महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध]
युधिष्ठिर उवाच
अन्नदानफलं श्रुत्वा प्रीतोऽस्मि मधुसूदन ।
भोजनस्य विधिं वक्तुं देवदेव त्वमर्हसि ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**देवाधिदेव मधुसूदन! अन्न-दानका फल सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, अब आप भोजनकी विधि बतानेकी कृपा कीजिये ।।
श्रीभगवानुवाच
भोजनस्य द्विजातीनां विधानं शृणु पाण्डव ।
स्नातः शुचिः शुचौ देशे निर्जने हुतपावकः ।।
मण्डलं कारयित्वा च चतुरस्रं द्विजोत्तमः ।
क्षत्रियश्चैत् ततो वृत्तं वैश्योऽर्धेन्दुसमाकृतम् ।।
**श्रीभगवान् बोले—**पाण्डुनन्दन! द्विजातियोंके भोजनका जो विधान है, उसे सुनो। श्रेष्ठ द्विजको उचित है कि वह स्नान करके पवित्र हो अग्निहोत्र करनेके बाद शुद्ध और एकान्त स्थानमें बैठकर ब्राह्मण हो तो चौकोना, क्षत्रिय हो तो गोलाकार और वैश्य हो तो अर्धचन्द्राकार मण्डल बनावे ।।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात् प्राङ्मुखश्चासने शुचौ ।
पादाभ्यां धरणीं स्पृष्ट्वा पादेनैकेन वा पुनः ।।
उसके बाद पैर धोकर उसी मण्डलमें बिछे हुए शुद्ध आसनके ऊपर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाय और दोनों पैरोंसे अथवा एक पैरके द्वारा पृथ्वीका स्पर्श किये रहे ।।
नैकवासास्तु भुञ्जीयान्न चान्तर्धाय वा द्विजः ।
न भिन्नपात्रे भुञ्जीत पर्णपृष्ठे तथैव च ।।
द्विज एक वस्त्र पहनकर तथा सारे शरीरको कपड़ेसे ढककर भी भोजन न करे। इसी प्रकार फूटे हुए बर्तनमें तथा उलटी पत्तलमें भी भोजन करना निषिद्ध है ।।
अन्नं पूर्वं नमस्कुर्यात् प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
नान्यदालोकयेदन्नान्न जुगुप्सेत तत्परः ।।
भोजन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि प्रसन्नचित्त होकर पहले अन्नको नमस्कार करे। अन्नके सिवा दूसरी ओर दृष्टि न डाले तथा भोजन करते समय परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे ।।
जुगुप्सितं च यच्चान्नं राक्षसा एव भुञ्जते ।
पाणिना जलमुद्धृत्य कुर्यादन्नं प्रदक्षिणम् ।।