महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2182, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो देवताओं, पितरों, ऋषियों, ब्राह्मणों, अतिथियों और निराश्रय मनुष्योंको अन्नसे तृप्त करता है, उसको महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है।। कृत्वा तु पापं बहुशो यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। जिसने अपने जीवनमें बहुत-से पाप किये हों, वह भी यदि याचक ब्राह्मणको विशेषरूपसे अन्नदान करता है तो सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है।। अन्नदः प्राणदो लोके प्राणदः सर्वदो भवेत् । तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ।। संसारमें अन्न देनेवाला पुरुष प्राणदाता माना जाता है और जो प्राणदाता है, वही सब कुछ देनेवाला है। अतः कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अन्नका दान विशेषरूपसे करना चाहिये।।
अन्नं ह्यमृतमित्याहुरन्नं प्रजननं स्मृतम् । अन्नप्रणाशे सीदन्ति शरीरे पञ्च धातवः ।। अन्नको अमृत कहते हैं और अन्न ही प्रजाको जन्म देनेवाला माना गया है। अन्नके नाश होनेपर शरीरके पाँचों धातुओंका नाश हो जाता है।।