महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 668, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता
युधिष्ठिर उवाच
विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान् प्रवदता विभो ।
प्रवक्ष्यामि तु संदेहं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**प्रभो! आपने धर्मका उपदेश करके उसमें मेरा दृढ़ विश्वास उत्पन्न कर दिया है। पितामह! अब मैं आपसे एक और संदेह पूछ रहा हूँ, उसके विषयमें मुझे बताइये ॥ १ ॥
व्रतानां किं फलं प्रोक्तं कीदृशं वा महाद्युते ।
नियमानां फलं किं च स्वधीतस्य च किं फलम् ॥ २ ॥
महाद्युते! व्रतोंका क्या और कैसा फल बताया गया है? नियमोंके पालन और स्वाध्यायका भी क्या फल है? ॥ २ ॥
दत्तस्येह फलं किं च वेदानां धारणे च किम् ।
अध्यापने फलं किं च सर्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
दान देने, वेदोंको धारण करने और उन्हें पढ़ानेका क्या फल होता है? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
अप्रतिग्राहके किं च फलं लोके पितामह ।
तस्य किं च फलं दृष्टं श्रुतं यस्तु प्रयच्छति ॥ ४ ॥
पितामह! संसारमें जो प्रतिग्रह नहीं लेता, उसे क्या फल मिलता है? तथा जो वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, उसके लिये कौन-सा फल देखा गया है ॥ ४ ॥
स्वकर्मनिरतानां च शूराणां चापि किं फलम् ।
शौचे च किं फलं प्रोक्तं ब्रह्मचर्ये च किं फलम् ॥ ५ ॥
अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहनेवाले शूरवीरोंको भी किस फलकी प्राप्ति होती है? शौचाचारका तथा ब्रह्मचर्यके पालनका क्या फल बताया गया है? ॥ ५ ॥
पितृशुश्रूषणे किं च मातृशुश्रूषणे तथा ।
आचार्यगुरुशुश्रूषास्वनुक्रोशानुकम्पने ॥ ६ ॥
पिता और माताकी सेवासे कौन-सा फल प्राप्त होता है? आचार्य एवं गुरुकी सेवासे तथा प्राणियोंपर अनुग्रह एवं दयाभाव बनाये रखनेसे किस फलकी प्राप्ति होती है? ॥ ६ ॥
एतत् सर्वमशेषेण पितामह यथातथम् ।