भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1425, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1425

१८१ महेष्वासः-महान् धनुषवाले, १८२ महीभर्ता-पृथ्वीको धारण करनेवाले, १८३ श्रीनिवासः-अपने वक्षःस्थलमें श्रीको निवास देनेवाले, १८४ सतां गतिः-सत्पुरुषोंके परम आश्रय, १८५ अनिरुद्धः-किसीके भी द्वारा न रुकनेवाले, १८६ सुरानन्दः-देवताओंको आनन्दित करनेवाले, १८७ गोविन्दः-वेदवाणीके द्वारा अपनेको प्राप्त करा देनेवाले, १८८ गोविदां पतिः-वेदवाणीको जाननेवालोंके स्वामी ।। ३३ ।। मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।। ३४ ।। १८९ मरीचिः-तेजस्वियोंके भी परम तेजरूप, १९० दमनः-प्रमाद करनेवाली प्रजाको यम आदिके रूपसे दमन करनेवाले, १९१ हंसः-पितामह ब्रह्माको वेदका ज्ञान करानेके लिये हंसरूप धारण करनेवाले, १९२ सुपर्णः-सुन्दर पंखवाले गरुड़स्वरूप, १९३ भुजगोत्तमः-सर्पोंमें श्रेष्ठ शेषनागरूप, १९४ हिरण्यनाभः-सुवर्णके समान रमणीय नाभिवाले, १९५ सुतपाः-बदरिकाश्रममें नर-नारायणरूपसे सुन्दर तप करनेवाले, १९६ पद्मनाभः-कमलके समान सुन्दर नाभिवाले, १९७ प्रजापतिः-सम्पूर्ण प्रजाओंके पालनकर्ता ।। ३४ ।। अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः संधाता सन्धिमान्स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ।। ३५ ।। १९८ अमृत्युः-मृत्युसे रहित, १९९ सर्वदृक्-सब कुछ देखनेवाले, २०० सिंहः-दुष्टोंका विनाश करनेवाले, २०१ संधाता-प्राणियोंको उनके कर्मोंके फलोंसे संयुक्त करनेवाले, २०२ सन्धिमान्-सम्पूर्ण यज्ञ और तपोंके फलोंको भोगनेवाले, २०३ स्थिरः-सदा एक रूप, २०४ अजः-दुर्गुणोंको दूर हटा देनेवाले, २०५ दुर्मर्षणः-किसीसे भी सहन नहीं किये जा सकनेवाले, २०६ शास्ता-सबपर शासन करनेवाले, २०७ विश्रुतात्मा-वेदशास्त्रोंमें प्रसिद्ध स्वरूपवाले, २०८ सुरारिहा-देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाले ।। ३५ ।। गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ।। ३६ ।। २०९ गुरुः-सब विद्याओंका उपदेश करनेवाले, २१० गुरुतमः-ब्रह्मा आदिको भी ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले, २११ धाम-सम्पूर्ण जगत्के आश्रय, २१२ सत्यः-सत्यस्वरूप, २१३ सत्यपराक्रमः-अमोघ पराक्रमवाले, २१४ निमिषः-योगनिद्रासे मुँदे हुए नेत्रोंवाले, २१५ अनिमिषः-मत्स्यरूपसे अवतार लेनेवाले, २१६ स्रग्वी-वैजयन्तीमाला धारण करनेवाले, २१७ वाचस्पतिरुदारधीः-सारे पदार्थोंको प्रत्यक्ष करनेवाली बुद्धिसे युक्त समस्त विद्याओंके पति ।। ३६ ।। अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ।। ३७ ।।