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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

भूमिर्भूतिर्महादेवी दातारं कुरुते प्रियम् ।। ६ ।।
मनुष्य इहलोक और परलोकमें अपने कर्मके अनुसार ही जीवन-निर्वाह करते हैं। भूमि ऐश्वर्यस्वरूपा महादेवी है। वह दाताको अपना प्रिय बना लेती है ।।
य एतां दक्षिणां दद्यादक्षयां राजसत्तम ।
पुनर्नरत्वं सम्प्राप्य भवेत् स पृथिवीपतिः ।। ७ ।।
नृपश्रेष्ठ! जो इस अक्षय भूमिको दान करता है वह दूसरे जन्ममें मनुष्य होकर पृथ्वीका स्वामी होता है ।। ७ ।।
यथा दानं तथा भोग इति धर्मेषु निश्चयः ।
संग्रामे वा तनुं जह्याद् दद्याच्च पृथिवीमिमाम् ।। ८ ।।
इत्येतत् क्षत्रबन्धूनां वदन्ति परमां श्रियम् ।
धर्मशास्त्रोंका सिद्धान्त है कि जैसा दान किया जाता है, वैसा ही भोग मिलता है। संग्राममें शरीरका त्याग करना तथा इस पृथ्वीका दान करना—ये दोनों ही कार्य क्षत्रियोंको उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं ।। ८ १/२ ।।
पुनाति दत्ता पृथिवी दातारमिति शुश्रुम ।। ९ ।।
अपि पापसमाचारं ब्रह्मघ्नमपि चानृतम् ।
सैव पापं प्लावयति सैव पापात् प्रमोचयेत् ।। १० ।।
दानमें दी हुई पृथ्वी दाताको पवित्र कर देती है—यह हमने सुना है। कितना ही बड़ा पापाचारी, ब्रह्महत्यारा और असत्यवादी क्यों न हो, दानमें दी हुई पृथ्वी ही दाताके पापको धो बहा देती है और वही उसे सर्वथा पापमुक्त कर देती है ।। ९-१० ।।
अपि पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः ।
पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जननी यथा ।। ११ ।।
श्रेष्ठ पुरुष पापाचारी राजाओंसे भी पृथ्वीका दान तो ले लेते हैं, किंतु और किसी वस्तुका दान नहीं लेना चाहते। पृथ्वी वैसी ही पावन वस्तु है जैसी माता ।। ११ ।।
नामास्याः प्रियदत्तेति गुह्यं देव्याः सनातनम् ।
दानं वाप्यथवाऽऽदानं नामास्याः प्रथमं प्रियम् ।। १२ ।।
इस पृथ्वी देवीका सनातन गोपनीय नाम ‘प्रियदत्ता’ है। इसका दान अथवा ग्रहण दोनों ही दाता और प्रतिग्रहीताको प्रिय हैं; इसीलिये इसका यह प्रथम नाम सबको प्रिय है ।। १२ ।।
य एतां विदुषे दद्यात् पृथिवीं पृथिवीपतिः ।
पृथिव्यामेतदिष्टं स राजा राज्यमितो व्रजेत् ।। १३ ।।
जो पृथिवीपति विद्वान् ब्राह्मणोंको इस पृथ्वीका दान देता है, वह राजा इस दानके प्रभावसे पुनः राज्य प्राप्त करता है। भूमण्डलमें यह पृथ्वीदान सबको प्रिय है ।। १३ ।।
पुनश्चासौ जनिं प्राप्य राजवत् स्यान्न संशयः ।

तस्मात् प्राप्यैव पृथिवीं दद्यात् विप्राय पार्थिवः ॥ १४ ॥
वह पुनर्जन्म पाकर राजाके समान ही होता है, इसमें संशय नहीं है। अतः राजाको चाहिये कि वह पृथ्वीपर अधिकार पाते ही उसमेंसे कुछ ब्राह्मणको दान करे ॥ १४ ॥
नाभूमिपतिना भूमिरधितिष्ठेया कथंचन ।
न चापात्रेण वा ग्राह्या दत्तदाने न चाचरेत् ॥ १५ ॥
जो जिस भूमिका स्वामी नहीं है, उसे उसपर किसी तरह अधिकार नहीं करना चाहिये तथा अयोग्य पात्रको भूमिदान नहीं ग्रहण करना चाहिये। जिस भूमिको दानमें दे दिया गया हो, उसे अपने उपयोगमें नहीं लाना चाहिये ॥ १५ ॥
ये चान्ये भूमिमिच्छेयुः कुर्युुरेवं न संशयः ।
यः साधोर्भूमिमादत्ते न भूमिं विन्दते तु सः ॥ १६ ॥
दूसरे भी जो लोग भावी जन्ममें भूमि पानेकी इच्छा करें, उन्हें भी इस जन्ममें इसी तरह भूमिदान करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। जो छल-बलसे श्रेष्ठ पुरुषकी भूमिका अपहरण कर लेता है, उसे भूमिकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १६ ॥
भूमिं दत्त्वा तु साधुभ्यो विन्दते भूमिमुत्तमाम् ।
प्रेत्य चेह च धर्मात्मा सम्प्राप्नोति महत् यशः ॥ १७ ॥
श्रेष्ठ पुरुषोंको भूमिदान देनेसे दाताको उत्तम भूमिकी प्राप्ति होती है तथा वह धर्मात्मा पुरुष इहलोक और परलोकमें भी महान् यशका भागी होता है ॥ १७ ॥
(एकागारकरीं दत्त्वा षष्टिसाहस्रमूर्ध्वगः ।
तावत्या हरणे पृथ्व्या नरकं द्विगुणोत्तरम् ॥)
जो एक घर बनाने भरके लिये भूमि दान करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक ऊर्ध्वलोकमें निवास करता है। तथा जो उतनी ही पृथ्वीका हरण कर लेता है, उसे उससे दूने अधिक कालतक नरकमें रहना पड़ता है ॥
यस्य विप्रास्तु शंसन्ति साधोर्भूमिं सदैव हि ।
न तस्य शत्रवो राजन् प्रशंसन्ति वसुन्धराम् ॥ १८ ॥
राजन्! ब्राह्मण जिस श्रेष्ठ पुरुषकी दी हुई भूमिकी सदा ही प्रशंसा करते हैं, उसकी उस भूमिकी राजाके शत्रु प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ १८ ॥
यत् किंचित् पुरुषः पापं कुरुते वृत्तिकर्शितः ।
अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन पूयते ॥ १९ ॥
जीविका न होनेके कारण मनुष्य क्लेशमें पड़कर जो कुछ पाप कर डालता है, वह सारा पाप गोचर्मके बराबर भूमि-दान करनेसे धुल जाता है ॥ १९ ॥
येऽपि संकीर्णकर्माणो राजानो रौद्रकर्मिणः ।
तेभ्यः पवित्रमाख्येयं भूमिदानमनुत्तमम् ॥ २० ॥

