महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ अग्रणीः-४ मुमुक्षुओंको उत्तम पदपर ले जानेवाले, २१९ ग्रामणीः-भूतसमुदायके नेता, २२० श्रीमान्-सबसे बढ़ी-चढ़ी कान्तिवाले, २२१ न्यायः-प्रमाणोंके आश्रयभूत तर्ककी मूर्ति, २२२ नेता-जगत्-रूप यन्त्रको चलानेवाले, २२३ समीरणः-श्वासरूपसे प्राणियोंसे चेष्टा करानेवाले, २२४ सहस्रमूर्धा-हजार सिरवाले, २२५ विश्वात्मा-विश्वके आत्मा, २२६ सहस्राक्षः-हजार आँखोंवाले, २२७ सहस्रपात्-हजार पैरोंवाले ।। ३७ ।।
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहःसंवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ।। ३८ ।।
२२८ आवर्तनः-संसारचक्रको चलानेके स्वभाववाले, २२९ निवृत्तात्मा-संसारबन्धनसे नित्य मुक्तस्वरूप, २३० संवृतः-अपनी योगमायासे ढके हुए, २३१ सम्प्रमर्दनः-अपने रुद्र आदि स्वरूपसे सबका मर्दन करनेवाले, २३२ अहःसंवर्तकः-सूर्यरूपसे सम्यक्तया दिनके प्रवर्तक, २३३ वह्निः-हविको वहन करनेवाले अग्निदेव, २३४ अनिलः-प्राणरूपसे वायुस्वरूप, २३५ धरणीधरः-वराह और शेषरूपसे पृथिवीको धारण करनेवाले ।। ३८ ।।
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग् विश्वभुग् विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ।। ३९ ।।
२३६ सुप्रसादः-शिशुपालादि अपराधियोंपर भी कृपा करनेवाले, २३७ प्रसन्नात्मा-प्रसन्न स्वभाववाले, २३८ विश्वधृक्-जगत्को धारण करनेवाले, २३९ विश्वभुक्-विश्वका पालन करनेवाले, २४० विश्वः-सर्वव्यापी, २४१ सत्कर्ता-भक्तोंका सत्कार करनेवाले, २४२ सत्कृतः-पूजितोंसे भी पूजित, २४३ साधुः-भक्तोंके कार्य साधनेवाले, २४४ जह्नुः-संहारके समय जीवोंका लय करनेवाले, २४५ नारायणः-जलमें शयन करनेवाले, २४६ नरः-भक्तोंको परमधाममें ले जानेवाले ।। ३९ ।।
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।। ४० ।।
२४७ असंख्येयः-जिसके नाम और गुणोंकी संख्या न की जा सके, २४८ अप्रमेयात्मा-किसीसे भी मापे न जा सकनेवाले, २४९ विशिष्टः-सबसे उत्कृष्ट, २५० शिष्टकृत्-श्रेष्ठ बनानेवाले, २५१ शुचिः-परम शुद्ध, २५२ सिद्धार्थः-इच्छित अर्थको सर्वथा सिद्ध कर चुकनेवाले, २५३ सिद्धसंकल्पः-सत्य-संकल्पवाले, २५४ सिद्धिदः-कर्म करनेवालोंको उनके अधिकारके अनुसार फल देनेवाले, २५५ सिद्धिसाधनः-सिद्धिरूप क्रियाके साधक ।। ४० ।।
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ।। ४१ ।।
२५६ वृषाही-द्वादशाहादि यज्ञोंको अपनेमें स्थित रखनेवाले, २५७ वृषभः-भक्तोंके लिये इच्छित वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, २५८ विष्णुः-शुद्ध सत्त्वमूर्ति, २५९ वृषपर्वा-