महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2089, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृथा ह्येतानि दत्तानि कथितानि समासतः । जीवितं तु तथा ह्येषां तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! ये सब वृथा दान संक्षेपमें बताये गये। अब जिन-जिन मनुष्योंका जीवन व्यर्थ है, उनका परिचय दे रहा हूँ; सुनो ।।
ये मां न प्रतिपद्यन्ते शङ्करं वा नराधमाः । ब्राह्मणान् वा महीदेवान् वृथा जीवन्ति ते नराः ।। जो नराधम मेरी, भगवान् शंकरकी अथवा भूमण्डलके देवता ब्राह्मणोंकी शरण नहीं लेते, वे मनुष्य व्यर्थ ही जीते हैं ।।
हेतुशास्त्रेषु ये सक्ताः कुदृष्टिपथमाश्रिताः । देवान् निन्दन्त्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नराः ।। जिनकी कोरे तर्कशास्त्रमें ही आसक्ति है, जो नास्तिक-पथका अवलम्बन करते हैं, जिन्होंने आचार त्याग दिया है तथा जो देवताओंकी निन्दा करते हैं, वे मनुष्य व्यर्थ ही जी रहे हैं ।।
कुशलैः कृतशास्त्राणि पठित्वा ये नराधमाः । विप्रान् निन्दन्ति यज्ञांश्च वृथा जीवन्ति ते नराः ।। जो नराधम नास्तिकोंके शास्त्र पढ़कर ब्राह्मण और यज्ञोंकी निन्दा करते हैं, वे व्यर्थ ही जीवन धारण करते हैं ।।
ये दुर्गां वा कुमारं वा वायुमग्निं जलं रविम् । पितरं मातरं चैव गुरुमिन्द्रं निशाकरम् । मूढा निन्दन्त्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नराः ।। जो मूढ़ दुर्गा, स्वामी कार्तिकेय, वायु, अग्नि, जल, सूर्य, माता-पिता, गुरु, इन्द्र तथा चन्द्रमाकी निन्दा करते और आचारका पालन नहीं करते, वे मनुष्य भी निरर्थक ही जीवन व्यतीत करते हैं ।।
विद्यमाने धने यस्तु दानधर्मविवर्जितः । मृष्टमश्नाति यश्चैको वृथा जीवति सोऽपि च । वृथा जीवितमाख्यातं दानकालं ब्रवीमि ते ।। जो धन होनेपर भी दान और धर्म नहीं करता तथा दूसरोंको न देकर अकेले ही मिठाई खाया करता है, वह भी व्यर्थ ही जीता है। इस प्रकार व्यर्थ जीवनकी बात बतायी गयी। अब दानका समय बताता हूँ ।।
तमोनिविष्टचित्तेन दत्तं दानं तु यद् भवेत् । तदस्य फलमश्नाति नरो गर्भगतो नृप ।। राजन्! तमोगुणमें आविष्ट हुए चित्तवाले मनुष्यके द्वारा जो दान दिया जाता है, उसका फल मनुष्य गर्भावस्थामें भोगता है ।।