भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2120, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2120

'पाण्डुनन्दन! धर्म, अर्थ और कामका निर्वाह अन्नसे ही होता है। अतः इस लोक या परलोकमें अन्नसे बढ़कर कोई दान नहीं है।। यक्षरक्षोग्रहा नागा भूतान्यन्ये च दानवाः। तुष्यन्त्यन्नेन यस्मात् तु तस्मादन्नं परं भवेत्।। 'यक्ष, राक्षस, ग्रह, नाग, भूत और दानव भी अन्नसे ही संतुष्ट होते हैं; इसलिये अन्नका महत्त्व सबसे बढ़कर है।। ब्राह्मणाय दरिद्राय योऽन्नं संवत्सरं नृप। श्रोत्रियाय प्रयच्छेद् वै पाकभेदविवर्जितः।। दम्भानृतविमुक्तस्तु परां भक्तिमुपागतः। स्वधर्मेणार्जितफलं तस्य पुण्यफलं शृणु।। 'राजन्! जो मनुष्य दम्भ और असत्यका परित्याग करके मुझमें परम भक्ति रखकर रसोईमें भेद न करते हुए दरिद्र एवं श्रोत्रिय ब्राह्मणको एक वर्षतक अपने द्वारा धर्मपूर्वक उपार्जित अन्नका दान करता है, उसके पुण्यके फलको सुनो।। शतवर्षसहस्राणि कामगः कामरूपधृक्। मोदतेऽमरलोकस्थः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः।। ततश्चापि च्युतः कालान्न्रलोके द्विजो भवेत्।। 'वह एक लाख वर्षतक बड़े सम्मानके साथ देवलोकमें निवास करता है तथा वहाँ इच्छानुसार रूप धारण करके यथेष्ट विचरता रहता है एवं अप्सराओंका समुदाय उसका सत्कार करता है। फिर समयानुसार पुण्य क्षीण हो जानेपर वह जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब मनुष्यलोकमें ब्राह्मण होता है।। अग्रभिक्षां च यो दद्याद् दरिद्राय द्विजातये। षण्मासान् वार्षिकं श्राद्धं तस्य पुण्यफलं शृणु।। 'जो छः महीने या वार्षिक श्राद्धपर्यन्त प्रतिदिनकी पहली भिक्षा दरिद्र ब्राह्मणको देता है, उसका पुण्यफल सुनो।। गोसहस्रप्रदानेन यत् पुण्यं समुदाहृतम्। तत् पुण्यफलमाप्नोति नरो वै नात्र संशयः।। 'एक हजार गोदानका जो पुण्यफल बताया गया है, वह उसी पुण्यके समान फल पाता है, इसमें संशय नहीं है।। अध्वश्रान्ताय विप्राय क्षुधितायान्नकाङ्क्षिणे। देशकालाभियाताय दीयते पाण्डुनन्दन।। 'पाण्डुनन्दन! देश-कालके अनुसार प्राप्त एवं रास्ता चलकर थके-माँदे आये हुए भूखे और अन्न चाहनेवाले ब्राह्मणको अन्न-दान करना चाहिये।। यस्तु पांसुलपादश्च दूराध्वश्रमकर्शितः।