत्तमः-विश्वरूप और अत्यन्त श्रेष्ठ, ५०८ विनयः-दुष्टोंको दण्ड देनेवाले, ५०९ जयः-सबपर विजय प्राप्त करनेवाले, ५१० सत्यसंधः-सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले, ५११ दाशार्हः-दाशार्हकुलमें प्रकट होनेवाले, ५१२ सात्वतां पतिः-यादवोंके और अपने भक्तोंके स्वामी ।। ६७ ।।
जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ।। ६८ ।।
५१३ जीवः-क्षेत्रज्ञरूपसे प्राणोंको धारण करनेवाले, ५१४ विनयितासाक्षी-अपने शरणापन्न भक्तोंके विनय-भावको तत्काल प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले, ५१५ मुकुन्दः-मुक्तिदाता, ५१६ अमितविक्रमः-वामनावतारमें पृथ्वी नापते समय अत्यन्त विस्तृत पैर रखनेवाले, ५१७ अम्भोनिधिः-जलके निधान समुद्रस्वरूप, ५१८ अनन्तात्मा-अनन्तमूर्ति, ५१९ महोदधिशयः-प्रलयकालके महान् समुद्रमें शयन करनेवाले, ५२० अन्तकः-प्राणियोंका संहार करनेवाले मृत्युस्वरूप ।। ६८ ।।
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।। ६९ ।।
५२१ अजः-अकार भगवान् विष्णुका वाचक है, उससे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मास्वरूप, ५२२ महार्हः-पूजनीय, ५२३ स्वाभाव्यः-नित्य सिद्ध होनेके कारण स्वभावसे ही उत्पन्न न होनेवाले, ५२४ जितामित्रः-रावण-शिशुपालादि शत्रुओंको जीतनेवाले, ५२५ प्रमोदनः-
स्मरणमात्रसे नित्य प्रमुदित करनेवाले, ५२६ आनन्दः-आनन्दस्वरूप, ५२७ नन्दनः-सबको प्रसन्न करनेवाले, ५२८ नन्दः-सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न, ५२९ सत्यधर्मा-धर्मज्ञानादि सब गुणोंसे युक्त, ५३० त्रिविक्रमः-तीन डगमें तीनों लोकोंको नापनेवाले ॥ ६९ ॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ७० ॥
५३१ महर्षिः कपिलाचार्यः-सांख्यशास्त्रके प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, ५३२ कृतज्ञः-अपने भक्तोंकी सेवाको बहुत मानकर अपनेको उनका ऋणी समझनेवाले, ५३३ मेदिनीपतिः-पृथ्वीके स्वामी, ५३४ त्रिपदः-त्रिलोकीरूप तीन पैरोंवाले विश्वरूप, ५३५ त्रिदशाध्यक्षः-देवताओंके स्वामी, ५३६ महाशृङ्गः-मत्स्यावतारमें महान् सींग धारण करनेवाले, ५३७ कृतान्तकृत्-स्मरण करनेवालोंके समस्त कर्मोंका अन्त करनेवाले ॥ ७० ॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ७१ ॥
५३८ महावराहः-हिरण्याक्षका वध करनेके लिये महावराहरूप धारण करनेवाले, ५३९ गोविन्दः-नष्ट हुई पृथ्वीको पुनः प्राप्त कर लेनेवाले, ५४० सुषेणः-पार्षदोंके समुदायरूप सुन्दर सेनासे सुसज्जित, ५४१ कनकाङ्गदी-सुवर्णका बाजूबंद धारण करनेवाले, ५४२ गुह्यः-हृदयाकाशमें छिपे रहनेवाले, ५४३ गभीरः-अतिशय गम्भीर स्वभाववाले, ५४४ गहनः-जिनके स्वरूपमें प्रविष्ट होना अत्यन्त कठिन हो—ऐसे, ५४५ गुप्तः-वाणी और मनसे जाननेमें न आनेवाले, ५४६ चक्रगदाधरः-भक्तोंकी रक्षा करनेके लिये चक्र और गदा आदि दिव्य आयुधोंको धारण करनेवाले ॥ ७१ ॥
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ७२ ॥
