महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1428, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार त्रिदेवस्वरूप, २९८ कामप्रदः-भक्तोंको उनकी कामना की हुई वस्तुएँ प्रदान करनेवाले, २९९ प्रभुः-सर्वसामर्थ्यवान् ॥ ४५ ॥
युगादिकृद् युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्योऽव्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ४६ ॥
३०० युगादिकृत्-युगादिका आरम्भ करनेवाले, ३०१ युगावर्तः-चारों युगोंको चक्रके समान घुमानेवाले, ३०२ नैकमायः-अनेक मायाओंको धारण करनेवाले, ३०३ महाशनः-कल्पके अन्तमें सबको ग्रसन करनेवाले, ३०४ अदृश्यः-समस्त ज्ञानेन्द्रियोंके अविषय, ३०५ अव्यक्तरूपः-निराकार स्वरूपवाले, ३०६ सहस्रजित्-युद्धमें हजारों देवशत्रुओंको जीतनेवाले, ३०७ अनन्तजित्-युद्ध और क्रीड़ा आदिमें सर्वत्र समस्त भूतोंको जीतनेवाले ॥ ४६ ॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ४७ ॥
३०८ इष्टः-परमानन्दरूप होनेसे सर्वप्रिय, ३०९ अविशिष्टः-सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, ३१० शिष्टेष्टः-शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, ३११ शिखण्डी-मयूरपिच्छको अपना शिरोभूषण बना लेनेवाले, ३१२ नहुषः-भूतोंको मायासे बाँधनेवाले, ३१३ वृषः-कामनाओंको पूर्ण करनेवाले धर्मस्वरूप, ३१४ क्रोधहा-क्रोधका नाश करनेवाले, ३१५ क्रोधकृत्कर्ता-क्रोध करनेवाले दैत्यादिके विनाशक, ३१६ विश्वबाहुः-सब ओर बाहुओंवाले, ३१७ महीधरः-पृथ्वीको धारण करनेवाले ॥ ४७ ॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ४८ ॥
३१८ अच्युतः-छः भावविकारोंसे रहित, ३१९ प्रथितः-जगत्की उत्पत्ति आदि कर्मोंके कारण विख्यात, ३२० प्राणः-हिरण्यगर्भरूपसे प्रजाको जीवित रखनेवाले, ३२१ प्राणदः-सबका भरण-पोषण करनेवाले, ३२२ वासवानुजः-वामनावतारमें इन्द्रके अनुजरूपमें उत्पन्न होनेवाले, ३२३ अपां निधिः-जलको एकत्र रखनेवाले समुद्ररूप, ३२४ अधिष्ठानम्-उपादान कारणरूपसे सब भूतोंके आश्रय, ३२५ अप्रमत्तः-कभी प्रमाद न करनेवाले, ३२६ प्रतिष्ठितः-अपनी महिमामें स्थित ॥ ४८ ॥
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरंदरः ॥ ४९ ॥
३२७ स्कन्दः-स्वामिकार्तिकेयरूप, ३२८ स्कन्दधरः-धर्मपथको धारण करनेवाले, ३२९ धुर्यः-समस्त भूतोंके जन्मादिरूप धुरको धारण करनेवाले, ३३० वरदः-इच्छित वर देनेवाले, ३३१ वायुवाहनः-सारे वायुभेदोंको चलानेवाले, ३३२ वासुदेवः-सब भूतोंमें सर्वात्मारूपसे बसनेवाले, ३३३ बृहद्भानुः-महान् किरणोंसे युक्त एवं सम्पूर्ण जगत्को