भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1957, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1957

उस गजराजने अपनी सूँडसे छोड़े गये जलकणोंद्वारा गुडाकेश अर्जुनको भिगो दिया। मानो मेघने नील पर्वतपर जलके फुहारे डाल दिये हों ॥ ७ ॥

स तेन प्रेषितो राज्ञा मेघवद् विनदन् मुहुः । मुखाडम्बरसंहादैर्भ्यद्रवत् फाल्गुनम् ॥ ८ ॥ राजासे प्रेरित होकर बारंबार मेघके समान गम्भीर गर्जना करता हुआ वह हाथी अपने मुखके चीत्कारपूर्ण कोलाहलके साथ अर्जुनपर टूट पड़ा ॥ ८ ॥

स नृत्यन्निव नागेन्द्रो वज्रदत्तप्रचोदितः । आससाद द्रुतं राजन् कौरवाणां महारथम् ॥ ९ ॥ राजन्! वज्रदत्तका हाँका हुआ वह गजराज नृत्य-सा करता हुआ तुरंत कौरव महारथी अर्जुनके पास जा पहुँचा ॥ ९ ॥

तमायान्तमथालक्ष्य वज्रदत्तस्य वारणम् । गाण्डीवमाश्रित्य बली न व्यकम्पत शत्रुहा ॥ १० ॥ वज्रदत्तके उस हाथीको आते देख शत्रुओंका संहार करनेवाले बलवान् अर्जुन गाण्डीवका सहारा लेकर तनिक भी विचलित नहीं हुए ॥ १० ॥

चुक्रोध बलवच्चापि पाण्डवस्तस्य भूपतेः । कार्यविघ्नमनुस्मृत्य पूर्ववैरं च भारत ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! वज्रदत्तके कारण जो कार्यमें विघ्न पड़ रहा था, उसको तथा पहलेके वैरको याद करके पाण्डुपुत्र अर्जुन उस राजापर अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ११ ॥

ततस्तं वारणं क्रुद्धः शरजालेन पाण्डवः । निवारयामास तदा वेलेव मकरालयम् ॥ १२ ॥ क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनने अपने बाणसमूहोंद्वारा उस हाथीको उसी तरह रोक दिया, जैसे तटकी भूमि उमड़ते हुए समुद्रको रोक देती है ॥ १२ ॥

स नागप्रवरः श्रीमानर्जुनेन निवारितः । तस्थौ शरैर्विमुन्नाङ्गः श्वाविच्छललितो यथा ॥ १३ ॥ उसके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे। अर्जुनके द्वारा रोका गया वह शोभाशाली गजराज काँटोंवाली साहीके समान खड़ा हो गया ॥ १३ ॥

निवारितं गजं दृष्ट्वा भगदत्तसुतो नृपः । उत्ससर्ज शितान् बाणानर्जुनं क्रोधमूर्च्छितः ॥ १४ ॥ अपने हाथीको रोका गया देख भगदत्तकुमार राजा वज्रदत्त क्रोधसे व्याकुल हो उठा और अर्जुनपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १४ ॥

अर्जुनस्तु महाबाहुः शरैररिनिघातिभिः । वारयामास तान् बाणांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १५ ॥