महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2180, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! जो क्रोध न करनेवाले, सत्यपरायण, सदा धर्ममें लगे रहनेवाले और जितेन्द्रिय हों, वे ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं तथा उन्हींको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है॥
अमानिनः सर्वसहा दृष्टार्था विजितेन्द्रियाः ।
सर्वभूतहिता मैत्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
जो अभिमानशून्य, सब कुछ सहनेवाले, शास्त्रीय अर्थके ज्ञाता, इन्द्रियजयी, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितकारी, सबके साथ मैत्रीका भाव रखनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फलदायक है॥
अलुब्धाः शुचयो वैद्या ह्रीमन्तः सत्यवादिनः ।
स्वधर्मनिरता ये तु तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
जो निर्लोभ, पवित्र, विद्वान्, संकोची, सत्यवादी और स्वधर्मपरायण हों, उनको दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है॥
साङ्गांश्च चतुरो वेदान् योऽधीयेत दिने दिने ।
शूद्रान्नं यस्य नो देहे तत् पात्रमृषयो विदुः ॥
जो प्रतिदिन अंगोंसहित चारों वेदोंका स्वाध्याय करता हो और उसके उदरमें शूद्रका अन्न न पड़ा हो, उसको ऋषियोंने दानका उत्तम पात्र माना है॥
प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वितः ।
तारयेत् तत्कुलं सर्वमेकोऽपीह युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! यदि शुद्ध बुद्धि, शास्त्रीय ज्ञान, सदाचार और उत्तम शीलसे युक्त एक ब्राह्मण भी दान ग्रहण कर ले तो वह दाताके समस्त कुलका उद्धार कर देता है॥
गामश्वमन्नं वित्तं वा तद्विधे प्रतिपादयेत् ।
निशम्य तु गुणोपेतं ब्राह्मणं साधुसम्मत्तम् ।
दूरादाहृत्य सत्कृत्य तं प्रयत्नेन पूजयेत् ॥
ऐसे ब्राह्मणको गाय, घोड़ा, अन्न और धन देना चाहिये। सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित किसी गुणवान् ब्राह्मणका नाम सुनकर उसे दूरसे भी बुलाना और प्रयत्नपूर्वक उसका सत्कार तथा पूजन करना चाहिये॥
युधिष्ठिर उवाच
धर्माधर्मविधिस्त्वेवं भीष्मेण सम्प्रभाषितम् ।
भीष्मवाक्यात् सारभूतं वद धर्मं सुरेश्वर ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**देवेश्वर! धर्म और अधर्मकी इस विधिका भीष्मजीने विस्तारके साथ वर्णन किया था। आप उनके वचनोंमेंसे सारभूत धर्म छाँटकर बतलाइये॥