महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जो मूर्ख मनुष्य प्रमाणको भी अप्रमाण बनाता है, उसकी बातको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वह केवल विवाद करनेवाला है ।। २५ ।। ब्राह्मणानेव सेवस्व सत्कृत्य बहुमन्य च । एतेष्वेव त्विमे लोकाः कृत्स्ना इति निबोध तान् ।। २६ ।। तुम ब्राह्मणोंका ही विशेष आदर-सत्कार करके उनकी सेवामें लगे रहो और यह जान लो कि ये सम्पूर्ण लोक ब्राह्मणोंके ही आधारपर टिके हुए हैं ।। २६ ।।
युधिष्ठिर उवाच
ये च धर्ममसूयन्ते ये चैनं पर्युपासते । ब्रवीतु मे भवानेतत् क्व ते गच्छन्ति तादृशाः ।। २७ ।। युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जो मनुष्य धर्मकी निन्दा करते हैं और जो धर्मका आचरण करते हैं, वे किन लोकोंमें जाते हैं? आप इस विषयका वर्णन कीजिये ।। २७ ।।
भीष्म उवाच
रजसा तमसा चैव समवस्तीर्णचेतसः । नरकं प्रतिपद्यन्ते धर्मविद्वेषिणो जनाः ।। २८ ।। भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! जो मनुष्य रजोगुण और तमोगुणसे मलिन चित्त होनेके कारण धर्मसे द्रोह करते हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ।। २८ ।। ये तु धर्मं महाराज सततं पर्युपासते । सत्यार्जवपराः सन्तस्ते वै स्वर्गभुजो नराः ।। २९ ।। महाराज! जो सत्य और सरलतामें तत्पर होकर सदा धर्मका पालन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकका सुख भोगते हैं ।। २९ ।। धर्म एव गतिस्तेषामाचार्योपासनाद् भवेत् । देवलोकं प्रपद्यन्ते ये धर्मं पर्युपासते ।। ३० ।। आचार्यकी सेवा करनेसे मनुष्योंको एकमात्र धर्मका ही सहारा रहता है और जो धर्मकी उपासना करते हैं, वे देवलोकमें जाते हैं ।। ३० ।। मनुष्या यदि वा देवाः शरीरमुपताप्य वै । धर्मिणः सुखमेधन्ते लोभद्वेषविवर्जिताः ।। ३१ ।। मनुष्य हों या देवता, जो शरीरको कष्ट देकर भी धर्माचरणमें लगे रहते हैं तथा लोभ और द्वेषका त्याग कर देते हैं, वे सुखी होते हैं ।। ३१ ।। प्रथमं ब्रह्मणः पुत्रं धर्ममाहुर्मनीषिणः । धर्मिणः पर्युपासन्ते फलं पक्वमिवाशयः ।। ३२ ।। मनीषी पुरुष धर्मको ही ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं। जैसे खानेवालोंका मन पके हुए फलको अधिक पसंद करता है, उसी प्रकार धर्मनिष्ठ पुरुष धर्मकी ही उपासना करते
हैं ॥ ३२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
असतां कीदृशं रूपं साधवः किं च कुर्वते ।
ब्रवीतु मे भवानेतत् सन्तोऽसन्तश्च कीदृशाः ॥ ३३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! असाधु पुरुषोंका रूप कैसा होता है? साधु पुरुष कौन-सा कर्म करते हैं? साधु और असाधु कैसे होते हैं? आप यह बात मुझे बताइये ॥ ३३ ॥
भीष्म उवाच
दुराचाराश्च दुर्धर्षा दुर्मुखाश्चाप्यसाधवः ।
साधवः शीलसम्पन्नाः शिष्टाचारस्य लक्षणम् ॥ ३४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! असाधु या दुष्ट पुरुष दुराचारी, दुर्धर्ष (उद्दण्ड) और दुर्मुख (कटुवचन बोलनेवाले) होते हैं तथा साधु पुरुष सुशील हुआ करते हैं। अब शिष्टाचारका लक्षण बताया जाता है ॥ ३४ ॥
राजमार्गे गवां मध्ये धान्यमध्ये च धर्मिणः ।
नोपसेवन्ति राजेन्द्र सर्गं मूत्रपुरीषयोः ॥ ३५ ॥
धर्मात्मा पुरुष सड़कपर, गौओंके बीचमें तथा खेतमें लगे हुए धान्यके भीतर मल-मूत्रका त्याग नहीं करते हैं ॥ ३५ ॥
पञ्चानामशनं दत्त्वा शेषमश्नन्ति साधवः ।
न जल्पन्ति च भुञ्जाना न निद्रान्त्यार्द्रपाणयः ॥ ३६ ॥
साधु पुरुष देवता, पितर, भूत, अतिथि और कुटुम्बी—इन पाँचोंको भोजन देकर शेष अन्नका स्वयं आहार करते हैं। वे खाते समय बातचीत नहीं करते तथा भीगे हाथ लिये शयन नहीं करते हैं ॥ ३६ ॥
चित्रभानुमनड्वाहं देवं गोष्ठं चतुष्पथम् ।
ब्राह्मणं धार्मिकं वृद्धं ये कुर्वन्ति प्रदक्षिणम् ॥ ३७ ॥
वृद्धानां भारतप्तानां स्त्रीणां चक्रधरस्य च ।
ब्राह्मणानां गवां राज्ञां पन्थानं ददते च ये ॥ ३८ ॥
जो लोग अग्नि, वृषभ, देवता, गोशाला, चौराहा, ब्राह्मण, धार्मिक और वृद्ध पुरुषोंको दाहिने करके चलते हैं, जो बड़े-बूढ़ों, भारसे पीड़ित हुए मनुष्यों, स्त्रियों, जमींदार, ब्राह्मण, गौ तथा राजाको सामनेसे आते देखकर जानेके लिये मार्ग दे देते हैं, वे सब साधु पुरुष हैं ॥ ३७-३८ ॥
अतिथीनां च सर्वेषां प्रेष्याणां स्वजनस्य च ।
तथा शरणकामानां गोप्ता स्यात् स्वागतप्रदः ॥ ३९ ॥
सायंप्रातर्मनुष्याणामशनं देवनिर्मितम् ।
नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासविधिर्हि सः ॥ ४० ॥
सत्पुरुषको चाहिये कि वह सम्पूर्ण अतिथियों, सेवकों, स्वजनों तथा शरणार्थियोंका रक्षक एवं स्वागत करनेवाला बने। देवताओंने मनुष्योंके लिये सबेरे और सायंकाल दो ही समय भोजन करनेका विधान किया है। बीचमें भोजन करनेकी विधि नहीं देखी जाती। इस नियमका पालन करनेसे उपवासका ही फल होता है ॥ ३९-४० ॥
होमकाले यथा वह्निः कालमेव प्रतीक्षते ।
ऋतुकाले तथा नारी ऋतुमेव प्रतीक्षते ॥ ४१ ॥
