महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान् प्रवदता विभो ।
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता
युधिष्ठिर उवाच
विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान् प्रवदता विभो ।
प्रवक्ष्यामि तु संदेहं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**प्रभो! आपने धर्मका उपदेश करके उसमें मेरा दृढ़ विश्वास उत्पन्न कर दिया है। पितामह! अब मैं आपसे एक और संदेह पूछ रहा हूँ, उसके विषयमें मुझे बताइये ॥ १ ॥
व्रतानां किं फलं प्रोक्तं कीदृशं वा महाद्युते ।
नियमानां फलं किं च स्वधीतस्य च किं फलम् ॥ २ ॥
महाद्युते! व्रतोंका क्या और कैसा फल बताया गया है? नियमोंके पालन और स्वाध्यायका भी क्या फल है? ॥ २ ॥
दत्तस्येह फलं किं च वेदानां धारणे च किम् ।
अध्यापने फलं किं च सर्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
दान देने, वेदोंको धारण करने और उन्हें पढ़ानेका क्या फल होता है? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
अप्रतिग्राहके किं च फलं लोके पितामह ।
तस्य किं च फलं दृष्टं श्रुतं यस्तु प्रयच्छति ॥ ४ ॥
पितामह! संसारमें जो प्रतिग्रह नहीं लेता, उसे क्या फल मिलता है? तथा जो वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, उसके लिये कौन-सा फल देखा गया है ॥ ४ ॥
स्वकर्मनिरतानां च शूराणां चापि किं फलम् ।
शौचे च किं फलं प्रोक्तं ब्रह्मचर्ये च किं फलम् ॥ ५ ॥
अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहनेवाले शूरवीरोंको भी किस फलकी प्राप्ति होती है? शौचाचारका तथा ब्रह्मचर्यके पालनका क्या फल बताया गया है? ॥ ५ ॥
पितृशुश्रूषणे किं च मातृशुश्रूषणे तथा ।
आचार्यगुरुशुश्रूषास्वनुक्रोशानुकम्पने ॥ ६ ॥
पिता और माताकी सेवासे कौन-सा फल प्राप्त होता है? आचार्य एवं गुरुकी सेवासे तथा प्राणियोंपर अनुग्रह एवं दयाभाव बनाये रखनेसे किस फलकी प्राप्ति होती है? ॥ ६ ॥
एतत् सर्वमशेषेण पितामह यथातथम् ।
वेत्तुमिच्छामि धर्मज्ञ परं कौतूहलं हि मे ॥ ७ ॥ धर्मज्ञ पितामह! यह सब मैं यथावत् रूपसे जानना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥
भीष्म उवाच
यो व्रतं वै यथोद्दिष्टं तथा सम्प्रतिपद्यते । अखण्डं सम्यगारभ्य तस्य लोकाः सनातनाः ॥ ८ ॥ **भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे किसी व्रतको आरम्भ करके उसे अखण्डरूपसे निभा देते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
नियमानां फलं राजन् प्रत्यक्षमिह दृश्यते । नियमानां क्रतूनां च त्वयावाप्तमिदं फलम् ॥ ९ ॥ राजन्! संसारमें नियमोंके पालनका फल तो प्रत्यक्ष देखा जाता है। तुमने भी यह नियमों और यज्ञोंका ही फल प्राप्त किया है ॥ ९ ॥
स्वधीतस्यापि च फलं दृश्यतेऽमुत्र चेह च । इहलोकेऽथवा नित्यं ब्रह्मलोके च मोदते ॥ १० ॥ वेदोंके स्वाध्यायका फल भी इहलोक और परलोकमें भी देखा जाता है। स्वाध्यायशील द्विज इहलोक और ब्रह्मलोकमें भी सदा आनन्द भोगता है ॥ १० ॥
दमस्य तु फलं राजन् शृणु त्वं विस्तरेण मे । दान्ताः सर्वत्र सुखिनो दान्ताः सर्वत्र निर्वृताः ॥ ११ ॥ राजन्! अब तुम मुझसे विस्तारपूर्वक दम (इन्द्रियसंयम)के फलका वर्णन सुनो। जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सुखी और सर्वत्र संतुष्ट रहते हैं ॥ ११ ॥
यत्रेच्छागामिनो दान्ताः सर्वशत्रुनिषूदनाः । प्रार्थयन्ति च यद् दान्ता लभन्ते तन्न संशयः ॥ १२ ॥ वे जहाँ चाहते हैं वहीं चले जाते हैं और जिस वस्तुकी इच्छा करते हैं वही उन्हें प्राप्त हो जाती है। वे सम्पूर्ण शत्रुओंका अन्त कर देते हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥
युज्यन्ते सर्वकामैर्हि दान्ताः सर्वत्र पाण्डव । स्वर्गे यथा प्रमोन्दन्ते तपसा विक्रमेण च ॥ १३ ॥ दानैर्यज्ञैश्च विविधैस्तथा दान्ताः क्षमान्विताः । पाण्डुनन्दन! जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सम्पूर्ण मनचाही वस्तुएँ प्राप्त कर लेते हैं। वे अपनी तपस्या, पराक्रम, दान तथा नाना प्रकारके यज्ञोंसे स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। इन्द्रियोंका दमन करनेवाले पुरुष क्षमाशील होते हैं ॥ १३ १/२ ॥
दानाद् दमो विशिष्टो हि ददत्किंचित् द्विजातये ॥ १४ ॥ दाता कुप्यति नो दान्तस्तस्माद् दानात् परं दमः ।
यस्तु दद्यादकुप्यन् हि तस्य लोकाः सनातनाः ॥ १५ ॥ दानसे दमका स्थान ऊँचा होता है। दानी पुरुष ब्राह्मणको कुछ दान करते समय कभी क्रोध भी कर सकता है; परंतु दमनशील या जितेन्द्रिय पुरुष कभी क्रोध नहीं करता; इसलिये दम (इन्द्रिय-संयम) दानसे श्रेष्ठ है। जो दाता बिना क्रोध किये दान करता है उसे सनातन (नित्य) लोक प्राप्त होते हैं ॥ १४-१५ ॥
