महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2142, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान्के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन]
युधिष्ठिर उवाच
पञ्च यज्ञाः कथं देव क्रियन्तेऽत्र द्विजातिभिः ।
तेषां नाम च देवेश वक्तुमर्हस्यशेषतः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! द्विजातियोंके द्वारा पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान यहाँ किस प्रकार किया जाता है? देवेश्वर! उन यज्ञोंके नाम भी पूर्णतया बताने चाहिये ॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु पञ्च महायज्ञान् कीर्त्यमानान् युधिष्ठिर ।
यैरेव ब्रह्मसालोक्यं लभ्यते गृहमेधिना ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**युधिष्ठिर! जिनके अनुष्ठानसे गृहस्थ पुरुषोंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, उन पञ्चमहायज्ञोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
ऋभुयज्ञं ब्रह्मयज्ञं भूतयज्ञं च पाण्डव ।
नृयज्ञं पितृयज्ञं च पञ्च यज्ञान् प्रचक्षते ॥
पाण्डुनन्दन! ऋभुयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और पितृयज्ञ—ये पञ्चयज्ञ कहलाते हैं ॥
तर्पणं ऋभुयज्ञः स्यात् स्वाध्यायो ब्रह्मयज्ञकः ।
भूतयज्ञो बलैर्यज्ञो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ।
पितॄनुद्दिश्य यत् कर्म पितृयज्ञः प्रकीर्तितः ॥
इनमें ‘ऋभुयज्ञ’ तर्पणको कहते हैं, ‘ब्रह्मयज्ञ’ स्वाध्यायका नाम है, समस्त प्राणियोंके लिये अन्नकी बलि देना ‘भूतयज्ञ’ है, अतिथियोंकी पूजाको ‘मनुष्ययज्ञ’ कहते हैं और पितरोंके उद्देश्यसे जो श्राद्ध आदि कर्म किये जाते हैं, उनकी ‘पितृयज्ञ’ संज्ञा है ॥
हुतं चाप्यहुतं चैव तथा प्रहुतमेव च ।
प्राशितं बलिदानं च पाकयज्ञान् प्रचक्षते ॥
हुत, अहुत, प्रहुत, प्राशित और बलिदान—ये पाकयज्ञ कहलाते हैं ॥
वैश्वदेवादयो होमा हुतमित्युच्यते बुधैः ।
अहुतं च भवेद् दत्तं प्रहुतं ब्राह्मणाशितम् ॥
वैश्वदेव आदि कर्मोंमें जो देवताओंके निमित्त हवन किया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष ‘हुत’ कहते हैं। दान दी हुई वस्तुको ‘अहुत’ कहते हैं। ब्राह्मणोंको भोजन करानेका नाम ‘प्रहुत’ है ॥