महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 583, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिर्भूतिर्महादेवी दातारं कुरुते प्रियम् ।। ६ ।।
मनुष्य इहलोक और परलोकमें अपने कर्मके अनुसार ही जीवन-निर्वाह करते हैं। भूमि ऐश्वर्यस्वरूपा महादेवी है। वह दाताको अपना प्रिय बना लेती है ।।
य एतां दक्षिणां दद्यादक्षयां राजसत्तम ।
पुनर्नरत्वं सम्प्राप्य भवेत् स पृथिवीपतिः ।। ७ ।।
नृपश्रेष्ठ! जो इस अक्षय भूमिको दान करता है वह दूसरे जन्ममें मनुष्य होकर पृथ्वीका स्वामी होता है ।। ७ ।।
यथा दानं तथा भोग इति धर्मेषु निश्चयः ।
संग्रामे वा तनुं जह्याद् दद्याच्च पृथिवीमिमाम् ।। ८ ।।
इत्येतत् क्षत्रबन्धूनां वदन्ति परमां श्रियम् ।
धर्मशास्त्रोंका सिद्धान्त है कि जैसा दान किया जाता है, वैसा ही भोग मिलता है। संग्राममें शरीरका त्याग करना तथा इस पृथ्वीका दान करना—ये दोनों ही कार्य क्षत्रियोंको उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं ।। ८ १/२ ।।
पुनाति दत्ता पृथिवी दातारमिति शुश्रुम ।। ९ ।।
अपि पापसमाचारं ब्रह्मघ्नमपि चानृतम् ।
सैव पापं प्लावयति सैव पापात् प्रमोचयेत् ।। १० ।।
दानमें दी हुई पृथ्वी दाताको पवित्र कर देती है—यह हमने सुना है। कितना ही बड़ा पापाचारी, ब्रह्महत्यारा और असत्यवादी क्यों न हो, दानमें दी हुई पृथ्वी ही दाताके पापको धो बहा देती है और वही उसे सर्वथा पापमुक्त कर देती है ।। ९-१० ।।
अपि पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः ।
पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जननी यथा ।। ११ ।।
श्रेष्ठ पुरुष पापाचारी राजाओंसे भी पृथ्वीका दान तो ले लेते हैं, किंतु और किसी वस्तुका दान नहीं लेना चाहते। पृथ्वी वैसी ही पावन वस्तु है जैसी माता ।। ११ ।।
नामास्याः प्रियदत्तेति गुह्यं देव्याः सनातनम् ।
दानं वाप्यथवाऽऽदानं नामास्याः प्रथमं प्रियम् ।। १२ ।।
इस पृथ्वी देवीका सनातन गोपनीय नाम ‘प्रियदत्ता’ है। इसका दान अथवा ग्रहण दोनों ही दाता और प्रतिग्रहीताको प्रिय हैं; इसीलिये इसका यह प्रथम नाम सबको प्रिय है ।। १२ ।।
य एतां विदुषे दद्यात् पृथिवीं पृथिवीपतिः ।
पृथिव्यामेतदिष्टं स राजा राज्यमितो व्रजेत् ।। १३ ।।
जो पृथिवीपति विद्वान् ब्राह्मणोंको इस पृथ्वीका दान देता है, वह राजा इस दानके प्रभावसे पुनः राज्य प्राप्त करता है। भूमण्डलमें यह पृथ्वीदान सबको प्रिय है ।। १३ ।।
पुनश्चासौ जनिं प्राप्य राजवत् स्यान्न संशयः ।