जो राजा कठोर कर्म करनेवाले तथा पापपरायण हैं, उन्हें पापोंसे मुक्त होनेके लिये परम पवित्र एवं सबसे उत्तम भूमिदानका उपदेश देना चाहिये॥ २०॥ अल्पान्तरमिदं शश्वत् पुराणा मेनिरे जनाः।
यो यजेताश्वमेधेन दद्याद् वा साधवे महीम्॥ २१॥
प्राचीनकालके लोग सदा यह मानते रहे हैं कि जो अश्वमेधयज्ञ करता है अथवा जो श्रेष्ठ पुरुषको पृथ्वीदान करता है, इन दोनोंमें बहुत कम अन्तर है॥
अपि चेत्सुकृतं कृत्वा शङ्केरन्नपि पण्डिताः।
अशङ्क्यमेकमेवैतद् भूमिदानमनुत्तमम्॥ २२॥
दूसरा कोई पुण्य कर्म करके उसके फलके विषयमें विद्वान् पुरुषोंको भी शंका हो जाय, यह सम्भव है; किंतु एकमात्र यह सर्वोत्तम भूमिदान ही ऐसा सत्कर्म है, जिसके फलके विषयमें किसीको शंका नहीं हो सकती॥ २२॥
सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च।
सर्वमेतन्महाप्राज्ञो ददाति वसुधां ददत्॥ २३॥
जो महाबुद्धिमान् पुरुष पृथ्वीका दान करता है, वह सोना, चाँदी, वस्त्र, मणि, मोती तथा रत्न—इन सबका दान कर देता है (अर्थात् इन सभी दानोंका फल प्राप्त कर लेता है)॥ २३॥
तपो यज्ञः श्रुतं शीलमलोभः सत्यसंधता।
गुरुदैवतपूजा च एता वर्तन्ति भूमिदम्॥ २४॥
पृथ्वीका दान करनेवाले पुरुषको तप, यज्ञ, विद्या, सुशीलता, लोभका अभाव, सत्यवादिता, गुरु-शुश्रूषा और देवाराधन—इन सबका फल प्राप्त हो जाता है॥ २४॥
भर्तृनिःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः।
ब्रह्मलोकगताः सिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम्॥ २५॥
जो अपने स्वामीका भला करनेके लिये रणभूमिमें मारे जाकर शरीर त्याग देते हैं और जो सिद्ध होकर ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं, वे भी भूमिदान करनेवाले पुरुषको लाँघकर आगे नहीं बढ़ने पाते॥ २५॥
यथा जनित्री स्वं पुत्रं क्षीरेण भरते सदा।
अनुगृह्णाति दातारं तथा सर्वरसैर्मही॥ २६॥
जैसे माता अपने बच्चेको सदा दूध पिलाकर पालती है, उसी प्रकार पृथ्वी सब प्रकारके रस देकर भूमिदातापर अनुग्रह करती है॥ २६॥
मृत्युर्वैकिङ्करो दण्डस्तमो वह्निः सुदारुणः।
घोराश्च दारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम्॥ २७॥
कालकी भेजी हुई मौत, दण्ड, तमोगुण, दारुण अग्नि और अत्यन्त भयंकर पाश—ये भूमिदान करनेवाले पुरुषका स्पर्श नहीं कर सकते हैं॥ २७॥

पितॄंश्च पितृलोकस्थान् देवलोकाच्च देवताः । संतर्पयति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम् ॥ २८ ॥ जो पृथ्वीका दान करता है, वह शान्ताचित्त पुरुष पितृलोकमें रहनेवाले पितरों तथा देवलोकसे आये हुए देवताओंको भी तृप्त कर देता है ॥ २८ ॥

कृशाय म्रियमाणाय वृत्तिग्लानाय सीदते । भूमिं वृत्तिकरीं दत्त्वा सत्री भवति मानवः ॥ २९ ॥ दुर्बल, जीविकाके बिना दुखी और भूखके कष्टसे मरते हुए ब्राह्मणको उपजाऊ भूमिदान करनेवाला मनुष्य यज्ञका फल पाता है ॥ २९ ॥

यथा धावति गौर्र्वत्सं स्रवन्ती वत्सला पयः । एवमेव महाभाग भूमिर्भवति भूमिदम् ॥ ३० ॥ महाभाग! जैसे बछड़ेके प्रति वात्सल्यभावसे भरी हुई गौ अपने थनोंसे दूध बहाती हुई उसे पिलानेके लिये दौड़ती है, उसी प्रकार यह पृथ्वी भूमिदान करनेवालेको सुख पहुँचानेके लिये दौड़ती है ॥ ३० ॥

फालकृष्टं महीं दत्त्वा सबीजां सफलामपि । उदीर्णं वापि शरणं यथा भवति कामदः ॥ ३१ ॥ जो मनुष्य जोती-बोयी और उपजी हुई खेतीसे भरी भूमिको दान करता है अथवा विशाल भवन बनवाकर देता है, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ३१ ॥

ब्राह्मणं वृत्तिसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् । नरः प्रतिग्राह्य महीं न याति परमापदम् ॥ ३२ ॥ जो सदाचारी, अग्निहोत्री और उत्तम व्रतमें संलग्न ब्राह्मणको पृथ्वीका दान करता है, वह कभी भारी विपत्तिमें नहीं पड़ता है ॥ ३२ ॥

यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जायते । तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ॥ ३३ ॥ जैसे चन्द्रमाकी कला प्रतिदिन बढ़ती है, उसी प्रकार दान की हुई पृथ्वीमें जितनी बार फसल पैदा होती है, उतना ही उसके पृथ्वी-दानका फल बढ़ता जाता है ॥ ३३ ॥

अत्र गाथा भूमिगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । याः श्रुत्वा जामदग्न्येन दत्ता भूः काश्यपाय वै ॥ ३४ ॥ प्राचीन बातोंको जाननेवाले लोग भूमिकी गायी हुई गाथाओंका वर्णन किया करते हैं, जिन्हें सुनकर जमदग्निनन्दन परशुरामने काश्यपजीको सारी पृथ्वी दान कर दी थी ॥ ३४ ॥

मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्यथ । अस्मिल्लोंके परे चैव तद् दत्तं जायते पुनः ॥ ३५ ॥

वह गाथा इस प्रकार है—(पृथ्वी कहती है—) 'मुझे ही दानमें दो, मुझे ही ग्रहण करो। मुझे देकर ही मुझे पाओगे; क्योंकि मनुष्य इस लोकमें जो कुछ दान करता है, वही उसे इहलोक और परलोकमें भी प्राप्त होता है' ।। ३५ ।।

य इमां व्याहृतिं वेद ब्राह्मणो वेदसम्मिताम् ।
श्राद्धस्य क्रियमाणस्य ब्रह्मभूयं स गच्छति ।। ३६ ।।
जो ब्राह्मण श्राद्धकालमें पृथ्वीकी गायी हुई वेदसम्मत इस गाथाका पाठ करता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ।। ३६ ।।

कृत्यानामधिशस्तानामरिष्टशमनं महत् ।
प्रायश्चित्तं महीं दत्त्वा पुनात्युभयतो दश ।। ३७ ।।
अत्यन्त प्रबल कृत्या (मारणशक्ति) के प्रयोगसे जो भय प्राप्त होता है, उसको शान्त करनेका सबसे महान् साधन पृथ्वीका दान ही है। भूमिदानरूप प्रायश्चित्त करके मनुष्य अपने आगे-पीछेकी दस पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है ।। ३७ ।।

पुनाति य इदं वेद वेदवादं तथैव च ।
प्रकृतिः सर्वभूतानां भूमिर्वैश्वानरी मता ।। ३८ ।।
जो वेदवाणीरूप इस भूमिगाथाको जानता है, वह भी अपनी दस पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है। यह पृथ्वी सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिस्थान है और अग्नि इसका अधिष्ठाता देवता है ।। ३८ ।।

अभिषिच्यैव नृपतिं श्रावयेदिममागमम् ।
यथा श्रुत्वा महीं दद्यान्नादद्यात् साधुतश्च ताम् ।। ३९ ।।
राजाको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करनेके बाद उसे तत्काल ही पृथ्वीकी गायी हुई यह गाथा सुना देनी चाहिये; जिससे वह भूमिका दान करे और सत्पुरुषोंके हाथसे उन्हें दी हुई भूमि छीन न ले ।। ३९ ।।

