भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2154, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2154

स्वर्ग्याण्यपि यशस्यानि मत्प्रियाणि विशेषतः । मद्भक्तः पाण्डवश्रेष्ठ व्रतानीमानि धारयेत् ॥ पाण्डवश्रेष्ठ! स्वर्ग और यश देनेवाले होनेके साथ ही जो मुझे विशेष प्रिय हों, ऐसे व्रतोंका ही मेरे भक्त पालन करते हैं ।।

नान्यदाच्छादयेद् वस्त्रं मद्भक्तो जलतारणे । स्वस्थस्तु न दिवा स्वप्नेन्मधुमांसानि वर्जयेत् ॥ भक्त पुरुषको जलमें तैरते समय एक वस्त्रके सिवा दूसरा नहीं धारण करना चाहिये। स्वस्थ रहते हुए दिनमें कभी नहीं सोना चाहिये। मधु और मांसको त्याग देना चाहिये ।।

प्रदक्षिणं व्रजेद् विप्रान् गामश्वत्थं हुताशनम् । न धावेत् पतिते वर्षे नाग्रभिक्षां च लोपयेत् ॥ मार्गमें ब्राह्मण, गौ, पीपल और अग्निके मिलनेपर उनको दाहिने करके जाना चाहिये। पानी बरसते समय दौड़ना नहीं चाहिये। पहले मिलनेवाली भिक्षाका त्याग नहीं करना चाहिये ।।

प्रत्यक्षलवणं नाद्यात् सौभाञ्जनकरञ्जनौ । ग्रासमुष्टिं गवे दद्याद् धान्याम्लं चैव वर्जयेत् ॥ खाली नमक नहीं खाना चाहिये तथा सौभांजन और करंजनका भक्षण नहीं करना चाहिये। गौको प्रतिदिन ग्रास अर्पण करे और अन्नमें खटाई मिलाकर न खाय ।।

तथा पर्युषितं चापि पक्वं परगृहागतम् । अनिवेदितं च यद् द्रव्यं तत् प्रयत्नेन वर्जयेत् ॥ दूसरेके घरसे उठाकर आयी हुई रसोई, बासी अन्न तथा भगवान्‌को भोग न लगाये हुए पदार्थका भी प्रयत्नपूर्वक त्याग करे ।।

विभीतककरञ्जानां छायां दूरे विवर्जयेत् । विप्रदेवपरीवादान् न वदेत् पीडितोऽपि सन् ॥ बहेड़े और करंजकी छायासे दूर रहे, कष्टमें पड़नेपर भी ब्राह्मणों और देवताओंकी निन्दा न करे ।।

उदिते सवितर्याप्य क्रियायुक्तस्य धीमतः । चतुर्वेदविदश्चापि देहे षड् वृषलाः स्मृताः ॥ सूर्योदयके बाद नित्य क्रियाशील रहनेवाले बुद्धिमान् और चारों वेदोंके विद्वान् ब्राह्मणके शरीरमें भी छः वृषल बताये जाते हैं ।।

क्षत्रियाः सप्त विज्ञेया वैश्यास्त्वष्टौ प्रकीर्तिताः । नियताः पाण्डवश्रेष्ठ शूद्राणामेकविंशतिः ॥