क्रोधो हन्ति हि यद् दानं तस्माद् दानात् परं दमः । अदृश्यानि महाराज स्थानान्ययुतशो दिवि ॥ १६ ॥ ऋषीणां सर्वलोकेषु यानि ते यान्ति देवताः । दमेन यानि नृपते गच्छन्ति परमर्षयः ॥ १७ ॥ कामयाना महत्स्थानं तस्माद् दानात् परं दमः । दान करते समय यदि क्रोध आ जाय तो वह दानके फलको नष्ट कर देता है; इसलिये उस क्रोधको दबानेवाला जो दमनामक गुण है, वह दानसे श्रेष्ठ माना गया है। महाराज! नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले ऋषियोंके स्वर्गमें सहस्रों अदृश्य स्थान हैं, जिनमें दमके पालनद्वारा महान् लोककी इच्छा रखनेवाले महर्षि और देवता इस लोकसे जाते हैं; अतः 'दम' दानसे श्रेष्ठ है ॥ १६-१७ १/२ ॥
अध्यापकः परिक्लेशादक्षयं फलमश्नुते ॥ १८ ॥ विधिवत् पावकं हुत्वा ब्रह्मलोके नराधिप । नरेन्द्र! शिष्योंको वेद पढ़ानेवाला अध्यापक क्लेश सहन करनेके कारण अक्षय फलका भागी होता है। अग्निमें विधिपूर्वक हवन करके ब्राह्मण ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १८ १/२ ॥
अधीत्यापि हि यो वेदान् न्यायविद्भ्यः प्रयच्छति ॥ १९ ॥ गुरुकर्मप्रशंसी तु सोऽपि स्वर्गे महीयते । जो वेदोंका अध्ययन करके न्यायपरायण शिष्योंको विद्यादान करता है तथा गुरुके कर्मोंकी प्रशंसा करनेवाला है, वह भी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
क्षत्रियोऽध्ययने युक्तो यजने दानकर्मणि । युद्धे यश्च परित्राता सोऽपि स्वर्गे महीयते ॥ २० ॥ वेदाध्ययन, यज्ञ और दानकर्ममें तत्पर रहनेवाला तथा युद्धमें दूसरोंकी रक्षा करनेवाला क्षत्रिय भी स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ २० ॥
वैश्यः स्वकर्मनिरतः प्रदानाल्लभते महत् । शूद्रः स्वकर्मनिरतः स्वर्गं शुश्रूषयार्च्छति ॥ २१ ॥ अपने कर्ममें लगा हुआ वैश्य दान देनेसे महत्-पदको प्राप्त होता है। अपने कर्ममें तत्पर रहनेवाला शूद्र सेवा करनेसे स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २१ ॥
शूरा बहुविधाः प्रोक्तास्तेषामर्थांस्तु मे शृणु ।
शूरान्वयानां निर्दिष्टं फलं शूरस्य चैव हि ॥ २२ ॥
शूरवीरोंके अनेक भेद बताये गये हैं। उन सबके तात्पर्य मुझसे सुनो। उन शूरोंके वंशजों तथा शूरोंके लिये जो फल बताया गया है, उसे बता रहा हूँ ॥ २२ ॥
यज्ञशूरा दमे शूराः सत्यशूरास्तथापरे ।
युद्धशूरास्तथैवोक्ता दानशूराश्च मानवाः ॥ २३ ॥
(बुद्धिशूरास्तथा चान्ये क्षमाशूरास्तथा परे ।)
कुछ लोग यज्ञशूर हैं। कुछ इन्द्रियसंयममें शूर होनेके कारण दमशूर कहलाते हैं। इसी प्रकार कितने ही मानव सत्यशूर, युद्धशूर, दानशूर, बुद्धिशूर तथा क्षमाशूर कहे गये हैं ॥ २३ ॥
सांख्यशूराश्च बहवो योगशूरास्तथापरे ।
अरण्ये गृहवासे च त्यागे शूरास्तथापरे ॥ २४ ॥
बहुत-से मनुष्य सांख्यशूर, योगशूर, वनवासशूर, गृहवासशूर तथा त्यागशूर हैं ॥ २४ ॥
आर्जवे च तथा शूराः शमे वर्तन्ति मानवाः ।
तैस्तैश्च नियमैः शूरा बहवः सन्ति चापरे ।
वेदाध्ययनशूराश्च शूराश्चाध्यापने रताः ॥ २५ ॥
गुरुशुश्रूषया शूराः पितृशुश्रूषयापरे ।
मातृशुश्रूषया शूरा भैक्ष्यशूरास्तथापरे ॥ २६ ॥
कितने मानव सरलता दिखानेमें शूरवीर हैं। बहुत-से शम (मनोनिग्रह) में ही शूरता प्रकट करते हैं। विभिन्न नियमोंद्वारा अपना शौर्य सूचित करनेवाले और भी बहुत-से शूरवीर हैं। कितने ही वेदाध्ययनशूर, अध्यापनशूर, गुरुशुश्रूषाशूर, पितृसेवाशूर, मातृसेवाशूर तथा भिक्षाशूर हैं ॥ २५-२६ ॥
अरण्ये गृहवासे च शूराश्चातिथिपूजने ।
सर्वे यान्ति पराँल्लोकान् स्वकर्मफलनिर्जितान् ॥ २७ ॥
कुछ लोग वनवासमें, कुछ गृहवासमें और कुछ लोग अतिथियोंकी सेवा-पूजामें शूरवीर होते हैं। ये सब-के-सब अपने कर्मफलोंद्वारा उपार्जित उत्तम लोकोंमें जाते हैं ॥ २७ ॥
धारणं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम् ।
सत्यं च ब्रुवतो नित्यं समं वा स्यान्न वा समम् ॥ २८ ॥
सम्पूर्ण वेदोंको धारण करना और समस्त तीर्थोंमें स्नान करना—इन सत्कर्मोंका पुण्य सदा सत्य बोलनेवाले पुरुषके पुण्यके बराबर हो सकता है या नहीं; इसमें सन्देह है। अर्थात् इनसे सत्य श्रेष्ठ है ॥ २८ ॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।
अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ २९ ॥
यदि तराजूके एक पलड़ेपर एक हजार अश्वमेध यज्ञोंका पुण्य और दूसरे पलड़ेपर केवल सत्य रखा जाय तो एक सहस्र अश्वमेध यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका ही पलड़ा भारी होगा ॥ २९ ॥ सत्येन सूर्यस्तपति सत्येनाग्निः प्रदीप्यते । सत्येन मरुतो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ३० ॥ सत्यके प्रभावसे सूर्य तपते हैं, सत्यसे अग्नि प्रज्वलित होती है और सत्यसे ही वायुका सर्वत्र संचार होता है; क्योंकि सब कुछ सत्यपर ही टिका हुआ है ॥ सत्येन देवाः प्रीयन्ते पितरो ब्राह्मणास्तथा । सत्यमाहुः परो धर्मस्तस्मात् सत्यं न लङ्घयेत् ॥ ३१ ॥ देवता, पितर और ब्राह्मण सत्यसे ही प्रसन्न होते हैं। सत्यको ही परम धर्म बताया गया है; अतः सत्यका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिये ॥ ३१ ॥ मुनयः सत्यनिरता मुनयः सत्यविक्रमाः । मुनयः सत्यशपथास्तस्मात् सत्यं विशिष्यते ॥ ३२ ॥ ऋषि-मुनि सत्यपरायण, सत्यपराक्रमी और सत्यप्रतिज्ञ होते हैं। इसलिये सत्य सबसे श्रेष्ठ है ॥ ३२ ॥ सत्यवन्तः स्वर्गलोके मोदन्ते भरतर्षभ । दमः सत्यफलावाप्तिरुक्ता सर्वात्मना मया ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ! सत्य बोलनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। किंतु इन्द्रियसंयम—दम उस सत्यके फलकी प्राप्तिमें कारण है। यह बात मैंने सम्पूर्ण हृदयसे कही है ॥ ३३ ॥ असंशयं विनीतात्मा स वै स्वर्गे महीयते । ब्रह्मचर्यस्य च गुणं शृणु त्वं वसुधाधिप ॥ ३४ ॥ जिसने अपने मनको वशमें करके विनयशील बना दिया है, वह निश्चय ही स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। पृथ्वीनाथ! अब तुम ब्रह्मचर्यके गुणोंका वर्णन सुनो ॥ ३४ ॥ आजन्ममरणाद् यस्तु ब्रह्मचारी भवेदिह । न तस्य किंचिदप्राप्यमिति विद्धि नराधिप ॥ ३५ ॥ नरेश्वर! जो जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त यहाँ ब्रह्मचारी ही रह जाता है, उसके लिये कुछ भी अलभ्य नहीं है, इस बातको जान लो ॥ ३५ ॥ बह्व्यःकोट्यस्त्वृषीणां तु ब्रह्मलोके वसन्त्युत । सत्ये रतानां सततं दान्तानामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ३६ ॥ ब्रह्मलोकमें ऐसे करोड़ों ऋषि निवास करते हैं, जो इस लोकमें सदा सत्यवादी, जितेन्द्रिय और ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) रहे हैं ॥ ३६ ॥ ब्रह्मचर्यं दहेद् राजन् सर्वपापान्युपासितम् । ब्राह्मणेन विशेषेण ब्राह्मणो ह्यग्निरुच्यते ॥ ३७ ॥
राजन्! यदि ब्राह्मण विशेषरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करे तो वह सम्पूर्ण पापोंको भस्म कर डालता है; क्योंकि ब्रह्मचारी ब्राह्मण अग्निस্বরূপ कहा जाता है ।। ३७ ।।
प्रत्यक्षं हि तथा ह्येतद् ब्राह्मणेषु तपस्विषु ।
बिभेति हि यथा शक्रो ब्रह्मचारिप्रधर्षितः ॥ ३८ ॥
तद् ब्रह्मचर्यस्य फलमृषीणामिह दृश्यते ।
मातापित्रोः पूजने यो धर्मस्तमपि मे शृणु ॥ ३९ ॥
तपस्वी ब्राह्मणोंमें यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है; क्योंकि ब्रह्मचारीके आक्रमण करनेपर साक्षात् इन्द्र भी डरते हैं। ब्रह्मचर्यका वह फल यहाँ ऋषियोंमें दृष्टिगोचर होता है। अब तुम माता-पिता आदिके पूजनसे जो धर्म होता है, उसके विषयमें भी मुझसे सुनो ॥ ३८-३९ ॥
शुश्रूषते यः पितरं न चासूयेत् कदाचन ।
मातरं भ्रातरं वापि गुरुमाचार्यमेव च ॥ ४० ॥
तस्य राजन् फलं विद्धि स्वर्लोके स्थानमर्चितम् ।
न च पश्येत नरकं गुरुशुश्रूषयाऽऽत्मवान् ॥ ४१ ॥
राजन्! जो पिता-माता, बड़े भाई, गुरु और आचार्यकी सेवा करता है और कभी उनके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं करता है, उसको मिलनेवाले फलको जान लो। उसे स्वर्गलोकमें सर्वसम्मानित स्थान प्राप्त होता है। मनको वशमें रखनेवाला वह पुरुष गुरुशुश्रूषाके प्रभावसे कभी नरकका दर्शन नहीं करता ॥ ४०-४१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 674)
षट्सप्ततितमोऽध्यायः
गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम
युधिष्ठिर उवाच
विधिं गवां परं श्रोतुमिच्छामि नृप तत्त्वतः ।
येन तान् शाश्वताँल्लोकानर्थिनां प्राप्नुयादिह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**नरेश्वर! अब मैं गोदानकी उत्तम विधिका यथार्थरूपसे श्रवण करना चाहता हूँ; जिससे प्रार्थी पुरुषोंके लिये अभीष्ट सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
न गोदानात् परं किंचिद् विद्यते वसुधाधिप ।
गौर्हि न्यायागता दत्ता सद्यस्तारयते कुलम् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**पृथ्वीनाथ! गोदानसे बढ़कर कुछ भी नहीं है। यदि न्यायपूर्वक प्राप्त हुई गौका दान किया जाय तो वह समस्त कुलका तत्काल उद्धार कर देती है ॥ २ ॥
सतामर्थे सम्यगुत्पादितो यः
स वै कॢप्तः सम्यगाभ्यः प्रजाभ्यः ।
तस्मात् पूर्वं ह्यादिकालप्रवृत्तं
गोदानार्थं शृणु राजन् विधिं मे ॥ ३ ॥
राजन्! ऋषियोंने सत्पुरुषोंके लिये समीचीन भावसे जिस विधिको प्रकट किया है, वही इन प्रजाजनोंके लिये भलीभाँति निश्चित किया गया है। इसलिये तुम आदिकालसे प्रचलित हुई गोदानकी उस उत्तम विधिका मुझसे श्रवण करो ॥ ३ ॥
पुरा गोषूपनीतासु गोषु संदिग्धदर्शिना ।
मान्धात्रा प्रकृतं प्रश्नं बृहस्पतिरभाषत ॥ ४ ॥
पूर्वकालकी बात है, जब महाराज मान्धाताके पास बहुत-सी गौएँ दानके लिये लायी गयीं, तब उन्होंने ‘कैसी गौ दान करे?’ इस संदेहमें पड़कर बृहस्पतिजीसे तुम्हारी ही तरह प्रश्न किया। उस प्रश्नके उत्तरमें बृहस्पतिजीने इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥
द्विजातिमतिसत्कृत्य श्वः कालमभिवेद्य च ।
गोदानार्थे प्रयुञ्जीत रोहिणीं नियतव्रतः ॥ ५ ॥
आह्वानं च प्रयुञ्जीत समंगे बहुलेति च ।
प्रविश्य च गवां मध्यमिमां श्रुतिमुदाहरेत् ॥ ६ ॥