सोऽयं कृत्स्नो ब्राह्मणार्थो राजार्थश्चाप्यसंशयः ।
राजा हि धर्मकुशलः प्रथमं भूतिलक्षणम् ।। ४० ।।
यह सारी कथा ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये है। इस विषयमें कोई संदेह नहीं है; क्योंकि राजा धर्ममें कुशल हो, यह प्रजाके ऐश्वर्य (वैभव)-को सूचित करनेवाला प्रथम लक्षण है ।। ४० ।।

अथ येषामधर्मज्ञो राजा भवति नास्तिकः ।
न ते सुखं प्रबुध्यन्ति न सुखं प्रस्वपन्ति च ।। ४१ ।।
सदा भवन्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नराः ।
योगक्षेमा हि बहवो राष्ट्रं नास्याविशन्ति तत् ।। ४२ ।।
जिनका राजा धर्मको न जाननेवाला और नास्तिक होता है, वे लोग न तो सुखसे सोते हैं और न सुखसे जागते ही हैं; अपितु उस राजाके दुराचारसे सदैव उद्विग्न रहते हैं। ऐसे

राजाके राज्यमें बहुधा योगक्षेम नहीं प्राप्त होते ।।
अथ येषां पुनः प्राज्ञो राजा भवति धार्मिकः ।
सुखं ते प्रतिबुध्यन्ते सुसुखं प्रस्वपन्ति च ॥ ४३ ॥
किंतु जिनका राजा बुद्धिमान् और धार्मिक होता है, वे सुखसे सोते और सुखसे जागते हैं ॥ ४३ ॥
तस्य राज्ञः शुभै राज्यैः कर्मभिर्निर्वृता नराः ।
योगक्षेमेण वृष्ट्या च विवर्धन्ते स्वकर्मभिः ॥ ४४ ॥
उस राजाके शुभ राज्य और शुभ कर्मोंसे प्रजावर्गके लोग संतुष्ट रहते हैं। उस राज्यमें सबके योगक्षेमका निर्वाह होता है, समयपर वर्षा होती है और प्रजा अपने शुभ कर्मोंसे समृद्धिशालिनी होती है ॥ ४४ ॥
स कुलीनः स पुरुषः स बन्धुः स च पुण्यकृत् ।
स दाता स च विक्रान्तो यो ददाति वसुन्धराम् ॥ ४५ ॥
जो पृथ्वीका दान करता है, वही कुलीन, वही पुरुष, वही बन्धु, वही पुण्यात्मा, वही दाता और वही पराक्रमी है ॥ ४५ ॥
आदित्या इव दीप्यन्ते तेजसा भुवि मानवाः ।
ददन्ति वसुधां स्फीतां ये वेदविदुषि द्विजे ॥ ४६ ॥
जो वेदवेत्ता ब्राह्मणको धन-धान्यसे सम्पन्न भूमिदान करते हैं, वे मनुष्य इस पृथ्वीपर अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होते हैं ॥ ४६ ॥
यथा सस्यानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले ।
तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानसमार्जिताः ॥ ४७ ॥
जैसे भूमिमें बोये हुए बीज खेतीके रूपमें अंकुरित होते और अधिक अन्न पैदा करते हैं, उसी प्रकार भूमिदान करनेसे सम्पूर्ण कामनाएँ सफल होती हैं ॥
आदित्यो वरुणो विष्णुर्ब्रह्मा सोमो हुताशनः ।
शूलपाणिश्च भगवान् प्रतिनन्दन्ति भूमिदम् ॥ ४८ ॥
सूर्य, वरुण, विष्णु, ब्रह्मा, चन्द्रमा, अग्नि और भगवान् शंकर—ये सभी भूमि-दान करनेवाले पुरुषका अभिनन्दन करते हैं ॥ ४८ ॥
भूमौ जायन्ति पुरुषा भूमौ निष्ठां व्रजन्ति च ।
चतुर्विधो हि लोकोऽयं योऽयं भूमिगुणात्मकः ॥ ४९ ॥
सब लोग पृथ्वीपर ही जन्म लेते और पृथ्वीमें ही लीन हो जाते हैं। अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चारों प्रकारके प्राणियोंका शरीर पृथ्वीका ही कार्य है ।।
एषा माता पिता चैव जगतः पृथिवीपते ।
नानया सदृशं भूतं किंचिदस्ति जनाधिप ॥ ५० ॥

पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! यह पृथ्वी ही जगत्‌की माता और पिता है। इसके समान दूसरा कोई भूत नहीं है॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । बृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ ५१ ॥ युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और बृहस्पतिके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं॥ ५१ ॥ इष्ट्वा क्रतुशतेनाथ महता दक्षिणावता । मघवा वाग्विदां श्रेष्ठं पप्रच्छेदं बृहस्पतिम् ॥ ५२ ॥ इन्द्रने महान् दक्षिणाओंसे युक्त सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेके पश्चात् वाग्‍वेत्ताओंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीसे इस प्रकार पूछा॥ ५२ ॥

मघवोवाच

भगवन् केन दानेन स्वर्गतः सुखमेधते । यदक्षयं महार्घं च तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ ५३ ॥ इन्द्र बोले— वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! किस दानके प्रभावसे दाताको स्वर्गसे भी अधिक सुखकी प्राप्ति होती है? जिसका फल अक्षय और अधिक महत्त्वपूर्ण हो, उस दानको ही मुझे बताइये॥ ५३ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तः स सुरेन्द्रेण ततो देवपुरोहितः । बृहस्पतिर्बृहत्तेजाः प्रत्युवाच शतक्रतुम् ॥ ५४ ॥ भीष्मजी कहते हैं— भारत! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर देवताओंके पुरोहित महातेजस्वी बृहस्पतिने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया॥ ५४ ॥

बृहस्पतिरुवाच

सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं च वृत्रहन् । (विद्यादानं च कन्यानां दानं पापहरं परम् ।) दददेतान् महाप्राज्ञः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥ बृहस्पतिने कहा— वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र! सुवर्णदान, गोदान, भूमिदान, विद्यादान और कन्यादान—ये अत्यन्त पापहारी माने गये हैं। जो परम बुद्धिमान् पुरुष इन सब वस्तुओंका दान करता है वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५५ ॥ न भूमिदानाद् देवेन्द्र परं किंचिदिति प्रभो । विशिष्टमिति मन्यामि यथा प्राहर्मनीषिणः ॥ ५६ ॥

प्रभो! देवेन्द्र! जैसा कि मनीषी पुरुष कहते हैं, मैं भूमिदानसे बढ़कर दूसरे किसी दानको नहीं मानता हूँ ।। ५६ ।।
(ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा राष्ट्रघातेऽथ स्वामिनः ।
कुलस्त्रीणां परिभवे मृतास्ते भूमिदैः समाः ॥)

जो ब्राह्मणोंके लिये, गौओंके लिये, राष्ट्रके विनाशके अवसरपर स्वामीके लिये तथा जहाँ कुलांगनाओंका अपमान होता हो, वहाँ उन सबकी रक्षाके लिये युद्धमें प्राण त्याग करते हैं, वे ही भूमिदान करनेवालोंके समान पुण्यके भागी होते हैं ।।
ये शूरा निहता युद्धे स्वर्ग्याता रणगृद्धिनः ।
सर्वे ते विबुधश्रेष्ठ नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥ ५७ ॥