जैसे होमकालमें अग्निदेव होमकी ही प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार ऋतुकालमें स्त्री ऋतुकी ही प्रतीक्षा करती है ॥ ४१ ॥
नान्यदा गच्छते यस्तु ब्रह्मचर्यं च तत् स्मृतम् ।
अमृतं ब्राह्मणा गाव इत्येतत् त्रयमेकतः ।
तस्माद् गोब्राह्मणं नित्यमर्चयेत यथाविधि ॥ ४२ ॥
जो ऋतुकालके सिवा और कभी स्त्रीके पास नहीं जाता, उसका वह बर्ताव ब्रह्मचर्य कहा गया है। अमृत, ब्राह्मण और गौ—ये तीनों एक स्थानसे प्रकट हुए हैं। अतः गौ तथा ब्राह्मणकी सदा विधिपूर्वक पूजा करे ॥ ४२ ॥
स्वदेशे परदेशे वाप्यतिथिं नोपवासयेत् ।
कर्म वै सफलं कृत्वा गुरूणां प्रतिपादयेत् ॥ ४३ ॥
स्वदेश या परदेशमें किसी अतिथिको भूखा न रहने दे। गुरुने जिस कामके लिये आज्ञा दी हो, उसे सफल करके उन्हें सूचित कर देना चाहिये ॥ ४३ ॥
गुरुभ्यस्त्वासनं देयमभिवाद्याभिपूज्य च ।
गुरुमभ्यर्च्य वर्धन्ते आयुषा यशसा श्रिया ॥ ४४ ॥
गुरुके आनेपर उन्हें प्रणाम करे और विधिवत् पूजा करके उन्हें बैठनेके लिये आसन दे। गुरुकी पूजा करनेसे मनुष्यके यश, आयु और श्रीकी वृद्धि होती है ॥ ४४ ॥
वृद्धान् नाभिभवेज्जातु न चैतान् प्रेषयेदिति ।
नासीनः स्यात् स्थितेष्वेवमायुरस्य न रिष्यते ॥ ४५ ॥
वृद्ध पुरुषोंका कभी तिरस्कार न करे। उन्हें किसी कामके लिये न भेजे तथा यदि वे खड़े हों तो स्वयं भी बैठा न रहे। ऐसा करनेसे उस मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ॥ ४५ ॥
न नग्नामीक्षते नारीं न नग्नान् पुरुषानपि ।
मैथुनं सततं गुप्तमाहारं च समाचरेत् ॥ ४६ ॥
नंगी स्त्रीकी ओर न देखे, नग्न पुरुषोंकी ओर भी दृष्टिपात न करे। मैथुन और भोजन सदा एकान्त स्थानमें ही करे ॥ ४६ ॥
तीर्थानां गुरवस्तीर्थं चोक्षाणां हृदयं शुचि ।
दर्शनानां परं ज्ञानं संतोषः परमं सुखम् ॥ ४७ ॥ तीर्थोंमें सर्वोत्तम तीर्थ गुरुजन ही हैं, पवित्र वस्तुओंमें हृदय ही अधिक पवित्र है। दर्शनों (ज्ञानों)-में परमार्थतत्त्वका ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है तथा संतोष ही सबसे उत्तम सुख है ॥ ४७ ॥
सायं प्रातश्च वृद्धानां शृणुयात् पुष्कला गिरः । श्रुतमाप्नोति हि नरः सततं वृद्धसेवया ॥ ४८ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल वृद्ध पुरुषोंकी कही हुई बातें पूरी-पूरी सुननी चाहिये। सदा वृद्ध पुरुषोंकी सेवासे मनुष्यको शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् । यच्छेद्वाङ्मनसी नित्यमिन्द्रियाणि तथैव च ॥ ४९ ॥ स्वाध्याय और भोजनके समय दाहिना हाथ उठाना चाहिये तथा मन, वाणी और इन्द्रियोंको सदा अपने अधीन रखना चाहिये ॥ ४९ ॥
संस्कृतं पायसं नित्यं यवागूं कृसरं हविः । अष्टकाः पितृदैवत्या ग्रहाणामभिपूजनम् ॥ ५० ॥ अच्छे ढंगसे बनायी हुई खीर, हलुआ, खिचड़ी और हविष्य आदिके द्वारा देवताओं तथा पितरोंका अष्टका श्राद्ध करना चाहिये। नवग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ ५० ॥
श्मश्रुकर्मणि मङ्गल्यं क्षुतानामभिनन्दनम् । व्याधितानां च सर्वेषामायुषामभिनन्दनम् ॥ ५१ ॥ मूँछ और दाढ़ी बनवाते समय मङ्गलसूचक शब्दोंका उच्चारण करना चाहिये। छींकनेवालेको (शतंजीव आदि कहकर) आशीर्वाद देना तथा रोगग्रस्त पुरुषोंका उनके दीर्घायु होनेकी शुभ कामना करते हुए अभिनन्दन करना चाहिये ॥ ५१ ॥
न जातु त्वमिति ब्रूयादापन्नोऽपि महत्तरम् । त्वंकारो वा वधो वेति विद्वत्सु न विशिष्यते ॥ ५२ ॥ युधिष्ठिर! तुम कभी बड़े-से-बड़े संकट पड़नेपर भी किसी श्रेष्ठ पुरुषके प्रति तुमका प्रयोग न करना। किसीको तुम कहकर पुकारना या उसका वध कर डालना—इन दोनोंमें विद्वान् पुरुष कोई अन्तर नहीं मानते ॥ ५२ ॥
अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत् । पापमाचक्षते नित्यं हृदयं पापकर्मिणः ॥ ५३ ॥ जो अपने बराबरके हों, अपनेसे छोटे हों अथवा शिष्य हों, उनको 'तुम' कहनमें कोई हर्ज नहीं है। पापकर्मी पुरुषका हृदय ही उसके पापको प्रकट कर देता है ॥ ५३ ॥
ज्ञानपूर्वकृतं कर्म च्छादयन्ते ह्यसाधवः । ज्ञानपूर्वं विनश्यन्ति गूहमाना महाजने ॥ ५४ ॥ दुष्ट मनुष्य जान-बूझकर किये हुए पापकर्मोंको भी दूसरेसे छिपानेका प्रयत्न करते हैं; किंतु महापुरुषोंके सामने अपने किये हुए पापोंको गुप्त रखनेके कारण वे नष्ट हो जाते
हैं ॥ ५४ ॥ न मां मनुष्याः पश्यन्ति न मां पश्यन्ति देवताः । पापेनापिहितः पापः पापमेवाभिजायते ॥ ५५ ॥ 'मुझे पाप करते समय न मनुष्य देखते हैं और न देवता ही देख पाते हैं।' ऐसा सोचकर पापसे आच्छादित हुआ पापात्मा पुरुष पापयोनिमें ही जन्म लेता है? ॥ ५५ ॥ यथा वार्धुषिको वृद्धिं दिनभेदे प्रतीक्षते । धर्मेण पिहितं पापं धर्ममेवाभिवर्धयेत् ॥ ५६ ॥ जैसे सूदखोर जितने ही दिन बीतते हैं, उतनी ही वृद्धिकी प्रतीक्षा करता है। उसी प्रकार पाप बढ़ता है, परंतु यदि उस पापको धर्मसे दबा दिया जाय तो वह धर्मकी वृद्धि करता है ॥ ५६ ॥ यथा लवणमम्भोभिराप्लुतं प्रविलीयते । प्रायश्चित्तहतं पापं तथा सद्यः प्रणश्यति ॥ ५७ ॥ जैसे नमककी डली जलमें डालनेसे गल जाती है, उसी प्रकार प्रायश्चित्त करनेसे तत्काल पापका नाश हो जाता है ॥ ५७ ॥ तस्मात् पापं न गूहेत गूहमानं विवर्धयेत् । कृत्वा तत् साधुष्वाख्येयं ते तत् प्रशमयन्त्युत ॥ ५८ ॥ इसलिये अपने पापको न छिपाये। छिपाया हुआ पाप बढ़ता है। यदि कभी पाप बन गया हो तो उसे साधु पुरुषोंसे कह देना चाहिये। वे उसकी शान्ति कर देते हैं ॥ ५८ ॥ आशया संचितं द्रव्यं कालेनैवोपभुज्यते । अन्ये चैतत् प्रपद्यन्ते वियोगे तस्य देहिनः ॥ ५९ ॥ आशासे संचित किये हुए द्रव्यका काल ही उपभोग करता है। उस मनुष्यका शरीरसे वियोग होनेपर उस धनको दूसरे लोग प्राप्त करते हैं ॥ ५९ ॥ मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः । तस्मात् सर्वाणि भूतानि धर्ममेव समासते ॥ ६० ॥ मनीषी पुरुष धर्मको समस्त प्राणियोंका हृदय कहते हैं। अतः समस्त प्राणियोंको धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये ॥ ६० ॥ एक एव चरेद् धर्मं न धर्मध्वजिको भवेत् । धर्मवाणिजका ह्येते ये धर्ममुपभुञ्जते ॥ ६१ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह अकेला ही धर्मका आचरण करे। धर्मध्वजी (धर्मका दिखावा करनेवाला) न बने। जो धर्मको जीविकाका साधन बनाते हैं, उसके नामपर जीविका चलाते हैं, वे धर्मके व्यवसायी हैं ॥ ६१ ॥ अर्चेद् देवानदम्भेन सेवेतामायया गुरून् । निधिं निदध्यात् पारत्र्यं यात्रार्थं दानशब्दितम् ॥ ६२ ॥
दम्भका परित्याग करके देवताओंकी पूजा करे। छल-कपट छोड़कर गुरुजनोंकी सेवा करे और परलोककी यात्राके लिये दान नामक निधिका संग्रह करे; अर्थात् पारलौकिक लाभके लिये मुक्तहस्त होकर दान करे ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रमाणकथने द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मके प्रमाणका वर्णनविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६२ ॥
१६३-
त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका विद्या, बल और बुद्धिकी अपेक्षा भाग्यकी प्रधानता बताना और भीष्मजीद्वारा उसका उत्तर
युधिष्ठिर उवाच
नाभागधेयः प्राप्नोति धनं सुबलवानपि ।
भागधेयान्वितस्त्वर्थान् कृशो बालश्च विन्दति ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! भाग्यहीन मनुष्य बलवान् हो तो भी उसे धन नहीं मिलता और जो भाग्यवान् है, वह बालक एवं दुर्बल होनेपर भी बहुत-सा धन प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥
नालाभकाले लभते यत्नेऽपि कृते सति ।
लाभकालेऽप्रयत्नेन लभते विपुलं धनम् ॥ २ ॥
जबतक धनकी प्राप्तिका समय नहीं आता तबतक विशेष यत्न करनेपर भी कुछ हाथ नहीं लगता; किंतु लाभका समय आनेपर मनुष्य बिना यत्नके भी बहुत बड़ी सम्पत्ति पा लेता है ॥ २ ॥
कृतयत्नाफलाश्चैव दृश्यन्ते शतशो नराः ।
अयत्नेनैधमानाश्च दृश्यन्ते बहवो जनाः ॥ ३ ॥
ऐसे सैकड़ों मनुष्य देखे जाते हैं, जो धनकी प्राप्तिके लिये यत्न करनेपर भी सफल न हो सके और बहुत-से ऐसे मनुष्य भी दृष्टिगोचर होते हैं, जिनका धन बिना यत्नके ही दिनों-दिन बढ़ रहा है ॥ ३ ॥
यदि यत्नो भवेन्मर्त्यः स सर्वं फलमाप्नुयात् ।
नालभ्यं चोपलभ्येत नृणां भरतसत्तम ॥ ४ ॥
भरतभूषण! यदि प्रयत्न करनेपर सफलता मिलनी अनिवार्य होती तो मनुष्य सारा फल प्राप्त कर लेता; किंतु जो वस्तु प्रारब्धवश मनुष्यके लिये अलभ्य है, वह उद्योग करनेपर भी नहीं मिल सकती ॥ ४ ॥
प्रयत्नं कृतवन्तोऽपि दृश्यन्ते ह्यफला नराः ।
मार्गत्यायशतैरर्थानमार्गश्चापरः सुखी ॥ ५ ॥
प्रयत्न करनेवाले मनुष्य भी असफल देखे जाते हैं। कोई सैकड़ों उपाय करके धनकी खोज करता रहता है और कोई कुमार्गपर ही चलकर धनकी दृष्टिसे सुखी दिखायी देता है ॥ ५ ॥
अकार्यमसकृत् कृत्वा दृश्यन्ते ह्यधना नराः ।
धनयुक्ताः स्वकर्मस्था दृश्यन्ते चापरेऽधनाः ॥ ६ ॥ कितने ही मनुष्य अनेक बार कुकर्म करके भी निर्धन ही देखे जाते हैं। कितने ही अपने धर्मानुकूल कर्तव्यका पालन करके धनवान् हो जाते और कोई निर्धन ही रह जाते हैं ॥ ६ ॥
अधीत्य नीतिशास्त्राणि नीतियुक्तो न दृश्यते । अनभिज्ञश्च साचिव्यं गमितः केन हेतुना ॥ ७ ॥ कोई मनुष्य नीतिशास्त्रका अध्ययन करके भी नीतियुक्त नहीं देखा जाता और कोई नीतिसे अनभिज्ञ होनेपर भी मन्त्रीके पदपर पहुँच जाता है। इसका क्या कारण है? ॥ ७ ॥
विद्यायुक्तो ह्यविद्यश्च धनवान् दुर्मतिस्तथा । यदि विद्यामुपाश्रित्य नरः सुखमवाप्नुयात् ॥ ८ ॥ न विद्वान् विद्यया हीनं वृत्त्यर्थमुपसंश्रयेत् । कभी-कभी विद्वान् और मूर्ख दोनों एक-जैसे धनी दिखायी देते हैं। कभी खोटी बुद्धिवाले मनुष्य तो धनवान् हो जाते हैं (और अच्छी बुद्धि रखनेवाले मनुष्यको थोड़ा-सा धन भी नहीं मिलता)। यदि विद्या पढ़कर मनुष्य अवश्य ही सुख पा लेता तो विद्वान्को जीविकाके लिये किसी मूर्ख धनीका आश्रय नहीं लेना पड़ता ॥ ८ १/२ ॥
यथा पिपासां जयति पुरुषः प्राप्य वै जलम् ॥ ९ ॥ इष्टार्थो विद्यया ह्येव न विद्यां प्रजहेन्नरः । जिस प्रकार पानी पीनेसे मनुष्यकी प्यास अवश्य बुझ जाती है, उसी प्रकार यदि विद्यासे अभीष्ट वस्तुकी सिद्धि अनिवार्य होती तो कोई भी मनुष्य विद्याकी उपेक्षा नहीं करता ॥ ९ १/२ ॥
नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि । तृणाग्रेणापि संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥ १० ॥ जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह सैकड़ों बाणोंसे बिंधकर भी नहीं मरता; परंतु जिसका काल आ पहुँचा है, वह तिनकेके अग्रभागसे छू जानेपर भी प्राणोंका परित्याग कर देता है ॥ १० ॥
भीष्म उवाच
ईहमानः समारम्भान् यदि नासादयेद् धनम् । उग्रं तपः समारोहेन्न ह्यनुप्तं प्ररोहति ॥ ११ ॥ **भीष्मजीने कहा—**बेटा! यदि नाना प्रकारकी चेष्टा तथा अनेक उद्योग करनेपर भी मनुष्य धन न पा सके तो उसे उग्र तपस्या करनी चाहिये; क्योंकि बीज बोये बिना अंकुर नहीं पैदा होता ॥ ११ ॥
दानेन भोगी भवति मेधावी वृद्धसेवया ।
अहिंसया च दीर्घायुरिति प्राहुर्मनीषिणः ॥ १२ ॥
मनीषी पुरुष कहते हैं कि मनुष्य दान देनेसे उपभोगकी सामग्री पाता है। बड़े-बूढ़ोंकी सेवासे उसको उत्तम बुद्धि प्राप्त होती है और अहिंसा धर्मके पालनसे वह दीर्घजीवी होता है ॥ १२ ॥
तस्माद् दद्यान्न याचेत पूजयेद् धार्मिकानपि ।
सुभाषी प्रियकृच्छान्तः सर्वसत्त्वाविहिंसकः ॥ १३ ॥
इसलिये स्वयं दान दे, दूसरोंसे याचना न करे, धर्मात्मा पुरुषोंकी पूजा करे, उत्तम वचन बोले, सबका भला करे, शान्तभावसे रहे और किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे ॥ १३ ॥
यदा प्रमाणं प्रसवः स्वभावश्च सुखासुखे ।
दंशकीटपिपीलानां स्थिरो भव युधिष्ठिर ॥ १४ ॥
युधिष्ठिर! डाँस, कीड़े और चींटी आदि जीवोंको उन-उन योनियोंमें उत्पन्न करके उन्हें सुख-दुःखकी प्राप्ति करानेमें उनका अपने किये हुए कर्मानुसार बना हुआ स्वभाव ही कारण है। यह सोचकर स्थिर हो जाओ ॥ १४ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रशंसायां
त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मकी प्रशंसाविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥
भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दुःखकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना
चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दुःखकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना
भीष्म उवाच
कार्यते यच्च क्रियते सच्चासच्व कृताकृतम् ।
तत्राश्वसीत सत्कृत्वा असत्कृत्वा न विश्वसेत् ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा— बेटा! मनुष्य जो शुभ और अशुभ कर्म करता या कराता है, उन दोनों प्रकारके कर्मोंमेंसे शुभ कर्मका अनुष्ठान करके उसे यह आश्वासन प्राप्त करना चाहिये कि इसका मुझे शुभ फल मिलेगा; किंतु अशुभ कर्म करनेपर उसे किसी अच्छा फल मिलनेका विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १ ॥
काल एव सर्वकाले निग्रहानुग्रहौ ददत् ।
बुद्धिमाविश्य भूतानां धर्माधर्मौ प्रवर्तते ॥ २ ॥
काल ही सदा निग्रह और अनुग्रह करता हुआ प्राणियोंकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो धर्म और अधर्मका फल देता रहता है ॥ २ ॥
तदा त्वस्य भवेद् बुद्धिर्धर्मार्थस्य प्रदर्शनात् ।
तदाश्वसीत धर्मात्मा दृढबुद्धिर्न विश्वसेत् ॥ ३ ॥
जब धर्मका फल देखकर मनुष्यकी बुद्धिमें धर्मकी श्रेष्ठताका निश्चय हो जाता है, तभी उसका धर्मके प्रति विश्वास बढ़ता है और तभी उसका मन धर्ममें लगता है। जबतक धर्ममें बुद्धि दृढ़ नहीं होती तबतक कोई उसपर विश्वास नहीं करता ॥ ३ ॥
एतावन्मात्रमेतद्धि भूतानां प्राज्ञलक्षणम् ।
कालयुक्तोऽप्युभयविच्छ्रेषं युक्तं समाचरेत् ॥ ४ ॥
प्राणियोंकी बुद्धिमत्ताकी यही पहचान है कि वे धर्मके फलमें विश्वास करके उसके आचरणमें लग जायें। जिसे कर्तव्य-अकर्तव्य दोनोंका ज्ञान है, उस पुरुषको चाहिये कि प्रतिकूल प्रारब्धसे युक्त होकर भी यथायोग्य धर्मका ही आचरण करे ॥ ४ ॥
यथा ह्युपस्थितैश्वर्याः प्रजायन्ते न राजसाः ।
एवमेवात्मनाऽऽत्मानं पूजयन्तीह धार्मिकाः ॥ ५ ॥
जो अतुल ऐश्वर्यके स्वामी हैं, वे यह सोचकर कि कहीं रजोगुणी होकर पुनः जन्म-मृत्युके चक्करमें न पड़ जायें, धर्मका अनुष्ठान करते हैं और इस प्रकार अपने ही प्रयत्नसे आत्माको महत् पदकी प्राप्ति कराते हैं ॥ ५ ॥
न ह्यधर्मतयाधर्मं दद्यात् कालः कथंचन ।
तस्माद् विशुद्धमात्मानं जानीयाद् धर्मचारिणम् ॥ ६ ॥ काल किसी तरह धर्मको अधर्म नहीं बना सकता अर्थात् धर्म करनेवालेको दुःख नहीं दे सकता। इसलिये धर्माचरण करनेवाले पुरुषको विशुद्ध आत्मा ही समझना चाहिये ॥ ६ ॥
स्प्रष्टुमप्यसमर्थो हि ज्वलन्तमिव पावकम् । अधर्मः संततो धर्मं कालेन परिरक्षितम् ॥ ७ ॥ धर्मका स्वरूप प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी है, काल उसकी सब ओरसे रक्षा करता है। अतः अधर्ममें इतनी शक्ति नहीं है कि वह फैलकर धर्मको छू भी सके ॥ ७ ॥
कार्यावेतौ हि धर्मेण धर्मो हि विजयावहः । त्रयाणामपि लोकानामालोकः कारणं भवेत् ॥ ८ ॥ विशुद्ध और पापके स्पर्शका अभाव—ये दोनों धर्मके कार्य हैं। धर्म विजयकी प्राप्ति करानेवाला और तीनों लोकोंमें प्रकाश फैलानेवाला है। वही इस लोककी रक्षाका कारण है ॥ ८ ॥