५४७ वेधाः-सब कुछ विधान करनेवाले, ५४८ स्वाङ्गः-कार्य करनेमें स्वयं ही सहकारी, ५४९ अजितः-किसीके द्वारा न जीते जानेवाले, ५५० कृष्णः-श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण, ५५१ दृढः-अपने स्वरूप और सामर्थ्यसे कभी भी च्युत न होनेवाले, ५५२ सङ्कर्षणोऽच्युतः-प्रलयकालमें एक साथ सबका संहार करनेवाले और जिनका कभी किसी भी कारणसे पतन न हो सके—ऐसे अविनाशी, ५५३ वरुणः-जलके स्वामी वरुणदेवता, ५५४ वारुणः-वरुणके पुत्र वशिष्ठस्वरूप, ५५५ वृक्षः-अश्वत्थवृक्षरूप, ५५६ पुष्कराक्षः-कमलके समान नेत्रवाले, ५५७ महामनाः-संकल्पमात्रसे उत्पत्ति, पालन और संहार आदि समस्त लीला करनेकी शक्तिवाले ॥ ७२ ॥
भगवान् भगहानन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ७३ ॥
५५८ भगवान्-उत्पत्ति और प्रलय, आना और जाना तथा विद्या और अविद्याको जाननेवाले एवं सर्वैश्वर्यादि छहों भगोंसे युक्त, ५५९ भगहा-अपने भक्तोंका प्रेम बढ़ानेके लिये उनके ऐश्वर्यका हरण करनेवाले, ५६० आनन्दी-परम सुखस्वरूप, ५६१ वनमाली-वैजयन्ती वनमाला धारण करनेवाले, ५६२ हलायुधः-हलरूप शस्त्रको धारण करनेवाले बलभद्रस्वरूप, ५६३ आदित्यः-अदितिपुत्र वामन-भगवान्, ५६४ ज्योतिरादित्यः-सूर्यमण्डलमें विराजमान ज्योतिःस्वरूप, ५६५ सहिष्णुः-समस्त द्वन्द्वोंको सहन करनेमें समर्थ, ५६६ गतिसत्तमः-सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप ।। ७३ ।।
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिविस्पृक् सर्वदृग् व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ।। ७४ ।।
५६७ सुधन्वा-अतिशय सुन्दर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, ५६८ खण्डपरशुः-शत्रुओंका खण्डन करनेवाले फरसेको धारण करनेवाले परशुरामस्वरूप, ५६९ दारुणः-सन्मार्गविरोधियोंके लिये महान् भयंकर, ५७० द्रविणप्रदः-अर्थार्थी भक्तोंको धन-सम्पत्ति प्रदान करनेवाले, ५७१ दिविस्पृक्-स्वर्गलोकतक व्याप्त, ५७२ सर्वदृग् व्यासः-सबके द्रष्टा एवं वेदका विभाग करनेवाले श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासस्वरूप, ५७३ वाचस्पतिरयोनिजः-विद्याके स्वामी तथा बिना योनिके स्वयं ही प्रकट होनेवाले ।। ७४ ।।
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् । संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ।। ७५ ।।
५७४ त्रिसामा-देवव्रत आदि तीन साम श्रुतियोंद्वारा जिनकी स्तुति की जाती है—ऐसे परमेश्वर, ५७५ सामगः-सामवेदका गान करनेवाले, ५७६ साम-सामवेदस्वरूप, ५७७ निर्वाणम्-परमशान्तिके निधान परमानन्दस्वरूप, ५७८ भेषजम्-संसार-रोगकी ओषधि, ५७९ भिषक्-संसाररोगका नाश करनेके लिये गीतारूप उपदेशामृतका पान करानेवाले परम वैद्य, ५८० संन्यासकृत्-मोक्षके लिये संन्यासाश्रम और संन्यासयोगका निर्माण करनेवाले, ५८१ शमः-उपशमताका उपदेश देनेवाले, ५८२ शान्तः-परम शान्तस्वरूप, ५८३ निष्ठा-सबकी स्थितिके आधार अधिष्ठानस्वरूप, ५८४ शान्तिः-परम शान्तिस्वरूप, ५८५ परायणम्-मुमुक्षु पुरुषोंके परम प्राप्य-स्थान ।। ७५ ।।
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। ७६ ।।