गोदान करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह नियमपूर्वक व्रतका पालन करे और ब्राह्मणको बुलाकर उसका अच्छी तरह सत्कार करके कहे कि 'मैं कल प्रातःकाल आपको एक गौ दान करूँगा।' तत्पश्चात् गोदानके लिये वह लाल रंगकी (रोहिणी) गौ मँगवाये और 'समंगे बहुले' इस प्रकार कहकर गायको सम्बोधित करे, फिर गौओंके बीचमें प्रवेश करके इस निम्नांकित श्रुतिका उच्चारण करे— ।। ५-६ ।।
गौर्मे माता वृषभः पिता मे दिवं शर्म जगती मे प्रतिष्ठा । प्रपद्यैवं शर्वरीमुष्य गोषु पुनर्वाणीमुत्सृजेद् गोप्रदाने ।। ७ ।। ‘गौ मेरी माता है। वृषभ (बैल) मेरा पिता है। वे दोनों मुझे स्वर्ग तथा ऐहिक सुख प्रदान करें। गौ ही मेरा आधार है।' ऐसा कहकर गौओंकी शरण ले और उन्हींके साथ मौनावलम्बनपूर्वक रात बिताकर सबेरे गोदानकालमें ही मौन भंग करे—बोले ।। ७ ।।
स तामेकां निशां गोभिः समसख्यः समव्रतः । ऐकात्म्यगमनात् सद्यः कलुषाद् विप्रमुच्यते ।। ८ ।। इस प्रकार गौओंके साथ एक रात रहकर उनके समान व्रतका पालन करते हुए उन्हींके साथ एकात्मभावको प्राप्त होनेसे मनुष्य तत्काल सब पापोंसे छूट जाता है ।।
उत्सृष्टवृषवत्सा हि प्रदेया सूर्यदर्शने । त्रिदिवं प्रतिपत्तव्यमर्थवादाशिषस्तव ।। ९ ।। राजन्! सूर्योदयके समय बछड़ेसहित गौका तुम्हें दान करना चाहिये। इससे स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी और अर्थवाद मन्त्रोंमें जो आशीः (प्रार्थना) की गयी है, वह तुम्हारे लिये सफल होगी ।। ९ ।।
ऊर्जस्विन्य ऊर्जमेधाश्च यज्ञे गर्भोऽमृतस्य जगतोऽस्य प्रतिष्ठा । क्षिते रोहः प्रवहः शश्वदेव प्राजापत्याः सर्वमित्यर्थवादाः ।। १० ।। (वे मन्त्र इस प्रकार हैं, गोदानके पश्चात् इनके द्वारा प्रार्थना करनी चाहिये—) ‘गौएँ उत्साहसम्पन्न, बल और बुद्धिसे युक्त, यज्ञमें काम आनेवाले अमृतस्वरूप हविष्यके उत्पत्तिस्थान, इस जगत्की प्रतिष्ठा (आश्रय), पृथ्वीपर बैलोंके द्वारा खेती उपजानेवाली, संसारके अनादि प्रवाहको प्रवृत्त करनेवाली और प्रजापतिकी पुत्री हैं। यह सब गौओंकी प्रशंसा है ।। १० ।।
गावो ममैनः प्रणुदन्तु सौर्या- स्तथा सौम्याः स्वर्गयानाय सन्तु । आत्मानं मे मातृवच्चाश्रयन्तु
यथानुक्ताः सन्तु सर्वाशिषो मे ॥ ११ ॥ ‘सूर्य और चन्द्रमाके अंशसे प्रकट हुई वे गौएँ हमारे पापोंका नाश करें। हमें स्वर्ग आदि उत्तम लोकोंकी प्राप्तिमें सहायता दें। माताकी भाँति शरण प्रदान करें। जिन इच्छाओंका इन मन्त्रोंद्वारा उल्लेख नहीं हुआ है और जिनका हुआ है, वे सभी गोमाताकी कृपासे मेरे लिये पूर्ण हों ॥ ११ ॥ शोषोत्सर्गे कर्मभिर्देहमोक्षे सरस्वत्यः श्रेयसे सम्प्रवृत्ताः । यूयं नित्यं सर्वपुण्योपवाह्यां दिशध्वं मे गतिमिष्टां प्रसन्नाः ॥ १२ ॥ ‘गौओ! जो लोग तुम्हारी सेवा करते हुए तुम्हारी आराधनामें लगे रहते हैं, उनके उन कर्मोंसे प्रसन्न होकर तुम उन्हें क्षय आदि रोगोंसे छुटकारा दिलाती हो और ज्ञानकी प्राप्ति कराकर उन्हें देहबन्धनसे भी मुक्त कर देती हो। जो मनुष्य तुम्हारी सेवा करते हैं, उनके कल्याणके लिये तुम सरस्वती नदीकी भाँति सदा प्रयत्नशील रहती हो। गोमाताओ! तुम हमारे ऊपर सदा प्रसन्न रहो और हमें समस्त पुण्योंके द्वारा प्राप्त होनेवाली अभीष्ट गति प्रदान करो ॥ १२ ॥ या वै यूयं सोऽहमद्यैव भावो युष्मान् दत्त्वा चाहमात्मप्रदाता । मनश्च्युता मन एवोपपन्नाः संधुक्षध्वं सौम्यरूपोग्ररूपाः ॥ १३ ॥ एवं तस्याग्रे पूर्वमर्धं वदेत गवां दाता विधिवत् पूर्वदृष्टः । प्रतिब्रूयाच्छेषमर्धं द्विजातिः प्रतिगृह्णन् वै गोप्रदाने विधिज्ञः ॥ १४ ॥ ‘इसके बाद प्रथम दृष्टिपथमें आया हुआ दाता पहले विधिपूर्वक निम्नांकित आधे श्लोकका उच्चारण करे ‘या वै यूयं सोऽहमद्यैव भावो युष्मान् दत्त्वा चाहमात्मप्रदाता ।’—गौओ! तुम्हारा जो स्वरूप है, वही मेरा भी है—तुममें और हममें कोई अन्तर नहीं है; अतः आज तुम्हें दानमें देकर हमने अपने आपको ही दान कर दिया है।’ दाताके ऐसा कहनेपर दान लेनेवाला गोदानविधिका ज्ञाता ब्राह्मण शेष आधे श्लोकका उच्चारण करे—‘मनश्च्युता मन एवोपपन्नाः संधुक्षध्वं सौम्य-रूपोग्ररूपाः ।’—गौओ! तुम शान्त और प्रचण्डरूप धारण करनेवाली हो। अब तुम्हारे ऊपर दाताका ममत्व (अधिकार) नहीं रहा, अब तुम मेरे अधिकारमें आ गयी हो; अतः अभीष्ट भोग प्रदान करके तुम मुझे और दाताको भी प्रसन्न करो’ ॥ १३-१४ ॥ गोप्रदानीति वक्तव्यमर्घ्यवस्त्रवसुप्रदः ।
ऊर्ध्वास्या भवितव्या च वैष्णवीति च चोदयेत् ।। १५ ।।
नाम संकीर्तयेत् तस्या यथासंख्योत्तरं स वै ।
'जो गौके निष्क्रयरूपसे उसका मूल्य, वस्त्र अथवा सुवर्ण दान करता है, उसको भी गोदाता ही कहना चाहिये। मूल्य, वस्त्र एवं सुवर्णरूपमें दी जानेवाली गौओंका नाम क्रमशः ऊर्ध्वास्या, भवितव्या और वैष्णवी है। संकल्पके समय इनके इन्हीं नामोंका उच्चारण करना चाहिये अर्थात् 'इमां ऊर्ध्वास्यां' 'इमां भवितव्यां' 'इमां वैष्णवीं' तुभ्यमहं संप्रददे त्वं गृहाण—मैं यह ऊर्ध्वास्या, भवितव्या या वैष्णवी गौ आपको दे रहा हूँ, आप इसे ग्रहण करें।'-ऐसा कहकर ब्राह्मणको वह दान ग्रहण करनेके लिये प्रेरित करना चाहिये ।। १५ १/२ ।।