विबुधश्रेष्ठ! मनमें युद्धके लिये उत्साह रखनेवाले जो शूरवीर रणभूमिमें मारे जाकर स्वर्गलोकमें जाते हैं, वे सब-के-सब भूमिदाताका उल्लंघन नहीं कर सकते ।।
भर्तुर्निःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः ।
ब्रह्मलोकगता मुक्ता नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥ ५८ ॥

स्वामीकी भलाईके लिये उद्यत हो रणभूमिमें मारे जाकर अपने शरीरका परित्याग करनेवाले पुरुष पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं; परंतु वे भी भूमिदातासे आगे नही बढ़ पाते हैं ।। ५८ ।।
पञ्च पूर्वा हि पुरुषाः षडन्ये वसुधां गताः ।
एकादश ददद्भूमिं परित्रातीह मानवः ॥ ५९ ॥

इस जगत्में भूमिदान करनेवाला मनुष्य अपनी पाँच पीढ़ीत्तकके पूर्वजोंका और अन्य छः पीढ़ियोंतक पृथ्वीपर आनेवाली संतानोंका—इस प्रकार कुल ग्यारह पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ।। ५९ ।।
रत्नोपकीर्णां वसुधां यो ददाति पुरंदर ।
स मुक्तः सर्वकलुषैः स्वर्गलोके महीयते ॥ ६० ॥

पुरंदर! जो रत्नयुक्त पृथ्वीका दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ।। ६० ।।
महीं स्फीतां ददद् राजन् सर्वकामगुणान्विताम् ।
राजाधिराजो भवति तद्धि दानमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥

राजन्! धन-धान्यसे सम्पन्न तथा समस्त मनोवांछित गुणोंसे युक्त पृथ्वीका दान करनेवाला पुरुष दूसरे जन्ममें राजाधिराज होता है; क्योंकि वह सर्वोत्तम दान है ।। ६१ ।।
सर्वकामसमायुक्तां काश्यपीं यः प्रयच्छति ।
सर्वभूतानि मन्यन्ते मां ददातीति वासव ॥ ६२ ॥

इन्द्र! जो सम्पूर्ण भोगोंसे युक्त पृथ्वीका दान करता है, उसे सब प्राणी यही समझते हैं कि यह मेरा दान कर रहा है ।। ६२ ।।

सर्वकामदुघां धेनुं सर्वकामगुणान्विताम् ।
ददाति यः सहस्राक्ष स्वर्गं याति स मानवः ॥ ६३ ॥
सहस्राक्ष! जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली और समस्त मनोवांछित गुणोंसे सम्पन्न कामधेनु-स्वरूपा पृथ्वीका दान करता है, वह मानव स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ६३ ॥
मधुसर्पिःप्रवाहिन्यः पयोदधिवहास्तथा ।
सरितस्तर्पयन्तीह सुरेन्द्र वसुधाप्रदम् ॥ ६४ ॥
देवेन्द्र! यहाँ पृथ्वीदान करनेवाले पुरुषको परलोकमें मधु, घी, दूध और दहीकी धारा बहानेवाली नदियाँ तृप्त करती हैं ॥ ६४ ॥
भूमिप्रदानान्नृपतिर्मुच्यते सर्वकिल्बिषात् ।
न हि भूमिप्रदानेन दानमन्यद् विशिष्यते ॥ ६५ ॥
राजा भूमिदान करनेसे समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है। भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ॥ ६५ ॥
ददाति यः समुद्रान्तां पृथिवीं शस्त्रनिर्जिताम् ।
तं जनाः कथयन्तीह यावद् भवति गौरियम् ॥ ६६ ॥
जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको शस्त्रोंसे जीतकर दान देता है, उसकी कीर्ति संसारके लोग तबतक गाया करते हैं, जबतक यह पृथ्वी कायम रहती है ॥ ६६ ॥
पुण्यामृद्धिरसां भूमिं यो ददाति पुरंदर ।
न तस्य लोकाः क्षीयन्ते भूमिदानगुणान्विताः ॥ ६७ ॥
पुरंदर! जो परम पवित्र और समृद्धिरूपी रससे भरी हुई पृथ्वीका दान करता है, उसे उस भूदानसम्बन्धी गुणोंसे युक्त अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ॥ ६७ ॥
सर्वदा पार्थिवेनेह सततं भूतिमिच्छता ।
भूर्देया विधिवच्छक्र पात्रे सुखमभीप्सुना ॥ ६८ ॥
इन्द्र! जो राजा सदा ऐश्वर्य चाहता हो और सुख पानेकी इच्छा रखता हो, वह विधिपूर्वक सुपात्रको भूमिदान दे ॥ ६८ ॥
अपि कृत्वा नरः पापं भूमिं दत्त्वा द्विजातये ।
समुत्सृजति तत् पापं जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥ ६९ ॥
पाप करके भी यदि मनुष्य ब्राह्मणको भूमिदान कर देता है तो वह उस पापको उसी प्रकार त्याग देता है, जैसे सर्प पुरानी केंचुलको ॥ ६९ ॥
सागरान् सरितः शैलान् काननानि च सर्वशः ।
सर्वमेतन्नरः शक्र ददाति वसुधां ददत् ॥ ७० ॥
इन्द्र! मनुष्य पृथ्वीका दान करनेके साथ ही समुद्र, नदी, पर्वत और सम्पूर्ण वन—इन सबका दान कर देता है (अर्थात् इन सबके दानका फल प्राप्त कर लेता है) ॥
तडागान्युदपानानि स्रोतांसि च सरांसि च ।

स्नेहान् सर्वरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ॥ ७१ ॥
इतना ही नहीं, पृथ्वीका दान करनेवाला पुरुष तालाब, कुआँ, झरना, सरोवर, स्नेह (घृत आदि) और सब प्रकारके रसोंके दानका भी फल प्राप्त कर लेता है ॥ ७१ ॥
ओषधीर्वीर्यसम्पन्ना नगान् पुष्पफलान्वितान् ।
काननोपलशैलांश्च ददाति वसुधां ददत् ॥ ७२ ॥
पृथ्वीका दान करते समय मनुष्य शक्तिशाली ओषधियों, फल और फूलोंसे भरे हुए वृक्षों, वन, प्रस्तर और पर्वतोंका भी दान कर देता है ॥ ७२ ॥
अग्निष्टोमप्रभृतिभिरिष्ट्वा च स्वाप्तदक्षिणैः ।
न तत्फलमवाप्नोति भूमिदानाद् यदश्नुते ॥ ७३ ॥
बहुत-सी दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंद्वारा यजन करके भी मनुष्य उस फलको नहीं पाता, जो उसे भूमिदानसे मिल जाता है ॥ ७३ ॥
दाता दशानुगृह्णाति दश हन्ति तथा क्षिपन् ।
पूर्वदत्तां हरन् भूमिं नरकायोपगच्छति ॥ ७४ ॥
न ददाति प्रतिश्रुत्य दत्त्वापि च हरेत् तु यः ।
स बद्धो वारुणैः पाशैस्तप्यते मृत्युशासनात् ॥ ७५ ॥
भूमिका दान करनेवाला मनुष्य अपनी दस पीढ़ियोंका उद्धार करता है तथा देकर छीन लेनेवाला अपनी दस पीढ़ियोंको नरकमें ढकेलता है। जो पहलेकी दी हुई भूमिका अपहरण करता है वह स्वयं भी नरकमें जाता है। जो देनेकी प्रतिज्ञा करके नहीं देता है तथा जो देकर भी फिर ले लेता है वह मृत्युकी आज्ञासे वरुणके पाशमें बँधकर तरह-तरहके कष्ट भोगता है ॥ ७४ ॥
आहिताग्निं सदायज्ञं कृशवृत्तिं प्रियातिथिम् ।
ये भजन्ति द्विजश्रेष्ठं नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥ ७६ ॥
जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, सदा यज्ञके अनुष्ठानमें लगा रहता और अतिथियोंको प्रिय मानता है तथा जिसकी जीविका-वृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे श्रेष्ठ द्विजकी जो सेवा करते हैं वे यमराजके पास नहीं जाते ॥ ७६ ॥
ब्राह्मणेष्वनृणीभूतः पार्थिवः स्यात् पुरंदर ।
इतरेषां तु वर्णानां तारयेत् कृशदुर्बलान् ॥ ७७ ॥
पुरंदर! राजाको चाहिये कि वह ब्राह्मणोंके प्रति उऋण रहे अर्थात् उनकी सेवा करके उन्हें संतुष्ट रखे तथा अन्य वर्णोंमें भी जो लोग दीन-दुर्बल हों; उनका संकटसे उद्धार करे ॥ ७७ ॥
नाच्छिन्द्यात् स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप ।
ब्राह्मणस्य सुरश्रेष्ठ कृशवृत्तेः कदाचन ॥ ७८ ॥

