भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 42

न तस्य विषये चाभूत् कृपणो नापि दुर्गतिः ॥ १५ ॥ व्याधितो वा कृशो वापि तस्मिन् नाभून्नरः क्वचित् । उनके राज्यमें कहीं कोई भी कृपण, दुर्गतिग्रस्त, रोगी अथवा दुर्बल मनुष्य नहीं दृष्टिगोचर होता था ॥ १५½ ॥

सुदक्षिणो मधुरवागनसूयुर्जितेन्द्रियः । धर्मात्मा चानृशंसश्च विक्रान्तोऽथाविकत्थनः ॥ १६ ॥ वह राजा अत्यन्त उदार, मधुरभाषी, किसीके दोष न देखनेवाला, जितेन्द्रिय, धर्मात्मा, दयालु और पराक्रमी था। वह कभी अपनी प्रशंसा नहीं करता था ॥ १६ ॥

यज्वा च दान्तो मेधावी ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः । न चावमन्ता दाता च वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १७ ॥ राजा दुर्योधन वेद-वेदाङ्गोंका पारङ्गत विद्वान्, यज्ञकर्ता, जितेन्द्रिय, मेधावी, ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ था। वह सबको दान देता और किसीका भी अपमान नहीं करता था ॥ १७ ॥

तं नर्मदा देवनदी पुण्या शीतजला शिवा । चकमे पुरुषव्याघ्रं स्वेन भावेन भारत ॥ १८ ॥ भारत! एक समय शीतल जलवाली पवित्र एवं कल्याणमयी देवनदी नर्मदा उस पुरुषसिंहको सम्पूर्ण हृदयसे चाहने लगी और उसकी पत्नी बन गयी ॥ १८ ॥

तस्यां जज्ञे तदा नद्यां कन्या राजीवलोचना । नाम्ना सुदर्शना राजन् रूपेण च सुदर्शना ॥ १९ ॥ राजन्! उस नदीके गर्भसे राजाके द्वारा एक कमलोचना कन्या उत्पन्न हुई जो नामसे तो सुदर्शना थी ही, रूपसे भी सुदर्शना (सुन्दर एवं दर्शनीय) थी ॥ १९ ॥

तादृग्रूपा न नारीषु भूतपूर्वा युधिष्ठिर । दुर्योधनसुता यादृग्भवद् वरवर्णिनी ॥ २० ॥ युधिष्ठिर! दुर्योधनकी वह सुन्दर वर्णवाली पुत्री जैसी रूपवती थी, वैसी रूप-सौन्दर्यशालिनी स्त्री नारियोंमें पहले कभी नहीं हुई थी ॥ २० ॥

तामग्निश्चकमे साक्षाद् राजकन्यां सुदर्शनाम् । भूत्वा च ब्राह्मणो राजन् वरयामास तं नृपम् ॥ २१ ॥ राजन्! राजकन्या सुदर्शनापर साक्षात् अग्निदेव आसक्त हो गये और उन्होंने ब्राह्मणका रूप धारण करके राजासे उस कन्याको माँगा ॥ २१ ॥

दरिद्रश्चासवर्णश्च ममायमिति पार्थिवः । न दित्सति सुतां तस्मै तां विप्राय सुदर्शनाम् ॥ २२ ॥ राजा यह सोचकर कि एक तो यह दरिद्र है और दूसरे मेरे समान वर्णका नहीं है, अपनी पुत्री सुदर्शनाको उस ब्राह्मणके हाथमें नहीं देना चाहते थे ॥ २२ ॥