फलं षट्त्रिंशदष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः ।। १६ ।।
एवमेतान् गुणान् विद्याद् गवादीनां यथाक्रमम् ।
गोप्रदाता समाप्नोति समस्तानष्टमे क्रमे ।। १७ ।।
'इनके दानका फल क्रमशः इस प्रकार है—गौका मूल्य देनेवाला छत्तीस हजार वर्षोंतक, गौकी जगह वस्त्र दान करनेवाला आठ हजार वर्षोंतक तथा गौके स्थानमें सुवर्ण देनेवाला पुरुष बीस हजार वर्षोंतक परलोकमें सुख भोगता है। इस प्रकार गौओंके निष्क्रय दानका क्रमशः फल बताया गया है। इसे अच्छी तरह जान लेना चाहिये। साक्षात् गौका दान लेकर जब ब्राह्मण अपने घरकी ओर जाने लगता है, उस समय उसके आठ पग जाते-जाते ही दाताको अपने दानका फल मिल जाता है ।। १६-१७ ।।
गोदः शीली निर्भयश्चार्थदाता
न स्याद् दुःखी वसुदाता च कामम् ।
उषस्योत्था भारते यश्च विद्वान्
विख्यातास्ते वैष्णवाश्चन्द्रलोकाः ।। १८ ।।
'साक्षात् गौका दान करनेवाला शीलवान् और उसका मूल्य देनेवाला निर्भय होता है तथा गौकी जगह इच्छानुसार सुवर्ण दान करनेवाला मनुष्य कभी दुःखमें नहीं पड़ता है। जो प्रातःकाल उठकर नैतिक नियमोंका अनुष्ठान करनेवाला और महाभारतका विद्वान् है तथा जो विख्यात वैष्णव हैं, वे सब चन्द्रलोकमें जाते हैं ।। १८ ।।
गा वै दत्त्वा गोव्रती स्यात् त्रिरात्रं
निशां चैकां संवसेतेह ताभिः ।
कामाष्टम्यां वर्तितव्यं त्रिरात्रं
रसैर्वा गोः शकृता प्रस्नवैर्वा ।। १९ ।।
'गौका दान करनेके पश्चात् मनुष्यको तीन राततक गोव्रतका पालन करना चाहिये और यहाँ एक रात गौओंके साथ रहना चाहिये। कामाष्टमीसे लेकर तीन राततक गोबर, गोदुग्ध अथवा गोरसमात्रका आहार करना चाहिये ।। १९ ।।
देवव्रती स्याद् वृषभप्रदाने वेदावाप्तिर्गोयुगस्य प्रदाने । तथा गवां विधिमासाद्य यज्वा लोकानग्र्यान् विन्दते नाविधिज्ञः ॥ २० ॥ ‘जो पुरुष एक बैलका दान करता है, वह देवव्रती (सूर्यमण्डलका भेदन करके जानेवाला ब्रह्मचारी) होता है। जो एक गाय और एक बैल दान करता है उसे वेदोंकी प्राप्ति होती है, तथा जो विधिपूर्वक गोदान यज्ञ करता है उसे उत्तम लोक मिलते हैं, परन्तु जो विधिको नहीं जानता, उसे उत्तम फलकी प्राप्ति नहीं होती ॥ २० ॥
कामान् सर्वान् पार्थिवानेकसंस्थान् यो वै दद्यात् कामदुघांच धेनुम् । सम्यक्ताः स्युर्हव्यकव्यौघवत्य- स्तासामुक्ष्णां ज्यायसां सम्प्रदानम् ॥ २१ ॥ ‘जो इच्छानुसार दूध देनेवाली धेनुका दान करता है, वह मानो समस्त पार्थिव भोगोंका एक साथ ही दान कर देता है। जब एक गौके दानका ऐसा माहात्म्य है तब हव्य-कव्यकी राशिसे सुशोभित होनेवाली बहुत-सी गौओंका यदि विधिपूर्वक दान किया जाय तो कितना अधिक फल हो सकता है? नौजवान बैलोंका दान उन गौओंसे भी अधिक पुण्यदायक होता है ॥ २१ ॥
न चाशिष्यायाव्रतायोपकुर्या- न्नाश्रद्दधानाय न वक्रबुद्धये । गुह्यो ह्ययं सर्वलोकस्य धर्मो नेमं धर्मं यत्र तत्र प्रजल्पेत् ॥ २२ ॥ ‘जो मनुष्य अपना शिष्य नहीं है, जो व्रतका पालन नहीं करता, जिसमें श्रद्धाका अभाव है तथा जिसकी बुद्धि कुटिल है, उसे इस गोदान-विधिका उपदेश न दे; क्योंकि यह सबसे गोपनीय धर्म है; अतः इसका यत्र-तत्र सर्वत्र प्रचार नहीं करना चाहिये ॥ २२ ॥
सन्ति लोकेऽश्रद्दधाना मनुष्याः सन्ति क्षुद्रा राक्षसमानुषेषु । एषामेतद् दीयमानं ह्यनिष्टं ये नास्तिक्यं चाश्रयन्तेऽल्पपुण्याः ॥ २३ ॥ ‘संसारमें बहुत-से अश्रद्धालु हैं (जो इन सब बातोंपर विश्वास नहीं करते) तथा राक्षसी प्रकृतिके मनुष्योंमें बहुत-से ऐसे क्षुद्र पुरुष हैं (जिन्हें ये बातें अच्छी नहीं लगतीं), कितने ही पुण्यहीन मानव नास्तिकताका सहारा लिये रहते हैं। उन सबको इसका उपदेश देना अभीष्ट नहीं है, उलटे अनिष्टकारक होता है’ ॥ २३ ॥
बार्हस्पत्यं वाक्यमेतन्निशम्य
ये राजानो गोप्रदानानि दत्त्वा । लोकान् प्राप्ताः पुण्यशीलाः प्रवृत्ता- स्तान् मे राजन् कीर्त्यमानान् निबोध ॥ २४ ॥ राजन्! बृहस्पतिजीके इस उपदेशको सुनकर जिन राजाओंने गोदान करके उसके प्रभावसे उत्तम लोक प्राप्त किये तथा जो सदाके लिये पुण्यात्मा बनकर सत्कर्मोंमें प्रवृत्त हुए, उनके नामोंका उल्लेख करता हूँ, सुनो ॥ २४ ॥
उशीनरो विष्वगश्वो नृगश्च भगीरथो विश्रुतो यौवनाश्वः । मान्धाता वै मुचुकुन्दश्च राजा भूरिद्युम्नो नैषधः सोमकश्च ॥ २५ ॥ पुरूरवो भरतश्चक्रवर्ती यस्यान्ववाये भरताः सर्व एव । तथा वीरो दाशरथिश्च रामो ये चाप्यन्ये विश्रुताः कीर्तिमन्तः ॥ २६ ॥ तथा राजा पृथुकर्मा दिलीपो दिवं प्राप्तो गोप्रदानैर्विधिज्ञः । यज्ञैर्दानैस्तपसा राजधर्मै- र्मान्धाताभूद् गोप्रदानैश्च युक्तः ॥ २७ ॥ उशीनर, विष्वगश्व, नृग, भगीरथ, सुविख्यात युवनाश्वकुमार महाराज मान्धाता, राजा मुचुकुन्द, भूरिद्युम्न, निषधनरेश नल, सोमक, पुरूरवा, चक्रवर्ती भरत—जिनके वंशमें होनेवाले सभी राजा भारत कहलाये, दशरथनन्दन वीर श्रीराम, अन्यान्य विख्यात कीर्तिवाले नरेश तथा महान् कर्म करनेवाले राजा दिलीप—इन समस्त विधिज्ञ नरेशोंने गोदान करके स्वर्गलोक प्राप्त किया है। राजा मान्धाता तो यज्ञ, दान, तपस्या, राजधर्म तथा गोदान आदि सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न थे ॥ २५—२७ ॥
