भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2113, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2113

खड़ाऊँ और जल-दान करनेवाले मनुष्योंको उस मार्गमें सुख मिलता है। वे उत्तम रथपर बैठकर सोनेके पीढ़ेपर पैर रखे हुए यात्रा करते हैं ।। आरामान् वृक्षषण्डांश्च रोपयन्ति च ये नराः । संवर्धयन्ति चाव्यग्रं फलपुष्पोपशोभितम् ।। वृक्षच्छायासु रम्यासु शीतलासु स्वलंकृताः । यान्ति ते वाहनैर्दिव्यैः पूज्यमाना मुहुर्मुहुः ।। जो लोग बड़े-बड़े बगीचे बनवाते और उसमें वृक्षोंके पौधे रोपते हैं तथा शान्तिपूर्वक जलसे सींचकर उन्हें फल-फूलोंसे सुशोभित करके बढ़ाया करते हैं, वे दिव्य वाहनोंपर सवार हो आभूषणोंसे सज-धजकर वृक्षोंकी अत्यन्त रमणीय एवं शीतल छायामें होकर दिव्य पुरुषोंद्वारा बारंबार सम्मान पाते हुए यमलोकमें जाते हैं ।। अश्वयानं तु गोयानं हस्तियानमथापि वा । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो विमानैः कनकोपमैः ।। जो ब्राह्मणोंको घोड़े, बैल अथवा हाथीकी सवारी दान करते हैं, वे सोनेके समान विमानोंद्वारा यमलोकमें जाते हैं ।। भूमिदा यान्ति तं लोकं सर्वकामैः सुतर्पिताः । उदितादित्यसंकाशैर्विमानैर्वृषयोजितैः ।। भूमिदान करनेवाले लोग समस्त कामनाओंसे तृप्त होकर बैल जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंके द्वारा उस लोककी यात्रा करते हैं ।। सुगन्धागन्धसंयोगान् पुष्पाणि सुरभीणि च । प्रयच्छन्ति द्विजाग्र्येभ्यो भक्त्या परमया युताः ।। सुगन्धाः सुष्ठुवेषाश्च सुप्रभाः स्रग्विभूषणाः । यान्ति धर्मपुरं यानैर्विचित्रैरप्यलंकृताः ।। जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अत्यन्त भक्तिपूर्वक सुगन्धित पदार्थ तथा पुष्प प्रदान करते हैं, वे सुगन्धपूर्ण सुन्दर वेश धारणकर उत्तम कान्तिसे देदीप्यमान हो सुन्दर हार पहने हुए विचित्र विमानोंपर बैठकर धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।। दीपदा यान्ति यानैश्च द्योतयन्तो दिशो दश । आदित्यसदृशाकारैर्दीप्यमाना इवाग्नयः ।। दीप-दान करनेवाले पुरुष सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंसे दसों दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए साक्षात् अग्निके समान कान्तिमान् स्वरूपसे यात्रा करते हैं ।। गृहावसथदातारो गृहैः काञ्चनवेदिकैः । व्रजन्ति बालसूर्याभैर्धर्मराजपुरं नराः ।। जो घर एवं आश्रयस्थानका दान करनेवाले हैं, वे सोनेके चबूतरोंसे युक्त और प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिवाले गृहोंके साथ धर्मराजके नगरमें प्रवेश करते हैं ।।