भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2234, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2234

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[भगवान्‌के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन]

युधिष्ठिर उवाच

देशान्तरगते विप्रे संयुक्ते कालधर्मणा । शरीरनाशे सम्प्राप्ते कथं प्रेतत्वकल्पना ॥

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्‌! यदि कोई ब्राह्मण परदेश गया हो और वहीं कालकी प्रेरणासे उसका शरीर नष्ट हो जाय तो उसकी प्रेतक्रिया (अन्त्येष्टि-संस्कार) किस प्रकार सम्भव है? ॥

श्रीभगवानुवाच

श्रूयतामाहिताग्नेस्तु तथाभूतस्य संस्क्रिया । पालाशवृन्दैः प्रतिमा कर्तव्या कल्पचोदिता ॥

श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्‌! यदि किसी अग्निहोत्री ब्राह्मणकी इस प्रकार मृत्यु हो जाय तो उसका संस्कार करनेके लिये प्रेतकल्पमें बताये अनुसार उसकी काष्ठमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये। वह काष्ठ पलाशका ही होना उचित है ॥

त्रीणि षष्टिशतान्याहुरस्थीन्यस्य युधिष्ठिर । तेषां विकल्पना कार्या यथाशास्त्रं विनिश्चितम् ॥

युधिष्ठिर! मनुष्यके शरीरमें तीन सौ साठ हड्डियाँ बतायी गयी हैं। उन सबकी शास्त्रोक्त रीतिसे कल्पना करके उस प्रतिमाका दाह करना चाहिये ॥

युधिष्ठिर उवाच

विशेषतीर्थं सर्वेषामशक्तानामनुग्रहात् । भक्तानां तारणार्थं तु वक्तुमर्हसि धर्मतः ॥

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्‌! जो भक्त तीर्थयात्रा करनेमें असमर्थ हों, उन सबको तारनेके लिये कृपया किसी विशेष तीर्थका धर्मानुसार वर्णन कीजिये ॥

श्रीभगवानुवाच

पावनं सर्वतीर्थानां सत्यं गायन्ति सामगाः । सत्यस्य वचनं तीर्थमहिंसा तीर्थमुच्यते ॥

श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्‌! सामवेदका गायन करनेवाले विद्वान्‌ कहते हैं कि सत्य सब तीर्थोंको पवित्र करनेवाला है। सत्य बोलना और किसी जीवकी हिंसा न करना—ये तीर्थ कहलाते हैं ॥

तपस्तीर्थं दया तीर्थं शीलं तीर्थं युधिष्ठिर । अल्पसंतोषकं तीर्थं नारी तीर्थं पतिव्रता ॥