तस्मात् पार्थ त्वमपीमां मयोक्तां बार्हस्पतीं भारतीं धारयस्व । द्विजाग्र्येभ्यः सम्प्रयच्छस्व प्रीतो गाः पुण्या वै प्राप्य राज्यं कुरूणाम् ॥ २८ ॥ अतः कुन्तीनन्दन! तुम भी मेरे कहे हुए बृहस्पतिजीके इस उपदेशको धारण करो और कौरव-राज्यपर अधिकार पाकर उत्तम ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक पवित्र गौओंका दान करो ॥ २८ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथा सर्वं कृतवान् धर्मराजो भीष्मेणोक्तो विधिवद् गोप्रदाने । स मान्धातुर्देवदेवोपदिष्टं सम्यग्धर्मं धारयामास राजा ॥ २९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीने जब इस प्रकार विधिवत् गोदान करनेकी आज्ञा दी, तब धर्मराज युधिष्ठिरने सब वैसा ही किया तथा देवताओंके भी देवता बृहस्पतिजीने मान्धाताके लिये जिस उत्तम धर्मका उपदेश किया था, उसको भी भलीभाँति स्मरण रखा ॥ २९ ॥ इति नृप सततं गवां प्रदाने यवशकलान् सह गोमयैः पिबानः । क्षितितलशयनः शिखी यतात्मा वृष इव राजवृषस्तदा बभूव ॥ ३० ॥ नरेश्वर! राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर उन दिनों सदा गोदानके लिये उद्यत होकर गोबरके साथ जौके कणोंका आहार करते हुए मन और इन्द्रियोंके संयमपूर्वक पृथ्वीपर शयन करने लगे। उनके सिरपर जटाएँ बढ़ गयीं और वे साक्षात् धर्मके समान देदीप्यमान होने लगे ॥ ३० ॥ नरपतिरभवत् सदैवताभ्यः प्रयतमनास्त्वभिसंस्तुवंश्च ताः स्म । न च धुरि नृप गामयुक्त भूय- स्तुरगवरैरगमच्च यत्र तत्र ॥ ३१ ॥ नरेन्द्र! राजा युधिष्ठिर सदा ही गौओंके प्रति विनीत-चित्त होकर उनकी स्तुति करते रहते थे। उन्होंने फिर कभी बैलका अपनी सवारीमें उपयोग नहीं किया। वे अच्छे-अच्छे घोड़ोंद्वारा ही इधर-उधरकी यात्रा करते थे ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोदानकथने षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानकथनविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा भूयः शान्तनवं नृपम् ।
गोदानविस्तरं धर्मान् पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने पुनः शान्तनुनन्दन भीष्मसे गोदानकी विस्तृत विधि तथा तत्सम्बन्धी धर्मोंके विषयमें विनयपूर्वक जिज्ञासा की ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
गोप्रदानगुणान् सम्यक् पुनर्मे ब्रूहि भारत ।
न हि तृप्याम्यहं वीर शृण्वानोऽमृतमीदृशम् ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भारत! आप गोदानके उत्तम गुणोंका भलीभाँति पुनः मुझसे वर्णन कीजिये। वीर! ऐसा अमृतमय उपदेश सुनकर मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तो धर्मराजेन तदा शान्तनवो नृपः ।
सम्यगाह गुणांस्तस्मै गोप्रदानस्य केवलान् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस समय शान्तनुनन्दन भीष्म केवल गोदान-सम्बन्धी गुणोंका भलीभाँति (विधिवत्) वर्णन करने लगे ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
वत्सलां गुणसम्पन्नां तरुणीं वस्त्रसंयुताम् ।
दत्त्वेदृशीं गां विप्राय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! वात्सल्यभावसे युक्त, गुणवती और जवान गायको वस्त्र ओढ़ाकर उसका दान करे। ब्राह्मणको ऐसी गायका दान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥
असुर्या नाम ते लोका गां दत्त्वा तान् न गच्छति ।
पीतोदकां जग्धतृणां नष्टक्षीरां निरिन्द्रियाम् ॥ ५ ॥
जरारोगोपसम्पन्नां जीर्णां वापीमिवाजलाम् ।
दत्त्वा तमः प्रविशति द्विजं क्लेशेन योजयेत् ॥ ६ ॥
असूर्य नामके जो अन्धकारमय लोक (नरक) हैं, उनमें गोदान करनेवाले पुरुषको नहीं जाना पड़ता। जिसका घास खाना और पानी पीना प्रायः समाप्त हो चुका हो, जिसका दूध नष्ट हो गया है, जिसकी इन्द्रियाँ काम न दे सकती हों, जो बुढ़ापा और रोगसे आक्रान्त होनेके कारण शरीरसे जीर्ण-शीर्ण हो बिना पानीकी बावड़ीके समान व्यर्थ हो गयी हो, ऐसी गौका दान करके मनुष्य ब्राह्मणको व्यर्थ कष्टमें डालता है और स्वयं भी घोर नरकमें पड़ता है ।। ५-६ ।।
रुषा दुष्टा व्याधिता दुर्बला वा
नो दातव्या याश्च मूल्यैरदत्तैः ।
क्लेशैर्विप्रं योऽफलैः संयुनक्ति
तस्यावीर्याश्चाफलाश्चैव लोकाः ।। ७ ।।
जो क्रोध करनेवाली, दुष्टा, रोगिणी और दुबली-पतली हो तथा जिसका दाम न चुकाया गया हो, ऐसी गौका दान करना कदापि उचित नहीं है। जो इस तरहकी गाय देकर ब्राह्मणको व्यर्थ कष्टमें डालता है, उसे निर्बल और निष्फल लोक ही प्राप्त होते हैं ।। ७ ।।
बलान्विताः शीलवयोपपन्नाः
सर्वे प्रशंसन्ति सुगन्धवत्यः ।
यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा
तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ।। ८ ।।
