भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1420, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1420

कल्पके आदिमें जिससे सम्पूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं और फिर युगका क्षय होनेपर महाप्रलयमें जिसमें वे विलीन हो जाते हैं, उस लोकप्रधान, संसारके स्वामी, भगवान् विष्णुके हजार नामोंको मुझसे सुनो, जो पाप और संसार-भयको दूर करनेवाले हैं ॥ ९—१२ ॥

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १३ ॥
महान् आत्मस्वरूप विष्णुके जो नाम गुणके कारण प्रवृत्त हुए हैं, उनमेंसे जो-जो प्रसिद्ध हैं और मन्त्रद्रष्टा मुनियोंद्वारा जो सर्वत्र गाये गये हैं, उन समस्त नामोंको पुरुषार्थ-सिद्धिके लिये वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥

ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद् भूतभृद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १४ ॥
ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १ विश्वम्-विराट्स्वरूप, २ विष्णुः-सर्वव्यापी, ३ वषट्कारः-जिनके उद्देश्यसे यज्ञमें वषट् क्रिया की जाती है, ऐसे यज्ञस्वरूप, ४ भूतभव्यभवत्प्रभुः-भूत, भविष्यत् और वर्तमानके स्वामी, ५ भूतकृत्-रजोगुणको स्वीकार करके ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी रचना करनेवाले, ६ भूतभृत्-सत्त्वगुणको स्वीकार करके सम्पूर्ण भूतोंका पालन-पोषण करनेवाले, ७ भावः-नित्यस्वरूप होते हुए भी स्वतः उत्पन्न होनेवाले, ८ भूतात्मा-सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, ९ भूतभावनः-भूतोंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले ॥ १४ ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ १५ ॥
१० पूतात्मा-पवित्रात्मा, ११ परमात्मा-परमश्रेष्ठ नित्यशुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव, १२ मुक्तानां परमा गतिः-मुक्त पुरुषोंकी सर्वश्रेष्ठ गतिस्वरूप, १३ अव्ययः-कभी विनाशको प्राप्त न होनेवाले, १४ पुरुषः-पुर अर्थात् शरीरमें शयन करनेवाले, १५ साक्षी-बिना किसी व्यवधानके सब कुछ देखनेवाले, १६ क्षेत्रज्ञः-क्षेत्र अर्थात् समस्त प्रकृतिरूप शरीरको पूर्णतया जाननेवाले, १७ अक्षरः-कभी क्षीण न होनेवाले ॥ १५ ॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ १६ ॥
१८ योगः-मनसहित सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके निरोधरूप योगसे प्राप्त होनेवाले, १९ योगविदां नेता-योगको जाननेवाले भक्तोंके स्वामी, २० प्रधानपुरुषेश्वरः-प्रकृति और पुरुषके स्वामी, २१ नारसिंहवपुः-मनुष्य और सिंह दोनोंके-जैसा शरीर धारण करनेवाले नरसिंहरूप, २२ श्रीमान्-वक्षःस्थलमें सदा श्रीको धारण करनेवाले, २३ केशवः-(क) ब्रह्मा, (अ) विष्णु और (ईश) महादेव—इस प्रकार त्रिमूर्तिस्वरूप, २४ पुरुषोत्तमः-क्षर और अक्षर—इन दोनोंसे सर्वथा उत्तम ॥ १६ ॥