न तु कश्चिन्नयेत् प्राज्ञो गृहीत्वैव करे नरम् । उच्यमानस्तु धर्मेण धर्मलोकभयच्छले ॥ ९ ॥ कोई कितना ही बुद्धिमान् क्यों न हो, वह किसी मनुष्यका हाथ पकड़कर उसे बलपूर्वक धर्ममें नहीं लगा सकता; किंतु न्यायानुसार धर्ममय तथा लोकभयका बहाना लेकर उस पुरुषको धर्मके लिये कह सकता है ॥ ९ ॥
शूद्रोऽहं नाधिकारो मे चातुराश्रम्यसेवने । इति विज्ञानमपरे नात्मन्युपदधत्युत ॥ १० ॥ मैं शूद्र हूँ, अतः ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रमोंके सेवनका मुझे अधिकार नहीं है—शूद्र ऐसा सोचा करता है, परंतु साधु द्विजगण अपने भीतर छलको आश्रय नहीं देते हैं ॥ १० ॥
विशेषेण च वक्ष्यामि चातुर्वर्ण्यस्य लिङ्गतः । पञ्चभूतशरीराणां सर्वेषां सदृशात्मनाम् ॥ ११ ॥ लोकधर्मे च धर्मे च विशेषकरणं कृतम् । यथैकत्वं पुनर्यान्ति प्राणिनस्तत्र विस्तरः ॥ १२ ॥ अब मैं चारों वर्णोंका विशेषरूपसे लक्षण बता रहा हूँ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंके शरीर पञ्च महाभूतोंसे ही बने हुए हैं और सबका आत्मा एक-सा ही है। फिर भी उनके लौकिक धर्म और विशेष धर्ममें विभिन्नता रखी गयी है। इसका उद्देश्य यही है कि सब लोग अपने-अपने धर्मका पालन करते हुए पुनः एकत्वको प्राप्त हों। इसका शास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक वर्णन है ॥ ११-१२ ॥
अध्रुवो हि कथं लोकः स्मृतो धर्मः कथं ध्रुवः । यत्र कालो ध्रुवस्तात तत्र धर्मः सनातनः ॥ १३ ॥
तात! यदि कहो, धर्म तो नित्य माना गया है, फिर उससे स्वर्ग आदि अनित्य लोकोंकी प्राप्ति कैसे होती है? और यदि होती है तो वह नित्य कैसे है? तो इसका उत्तर यह है कि जब धर्मका संकल्प नित्य होता है अर्थात् अनित्य कामनाओंका त्याग करके निष्कामभावसे धर्मका अनुष्ठान किया जाता है, उस समय किये हुए धर्मसे सनातन लोक (नित्य परमात्मा)-की ही प्राप्ति होती है ।। १३ ।।
सर्वेषां तुल्यदेहानां सर्वेषां सदृशात्मनाम् ।
कालो धर्मेण संयुक्तः शेष एव स्वयं गुरुः ।। १४ ।।
सब मनुष्योंके शरीर एक-से होते हैं और सबका आत्मा भी समान ही है; किंतु धर्मयुक्त संकल्प ही यहाँ शेष रहता है, दूसरा नहीं। वह स्वयं ही गुरु है अर्थात् धर्मबलसे स्वयं ही उदित होता है ।। १४ ।।
एवं सति न दोषोऽस्ति भूतानां धर्मसेवने ।
तिर्यग्योनावपि सतां लोक एव मतो गुरुः ।। १५ ।।
ऐसी दशामें समस्त प्राणियोंके लिये पृथक्-पृथक् धर्म-सेवनमें कोई दोष नहीं है। तिर्यग्योनिमें पड़े हुए पशु-पक्षी आदि योनियोंके लिये भी यह लोक ही गुरु (कर्तव्याकर्तव्यका निर्देशक) है ।। १५ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रशंसायां चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मकी प्रशंसाविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६४ ।।
नित्यस्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओंके नाम-कीर्तनका माहात्म्य
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
नित्यस्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओंके नाम-कीर्तनका माहात्म्य
वैशम्पायन उवाच
शरतल्पगतं भीष्मं पाण्डवोऽथ कुरूद्वहः ।
युधिष्ठिरो हितं प्रेप्सुरपृच्छत् कल्मषापहम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर कुरुकुलतिलक पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने हितकी इच्छा रखकर बाणशय्यापर सोये हुए भीष्मजीसे यह पापनाशक विषय पूछा ।। १ ।।
युधिष्ठिर उवाच
किं श्रेयः पुरुषस्येह किं कुर्वन् सुखमेधते ।
विपाप्मा स भवेत् केन किं वा कल्मषनाशनम् ।। २ ।।
युधिष्ठिर बोले— पितामह! यहाँ मनुष्यके कल्याणका उपाय क्या है? क्या करनेसे वह सुखी होता है? किस कर्मके अनुष्ठानसे उसका पाप दूर होता है? अथवा कौन-सा कर्म पाप नष्ट करनेवाला है? ।। २ ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्मै शुश्रूषमाणाय भूयः शान्तनवस्तदा ।
दैवं वंशं यथान्यायमाचष्ट पुरुषर्षभ ।। ३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— पुरुषप्रवर जनमेजय! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने सुननेकी इच्छावाले युधिष्ठिरसे पुनः न्यायपूर्वक देववंशका वर्णन आरम्भ किया ।। ३ ।।
भीष्म उवाच
अयं दैवतवंशो वै ऋषिवंशसमन्वितः ।
त्रिसंध्यं पठितः पुत्र कल्मषापहरः परः ।। ४ ।।
यदह्ना कुरुते पापमिन्द्रियैः पुरुषश्चरन् ।
बुद्धिपूर्वमबुद्धिर्वा रात्रौ यच्चापि संध्ययोः ।। ५ ।।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः कीर्तयन् वै शुचिः सदा ।
नान्धो न बधिरः काले कुरुते स्वस्तिमान् सदा ।। ६ ।।
भीष्मजीने कहा— बेटा! यदि तीनों संध्याओंके समय देववंश और ऋषिवंशका पाठ किया जाय तो मनुष्य दिन-रात, सबेरे-शाम अपनी इन्द्रियोंके द्वारा जानकर या अनजानमें
जो-जो पाप करता है, उन सबसे छुटकारा पा जाता है तथा वह सदा पवित्र रहता है। देवर्षिवंशका कीर्तन करनेवाला पुरुष कभी अन्धा और बहरा न होकर सदा कल्याणका भागी होता है॥ ४—६॥