सुरश्रेष्ठ! देवेश्वर! जिसकी जीविका-वृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे ब्राह्मणको दूसरेके द्वारा दानमें मिली हुई जो भूमि है, उसको कभी नहीं छीनना चाहिये ॥ ७८ ॥

यथाश्रु पतितं तेषां दीनानामथ सीदताम् । ब्राह्मणानां हृते क्षेत्रे हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम् ॥ ७९ ॥ अपना खेत छिन जानेसे दुःखी हुए दीन ब्राह्मण जो आँसू बहाते हैं, वह छीननेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर देता है ॥ ७९ ॥

भूमिपालं च्युतं राष्ट्राद् यस्तु संस्थापयेन्नरः । तस्य वासः सहस्राक्ष नाकपृष्ठे महीयते ॥ ८० ॥ इन्द्र! जो मनुष्य राज्यसे भ्रष्ट हुए राजाको फिर राजसिंहासनपर बैठा देता है, उसका स्वर्गलोकमें निवास होता है तथा वह वहाँ बड़ा सम्मान पाता है ॥ ८० ॥

इक्षुभिः संततां भूमिं यवगोधूमशालिनीम् । गोऽश्ववाहनपूर्णां वा बाहुवीर्यादुपार्जिताम् ॥ ८१ ॥ निधिगर्भां ददद् भूमिं सर्वरत्नपरिच्छदाम् । अक्षयाँल्लभते लोकान् भूमिसत्रं हि तस्य तत् ॥ ८२ ॥ जो भूमि गन्नेके वृक्षोंसे आच्छादित हो, जिसपर जौ और गेहूँकी खेती लहलहा रही हो अथवा जहाँ बैल और घोड़े आदि वाहन भरे हों, जिसके नीचे खजाना गड़ा हो तथा जो सब प्रकारके रत्नमय उपकरणोंसे अलंकृत हो, ऐसी भूमिको अपने बाहुबलसे जीतकर जो राजा दान कर देता है, उसे अक्षय लोक प्राप्त होते हैं। उसका वह दान भूमियज्ञ कहलाता है ॥ ८१-८२ ॥

विधूय कलुषं सर्वं विरजाः सम्मतः सताम् । लोके महीयते सद्भिर्यो ददाति वसुन्धराम् ॥ ८३ ॥ जो वसुधाका दान करता है, वह अपने सब पापोंका नाश करके निर्मल एवं सत्पुरुषोंके आदरका पात्र हो जाता है तथा लोकमें सज्जन पुरुष सदा ही उसका सत्कार करते हैं ॥ ८३ ॥

यथाप्सु पतितः शक्र तैलबिन्दुर्विसर्पति । तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ॥ ८४ ॥ इन्द्र! जैसे जलमें गिरी हुई तेलकी एक बूँद सब ओर फैल जाती है; उसी प्रकार दान की हुई भूमिमें जितना-जितना अन्न पैदा होता है, उतना-ही-उतना उसके दानका महत्त्व बढ़ता जाता है ॥ ८४ ॥

ये रणाग्रे महीपालाः शूराः समितिशोभनाः । वध्यन्तेऽभिमुखाः शक्र ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते ॥ ८५ ॥ देवराज! युद्धमें शोभा पानेवाले जो शूरवीर भूपाल युद्धके मुहानेपर शत्रुके सम्मुख लड़ते हुए मारे जाते हैं, वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं ॥ ८५ ॥

नृत्यगीतपरा नार्यो दिव्यमाल्यविभूषिताः । उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र तथा भूमिप्रदं दिवि ॥ ८६ ॥ देवेन्द्र! दिव्य मालाओंसे विभूषित हो नाच और गानमें लगी हुई देवांगनाएँ स्वर्गमें भूमिदाताकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥ ८६ ॥ मोदते च सुखं स्वर्गे देवगन्धर्वपूजितः । यो ददाति महीं सम्यग् विधिनेह द्विजातये ॥ ८७ ॥ जो यहाँ उत्तम विधिसे ब्राह्मणको भूमिका दान करता है, वह स्वर्गमें देवताओं और गन्धर्वोंसे पूजित हो सुख और आनन्द भोगता है ॥ ८७ ॥ शतमप्सरसश्चैव दिव्यमाल्यविभूषिताः । उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र ब्रह्मलोके धराप्रदम् ॥ ८८ ॥ देवराज! भूदान करनेवाले पुरुषकी सेवामें ब्रह्मलोकमें दिव्य मालाओंसे विभूषित सैकड़ों अप्सराएँ उपस्थित होती हैं ॥ ८८ ॥ उपतिष्ठन्ति पुण्यानि सदा भूमिप्रदं नरम् । शङ्खभद्रासनं छत्रं वराश्वा वरवाहनम् ॥ ८९ ॥ भूमिदान करनेवाले मनुष्यके यहाँ सदा पुण्यके फलस्वरूप शंख, सिंहासन, छत्र, उत्तम घोड़े और श्रेष्ठ वाहन उपस्थित होते हैं ॥ ८९ ॥ भूमिप्रदानात् पुष्पाणि हिरण्यनिचयास्तथा । आज्ञा सदाप्रतिहता जयशब्दा वसूनि च ॥ ९० ॥ भूमिदान करनेसे पुरुषको सुन्दर पुष्प, सोनेके भण्डार, कभी प्रतिहत न होनेवाली आज्ञा, जयसूचक शब्द तथा भाँति-भाँतिके धन-रत्न प्राप्त होते हैं ॥ ९० ॥ भूमिदानस्य पुण्यानि फलं स्वर्गः पुरंदर । हिरण्यपुष्पाश्चौषध्यः कुशकाञ्चनशाद्वलाः ॥ ९१ ॥ पुरंदर! भूमिदानके जो पुण्य हैं, उनके फलरूपमें स्वर्ग, सुवर्णमय फूल देनेवाली ओषधियाँ तथा सुनहरे कुश और घाससे ढकी हुई भूमि प्राप्त होती हैं ॥ ९१ ॥ अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् । नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः । नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधिः ॥ ९२ ॥ भूमिदान करनेवाला पुरुष अमृत पैदा करनेवाली भूमि पाता है, भूमिके समान कोई दान नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, सत्यके समान कोई धर्म नहीं है और दानके समान कोई निधि नहीं है ॥ ९२ ॥

