महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1473, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
वायुद्वारा उदाहरणसहित ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन
वायुरुवाच
शृणु मूढ गुणान् कांश्चिद् ब्राह्मणानां महात्मनाम् ।
ये त्वया कीर्तिता राजंस्तेभ्योऽथ ब्राह्मणो वरः ॥ १ ॥
वायुने कहा— मूढ़! मैं महात्मा ब्राह्मणोंके कुछ गुणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। राजन्! तुमने पृथ्वी, जल और अग्नि आदि जिन व्यक्तियोंका नाम लिया है, उन सबकी अपेक्षा ब्राह्मण श्रेष्ठ है ॥ १ ॥
त्यक्त्वा महीत्वं भूमीस्तु स्पर्धयाङ्गनृपस्य ह ।
नाशं जगाम तां विप्रो व्यस्तम्भयत कश्यपः ॥ २ ॥
एक समयकी बात है, राजा अंगके साथ स्पर्धा (लाग-डाट) होनेके कारण पृथ्वीकी अधिष्ठात्री देवी अपने लोक-धर्म धारणरूप शक्तिका परित्याग करके अदृश्य हो गयीं। उस समय विप्रवर कश्यपने अपने तपोबलसे इस स्थूल पृथ्वीको थाम रखा था ॥ २ ॥
अजेया ब्राह्मणा राजन् दिवि चेह च नित्यदा ।
अपिबत् तेजसा ह्यापः स्वयमेवाङ्गिराः पुरा ॥ ३ ॥
स ताः पिबन् क्षीरमिव नातृप्यत महामनाः ।
अपूरयन्महौघेन महीं सर्वां च पार्थिव ॥ ४ ॥
राजन्! ब्राह्मण इस मर्त्यलोक और स्वर्गलोकमें भी अजेय हैं। पहलेकी बात है, महामना अंगिरा मुनि जलको दूधकी भाँति पी गये थे। उस समय उन्हें पीनेसे तृप्ति ही नहीं होती थी। अतः पीते-पीते वे अपने तेजसे पृथ्वीका सारा जल पी गये। पृथिवीनाथ! तत्पश्चात् उन्होंने जलका महान् स्रोत बहाकर सम्पूर्ण पृथ्वीको भर दिया ॥ ३-४ ॥
तस्मिन्नहं च क्रुद्धे वै जगत् त्यक्त्वा ततो गतः ।
व्यतिष्ठमग्निहोत्रे च चिरमङ्गिरसो भयात् ॥ ५ ॥
वे ही अंगिरा मुनि एक बार मेरे ऊपर कुपित हो गये थे। उस समय उनके भयसे इस जगत्को त्यागकर मुझे दीर्घकालतक अग्निहोत्रकी अग्निमें निवास करना पड़ा था ॥ ५ ॥
अथ शप्तश्च भगवान् गौतमेन पुरन्दरः ।
अहल्यां कामयानो वै धर्मार्थं च न हिंसितः ॥ ६ ॥
महर्षि गौतमने ऐश्वर्यशाली इन्द्रको अहल्यापर आसक्त होनेके कारण शाप दे दिया था। केवल धर्मकी रक्षाके लिये उनके प्राण नहीं लिये ॥ ६ ॥
तथा समुद्रो नृपते पूर्णो मृष्टस्य वारिणः ।
ब्राह्मणैरभिशप्तश्च बभूव लवणोदकः ॥ ७ ॥