हृष्ट-पुष्ट, सुलक्षणा, जवान तथा उत्तम गन्धवाली गायकी सभी लोग प्रशंसा करते हैं। जैसे नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, वैसे ही गौओंमें कपिला गौ उत्तम मानी गयी है ।।
युधिष्ठिर उवाच
कस्मात् समाने बहुलाप्रदाने
सद्भिः प्रशस्तं कपिलाप्रदानम् ।
विशेषमिच्छामि महाप्रभावं
श्रोतुं समर्थोऽस्मि भवान् प्रवक्तुम् ।। ९ ।।
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! किसी भी रंगकी गायका दान किया जाय, गोदान तो एक-सा ही होगा? फिर सत्पुरुषोंने कपिला गौकी ही अधिक प्रशंसा क्यों की है? मैं कपिलाके महान् प्रभावको विशेषरूपसे सुनना चाहता हूँ। मैं सुननेमें समर्थ हूँ और आप कहनेमें ।। ९ ।।
भीष्म उवाच
वृद्धानां ब्रुवतां तात श्रुतं मे यत् पुरातनम् ।
वक्ष्यामि तदशेषेण रोहिण्यो निर्मिता यथा ।। १० ।।
भीष्मजीने कहा— बेटा! मैंने बड़े-बूढ़ोंके मुँहसे रोहिणी (कपिला) की उत्पत्तिका जो प्राचीन वृत्तान्त सुना है, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ॥ १०॥ प्रजाः सृजेति चादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा । असृजद् वृत्तिमेवाग्रे प्रजानां हितकाम्यया ॥ ११॥ सृष्टिके प्रारम्भमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रजापति दक्षको यह आज्ञा दी कि 'तुम प्रजाकी सृष्टि करो,' किंतु प्रजापति दक्षने प्रजाके हितकी इच्छासे सर्वप्रथम उनकी आजीविकाका ही निर्माण किया ॥ ११ ॥ यथा ह्यमृतमाश्रित्य वर्तयन्ति दिवौकसः । तथा वृत्तिं समाश्रित्य वर्तयन्ति प्रजा विभो ॥ १२ ॥ प्रभो! जैसे देवता अमृतका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजा आजीविकाके सहारे जीवन धारण करती है ॥ १२ ॥ अचरेभ्यश्च भूतेभ्यश्चराः श्रेष्ठाः सदा नराः । ब्राह्मणाश्च ततः श्रेष्ठास्तेषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥ १३ ॥ स्थावर प्राणियोंसे जंगम प्राणी सदा श्रेष्ठ हैं। उनमें भी मनुष्य और मनुष्योंमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं; क्योंकि उन्हींमें यज्ञ प्रतिष्ठित हैं ॥ १३ ॥ यज्ञैरवाप्यते सोमः स च गोषु प्रतिष्ठितः । ततो देवाः प्रमोदान्ते पूर्वं वृत्तिस्ततः प्रजाः ॥ १४ ॥ यज्ञसे सोमकी प्राप्ति होती है और वह यज्ञ गौओंमें प्रतिष्ठित है, जिससे देवता आनन्दित होते हैं; अतः पहले आजीविका है फिर प्रजा ॥ १४ ॥ प्रजातान्येव भूतानि प्राक्रोशन् वृत्तिकांक्षया । वृत्तिदं चान्वपद्यन्त तृषिताः पितृमातृवत् ॥ १५ ॥ समस्त प्राणी उत्पन्न होते ही जीविकाके लिये कोलाहल करने लगे। जैसे भूखे-प्यासे बालक अपने माँ-बापके पास जाते हैं, उसी प्रकार समस्त जीव जीविकादाता दक्षके पास गये ॥ १५ ॥ इतीदं मनसा गत्वा प्रजासर्गार्थमात्मनः । प्रजापतिस्तु भगवानमृतं प्रापिबत् तदा ॥ १६ ॥ प्रजाजनोंकी इस स्थितिपर मन-ही-मन विचार करके भगवान् प्रजापतिने प्रजावर्गकी आजीविकाके लिये उस समय अमृतका पान किया ॥ १६ ॥ स गतस्तस्य तृप्तिं तु गन्धं सुरभिमुद्गिरन् । ददर्शोद्गारसंवृत्तां सुरभिं मुखजां सुताम् ॥ १७ ॥ अमृत पीकर जब वे पूर्ण तृप्त हो गये, तब उनके मुखसे सुरभि (मनोहर) गन्ध निकलने लगी। सुरभि गन्धके निकलनेके साथ ही 'सुरभि' नामक गौ प्रकट हो गयी, जिसे प्रजापतिने अपने मुखसे प्रकट हुई पुत्रीके रूपमें देखा ॥ १७ ॥
सासृजत् सौरभेयीस्तु सुरभिर्लोकमातृकाः ।
सुवर्णवर्णाः कपिलाः प्रजानां वृत्तिधेनवः ॥ १८ ॥
उस सुरभिने बहुत-सी 'सौरभेयी' नामवाली गौओंको उत्पन्न किया, जो सम्पूर्ण जगत्के लिये माताके समान थीं। उन सबका रंग सुवर्णके समान उद्दीप्त हो रहा था। वे कपिला गौएँ प्रजाजनोंके लिये आजीविकारूप दूध देनेवाली थीं ॥ १८ ॥
तासाममृतवर्णानां क्षरन्तीनां समन्ततः ।
बभूवामृतजः फेनः स्रवन्तीनामिवोर्मिजः ॥ १९ ॥
जैसे नदियोंकी लहरोंसे फेन उत्पन्न होता है, उसी प्रकार चारों ओर दूधकी धारा बहाती हुई अमृत (सुवर्ण) के समान वर्णवाली उन गौओंके दूधसे फेन उठने लगा ॥ १९ ॥
स वत्समुखविभ्रष्टो भवस्य भुवि तिष्ठतः ।
शिरस्यवाप तत् क्रुद्धः स तदैक्षत च प्रभुः ॥ २० ॥
ललाटप्रभवेणाक्ष्णा रोहिणीं प्रदहन्निव ।
एक दिन भगवान् शंकर पृथ्वीपर खड़े थे। उसी समय सुरभिके एक बछड़ेके मुँहसे फेन निकलकर उनके मस्तकपर गिर पड़ा। इससे वे कुपित हो उठे और अपने ललाटजनित नेत्रसे, मानो रोहिणीको भस्म कर डालेंगे, इस तरह उसकी ओर देखने लगे ॥ २० १/२ ॥
तत्तेजस्तु ततो रौद्रं कपिलास्ता विशाम्पते ॥ २१ ॥
नानावर्णत्वमनयन्मेघानिव दिवाकरः ।
प्रजानाथ! रुद्रका वह भयंकर तेज जिन-जिन कपिलाओंपर पड़ा, उनके रंग नाना प्रकारके हो गये। जैसे सूर्य बादलोंको अपनी किरणोंसे बहुरंगा बना देते हैं, उसी प्रकार उस तेजने उन सबको नाना वर्णवाली कर दिया ॥ २१ १/२ ॥
यास्तु तस्मादपक्रम्य सोममेवाभिसंश्रिताः ॥ २२ ॥
यथोत्पन्नाः स्ववर्णास्तास्ता ह्येता नान्यवर्णगाः ।
अथ क्रुद्धं महादेवं प्रजापतिरभाषत ॥ २३ ॥