भीष्म उवाच

एतदांगिरसाच्छ्रुत्वा वासवो वसुधामिमाम् ।

वसूरत्नसमाकीर्णां ददावांगिरसे तदा ॥ ९३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! बृहस्पतिजीके मुँहसे भूमिदानका यह माहात्म्य सुनकर इन्द्रने धन और रत्नोंसे भरी हुई यह पृथ्वी उन्हें दान कर दी ॥ ९३ ॥
य इदं श्रावयेच्छ्राद्धे भूमिदानस्य सम्भवम् ।
न तस्य रक्षसां भागो नासुराणां भवत्युत ॥ ९४ ॥
जो पुरुष श्राद्धके समय पृथ्वीदानके इस माहात्म्यको सुनता है, उसके श्राद्धकर्ममें अर्पण किये हुए भाग राक्षस और असुर नहीं लेने पाते ॥ ९४ ॥
अक्षयं च भवेद् दत्तं पितृभ्यस्तन्न संशयः ।
तस्माच्छाद्धेष्विदं विद्वान् भुञ्जतः श्रावयेद् द्विजान् ॥ ९५ ॥
पितरोंके निमित्त उसका दिया हुआ सारा दान अक्षय होता है, इसमें संशय नहीं है; इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंको यह भूमिदानका माहात्म्य अवश्य सुनाये ॥ ९५ ॥
इत्येतत् सर्वदानानां श्रेष्ठमुक्तं तवानघ ।
मया भरतशार्दूल किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ९६ ॥
निष्पाप भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने सब दानोंमें श्रेष्ठ पृथ्वीदानका माहात्म्य तुम्हें बताया है, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ९६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका
संवादविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९८ १/३ श्लोक हैं)

अन्नदानका विशेष माहात्म्य

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त्रिषष्टितमोऽध्यायः

अन्नदानका विशेष माहात्म्य

युधिष्ठिर उवाच

कानि दानानि लोकेऽस्मिन् दातुकामो महीपतिः ।
गुणाधिकेभ्यो विप्रेभ्यो दद्यात् भरतसत्तम ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! जिस राजाको दान करनेकी इच्छा हो, वह इस लोकमें गुणवान् ब्राह्मणोंको किन-किन वस्तुओंका दान करे? ॥ १ ॥

केन तुष्यन्ति ते सद्यः किं तुष्टाः प्रदिशन्ति च ।
शंस मे तन्महाबाहो फलं पुण्यकृतं महत् ॥ २ ॥
किस वस्तुके देनेसे ब्राह्मण तुरन्त प्रसन्न हो जाते हैं? और प्रसन्न होकर क्या देते हैं? महाबाहो! अब मुझे दानजनित महान् पुण्यका फल बताइये ॥ २ ॥

दत्तं किं फलवद् राजन्निह लोके परत्र च ।
भवतः श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ॥ ३ ॥
राजन्! इहलोक और परलोकमें कौन-सा दान विशेष फल देनेवाला होता है? यह मैं आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ। आप इस विषयका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

इममर्थं पुरा पृष्टो नारदो देवदर्शनः ।
यदुक्तवानसौ वाक्यं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! यही बात मैंने पहले एक बार देवदर्शी नारदजीसे पूछी थी। उस समय उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा था, वही तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४ ॥

नारद उवाच

अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ऋषिगणास्तथा ।
लोकतन्त्रं हि संज्ञाश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥ ५ ॥
नारदजीने कहा— देवता और ऋषि अन्नकी ही प्रशंसा करते हैं, अन्नसे ही लोकयात्राका निर्वाह होता है। उसीसे बुद्धिको स्फूर्ति प्राप्त होती है तथा उस अन्नमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ ५ ॥

अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति ।
तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छन्ति मानवाः ॥ ६ ॥
अन्नके समान न कोई दान था और न होगा। इसलिये मनुष्य अधिकतर अन्नका ही दान करना चाहते हैं ॥ ६ ॥

अन्नमूर्जस्करं लोके प्राणाश्चान्ने प्रतिष्ठिताः । अन्नेन धार्यते सर्वं विश्वं जगदिदं प्रभो ॥ ७ ॥ प्रभो! संसारमें अन्न ही शरीरके बलको बढ़ानेवाला है। अन्नके ही आधारपर प्राण टिके हुए हैं और इस सम्पूर्ण जगत्‌को अन्नने ही धारण कर रखा है ॥ ७ ॥

अन्नाद् गृहस्था लोकेऽस्मिन् भिक्षवस्तापसास्तथा । अन्नाद् भवन्ति वै प्राणाः प्रत्यक्षं नात्र संशयः ॥ ८ ॥ इस जगत्‌में गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा भिक्षा माँगनेवाले भी अन्नसे ही जीते हैं। अन्नसे ही सबके प्राणोंकी रक्षा होती है। इस बातका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥

कुटुम्बिने सीदते च ब्राह्मणाय महात्मने । दातव्यं भिक्षवे चान्नामात्मनो भूतिमिच्छता ॥ ९ ॥ अतः अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह अन्नके लिये दुखी, बाल-बच्चोंवाले, महामनस्वी ब्राह्मणको और भिक्षा माँगनेवालेको भी अन्नदान करे ॥ ९ ॥

ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमर्थिने । विदधाति निधिं श्रेष्ठं पारलौकिकमात्मनः ॥ १० ॥ जो याचना करनेवाले सुपात्र ब्राह्मणको अन्नदान देता है, वह परलोकमें अपने लिये एक अच्छी निधि (खजाना) बना लेता है ॥ १० ॥

श्रान्तमध्वनि वर्तन्तं वृद्धमर्हमुपस्थितम् । अर्चयेद् भूतिमन्विच्छन् गृहस्थो गृहमागतम् ॥ ११ ॥ रास्तेका थका-माँदा बूढ़ा राहगीर यदि घरपर आ जाय तो अपना कल्याण चाहनेवाले गृहस्थको उस आदरणीय अतिथिका आदर करना चाहिये ॥ ११ ॥

क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः । अन्नदः प्राप्नुते राजन् दिवि चेह च यत्सुखम् ॥ १२ ॥ राजन्! जो पुरुष मनमें उठे हुए क्रोधको दबाकर और ईर्ष्याको त्यागकर अच्छे शील-स्वभावका परिचय देता हुआ अन्नदान करता है, वह इहलोक और परलोकमें भी सुख पाता है ॥ १२ ॥

नावमन्येद्भिगतं न प्रणुद्यात् कदाचन । अपि श्वपाके शुनि वा न दानं विप्रणश्यति ॥ १३ ॥ अपने घरपर कोई भी आ जाय, उसका न तो कभी अपमान करना चाहिये और न उसे ताड़ना ही देनी चाहिये; क्योंकि चाण्डाल अथवा कुत्तेको भी दिया हुआ अन्नदान कभी नष्ट नहीं होता (व्यर्थ नहीं जाता) ॥ १३ ॥

यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते । आर्तायादृष्टपूर्वाय स महद्धर्ममाप्नुयात् ॥ १४ ॥

जो मनुष्य कष्टमें पड़े हुए अपरिचित राहीको प्रसन्नतापूर्वक अन्न देता है, उसे महान् धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥

पितॄन् देवानृषीन् विप्रानतिथींश्च जनाधिप । यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥ १५ ॥ नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों, ऋषियों, ब्राह्मणों और अतिथियोंको अन्न देकर संतुष्ट करता है, उसके पुण्यका फल महान् है ॥ १५ ॥

कृत्वातिपातकं कर्म यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण न स पापेन मुह्यते ॥ १६ ॥ जो महान् पाप करके भी याचक मनुष्यको, उसमें भी विशेषतः ब्राह्मणको अन्न देता है, वह अपने पापके कारण मोहमें नहीं पड़ता है ॥ १६ ॥