५८६ शुभाङ्गः-अति मनोहर परम सुन्दर अंगोंवाले, ५८७ शान्तिदः-परम शान्ति देनेवाले, ५८८ स्रष्टा-सर्गके आदिमें सबकी रचना करनेवाले, ५८९ कुमुदः-पृथ्वीपर प्रसन्नतापूर्वक लीला करनेवाले, ५९० कुवलेशयः-जलमें शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले, ५९१ गोहितः-गोपालरूपसे गायोंका और अवतार धारण करके भार उतारकर पृथ्वीका हित करनेवाले, ५९२ गोपतिः-पृथ्वीके और गायोंके स्वामी, ५९३ गोप्ता-अवतार धारण करके सबके सम्मुख प्रकट होते समय अपनी मायासे अपने स्वरूपको आच्छादित
करनेवाले, ५९४ वृषाध्यक्षः-समस्त कामनाओंकी वर्षा करनेवाली कृपादृष्टिसे युक्त, ५९५ वृषप्रियः-धर्मसे प्यार करनेवाले ।। ७६ ।।
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।। ७७ ।।
५९६ अनिवर्ती-रणभूमिमें और धर्मपालनमें पीछे न हटनेवाले, ५९७ निवृत्तात्मा-स्वभावसे ही विषय-वासनारहित नित्य शुद्ध मनवाले, ५९८ संक्षेप्ता-विस्तृत जगत्को संहारकालमें संक्षिप्त यानी सूक्ष्म करनेवाले, ५९९ क्षेमकृत्-शरणागतकी रक्षा करनेवाले, ६०० शिवः-स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले कल्याणस्वरूप, ६०१ श्रीवत्सवक्षाः-श्रीवत्स नामक चिह्नको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६०२ श्रीवासः-श्रीलक्ष्मीजीके वासस्थान, ६०३ श्रीपतिः-परमशक्तिरूपा श्रीलक्ष्मीजीके स्वामी, ६०४ श्रीमतां वरः-सब प्रकारकी सम्पत्ति और ऐश्वर्यसे युक्त ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंसे श्रेष्ठ ।। ७७ ।।
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ।। ७८ ।।
६०५ श्रीदः-भक्तोंको श्री प्रदान करनेवाले, ६०६ श्रीशः-लक्ष्मीके नाथ, ६०७ श्रीनिवासः-श्रीलक्ष्मीजीके अन्तःकरणमें नित्य निवास करनेवाले, ६०८ श्रीनिधिः-समस्त श्रियोंके आधार, ६०९ श्रीविभावनः-सब मनुष्योंके लिये उनके कर्मानुसार नाना प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, ६१० श्रीधरः-जगज्जननी श्रीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले, ६११ श्रीकरः-स्मरण, स्तवन और अर्चन आदि करनेवाले भक्तोंके लिये श्रीका विस्तार करनेवाले, ६१२ श्रेयः-कल्याणस्वरूप, ६१३ श्रीमान्-सब प्रकारकी श्रियोंसे युक्त, ६१४ लोकत्रयाश्रयः-तीनों लोकोंके आधार ।। ७८ ।।
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्माविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्न संशयः ।। ७९ ।।
६१५ स्वक्षः-मनोहर कृपाकटाक्षसे युक्त परम सुन्दर आँखोंवाले, ६१६ स्वङ्गः-अतिशय कोमल, परम सुन्दर, मनोहर अंगोंवाले, ६१७ शतानन्दः-लीलाभेदसे सैकड़ों विभागोंमें विभक्त आनन्दस्वरूप, ६१८ नन्दिः-परमानन्दस्वरूप, ६१९ ज्योतिर्गणेश्वरः-नक्षत्रसमुदायोंके ईश्वर, ६२० विजितात्मा-जिते हुए मनवाले, ६२१ अविधेयात्मा-जिनके असली स्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन नहीं किया जा सके—ऐसे अनिर्वचनीयस्वरूप, ६२२ सत्कीर्तिः-सच्ची कीर्तिवाले, ६२३ छिन्नसंशयः-सब प्रकारके संशयोंसे रहित ।। ७९ ।।
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।। ८० ।।
६२४ उदीर्णः-सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ, ६२५ सर्व-तश्चक्षुः-समस्त वस्तुओंको सब दिशाओंमें सदा-सर्वदा देखनेकी शक्तिवाले, ६२६ अनीशः-जिनका दूसरा कोई शासक न