तिर्यग्योनिं न गच्छेच्च नरकं संकराणि च।
न च दुःखभयं तस्य मरणे स न मुह्यति ॥ ७ ॥
वह तिर्यग्योनि और नरकमें नहीं पड़ता, संकर-योनिमें जन्म नहीं लेता, कभी दुःखसे भयभीत नहीं होता और मृत्युके समय व्याकुल नहीं होता॥ ७॥
देवासुरगुरुर्देवः सर्वभूतनमस्कृतः।
अचिन्त्योऽथाप्यनिर्देश्यः सर्वप्राणो ह्ययोनिजः ॥ ८ ॥
पितामहो जगन्नाथः सावित्री ब्रह्मणः सती।
वेदभूरथ कर्ता च विष्णुर्नारायणः प्रभुः ॥ ९ ॥
उमापतिर्विरूपाक्षः स्कन्दः सेनापतिस्तथा।
विशाखो हुतभुग् वायुश्चन्द्रसूर्यो प्रभाकरौ ॥ १० ॥
शक्रः शचीपतिर्देवो यमो धूम्रोर्णया सह।
वरुणः सह गौर्या च सह ऋद्ध्या धनेश्वरः ॥ ११ ॥
सौम्या गौः सुरभिर्देवी विश्रवाश्च महानृषिः।
संकल्पः सागरो गङ्गा स्रवन्त्योऽथ मरुद्गणः ॥ १२ ॥
वालखिल्यास्तपःसिद्धाः कृष्णद्वैपायनस्तथा।
नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहूः ॥ १३ ॥
तुम्बुरुश्चित्रसेनश्च देवदूतश्च विश्रुतः।
देवकन्या महाभागा दिव्याश्चाप्सरसां गणाः ॥ १४ ॥
उर्वशी मेनका रम्भा मिश्रकेशी ह्यलम्बुषा।
विश्वाची च घृताची च पञ्चचूडा तिलोत्तमा ॥ १५ ॥
आदित्या वसवो रुद्राः साश्विनः पितरोऽपि च।
धर्मः श्रुतं तपो दीक्षा व्यवसायः पितामहः ॥ १६ ॥
शर्वर्यो दिवसाश्चैव मारीचः कश्यपस्तथा।
शुक्रो बृहस्पतिर्भौमो बुधो राहुः शनैश्चरः ॥ १७ ॥
नक्षत्राण्यृतवश्चैव मासाः पक्षाः सवत्सराः।
वैनतेयाः समुद्राश्च कद्रुजाः पन्नगास्तथा ॥ १८ ॥
शतद्रुश्च विपाशा च चन्द्रभागा सरस्वती।
सिंधुश्च देविका चैव प्रभासं पुष्कराणि च ॥ १९ ॥
गङ्गा महानदी वेणा कावेरी नर्मदा तथा।
कुलम्पुना विशल्या च करतोयाम्बुवाहिनी ॥ २० ॥
सरयूर्गण्डकी चैव लोहितश्च महानदः । ताम्रारुणा वेत्रवती पर्णाशा गौतमी तथा ॥ २१ ॥ गोदावरी च वेण्या च कृष्णवेणा तथाद्रिजा । दृषद्वती च कावेरी चक्षुर्मन्दाकिनी तथा ॥ २२ ॥ प्रयागं च प्रभासं च पुण्यं नैमिषमेव च । तच्च विश्वेश्वरस्थानं यत्र तद्विमलं सरः ॥ २३ ॥ पुण्यतीर्थं सुसलिलं कुरुक्षेत्रं प्रकीर्तितम् । सिंधूत्तमं तपोदानं जम्बूमार्गमथापि च ॥ २४ ॥ हिरण्वती वितस्ता च तथा प्लक्षवती नदी । वेदस्मृतिर्वेदवती मालवाथाश्ववत्यपि ॥ २५ ॥ भूमिभागास्तथा पुण्या गङ्गाद्वारमथापि च । ऋषिकुल्यास्तथा मेध्या नद्यः सिंधुवहास्तथा ॥ २६ ॥ चर्मण्वती नदी पुण्या कौशिकी यमुना तथा । नदी भीमरथी चैव बाहुदा च महानदी ॥ २७ ॥ माहेन्द्रवाणी त्रिविदा नीलिका च सरस्वती । नन्दा चापरनन्दा च तथा तीर्थमहाह्रदः ॥ २८ ॥ गयाथ फल्गुतीर्थं च धर्मारण्यं सुरैर्वृतम् । तथा देवनदी पुण्या सरश्च ब्रह्मनिर्मितम् ॥ २९ ॥ पुण्यं त्रिलोकविख्यातं सर्वपापहरं शिवम् । हिमवान् पर्वतश्चैव दिव्यौषधिसमन्वितः ॥ ३० ॥ विन्ध्यो धातुविचित्राङ्गस्तीर्थवानौषधान्वितः । मेरुर्महेन्द्रो मलयः श्वेतश्च रजतावृतः ॥ ३१ ॥ शृङ्गवान् मन्दरो नीलो निषधो दर्दुरस्तथा । चित्रकूटोऽजनाभश्च पर्वतो गन्धमादनः ॥ ३२ ॥ पुण्यः सोमगिरिश्चैव तथैवान्ये महीधराः । दिशश्च विदिशश्चैव क्षितिः सर्वे महीरुहाः ॥ ३३ ॥ विश्वेदेवा नभश्चैव नक्षत्राणि ग्रहास्तथा । पान्तु नः सततं देवाः कीर्तिताऽकीर्तिता मया ॥ ३४ ॥ (देवता और ऋषि आदिके वंशकी नामावली इस प्रकार है—) सर्वभूतनमस्कृत, देवासुरगुरु, अचिन्त्य, अनिर्देश्य सबके प्राणस्वरूप और अयोनिज (स्वयम्भू) जगदीश्वर पितामह भगवान् ब्रह्माजी, उनकी पत्नी सती सावित्री देवी, वेदोंके उत्पत्तिस्थान जगत्कर्ता भगवान् नारायण, तीन नेत्रोंवाले उमापति महादेव, देवसेनापति स्कन्द, विशाख, अग्नि, वायु, प्रकाश फैलानेवाले चन्द्रमा और सूर्य, शचीपति इन्द्र, यमराज, उनकी पत्नी धूमोर्णा,
अपनी पत्नी गौरीके साथ वरुण, ऋद्धिसहित कुबेर, सौम्य स्वभाववाली देवी सुरभी गौ, महर्षि विश्रवा, संकल्प, सागर, गंगा आदि नदियाँ, मरुद्गण, तपःसिद्ध वालखिल्य ऋषि, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, तुम्बुरु, चित्रसेन, विख्यात देवदूत, महासौभाग्यशालिनी देवकन्याएँ, दिव्य अप्सराओंके समुदाय, उर्वशी, मेनका, रम्भा, मिश्रकेशी, अलम्बुषा, विश्वाची, घृताची, पंचचूडा और तिलोत्तमा आदि दिव्य अप्सराएँ, बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, अश्विनीकुमार, पितर, धर्म, शास्त्रज्ञान, तपस्या, दीक्षा, व्यवसाय, पितामह, रात, दिन, मरीचिनन्दन कश्यप, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, बुध, राहु, शनैश्चर, नक्षत्र, ऋतु, मास, पक्ष, संवत्सर, विनताके पुत्र गरुड़, समुद्र, कद्रूके पुत्र सर्पगण, शतद्रु, विपाशा, चन्द्रभागा, सरस्वती, सिन्धु, देविका, प्रभास, पुष्कर, गंगा, महानदी, वेणा, कावेरी, नर्मदा, कुलम्पुना, विशल्या, करतोया, अम्बुवाहिनी, सरयू, गण्डकी, लाल जलवाला महानद शोणभद्र, ताम्रा, अरुणा, वेत्रवती, पर्णाशा, गौतमी, गोदावरी, वेण्या, कृष्णवेणा, अद्रिजा, दृषद्वती, कावेरी, चक्षु, मन्दाकिनी, प्रयाग, प्रभास, पुण्यमय नैमिषारण्य, जहाँ विश्वेश्वरका स्थान है वह विमल