ब्राह्मणेष्वक्षयं दानमन्नं शूद्रे महाफलम् । अन्नदानं हि शूद्रे च ब्राह्मणे च विशिष्यते ॥ १७ ॥ ब्राह्मणको अन्नका दान दिया जाय तो अक्षय फल प्राप्त होता है और शूद्रको भी देनेसे महान् फल होता है; क्योंकि अन्नका दान शूद्रको दिया जाय या ब्राह्मणको, उसका विशेष फल होता है ॥ १७ ॥

न पृच्छेद् गोत्रचरणं स्वाध्यायं देशमेव च । भिक्षितो ब्राह्मणेनेह दद्यादन्नं प्रयाचितः ॥ १८ ॥ यदि ब्राह्मण अन्नकी याचना करे तो उससे गोत्र, शाखा, वेदाध्ययन और निवासस्थान आदिका परिचय न पूछे; तुरंत ही उसकी सेवामें अन्न उपस्थित कर दे ॥ १८ ॥

अन्नदस्यान्नवृक्षाश्च सर्वकामफलप्रदाः । भवन्ति चेह चामुत्र नृपतेर्नात्र संशयः ॥ १९ ॥ जो राजा अन्नका दान करता है, उसके लिये अन्नके पौधे इहलोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ १९ ॥

आशंसन्ते हि पितरः सुवृष्टिमिव कर्षकाः । अस्माकमपि पुत्रो वा पौत्रो वान्नं प्रदास्यति ॥ २० ॥ जैसे किसान अच्छी वृष्टि मनाया करते हैं, उसी प्रकार पितर भी यह आशा लगाये रहते हैं कि कभी हमलोगोंका पुत्र या पौत्र भी हमारे लिये अन्न प्रदान करेगा ॥ २० ॥

ब्राह्मणो हि महद्भूतं स्वयं देहीति याचति । अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्नुयात् ॥ २१ ॥ ब्राह्मण एक महान् प्राणी है। यदि वह 'मुझे अन्न दो' इस प्रकार स्वयं अन्नकी याचना करता है तो मनुष्यको चाहिये कि सकामभावसे या निष्कामभावसे उसे अन्नदान देकर पुण्य प्राप्त करे ॥ २१ ॥

ब्राह्मणः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् ।

विप्रा यदधिगच्छन्ति भिक्षमाणा गृहं सदा ॥ २२ ॥ सत्कृताश्च निवर्तन्ते तदतीव प्रवर्धते । महाभागे कुले प्रेत्य जन्म चाप्नोति भारत ॥ २३ ॥ भारत! ब्राह्मण सब मनुष्योंका अतिथि और सबसे पहले भोजन पानेका अधिकारी है। ब्राह्मण जिस घरपर सदा भिक्षा माँगनेके लिये जाते हैं और वहाँसे सत्कार पाकर लौटते हैं, उस घरकी सम्पत्ति अधिक बढ़ जाती है तथा उस घरका मालिक मरनेके बाद महान् सौभाग्यशाली कुलमें जन्म पाता है ॥

दत्त्वा त्वन्नं नरो लोके तथा स्थानमनुत्तमम् । नित्यं मिष्टान्नदायी तु स्वर्गे वसति सत्कृतः ॥ २४ ॥ जो मनुष्य इस लोकमें सदा अन्न, उत्तम स्थान और मिष्टान्नका दान करता है, वह देवताओंसे सम्मानित होकर स्वर्गलोकमें निवास करता है ॥ २४ ॥

अन्नं प्राणा नराणां हि सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् । अन्नदः पशुमान् पुत्री धनवान् भोगवानपि ॥ २५ ॥ प्राणवांश्चापि भवति रूपवांश्च तथा नृप । अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदः प्रोच्यते तु सः ॥ २६ ॥ नरेश्वर! अन्न ही मनुष्योंके प्राण हैं, अन्नमें ही सब प्रतिष्ठित है, अतः अन्न दान करनेवाला मनुष्य पशु, पुत्र, धन, भोग, बल और रूप भी प्राप्त कर लेता है। जगत्में अन्न दान करनेवाला पुरुष प्राणदाता और सर्वस्व देनेवाला कहलाता है ॥ २५-२६ ॥

अन्नं हि दत्त्वातिथये ब्राह्मणाय यथाविधि । प्रदाता सुखमाप्नोति दैवतैश्चापि पूज्यते ॥ २७ ॥ अतिथि ब्राह्मणको विधिपूर्वक अन्नदान करके दाता परलोकमें सुख पाता है और देवता भी उसका आदर करते हैं ॥ २७ ॥

ब्राह्मणो हि महद्भूतं क्षेत्रभूतं युधिष्ठिर । उप्यते तत्र यद् बीजं तद्धि पुण्यफलं महत् ॥ २८ ॥ युधिष्ठिर! ब्राह्मण महान् प्राणी एवं उत्तम क्षेत्र है। उसमें जो बीज बोया जाता है, वह महान् पुण्यफल देनेवाला होता है ॥ २८ ॥

प्रत्यक्षं प्रीतिजननं भोक्तुर्दातुर्भवत्युत । सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत ॥ २९ ॥ अन्नका दान ही एक ऐसा दान है, जो दाता और भोक्ता, दोनोंको प्रत्यक्षरूपसे संतुष्ट करनेवाला होता है। इसके सिवा अन्य जितने दान हैं, उन सबका फल परोक्ष है ॥ २९ ॥

अन्नाद्धि प्रसवं यान्ति रतिरन्नाद्धि भारत । धर्मार्थावन्नतो विद्धि रोगनाशं तथान्नतः ॥ ३० ॥

भारत! अन्नसे ही संतानकी उत्पत्ति होती है। अन्नसे ही रतिकी सिद्धि होती है। अन्नसे ही धर्म और अर्थकी सिद्धि समझो। अन्नसे ही रोगोंका नाश होता है ॥ ३० ॥
अन्नं ह्यमृतमित्याह पुराकल्पे प्रजापतिः ।
अन्नं भुवं दिवं खं च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥ ३१ ॥
पूर्वकल्पमें प्रजापतिने अन्नको अमृत बतलाया है। भूलोक, स्वर्ग और आकाश अन्नरूप ही हैं; क्योंकि अन्न ही सबका आधार है ॥ ३१ ॥
अन्नप्रणाशे भिद्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ।
बलं बलवतोऽपीह प्रणश्यत्यन्नहानितः ॥ ३२ ॥
अन्नका आहार न मिलनेपर शरीरमें रहनेवाले पाँचों तत्त्व अलग-अलग हो जाते हैं। अन्नकी कमी हो जानेसे बड़े-बड़े बलवानोंका बल भी क्षीण हो जाता है ॥ ३२ ॥
आवाहाश्च विवाहाश्च यज्ञाश्चान्नंमृते तथा ।
निवर्तन्ते नरश्रेष्ठ ब्रह्म चात्र प्रलीयते ॥ ३३ ॥
निमन्त्रण, विवाह और यज्ञ भी अन्नके बिना बंद हो जाते हैं। नरश्रेष्ठ! अन्न न हो तो वेदोंका ज्ञान भी भूल जाता है ॥ ३३ ॥
अन्नतः सर्वमेतद्धि यत् किंचित् स्थाणु जंगमम् ।
त्रिषु लोकेषु धर्मार्थमन्नं देयमतो बुधैः ॥ ३४ ॥
यह जो कुछ भी स्थावर-जंगमरूप जगत् है, सब-का-सब अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि तीनों लोकोंमें धर्मके लिये अन्नका दान अवश्य करें ॥ ३४ ॥
अन्नदस्य मनुष्यस्य बलमोजो यशांसि च ।
कीर्तिश्च वर्धते शश्वत् त्रिषु लोकेषु पार्थिव ॥ ३५ ॥
पृथ्वीनाथ! अन्नदान करनेवाले मनुष्यके बल, ओज, यश और कीर्तिका तीनों लोकोंमें सदा ही विस्तार होता रहता है ॥ ३५ ॥
मेघेषूर्ध्वं संनिधत्ते प्राणानां पवनः पतिः ।
तच्च मेघगतं वारि शक्रो वर्षति भारत ॥ ३६ ॥
भारत! प्राणोंका स्वामी पवन मेघोंके ऊपर स्थित होता है और मेघमें जो जल है, उसे इन्द्र धरतीपर बरसाते हैं ॥ ३६ ॥
आदत्ते च रसान् भौमानादित्यः स्वगभस्तिभिः ।
वायुरादित्यतस्तांश्च रसान् देवः प्रवर्षति ॥ ३७ ॥
सूर्य अपनी किरणोंसे पृथ्वीके रसोंको ग्रहण करते हैं। वायुदेव सूर्यसे उन रसोंको लेकर फिर भूमिपर बरसाते हैं ॥ ३७ ॥
तद् यदा मेघतो वारि पतितं भवति क्षितौ ।
तदा वसुमती देवी स्निग्धा भवति भारत ॥ ३८ ॥

