भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 670, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 670

यस्तु दद्यादकुप्यन् हि तस्य लोकाः सनातनाः ॥ १५ ॥ दानसे दमका स्थान ऊँचा होता है। दानी पुरुष ब्राह्मणको कुछ दान करते समय कभी क्रोध भी कर सकता है; परंतु दमनशील या जितेन्द्रिय पुरुष कभी क्रोध नहीं करता; इसलिये दम (इन्द्रिय-संयम) दानसे श्रेष्ठ है। जो दाता बिना क्रोध किये दान करता है उसे सनातन (नित्य) लोक प्राप्त होते हैं ॥ १४-१५ ॥

क्रोधो हन्ति हि यद् दानं तस्माद् दानात् परं दमः । अदृश्यानि महाराज स्थानान्ययुतशो दिवि ॥ १६ ॥ ऋषीणां सर्वलोकेषु यानि ते यान्ति देवताः । दमेन यानि नृपते गच्छन्ति परमर्षयः ॥ १७ ॥ कामयाना महत्स्थानं तस्माद् दानात् परं दमः । दान करते समय यदि क्रोध आ जाय तो वह दानके फलको नष्ट कर देता है; इसलिये उस क्रोधको दबानेवाला जो दमनामक गुण है, वह दानसे श्रेष्ठ माना गया है। महाराज! नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले ऋषियोंके स्वर्गमें सहस्रों अदृश्य स्थान हैं, जिनमें दमके पालनद्वारा महान् लोककी इच्छा रखनेवाले महर्षि और देवता इस लोकसे जाते हैं; अतः 'दम' दानसे श्रेष्ठ है ॥ १६-१७ १/२ ॥

अध्यापकः परिक्लेशादक्षयं फलमश्नुते ॥ १८ ॥ विधिवत् पावकं हुत्वा ब्रह्मलोके नराधिप । नरेन्द्र! शिष्योंको वेद पढ़ानेवाला अध्यापक क्लेश सहन करनेके कारण अक्षय फलका भागी होता है। अग्निमें विधिपूर्वक हवन करके ब्राह्मण ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १८ १/२ ॥

अधीत्यापि हि यो वेदान् न्यायविद्भ्यः प्रयच्छति ॥ १९ ॥ गुरुकर्मप्रशंसी तु सोऽपि स्वर्गे महीयते । जो वेदोंका अध्ययन करके न्यायपरायण शिष्योंको विद्यादान करता है तथा गुरुके कर्मोंकी प्रशंसा करनेवाला है, वह भी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥

क्षत्रियोऽध्ययने युक्तो यजने दानकर्मणि । युद्धे यश्च परित्राता सोऽपि स्वर्गे महीयते ॥ २० ॥ वेदाध्ययन, यज्ञ और दानकर्ममें तत्पर रहनेवाला तथा युद्धमें दूसरोंकी रक्षा करनेवाला क्षत्रिय भी स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ २० ॥

वैश्यः स्वकर्मनिरतः प्रदानाल्लभते महत् । शूद्रः स्वकर्मनिरतः स्वर्गं शुश्रूषयार्च्छति ॥ २१ ॥ अपने कर्ममें लगा हुआ वैश्य दान देनेसे महत्-पदको प्राप्त होता है। अपने कर्ममें तत्पर रहनेवाला शूद्र सेवा करनेसे स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २१ ॥

शूरा बहुविधाः प्रोक्तास्तेषामर्थांस्तु मे शृणु ।