महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1529, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मूर्ख मनुष्य प्रमाणको भी अप्रमाण बनाता है, उसकी बातको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वह केवल विवाद करनेवाला है ।। २५ ।। ब्राह्मणानेव सेवस्व सत्कृत्य बहुमन्य च । एतेष्वेव त्विमे लोकाः कृत्स्ना इति निबोध तान् ।। २६ ।। तुम ब्राह्मणोंका ही विशेष आदर-सत्कार करके उनकी सेवामें लगे रहो और यह जान लो कि ये सम्पूर्ण लोक ब्राह्मणोंके ही आधारपर टिके हुए हैं ।। २६ ।।
युधिष्ठिर उवाच
ये च धर्ममसूयन्ते ये चैनं पर्युपासते । ब्रवीतु मे भवानेतत् क्व ते गच्छन्ति तादृशाः ।। २७ ।। युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जो मनुष्य धर्मकी निन्दा करते हैं और जो धर्मका आचरण करते हैं, वे किन लोकोंमें जाते हैं? आप इस विषयका वर्णन कीजिये ।। २७ ।।
भीष्म उवाच
रजसा तमसा चैव समवस्तीर्णचेतसः । नरकं प्रतिपद्यन्ते धर्मविद्वेषिणो जनाः ।। २८ ।। भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! जो मनुष्य रजोगुण और तमोगुणसे मलिन चित्त होनेके कारण धर्मसे द्रोह करते हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ।। २८ ।। ये तु धर्मं महाराज सततं पर्युपासते । सत्यार्जवपराः सन्तस्ते वै स्वर्गभुजो नराः ।। २९ ।। महाराज! जो सत्य और सरलतामें तत्पर होकर सदा धर्मका पालन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकका सुख भोगते हैं ।। २९ ।। धर्म एव गतिस्तेषामाचार्योपासनाद् भवेत् । देवलोकं प्रपद्यन्ते ये धर्मं पर्युपासते ।। ३० ।। आचार्यकी सेवा करनेसे मनुष्योंको एकमात्र धर्मका ही सहारा रहता है और जो धर्मकी उपासना करते हैं, वे देवलोकमें जाते हैं ।। ३० ।। मनुष्या यदि वा देवाः शरीरमुपताप्य वै । धर्मिणः सुखमेधन्ते लोभद्वेषविवर्जिताः ।। ३१ ।। मनुष्य हों या देवता, जो शरीरको कष्ट देकर भी धर्माचरणमें लगे रहते हैं तथा लोभ और द्वेषका त्याग कर देते हैं, वे सुखी होते हैं ।। ३१ ।। प्रथमं ब्रह्मणः पुत्रं धर्ममाहुर्मनीषिणः । धर्मिणः पर्युपासन्ते फलं पक्वमिवाशयः ।। ३२ ।। मनीषी पुरुष धर्मको ही ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं। जैसे खानेवालोंका मन पके हुए फलको अधिक पसंद करता है, उसी प्रकार धर्मनिष्ठ पुरुष धर्मकी ही उपासना करते