भरतनन्दन! इस प्रकार जब मेघसे पृथ्वीपर जल गिरता है, तब पृथ्वीदेवी स्निग्ध (गीली) होती है ॥ ३८ ॥

ततः सस्यानि रोहन्ति येन वर्तयते जगत् । मांसमेदोऽस्थिशुक्राणां प्रादुर्भावस्ततः पुनः ॥ ३९ ॥

फिर उस गीली धरतीसे अनाजके अंकुर उत्पन्न होते हैं, जिससे जगत्के जीवोंका निर्वाह होता है। अन्नसे ही शरीरमें मांस, मेदा, अस्थि और वीर्यका प्रादुर्भाव होता है ॥ ३९ ॥

सम्भवन्ति ततः शुक्रात् प्राणिनः पृथिवीपते । अग्नीषोमौ हि तच्छुक्रं सृजतः पुष्यतश्च ह ॥ ४० ॥

पृथिवीनाथ! उस वीर्यसे प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार अग्नि और सोम उस वीर्यकी सृष्टि और पुष्टि करते हैं ॥ ४० ॥

एवमन्नाद्धि सूर्यश्च पवनः शुक्रमेव च । एक एव स्मृतो राशिस्ततो भूतानि जज्ञिरे ॥ ४१ ॥

इस तरह सूर्य, वायु और वीर्य एक ही राशि हैं जो अन्नसे प्रकट हुए हैं। उन्हींसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है ॥ ४१ ॥

प्राणान् ददाति भूतानां तेजश्च भरतर्षभ । गृहमभ्यागतायाथ यो दद्यादन्नमर्थिने ॥ ४२ ॥

भरतश्रेष्ठ! जो घरपर आये हुए याचकको अन्न देता है, वह सब प्राणियोंको प्राण और तेजका दान करता है ॥ ४२ ॥

भीष्म उवाच

नारदेनैवमुक्तोऽहमदामन्नं सदा नृप । अनसूयुस्त्वमप्यन्नं तस्माद् देहि गतज्वरः ॥ ४३ ॥

**भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! जब नारदजीने मुझे इस प्रकार अन्न-दानका माहात्म्य बतलाया, तबसे मैं नित्य अन्नका दान किया करता था। अतः तुम भी दोषदृष्टि और जलन छोड़कर सदा अन्न-दान करते रहना ॥ ४३ ॥

दत्त्वान्नं विधिवद् राजन् विप्रेभ्यस्त्वमिति प्रभो । यथावदनुरूपेभ्यस्ततः स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ ४४ ॥

राजन्! प्रभो! तुम सुयोग्य ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक अन्नका दान करके उसके पुण्यसे स्वर्गलोकको प्राप्त कर लोगे ॥ ४४ ॥

अन्नदानां हि ये लोकास्तांस्त्वं शृणु जनाधिप । भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् ॥ ४५ ॥

नरेश्वर! अन्न-दान करनेवालोंको जो लोक प्राप्त होते हैं, उनका परिचय देता हूँ, सुनो। स्वर्गमें उन महामनस्वी अन्नदाताओंके घर प्रकाशित होते रहते हैं ॥ ४५ ॥
तारासंस्थानि रूपाणि नानास्तम्भान्वितानि च।
चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किंकिणीजालवन्ति च ॥ ४६ ॥
उन गृहोंकी आकृति तारोंके समान उज्ज्वल और अनेकानेक खम्भोंसे सुशोभित होती है। वे गृह चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल प्रतीत होते हैं। उनपर छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी हैं ॥ ४६ ॥
तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च।
अनेकशतभौमानि सान्तर्जलचराणि च ॥ ४७ ॥
उनमेंसे कितने ही भवन प्रातःकालके सूर्यकी भाँति लाल प्रभासे युक्त हैं, कितने ही स्थावर हैं और कितने ही विमानोंके रूपमें विचरते रहते हैं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें होती हैं। उन घरोंके भीतर जलचर जीवोंसहित जलाशय होते हैं ॥ ४७ ॥
वैदूर्यार्कप्रकाशानि रौप्यरुक्ममयानि च।
सर्वकामफलाश्चापि वृक्षा भवनसंस्थिताः ॥ ४८ ॥
कितने ही घर वैदूर्यमणिमय (नील) सूर्यके समान प्रकाशित होते हैं। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए हैं। उन भवनोंमें अनेकानेक वृक्ष शोभा पाते हैं, जो सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले हैं ॥ ४८ ॥
वाप्यो वीथ्यः सभाः कूपा दीर्घिकाश्चैव सर्वशः।
घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रशः ॥ ४९ ॥
उन गृहोंमें अनेक प्रकारकी बावड़ियाँ, गलियाँ, सभाभवन, कूप, तालाब और गम्भीर घोष करनेवाले सहस्रों जुते हुए रथ आदि वाहन होते हैं ॥ ४९ ॥
भक्ष्यभोज्यमयाः शैला वासांस्याभरणानि च।
क्षीरं स्रवन्ति सरितस्तथा चैवान्नपर्वताः ॥ ५० ॥
वहाँ भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंके पर्वत, वस्त्र और आभूषण हैं। वहाँकी नदियाँ दूध बहाती हैं। अन्नके पर्वतोपम ढेर लगे रहते हैं ॥ ५० ॥
प्रासादाः पाण्डुराभ्राभाः शय्याश्च काञ्चनोज्ज्वलाः।
तान्यन्नदाः प्रपद्यन्ते तस्मादन्नप्रदो भव ॥ ५१ ॥
उन भवनोंमें सफेद बादलोंके समान अट्टालिकाएँ और सुवर्णनिर्मित प्रकाशपूर्ण शय्याएँ शोभा पाती हैं। वे महल अन्नदाता पुरुषोंको प्राप्त होते हैं; इसलिये तुम भी अन्नदान करो ॥ ५१ ॥
एते लोकाः पुण्यकृता अन्नदानां महात्मनाम्।
तस्मादन्नं प्रयत्नेन दातव्यं मानवैर्भुवि ॥ ५२ ॥