परंतु जो गौएँ वहाँसे भागकर चन्द्रमाकी ही शरणमें चली गयीं, वे जैसे उत्पन्न हुई थीं वैसे ही रह गयीं। उनका रंग नहीं बदला। उस समय क्रोधमें भरे हुए महादेवजीसे दक्षप्रजापतिने कहा— ॥ २२-२३ ॥
अमृतेनावसिक्तस्त्वं नोच्छिष्टं विद्यते गवाम् ।
यथा ह्यमृतमादाय सोमो विस्यन्दते पुनः ॥ २४ ॥
तथा क्षीरं क्षरन्त्येता रोहिण्योऽमृतसम्भवम् ।
प्रभो! आपके ऊपर अमृतका छींटा पड़ा है। गौओंका दूध बछड़ोंके पीनेसे जूठा नहीं होता। जैसे चन्द्रमा अमृतका संग्रह करके फिर उसे बरसा देता है, उसी प्रकार ये रोहिणी गौएँ अमृतसे उत्पन्न दूध देती हैं ॥ २४ १/२ ॥
न दुष्यत्यनिलो नाग्निर्न सुवर्णं न चोदधिः ॥ २५ ॥
नामृतेनामृतं पीतं वत्सपीता न वत्सला । इमाँल्लोकान् भरिष्यन्ति हविषा प्रस्रवेण च ॥ २६ ॥ आसामैश्वर्यमिच्छन्ति सर्वेऽमृतमयं शुभम् । 'जैसे वायु, अग्नि, सुवर्ण, समुद्र और देवताओंका पीया हुआ अमृत—ये वस्तुएँ उच्छिष्ट नहीं होतीं, उसी प्रकार बछड़ोंके पीनेपर उन बछड़ोंके प्रति स्नेह रखनेवाली गौ भी दूषित या उच्छिष्ट नहीं होती। (तात्पर्य यह कि दूध पीते समय बछड़ेके मुँहसे गिरा हुआ झाग अशुद्ध नहीं माना जाता।) ये गौएँ अपने दूध और घीसे इस सम्पूर्ण जगत्का पालन करेंगी। सब लोग चाहते हैं कि इन गौओंके पास मंगलकारी अमृतमय दुग्धकी सम्पत्ति बनी रहे' ॥ २५-२६½ ॥
वृषभं च ददौ तस्मै सह गोभिः प्रजापतिः ॥ २७ ॥ प्रसादयामास मनस्तेन रुद्रस्य भारत । भरतनन्दन! ऐसा कहकर प्रजापतिने महादेवजीको बहुत-सी गौएँ और एक बैल भेंट किये तथा इसी उपायके द्वारा उनके मनको प्रसन्न किया ॥ २७½ ॥
प्रीतश्चापि महादेवश्चकार वृषभं तदा ॥ २८ ॥ ध्वजं च वाहनं चैव तस्मात् स वृषभध्वजः । महादेवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने वृषभको अपना वाहन बनाया और उसीकी आकृतिसे अपनी ध्वजाको चिह्नित किया, इसीलिये वे 'वृषभध्वज' कहलाये ॥
ततो देवैर्महादेवस्तदा पशुपतिः कृतः । ईश्वरः स गवां मध्ये वृषभाङ्कः प्रकीर्तितः ॥ २९ ॥ तदनन्तर देवताओंने महादेवजीको पशुओंका अधिपति बना दिया और गौओंके बीचमें उन महेश्वरका नाम 'वृषांक' रख दिया ॥ २९ ॥
एवमव्यग्रवर्णानां कपिलानां महौजसाम् । प्रदाने प्रथमः कल्पः सर्वासामेव कीर्तितः ॥ ३० ॥ इस प्रकार कपिला गौएँ अत्यन्त तेजस्विनी और शान्त वर्णवाली हैं। इसीसे दानमें उन्हें सब गौओंसे प्रथम स्थान दिया गया है ॥ ३० ॥
लोकज्येष्ठा लोकवृत्तिप्रवृत्ता रुद्रोपेताः सोमविष्यन्दभूताः । सौम्याः पुण्याः कामदाः प्राणदाश्च गा वै दत्त्वा सर्वकामप्रदः स्यात् ॥ ३१ ॥ गौएँ संसारकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु हैं। ये जगत्को जीवन देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुई हैं। भगवान् शंकर सदा उनके साथ रहते हैं। वे चन्द्रमासे निकले हुए अमृतसे उत्पन्न हुई हैं तथा शान्त, पवित्र, समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली और जगत्को प्राणदान देनेवाली हैं; अतः गोदान करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका दाता माना गया है ॥ ३१ ॥
इदं गवां प्रभवविधानमुत्तमं
पठन् सदाशुचिरपि मंगलप्रियः ।
विमुच्यते कलिकलुषेण मानवः
श्रियं सुतान् धनपशुमाप्नुयात् सदा ॥ ३२ ॥
गौओंकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली इस उत्तम कथाका सदा पाठ करनेवाला मनुष्य अपवित्र हो तो भी मंगलप्रिय हो जाता है और कलियुगके सारे दोषोंसे छूट जाता है। इतना ही नहीं, उसे पुत्र, लक्ष्मी, धन तथा पशु आदिकी सदा प्राप्ति होती है ॥ ३२ ॥
हव्यं कव्यं तर्पणं शान्तिकर्म
यानं वासो वृद्धबालस्य तुष्टिः ।
एतान् सर्वान् गोप्रदाने गुणान् वै
दाता राजन्नाप्नुयाद् वै सदैव ॥ ३३ ॥
राजन्! गोदान करनेवालेको हव्य, कव्य, तर्पण और शान्तिकर्मका फल तथा वाहन, वस्त्र एवं बालकों और वृद्धोंको संतोष प्राप्त होता है। इस प्रकार ये सब गोदानके गुण हैं। दाता इन सबको सदा पाता ही है ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
पितामहस्याथ निशम्य वाक्यं
राजा सह भ्रातृभिराजमीढः ।
सुवर्णवर्णानडुहस्तथा गाः
पार्थो ददौ ब्राह्मणसत्तमेभ्यः ॥ ३४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पितामह भीष्मकी ये बातें सुनकर अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिर और उनके भाइयोंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सोनेके समान रंगवाले बैलों और उत्तम गौओंका दान किया ॥ ३४ ॥
तथैव तेभ्योऽपि ददौ द्विजेभ्यो
गवां सहस्राणि शतानि चैव ।
यज्ञान् समुद्दिश्य च दक्षिणार्थे
लोकान् विजेतुं परमां च कीर्तिम् ॥ ३५ ॥
इसी प्रकार यज्ञोंकी दक्षिणाके लिये, पुण्यलोकोंपर विजय पानेके लिये तथा संसारमें अपनी उत्तम कीर्तिका विस्तार करनेके लिये राजाने उन्हीं ब्राह्मणोंको सैकड़ों और हजारों गौएँ दान कीं ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रभवकथने
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गौओंकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७७ ।।