सरोवर, स्वच्छ सलिलसे युक्त पुण्यतीर्थ कुरुक्षेत्र, उत्तम समुद्र, तपस्या, दान, जम्बूमार्ग, हिरण्वती, वितस्ता, प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति वेदवती, मालवा, अश्ववती, पवित्र भूभाग, गंगाद्वार (हरिद्वार), ऋषिकुल्या, समुद्रगामिनी पवित्र नदियाँ, पुण्यसलिला चर्मण्वती नदी, कौशिकी, यमुना, भीमरथी, महानदी बाहुदा, माहेन्द्रावाणी, त्रिदिवा, नीलिका, सरस्वती, नन्दा, अपरनन्दा, तीर्थभूत महान् ह्रद, गया, फल्गुतीर्थ, देवताओंसे युक्त धर्मारण्य, पवित्र देवनदी, तीनों लोकोंमें विख्यात, पवित्र एवं सर्वपापनाशक कल्याणमय ब्रह्मनिर्मित सरोवर (पुष्करतीर्थ), दिव्य ओषधियोंसे युक्त हिमवान् पर्वत, नाना प्रकारके धातुओं, तीर्थों, औषधोंसे सुशोभित विन्ध्यगिरि, मेरु, महेन्द्र, मलय, चाँदीकी खानोंसे युक्त श्वेतगिरि, शृंगवान्, मन्दर, नील, निषध, दर्दुर, चित्रकूट, अजनाभ, गन्धमादन पर्वत, पवित्र सोमगिरि तथा अन्यान्य पर्वत, दिशा, विदिशा, भूमि, सभी वृक्ष, विश्वेदेव, आकाश, नक्षत्र और ग्रहगण—ये सदा हमारी रक्षा करें तथा जिनके नाम लिये गये हैं और जिनके नहीं लिये गये हैं, वे सम्पूर्ण देवता हमलोगोंकी रक्षा करते रहें ।। ८—३४ ।।
कीर्त्यानो नरो ह्येतान् मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।
स्तुवंश्च प्रतिनन्दंश्च मुच्यते सर्वतो भयात् ।। ३५ ।।
सर्वसंकरपापेभ्यो देवतास्तवनन्दकः ।
जो मनुष्य उपर्युक्त देवता आदिका कीर्तन, स्तवन और अभिनन्दन करता है, वह सब प्रकारके पाप और भयसे मुक्त हो जाता है। देवताओंकी स्तुति और अभिनन्दन करनेवाला पुरुष सब प्रकारके संकर पापोंसे छूट जाता है ।। ३५ ½ ।।
देवतानन्तरं विप्रांस्तपःसिद्धांस्तपोऽधिकान् ।। ३६ ।।
कीर्तितान् कीर्तयिष्यामि सर्वपापप्रमोचनान् ।
देवताओंके अनन्तर समस्त पापोंसे मुक्त करनेवाले तपस्यामें बढ़े-चढ़े तपःसिद्ध ब्रह्मर्षियोंके प्रख्यात नाम बतलाता हूँ॥ ३६ ½ ॥
यवक्रीतोऽथ रैभ्यश्च कक्षीवानौशिजस्तथा ॥ ३७ ॥
भृग्वङ्गिरास्तथा कण्वो मेधातिथिरथ प्रभुः ।
बर्ही च गुणसम्पन्नः प्राचीं दिशमुपाश्रिताः ॥ ३८ ॥
यवक्रीत, रैभ्य, कक्षीवान्, औशिज, भृगु, अंगिरा, कण्व, प्रभावशाली मेधातिथि और सर्वगुणसम्पन्न बर्हि—ये पूर्व दिशामें रहते हैं॥ ३७-३८॥
भद्रां दिशं महाभागा उल्मुचुः प्रमुचुस्तथा ।
मुमुचुश्च महाभागः स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् ॥ ३९ ॥
मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् ।
दृढायुश्चोर्ध्वबाहुश्च विश्रुतावृषिसत्तमौ ॥ ४० ॥
पश्चिमां दिशमाश्रित्य य एधन्ते निबोध तान् ।
उषङ्गुः सह सोदर्यैः परिव्याधश्च वीर्यवान् ॥ ४१ ॥
ऋषिर्दीर्घतमाश्चैव गौतमः काश्यपस्तथा ।
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महानृषिः ॥ ४२ ॥
अत्रेः पुत्रश्च धर्मात्मा तथा सारस्वतः प्रभुः ।
उल्मुचु, प्रमुचु, महाभाग मुमुचु, शक्तिशाली स्वस्त्यात्रेय, मित्रवरुणके पुत्र महाप्रतापी अगस्त्य और परम प्रसिद्ध ऋषिश्रेष्ठ दृढ़ायु तथा ऊर्ध्वबाहु—ये महाभाग दक्षिण दिशामें निवास करते हैं। अब जो पश्चिम दिशामें रहकर सदा अभ्युदयशील होते हैं, उन ऋषियोंके नाम सुनो—अपने सहोदर भाइयोंसहित उषंगु, शक्तिशाली परिव्याध, दीर्घतमा, ऋषि गौतम, काश्यप, एकत, द्वित, महर्षि त्रित, अत्रिके धर्मात्मा पुत्र दुर्वासा और प्रभावशाली सारस्वत ॥ ३९—४२ ½ ॥
उत्तरां दिशमाश्रित्य य एधन्ते निबोध तान् ॥ ४३ ॥
अत्रिर्वसिष्ठः शक्तिश्च पाराशर्यश्च वीर्यवान् ।
विश्वामित्रो भरद्वाजो जमदग्निस्तथैव च ॥ ४४ ॥
ऋचीकपुत्रो रामश्च ऋषिरौद्दालकिस्तथा ।
श्वेतकेतुः कोहलश्च विपुलो देवलस्तथा ॥ ४५ ॥
देवशर्मा च धौम्यश्च हस्तिकाश्यप एव च ।
लोमशो नाचिकेतश्च लोमहर्षण एव च ॥ ४६ ॥
ऋषिरुग्रश्रवाश्चैव भार्गवश्च्यवनस्तथा ।
अब जो उत्तर दिशाका आश्रय लेकर अपनी उन्नति करते हैं, उनके नाम सुनो—अत्रि, वसिष्ठ, शक्ति, पराशरनन्दन शक्तिशाली व्यास, विश्वामित्र, भरद्वाज, ऋचीकपुत्र जमदग्नि, परशुराम, उद्दालकपुत्र श्वेतकेतु, कोहल, विपुल, देवल, देवशर्मा, धौम्य, हस्तिकाश्यप, लोमश, नाचिकेत, लोमहर्षण, उग्रश्रवा ऋषि और भृगुनन्दन च्यवन ।। ४३-४६ १/२ ।। एष वै समवायश्च ऋषिदेवसमन्वितः ।। ४७ ।। आद्यः प्रकीर्तितो राजन् सर्वपापप्रमोचनः । राजन्! यह आदिमें होनेवाले देवता और ऋषियोंका मुख्य समुदाय अपने नामका कीर्तन करनेपर मनुष्यको सब पापोंसे मुक्त करता है ।। ४७ १/२ ।। नृगो ययातिर्नहुषो यदुः पूरुश्च वीर्यवान् ।। ४८ ।। धुन्धुमारो दिलीपश्च सगरश्च प्रतापवान् । कृशाश्वो यौवनाश्वश्च चित्राश्वः सत्यवांस्तथा ।। ४९ ।। दुष्यन्तो भरतश्चैव चक्रवर्ती महायशाः । पवनो जनकश्चैव तथा दृष्टरथो नृपः ।। ५० ।। रघुर्नरवरश्चैव तथा दशरथो नृपः । रामो राक्षसहा वीरः शशबिन्दुर्भगीरथः ।। ५१ ।। हरिश्चन्द्रो मरुत्तश्च तथा दृढरथो नृपः । महोदयो ह्यलर्कश्च ऐलश्चैव नराधिपः ।। ५२ ।। करन्धमो नरश्रेष्ठः कध्मोरश्च नराधिपः । दक्षोऽम्बरीषः कुकुरो रैवतश्च महायशाः ।। ५३ ।। कुरुः संवरणश्चैव मान्धाता सत्यविक्रमः । मुचुकुन्दश्च राजर्षिर्जह्नुर्जाह्नविसेवितः ।। ५४ ।। आदिराजः पृथुर्वैन्यो मित्रभानुः प्रियङ्करः । त्रसदस्युस्तथा राजा श्वेतो राजर्षिसत्तमः ।। ५५ ।। महाभिषश्च विख्यातो निमिराजा तथाष्टकः । आयुः क्षुपश्च राजर्षिः काक्षेयुश्च नराधिपः ।। ५६ ।। प्रतर्दनो दिवोदासः सुदासः कोसलेश्वरः । ऐलो नलश्च राजर्षिर्मनुश्चैव प्रजापतिः ।। ५७ ।। हविर्ध्रश्च पृषध्रश्च प्रतीपः शान्तनुस्तथा । अजः प्राचीनबर्हिश्च तथैक्ष्वाकुर्महायशाः ।। ५८ ।। अनरण्यो नरपतिर्जानुजंघस्तथैव च । कक्षसेनश्च राजर्षिर्ये चान्ये चानुकीर्तिताः ।। ५९ ।। कल्यमुत्थाय यो नित्यं संध्ये द्वेऽस्तमयोदये । पठेच्छुचिरनावृत्तः स धर्मफलभाग् भवेत् ।। ६० ।।
अब राजर्षियोंके नाम सुनो—राजा नृग, ययाति, नहुष, यदु, शक्तिशाली पूरु, धुन्धुमार, दिलीप, प्रतापी सगर, कृशाश्व, यौवनाश्व, चित्राश्व, सत्यवान्, दुष्यन्त, महायशस्वी चक्रवर्ती राजा भरत, पवन, जनक, राजा दृष्टरथ, नरश्रेष्ठ रघु, राजा दशरथ, राक्षसहन्ता वीरवर श्रीराम, शशबिन्दु, भगीरथ, हरिश्चन्द्र, मरुत्त, राजा दृढरथ, महोदर्य, अलर्क, नराधिप ऐल (पुरूरवा), नरश्रेष्ठ करन्धम, राजा कध्मोर, दक्ष, अम्बरीष, कुकुर, महायशस्वी रैवत, कुरु, संवरण, सत्यपराक्रमी मान्धाता, राजर्षि मुचुकुन्द, गंगाजीसे सेवित राजा जह्नु आदिराजा वेननन्दन पृथु, सबका प्रिय करनेवाले मित्रभानु, राजा त्रसदस्यु, राजर्षिश्रेष्ठ श्वेत, प्रसिद्ध राजा महाभिष, राजा निमि, अष्टक, आयु, राजर्षि क्षुप, राजा कक्षेयु, प्रतर्दन, दिवोदास, कोसलनरेश सुदास, पुरूरवा, राजर्षि नल, प्रजापति मनु, हविध्र, पृषध्र, प्रतीप, शान्तनु, अज, प्राचीनबर्हि, महायशस्वी इक्ष्वाकु, राजा अनरण्य, जानुजंघ, राजर्षि कक्षसेन तथा इनके अतिरिक्त पुराणोंमें जिनका अनेक बार वर्णन हुआ है, वे सब पुण्यात्मा राजा स्मरण करने योग्य हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान आदिसे शुद्ध हो प्रातःकाल और सांयकाल इन नामोंका पाठ करता है, वह धर्मके फलका भागी होता है।। ४८—६०।।
देवा देवर्षयश्चैव स्तुता राजर्षयस्तथा ।
पुष्टिमायुर्यशः स्वर्गं विधास्यन्ति ममेश्वराः ॥ ६१ ॥
देवता, देवर्षि और राजर्षि—इनकी स्तुति की जानेपर ये मुझे पुष्टि, आयु, यश और स्वर्ग प्रदान करेंगे; क्योंकि ये ईश्वर (सर्वसमर्थ स्वामी) हैं ।। ६१ ।।
मा विघ्नं मा च मे पापं मा च मे परिपन्थिनः ।
ध्रुवो जयो मे नित्यः स्यात् परत्र च शुभा गतिः ॥ ६२ ॥
इनके स्मरणसे मुझपर किसी विघ्नका आक्रमण न हो, मुझसे पाप न बने। मेरे ऊपर चोरों और बटमारोंका जोर न चले। मुझे इस लोकमें सदा चिरस्थायी जय प्राप्त हो और परलोकमें भी शुभ गति मिले ।। ६२ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि वंशानुकीर्तनं नाम
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवता आदिके वंशका वर्णन नामक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६५ ।।
१६६-
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्मकी अनुमति पाकर युधिष्ठिरका सपरिवार हस्तिनापुरको प्रस्थान
जनमेजय उवाच
शरत्तल्पगते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे ।
शयाने वीरशयने पाण्डवैः समुपस्थिते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो महाप्राज्ञो मम पूर्वपितामहः ।
धर्माणामगमं श्रुत्वा विदित्वा सर्वसंशयान् ॥ २ ॥
दानानां च विधिं श्रुत्वा च्छिन्नधर्मार्थसंशयः ।
यदन्यदकरोद् विप्र तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— विप्रवर! कुरुकुलके धुरन्धर वीर भीष्मजी जब वीरोंके सोनेयोग्य बाणशय्यापर सो गये और पाण्डवलोग उनकी सेवामें उपस्थित रहने लगे, तब मेरे पूर्व पितामह महाज्ञानी राजा युधिष्ठिरने उनके मुखसे धर्मोंका उपदेश सुनकर अपने समस्त संशयोंका समाधान जान लेनेके पश्चात् दानकी विधि श्रवण करके धर्म और अर्थविषयक सारे संदेह दूर हो जानेपर जो और कोई कार्य किया हो, उसे मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १—३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अभून्मुहूर्तं स्तिमितं सर्वं तद्राजमण्डलम् ।
तूष्णींभूते ततस्तस्मिन् पटे चित्रमिवार्पितम् ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! सब धर्मोंका उपदेश करनेके पश्चात् जब भीष्मजी चुप हो गये, तब दो घड़ीतक सारा राजमण्डल पटपर अंकित किये हुए चित्रके समान स्तब्ध-सा हो गया ॥ ४ ॥
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा व्यासः सत्यवतीसुतः ।
नृपं शयानं गाङ्गेयमिदमाह वचस्तदा ॥ ५ ॥
तब दो घड़ीतक ध्यान करनेके पश्चात् सत्यवती-नन्दन व्यासने वहाँ सोये हुए गङ्गानन्दन महाराज भीष्मजीसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
राजन् प्रकृतिमापन्नः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैः पार्थिवैश्चानुयायिभिः ॥ ६ ॥
उपास्ते त्वां नरव्याघ्र सह कृष्णेन धीमता ।
तमिमं पुरयानाय समनुज्ञातुमर्हसि ॥ ७ ॥